यह स्थापित और सर्वविदित सत्य है कि भाजपा अपने जन्म वर्ष 1980 से ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दिशा-निर्देशों पर चलती आई है। जब कभी भी भाजपा संकट में आई उसे नागपुर ने ही सम्भाला। नब्बे के दशक में राम मंदिर निर्माण आंदोलन को संघ और उसके अनुवांशिक संगठनों, विश्व हिंदू परिषद्, बजरंग दल इत्यादि के सहारे ही विराट रूप दे पाने में भाजपा सफल रही थी। यह भी स्थापित सत्य है कि भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष हमेशा से ही संघ की पसंद और सहमति से बनता रहा है। 2014 के बाद लेकिन हालात तेजी से बदले और 2025 आते-आते अब संघ का प्रभाव भाजपा भीतर पहले समान सर्व शक्तिमान का नहीं रहा।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो अब संघ की भूमिका दोयम दर्जे की हो गई है और भाजपा पूरी तरह प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का जेबी संगठन बनकर रह गया है। दिल्ली के सत्ता गलियारों में इन दिनों चैतरफा चर्चा संघ के घटते प्रभाव की सुनने को मिल रही है। 1969 में ‘मोम की गुड़िया’ कह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का उपहास उड़ाने वाले दिग्गज कांग्रेस नेताओं को इंदिरा ने पार्टी तोड़ हाशिए में पटका था। नरेंद्र मोदी ने ऐसा कुछ किए बगैर ही पार्टी में अपनी सत्ता स्थापित करने का काम कर दिखाया है। जानकारों की मानें तो इस वर्ष 75 के होने जा रहे मोदी अभी लम्बे समय तक सत्ता में काबिज रहेंगे लेकिन पूरी सम्भावना है कि इसी वर्ष 75 बरस के होने जा रहे संघ प्रमुख मोहन भागवत उम्र का हवाला दे पदमुक्त हो जाएं। चर्चा यह भी जोरों पर है कि उनका स्थान संघ में नम्बर दो की हैसियत रखने वाले दत्तात्रेय होसबले ले सकते हैं। 70 बरस के दत्तात्रेय को मोदी का करीबी माना जाता है। दिल्ली में रेखा गुप्ता के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह स्पष्ट हो चला है कि मोदी और शाह भाजपा के स्थापित नेताओं को सोची-समझी रणनीति अनुसार ठिकाने लगा रहे हैं ताकि भविष्य की भाजपा पर उनका पूरा नियंत्रण बना रहे और उनकी सत्ता को चुनौती देने वाला कोई बचे ही नहीं। अटल-आडवाणी वाली भाजपा में एक से बढ़कर एक नेता ऐसे थे जो खुद का जनाधार रखते थे और उनकी बात को नजरअंदाज करने का साहस अटल और आडवाणी में भी नहीं था। डाॅ. मुरली मनोहर जोशी, भैरो सिंह शेखावत, शांताकुमार, केशुभाई पटेल, कैलाश जोशी, कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह, प्रमोद महाजन आदि कई दिग्गज तब पार्टी को चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया करते थे। अब लेकिन हालात पूरी तरह से बदल गए हैं और पार्टी का हर बड़ा निर्णय मोदी-शाह की जोड़ी ही लेती है, बाकी सब उनके समर्थन में सिर हिलाने और ताली बजाने का काम करते हैं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को छोड़ आज एक भी भाजपाई मुख्यमंत्री ऐसा नजर नहीं आता जो दिल्ली दरबार के आगे पूरी तरह नतमस्तक न हो। योगी हठी प्रवृत्ति के हैं और उनकी ताकत मोदी-शाह के दरवाजे से होकर नहीं गुजरती। योगी हिंदुत्व का दमदार चेहरा हैं और उनका व्यापक जनाधार हिंदी बेल्ट में मोदी से कम नहीं है। यदि उत्तर प्रदेश और योगी को छोड़ दिया जाए तो हरेक भाजपा शासित राज्य में इस समय स्थापित नेताओं को पूरी तरह दरकिनार कर ऐसे चेहरों को आगे बढ़ाने का काम मोदी-शाह ने किया है जिनको सत्ता इन दो दिग्गजों की कृपा से मिली है और इनकी ही कृपा पर निर्भर करती है। जाहिर है ऐसे में इन सभी क्षत्रपों को अब अपना भविष्य संघ के साथ नजर नहीं आता है। कुल मिलाकर यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या संघ भाजपा पर अपनी तेजी से कमजोर हो रही पकड़ को थाम पाएगा या फिर किसी नए राजनीतिक दल का निर्माण करेगा।

