Uttarakhand

हर गांव-गली में ठेका, हर हाथ में प्याला

बर्बादी तो नवसृजन का पर्याय हो ही नहीं सकती। उत्तराखण्ड में वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए उत्तराखण्ड सरकार ने विभिन्न जिलों में पुरानी दुकानों के अलावा कुछ नई शराब की दुकानें खोलने का फैसला लिया है। उत्तरकाशी जिले में 2, नैनीताल में 3, ऊधमसिंह नगर में 18 और अल्मोड़ा में 10 नई शराब की दुकानें खोलने के फैसले ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाने के साथ ही लोगों को आक्रोशित कर दिया है। शराब की अवैध बिक्री पर रोक लगाने के नाम पर ये दुकानें सुदूर ग्रामीण इलाकों में खुलने जा रही हैं। अल्मोड़ा जिले के रानीखेत व सल्ट विधानसभा क्षेत्र के अंदर खुलने वाली इन दुकानों का स्थानीय निवासियों ने विरोध किया है, साथ ही आंदोलन की चेतावनी दी है। रानीखेत विधानसभा के अंतर्गत खुलने वाली जालीखान और सौनी-देवलीखेत में शराब की दुकानों के खिलाफ ग्रामीणों ने सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु आर्य के नेतृत्व में क्रमिक अनशन शुरू कर दिया है। हिमांशु आर्य का कहना है कि शराब जैसे जहर को रोकने के नाम पर सरकारें जहां मद्यनिषेध दिवस मनाकर जागरूकता का नाटक करती हैं, वहीं सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में शराब की नई दुकनों को खोलकर उत्तराखण्ड की युवा पीढ़ी को गर्त में धकेलने का रास्ता खोल दोहरा मापदंड दिखा रही है

‘ग्रामीण क्षेत्रों में शराब का प्रयोग बिल्कुल नहीं होता और मुझे आशा है कभी नहीं होगा। मुख्य स्टेशनों के अलावा शराब की दुकानें अन्य जगहों पर नहीं खुलने दी जाएंगी।’

ये 1882 में तत्कालीन कमिश्नर रैमजे ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा था- ‘नई शराब की दुकानें खोलना शासन का नीतिगत मामला है। जहां की आप बात कर रहे हैं वहां अवैध शराब की बिक्री होती है। अवैध शराब की बिक्री को रोकने के लिए उक्त क्षेत्र में नई दुकानें खोलने का निर्णय लिया गया है।’

ये शब्द अल्मोड़ा के जिला आबकारी अधिकारी मनोज उपाध्याय के हैं जिन्होंने ये बातें सौनी-देवलीखेत और जालीखान में शराब की दुकान खोलने का विरोध कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु आर्य से टेलीफोन वार्ता के दौरान कहे।
उपरोक्त दोनों कथन पराधीन भारत और स्वतंत्र भारत के अधिकारियों के दृष्टिकोण को बताते हैं कि विदेशी शासक उत्तराखण्ड के मूल्यों के प्रति कितने संवेदनशील थे और वहीं स्वतंत्र भारत के अधिकारियों के लिए शराब महज राजस्व का स्रोत है और जहर का इलाज जहर, भले ही कई पीढ़ियां बर्बाद हो जाएं। अवैध शराब को रोकने के लिए सरकार नई दुकानें खोलकर उसे वैध बनाकर बेचेगी। विदेशी शासक भारतीय मूल्यों के प्रति ज्यादा संवेदनशील व जागरूक वनिस्पत स्वतंत्र हिंदुस्तान के उन अधिकारियों के जो हिंदुस्तान की धरती पर पले-बढ़े हैं।

गांव-गांव में शराब की दुकानें खोलना गलत है। सरकार युवा पीढ़ी को गर्त में नहीं धकेले। एक शराब की दुकान से सरकार को राजस्व जरूर हासिल होता होगा लेकिन इससे कितने परिवार बर्बाद होते हैं सरकार को इसका अंदाज भी जरूर होना चाहिए। जहा तक जालीखान और सौनी- देवलीखेत में नई शराब की दुकान खुलने का सवाल है, सरकार से सकारात्मक संकेत मिले हैं। लेकिन सरकारी आदेश आने तक हम धरना और विरोध जारी रखेंगे।

हिमांशु आर्य, सामाजिक कार्यकर्ता

उत्तराखण्ड के छोटे क्षेत्रों में खुल रही नई शराब की दुकानें जिन्हें सरकारी विज्ञप्ति में ‘नवसृजित’ कहा गया, का विरोध अकारण नहीं है। ये कैसा ‘नवसृजन’ है जिसका अंतिम परिणाम बर्बादी है? बर्बादी तो नवसृजन का पर्याय हो ही नहीं सकती। उत्तराखण्ड में वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए उत्तराखण्ड सरकार ने विभिन्न जिलों में पुरानी दुकानों के अलावा कुछ नई शराब की दुकानें खोलने का फैसला लिया है। उत्तरकाशी जिले में 2, नैनीताल में 3, ऊधमसिंह नगर में 18 और अल्मोड़ा में 10 नई शराब की दुकानें खोलने के फैसले ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाने के साथ ही लोगों को आक्रोशित कर दिया है। शराब की अवैध बिक्री पर रोक लगाने के नाम पर खुलने जा रही ये दुकानें सुदूर ग्रामीण इलाकों में खुलने जा रही हैं। अल्मोड़ा जिले के रानीखेत व सल्ट विधानसभा क्षेत्र के अंदर खुलने वाली इन दुकानों का स्थानीय निवासियों ने विरोध किया है, साथ ही आंदोलन की चेतावनी दी है। रानीखेत विधानसभा के अंतर्गत खुलने वाली जालीखान और सौनी-देवलीखेत में शराब की दुकानों के खिलाफ ग्रामीणों ने सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु आर्य के नेतृत्व में क्रमिक अनशन शुरू कर दिया है। हिमांशु आर्य का कहना है कि शराब जैसे जहर को रोकने के नाम पर सरकारें जहां मद्यनिषेध दिवस मनाकर जागरूकता का नाटक करती हैं, वहीं सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में शराब की नई दुकनों को खोलकर उत्तराखण्ड की युवा पीढ़ी को गर्त में धकेलने का रास्ता खोल दोहरा मापदंड दिखा रही है। इस क्रमिक अनशन पर हर वर्ग का समर्थन मिल रहा है, अगर यह लम्बे आंदोलन का रूप ले ले तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि उत्तराखण्ड में शराब विरोधी आंदोलनों का एक लम्बा इतिहास रहा है। टिंचरी माई (दीपा देवी) का शराब के खिलाफ आंदोलन, 1970 के दशक में उत्तराखण्ड सर्वोदय मंडल द्वारा शुरू किया गया शराब के विरुद्ध आंदोलन और 1984 में अल्मोड़ा जिले के बसभीड़ा-चैखुटिया से शुरू हुआ ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आंदोलन आज भी याद किए जाते हैं जिन्होंने शराब के खिलाफ जागरूकता पैदा करने का काम बड़े पैमाने पर किया। उत्तर प्रदेश हो या फिर उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद पहाड़ी क्षेत्र ही शराब विरोधी आंदोलन के केंद्र में उभरे। पहाड़ की महिलाओं का इसमें बड़ा योगदान रहा क्योंकि इस व्यसन ने उनके जीवन को ज्यादा प्रभावित किया था। 1960 के दशक में दीपा देवी उर्फ टिंचरी माई का शराब के विरुद्ध आंदोलन 60 के दशक में कुमाऊं-गढ़वाल में शराब का बढ़ता प्रचलन आक्रोश का कारण बना। पहाड़ों में आयुर्वेदिक दवाओं के नाम पर बेची जा रही शराब ने परिवारों में कलह का माहौल बना दिया था। महिलाओं ने इसका विरोध करते हुए आंदोलन किए और इन्हीं आंदोलनों के बीच टिंचरी माई के नाम से प्रसिद्ध दीपा देवी ने आयुर्वेदिक दवा के नाम पर शराब बेचने वाली दुकान पर आग लगा दी। सर्वोदय कार्यकर्ताओं द्वारा पर्वतीय क्षेत्रों में चले शराब विरोधी आंदोलन के चलते कई शराब की भट्टियों को बंद कर दिया गया। 1969 में शराब के विरोध को देखते हुए उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ में शराबबंदी लागू कर दी गई। 1970 में टिहरी और पौड़ी में भी शराब बंदी लागू कर दी गई लेकिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा शराब बंदी को अवैध घोषित करते ही सरकार ने आबकारी नीति में संशोधन करते ही नए लाइसेंस जारी कर दिए। लेकिन इसका भारी विरोध हुआ इसमें भी नेतृत्व महिलाओं का ही रहा। जिसमें सरला बहन के नेतृत्व में गिरफ्तारियां दी गईं। अंततः 1972 में पहाड़ के पांचों जिलों में शराब बंदी लागू कर दी गई। शायद यही वो समय था जब पर्वतीय क्षेत्रों में शराब माफियाओं ने पैर पसारने शुरू किए। 2 फरवरी 1984 को चैखुटिया के बसभीड़ा से शुरू हुआ ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आंदोलन के माध्यम से युवा पीढ़ी को जोड़ने का प्रयोग शुरू किया गया। उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी के नेतृत्व में शुरू किए गए आंदोलन ने व्यापक रूप ले लिया जिसमें युवाओं और महिलाओं की बढ़ती भागीदारी, बढ़ती जागरूकताा को दर्शाती थी उसके बाद अल्मोड़ा जिले में आंशिक शराब बंदी लागू जरूर कर दी गई लेकिन अशोका लिक्विड के नाम से शराब माफियाओं ने अपना काम चालू रखा। इतने संघर्षों और आंदोलनों के बाद भी शराब का दायरा बढ़ता गया। शराब लोगों की जरूरत बनी और यही जरूरत सरकारों के लिए राजस्व का स्रोत बन गई।
उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद सरकारों ने खनन और शराब को मुख्य राजस्व का स्रोत मान लिया जैसे राज्य में खनन माफिया पनपे उसी प्रकार शराब माफिया संस्कृति का जन्म हुआ। राजनेता-अफसरशाही और माफिया का गठजोड़ उत्तराखण्ड की सोच पर हावी हो गया। इसी गठजोड़ ने उत्तराखण्ड में अपसंस्कृति की एक नई धारा को जन्म दिया। इस गठजोड़ में पैसा प्राथमिकता है। इसमें जनभावनाओं के लिए कोई जगह नहीं है। एक प्रधान के चुनाव से लेकर सांसद के चुनाव तक जीत का नशा लेने के लिए नेताओं को जनता को नशे में डुबाना जरूरी महसूस होने लगा। शायद चुनावों की जरूरत के मद्देनजर राजनीतिक दल इन मामलों में मौन साध लेना बेहतर समझते हैं। शायद उन्हें पता है कि उनका राजनीतिक आचरण उनके सामाजिक आचरण से मेल नहीं खाता।

सौनी-बिनसर धाम को जहां पर्यटन के छेत्र में स्थापित कर यहां के युवाओं को रोजगार से जोड़ने, यहां पर्यटकों के लिए आसान व्यवस्था बनाने का कार्य करना था। राज्य के 94 राजकीय उद्यानों, कृषि विभाग, बागवानी से कैसे राजस्व आएगा। इस पर कार्य करना था। लेकिन शासन मंदिरों और ग्रामीण स्थलों को भी अशांत करने को आतुर है। ठेके निरस्त होने तक धरना-प्रदर्शन जारी रहेगा।

दीपक करगेती, महासचिव, कृषक कृषि बागवानी और उद्यमी संगठ

जालीखान और सौनी-देखलीखेत में शराब की दुकान के विरोध में चल रहे आंदोलन में राजनीतिक दलों के नुमाइंदों की गैरमौजूदगी उसी गठजोड़ को सिद्ध करती है कि शराब माफियाओं का गठजोड़ कितना मजबूत है। सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु आर्य और दीपक करगेती के नेतृत्व में चल रहे इस आंदोलन से भले ही राजनीतिक नुमाइंदों ने दूरी बना रखी हो लेकिन आम तबका इससे जुड़ने लगा है। शायद पहली बार है किन्नर समाज किसी आंदोलन को समर्थन देने पहुंचा था।

उत्तराखण्ड का पर्वतीय क्षेत्र स्वाधीनता के बाद से ही शराब के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है लेकिन लोकतांत्रिक भारत की सरकारें अपने ही लोगों की आवाजों को अनसुना करती रही हैं। शराब की अपसंस्कृति सरकारों को उन सवालों से महफूज रखती हैं जो सवाल सरकारें सुनने से डरती हैं और एक नशे में डूबा समााज आजकल की सरकारों को ज्यादा भाता है जिसमें सोचने की क्षमता कम होती है।

बात अपनी-अपनी

मेरे विधानसभा क्षेत्र में शराब की दो दुकानों पर विरोध हो रहा है। इस सम्बंधा में मैं जिलाधिकारी जी से मिला और कहा कि नई दुकानें नहीं खुलनी चाहिए। यही नहीं बल्कि मैंने मुख्यमंत्री साहब को भी इस बाबत एक पत्र लिखा है। इसके बाद माननीय मुख्यमंत्री जी ने अल्मोड़ा जिलाधिकारी से कहा है कि शराब की जिन दुकानों पर आपत्ति है उन पर पुनर्विचार कीजिए। मुझे उम्मीद है कि जिलाधिकारी जी दोनों दुकानों पर पुनर्विचार कर उन्हें निरस्त करा देंगे।

डाॅ. प्रमोद नैनवाल, विधायक, नैनीताल

एक तरफ नशे के खिलाफ अभियान चलाने वाली सरकार है जो युवा पीढ़ी को नशे से दूर करने की बात कहती है तो वही सरकार गांव-गांव में शराब के नए ठेके खुला रही है। मेरे विधानसभा क्षेत्र रानीखेत में भी देवली खेत और सोनी में दो स्थानों पर सरकार ग्रामीणों के विरोध करने के बावजूद भी जबरन ठेके खुलवा रही है। जबकि मुख्यमंत्री का कहना है कि जहां-जहां विरोध हो रहा है वहां-वहां हम ठेके निरस्त कर रहे हैं। अगर अभी भी सरकार अपनी मनमानी पर उतर रही है तो मुझे वहां जाकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलना पड़ेगा।

करण माहरा, प्रदेश अध्यक्ष, उत्तराखण्ड कांग्रेस

सरकार ने बेरोजगारी से ध्यान हटाने के लिए अब नशे की दुकान खोलनी शुरू कर दी है। जब लोग नशे में धुत्त रहेंगे तो वे रोजगार ही नहीं मांगेंगे। ‘नशा नहीं रोजगार दो’ पर हम 40 साल से काम कर रहे हैं। जहां भी कहीं लोग नशे के खिलाफ लड़ाई लड़ेंगे हम वहीं उनको समर्थन देने पहुंचेंगे। नशे को प्रदेश में बढ़ाने के लिए भाजपा और कांग्रेस दोनों जिम्मेदार है। जो भी पार्टी जब सत्ता में होती है वह नशे को पूरा बढ़ावा देती है और जब वह विपक्ष में होती है तो नशे के खिलाफ दिखावटी सुर अलापने लगती है। जो कांग्रेस पहले नशे को गांव-गांव तक पहुंचा रही थी वह अब हमारे आंदोलन ‘नशा नहीं रोजगार दो’ को समर्थन दे रही है। कांग्रेसी नेताओं की जुबान पर अब ‘नशा नहीं रोजगार दो’ है। पहाड़ों में इस समय माफियाराज चल रहा है।

पी.सी. तिवारी, केंद्रीय अध्यक्ष, उपपा

You may also like

MERA DDDD DDD DD