शेख हसीना को मृत्युदंड मिलने के बाद बांग्लादेश एक निर्णायक मोड़ पर है जहां न्याय की मांग और लोकतांत्रिक सुधार की आवश्यकता टकरा रही है वहीं नया अंतरिम शासन भी उन्हीं गलतियों को दोहरा रहा है जिनका आरोप हसीना पर था
बां ग्लादेश इस समय अपने आधुनिक राजनीतिक इतिहास के सबसे जटिल और निर्णायक दौर से गुजर रहा है। कभी दक्षिण एशिया में स्थिरता, आर्थिक उछाल और मजबूत नेतृत्व का दावा करने वाले इस देश की राजनीति आज उसी नेतृत्व की विरासत के कारण गहरे संकट में है। 78 वर्षीय शेख हसीना, जो अगस्त 2024 तक स्वयं को बांग्लादेश के सबसे शक्तिशाली और स्थिर नेता के रूप में प्रस्तुत करती थीं, अब एक अंतरराष्ट्रीय भगोड़ी के रूप में भारत में निर्वासन में हैं और बांग्लादेश की एक अदालत द्वारा अनुपस्थिति में मृत्युदंड की सजा पा चुकी हैं। यह वही हसीना हैं जिन्होंने 15 वर्ष से अधिक समय तक देश पर सख्त शासन किया था और जिन्होंने लोकतंत्र, विकास और सुरक्षा, तीनों के संतुलन को अपने तरीके से परिभाषित किया था। लेकिन 2024 में छात्र आंदोलनों पर हुए निर्मम दमन ने इतिहास को पलट दिया। 1400 से अधिक नागरिकों की मौत, हजारों गिरफ्तारियां और सुरक्षाबलों की बेरोक-टोक कार्रवाई ने हसीना की सत्ता को जमींदोज कर दिया। इसी दमन को आधार बनाकर अंतरिम सरकार के तहत संचालित विशेष अदालत, इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यून ने हसीना को दोषी पाया और उन्हें मौत की सजा सुनाई। हसीना ने इस फैसले को ‘राजनीतिक बदले’ की कार्रवाई कहा, मगर बांग्लादेश में लाखों लोग इसे न्याय का क्षण मान रहे हैं।
यहां विडम्बना यह है कि वही ‘आईटीसी’, जिसे हसीना ने 2010 में युद्ध अपराधियों के लिए बनाया था, वही अब उन्हें सजा देने वाला मंच बन गया। यह न सिर्फ राजनीतिक घटनाओं की करवट का संकेत है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि संस्थानों का दुरुपयोग करने वालों को कभी न कभी उसी व्यवस्था का सामना करना पड़ सकता है। आज बांग्लादेश का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि हसीना दोषी हैं या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या देश उनकी विरासत से मुक्त होकर एक नए लोकतांत्रिक सफर की शुरुआत कर पाएगा या क्या अंतरिम सरकार भी सत्ता और प्रतिशोध के उसी पुराने चक्र में फंस जाएगी जिसने देश की राजनीति को दशकों तक जकड़ कर रखा है।
हसीना के शासनकाल का दूसरा पहलू यह है कि उन्होंने बांग्लादेश की सुरक्षा और आर्थिक नीतियों में तेजी से बदलाव किया। 2009 के बाद उन्होंने उग्रवाद, चरमपंथ और संगठित हिंसा पर कड़ा एक्शन लिया। कई क्षेत्रों में स्थिरता लौटी, उद्योगों का विस्तार हुआ, निर्यात बढ़ा और अर्थव्यवस्था ने ऐतिहासिक छलांग लगाई। प्रति व्यक्ति आय भारत से आगे निकल गई, और जीडीपी पाकिस्तान से ज्यादा हो गया। गारमेंट उद्योग में बांग्लादेश दुनिया में दूसरे स्थान पर पहुंच गया। यह विकास असंदिग्ध है, लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह विकास असमान था और सत्ता तथा पूंजी दोनों कुछ गिने-चुने परिवारों और समूहों के हाथों में केंद्रित रहे।
हसीना की आलोचना सिर्फ राजनीतिक दमन के लिए नहीं हुई। मानवाधिकार संगठन लम्बे समय से कह रहे थे कि उनके शासन में हजारों लोग ‘एनकाउंटर’, ‘गायब’ और ‘अवैध हिरासत’ जैसे तरीकों का शिकार बने। 2009 से 2022 के बीच 2,500 से अधिक ऐसी हत्याएं दर्ज की गईं, जिनमें सरकारी बलों, विशेषकर रैपिड एक्शन बटालियन की भूमिका पर वैश्विक चिंता जताई गई। अमेरिका ने रैपिड बटालियन पर प्रतिबंध भी लगाया। पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, मजदूर संघों और विपक्षी नेताओं पर कठोर कार्रवाई ने यह संदेश दिया कि विकास की विंडो के भीतर असहमति की कोई गुंजाइश नहीं थी। बीएनपी नेता बेगम खालिदा जिया का जेल में रहना, फिर बाद में स्वास्थ्य कारणों से रिहाई, जमाते इस्लामी का चुनावों से प्रतिबंधित होना, शाहिदुल आलम जैसे फोटोग्राफर का गिरफ्तारी में जाना, यह सब उस दौर की आम तस्वीरें थीं। लेकिन हसीना को हटाने के बाद अंतरिम सरकार, जिसका नेतृत्व नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस कर रहे हैं, वह भी आज उन्हीं आरोपों से घिरती दिख रही है। इस समय कई विश्लेषक कह रहे हैं कि यह सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि बदले की राजनीति का नया अध्याय है।
2024 में हसीना के भागने के बाद से बांग्लादेश में जो अंतरिम व्यवस्था बनी, उसका मुख्य उद्देश्य था, लोकतांत्रिक सुधार, निष्पक्ष चुनाव की तैयारी और संस्थानों को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करना। लेकिन घटनाएं इसके विपरीत दिशा में जा रही हैं। सबसे पहले, चट्र लीग, अवामी लीग की छात्र इकाई, को ‘आतंकी संगठन’ घोषित कर दिया गया। इसके बाद 2025 में अवामी लीग को भी राजनीतिक गतिविधियों से प्रतिबंधित कर दिया गया। यह फैसला लाखों समर्थकों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन माना जा रहा है। कई लोग कह रहे हैं कि इस तरह विपक्षी दलों को प्रतिबंधित करना उसी शैली की राजनीति का विस्तार है जिसके लिए हसीना की आलोचना की जाती रही। यहां साफ है कि बांग्लादेश की राजनीति में ‘दुश्मन’ की धारणा इतनी गहरी है कि हर शासन खुद को नैतिक और वैध साबित करने के लिए विपक्ष को ‘खतरा’ या ‘आतंकी रूप’ में पेश करता है। हसीना ने यह किया, अब यूनुस सरकार पर भी ऐसा ही आरोप लग रहा है। यह प्रतिशोध का चक्र बांग्लादेश के लोकतंत्र का सबसे बड़ा अवरोध बन रहा है। इसी दौर में एक और चिंताजनक बात यह है कि मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाएं, जैसे गुमशुदगियां और एनकाउंटर, पिछले एक साल में बंद नहीं हुए हैं। कई रिपोर्टों में कहा गया कि सुरक्षा बल पहले जैसे ही तरीके इस्तेमाल कर रहे हैं, सिर्फ राजनीतिक लक्ष्य बदल गए हैं। इससे यह तर्क मजबूत होता है कि समस्या किसी एक नेता में नहीं बल्कि पूरे ढांचे और सुरक्षा तंत्र के मनोविज्ञान में है, जिसे राजनीतिक नेतृत्व ने वर्षों तक प्रोत्साहित किया। अगर बांग्लादेश 2026 में होने वाले चुनाव को सच में एक नया आरम्भ बनाना चाहता है तो उसे इस ढांचे में गहरे और संस्थागत सुधार करने होंगे। न्याय प्रक्रियाओं को
राजनीतिक रंग से मुक्त करना, विपक्ष के लिए समान राजनीतिक अवसर प्रदान करना, सुरक्षा एजेंसियों को कानून के स्पष्ट दायरे में बांधना और राजनीतिक प्रतिशोध की आदत को रोकना ही वह आधार है जिस पर एक आधुनिक लोकतांत्रिक बांग्लादेश खड़ा हो सकता है।
कई विश्लेषकों का मानना है कि हसीना को सजा देना न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, लेकिन अगर इस प्रक्रिया को ही ऐसा प्रतीक बना दिया जाए कि पूरे राजनीतिक समूह को राजनीति से बाहर कर दिया जाए तो यह लोकतांत्रिक नहीं बल्कि व्यवस्थागत प्रतिशोध बन जाएगा। यही वह मोड़ है जहां बांग्लादेश को चुनाव करना है, क्या वह अतीत की गलतियों को दोहराएगा या उनसे सीखकर आगे बढ़ेगा?
इस समय देश का सबसे बड़ा खतरा यह है कि हर राजनीतिक संक्रमण एक अवसर की बजाय बदले की कार्रवाई बन जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि लोकतंत्र कोई स्थायी ढांचा नहीं बन पाता बल्कि किसी एक दल या नेता की इच्छा का विस्तार बन जाता है।
बांग्लादेश को इस दुष्चक्र से बाहर निकलने के लिए निर्णायक कदम उठाने होंगे। आवामी लीग, चाहे हसीना की नीतियों के कारण बदनाम रही हो, लेकिन वह देश का सबसे पुराना और बड़ा स्वतंत्रता-आंदोलन से निकला दल है। उसे राजनीतिक रूप से प्रतिबंधित करना देश में शून्य पैदा करेगा। लोकतंत्र किसी भी दल को बाहर करके मजबूत नहीं हो सकता, वह तभी मजबूत होता है जब हर दल को बराबर अवसर मिले और जनता को चुनने की पूरी स्वतंत्रता हो।
अंतरिम सरकार के सामने सबसे कठिन चुनौती यह है कि वह संस्थाओं को निष्पक्ष बनाए बिना एक विश्वसनीय चुनाव नहीं करा सकती। अभी भी देश के बड़े हिस्से में विश्वास का संकट है। लोग यह नहीं मानते कि अंतरिम सरकार किसी तरह अतीत से अलग है। अगर 2026 का चुनाव एकतरफा हुआ, किसी बड़े दल को बाहर रखा गया या सुरक्षा बलों की निगरानी में कठोरता रही तो पूरा संक्रमण सवालों के घेरे में आ जाएगा। बांग्लादेश के लिए सबसे बड़ा सबक यह है कि अकेले किसी नेता को हटाने से लोकतंत्र नहीं आता। लोकतंत्र संस्थानों से आता है, निष्पक्ष अदालतों, स्वतंत्र पत्रकारिता, पारदर्शी प्रशासन, जवाबदेह सुरक्षा बलों और राजनीतिक बहुलता से आता है।
यदि अंतरिम सरकार हसीना की नीतियों की सबसे खराब परम्पराओं को ही आगे बढ़ाएगी चाहे वह विपक्ष को दबाने की हो या सुरक्षा बलों को मनमानी की छूट देने की तो बांग्लादेश उसी राजनीतिक हिंसा और अविश्वास के दलदल में लौट आएगा जिससे वह बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है। इसलिए यह निर्णायक क्षण है। हसीना को सजा न्याय का सवाल है, लेकिन बांग्लादेश का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह प्रतिशोध की राजनीति के दायरे से निकलकर संस्थागत लोकतंत्र की स्थापना कर पाए या नहीं।
आज जब देश 2026 के चुनाव की तैयारी कर रहा है, तब यह समय सिर्फ नई सरकार चुनने का नहीं, बल्कि एक नई राजनीतिक संस्कृति बनाने का अवसर है, जहां राजनीतिक विचार का मुकाबला विचार से हो, न कि सत्ता की मशीनरी से। अगर यह नहीं हुआ तो चाहे सत्ता में कोई भी हो, हसीना, बीएनपी या यूनुस, बांग्लादेश उसी इतिहास में फंसा रहेगा, जहां राजनीति विजेता और पराजित का नहीं बल्कि दमनकर्ता और दमन के शिकार का खेल बन जाती है।
यह देश लगातार संघर्षों, तीन बड़े राजनीतिक उत्थान-पतन और कई जनआंदोलनों से गुजरा है। अब समय है कि वह इस चक्र को तोड़े। अंतरराष्ट्रीय समुदाय, मानवाधिकार संगठन और बांग्लादेश के भीतर के लोकतांत्रिक समूह यह मांग कर रहे हैं कि देश अपने संस्थानों को पुनर्गठित करे और उन पर से राजनीतिक दखल हटाए। अगर बांग्लादेश इस दिशा में गम्भीर कदम उठाता है तो यह सिर्फ हसीना युग का अंत नहीं होगा, बल्कि नई शुरुआत होगी, एक ऐसे लोकतंत्र की, जिसमें किसी एक नेता, विचारधारा या दल का वर्चस्व न हो बल्कि जनता की वास्तविक भागीदारी और संस्थाओं की तटस्थता केंद्र में हो।

