हिटलर के उदय का इतिहास हमें यह सीख देता है कि तानाशाही कभी अचानक नहीं आती बल्कि धीरे-धीरे समाज की चेतना और राज्य की संस्थाओं को कमजोर करते हुए स्थापित होती है। 1933 में जर्मनी का चांसलर बनने के दो ही वर्षों में हिटलर ने लोकतंत्र का खून करने की नींव रख दी ‘न्यूरेमबर्ग लाॅज’ इस पूरी प्रक्रिया का सबसे क्रूर सबसे निर्णायक अध्याय था।
‘न्यूरेमबर्ग लाॅज’ नाजी शासन द्वारा 1935 में पारित किए गए तीन अत्यंत कुख्यात नस्लीय कानूनों का समूह था जिन्हें जर्मन संसद ने नहीं बल्कि नाजी पार्टी की वार्षिक रैली में हिटलर ने सीधे लागू किया। सबसे महत्वपूर्ण पहला कानून था ‘राइक सिटिजनशिप लाॅ’ जिसने जर्मन नागरिकता को ‘नस्ल’ और ‘रक्त’ से जोड़ दिया। यह कानून कहता था कि वही व्यक्ति जर्मनी का नागरिक है जिसकी नस्ल ‘जर्मनिक यानी आर्य’ हो। यानी नागरिकता अब केवल अधिकार नहीं रह गई थी वह रक्त की शुद्धता का प्रमाण पत्र बन गई। इसके लागू होते ही यहूदी, रोमा और कई अन्य समूह नागरिकता से वंचित कर दिए गए। वे सिर्फ ‘राज्य के सब्जेक्ट’ रह गए, बिना अधिकारों वाले, लेकिन दायित्व उठाने को बाध्य लोग। दूसरा कानून था ‘लाॅ फाॅर द प्रोटेक्शन ऑफ जर्मन ब्लड एंड ऑनर’ जिसके अनुसार जर्मन नागरिकों और यहूदियों के बीच विवाह व किसी भी प्रकार के अन्य सम्बंध अवैध घोषित कर दिए गए। यहूदियों के साथ किसी भी तरह का नजदीकी सम्पर्क ‘रक्त की शुद्धता के विरुद्ध अपराध’ माना गया। तीसरा कानून उन पूरक परिभाषाओं का था जिनमें यह तय किया गया कि कौन यहूदी है, कौन ‘मिश्रित रक्त’ वाला है और किस व्यक्ति को कौन-कौन से अधिकार दिए जा सकते हैं। इन कानूनों ने यहूदियों को सिर्फ अलग नहीं किया बल्कि भेदभाव को नैतिक, धार्मिक, सामाजिक और कानूनी रूप दे दिया। यह कानूनी ढांचा ही बाद में ‘होलोकाॅस्ट’ की नींव बना क्योंकि जनता को यह विश्वास दिलाना आसान हो गया कि जो लोग नागरिक ही नहीं हैं, उनकी सुरक्षा या अधिकारों की क्या आवश्यकता?
हिटलर ने कहा था कि ‘‘वह जर्मन रक्त की शुद्धता बचा रहा है, जर्मन महिलाओं की ‘गौत्रीय रक्षा’ कर रहा है।’’ जर्मन राष्ट्र के सम्मान की रक्षा में यह सब आवश्यक है पर इतिहास ने सिद्ध किया कि इन कानूनों का उद्देश्य सुरक्षा नहीं बल्कि नफरत थी, रक्षा नहीं बल्कि दमन था, और शुद्धता नहीं बल्कि ऐसी विभाजनकारी राजनीति थी जिससे बहुसंख्यक वर्ग सत्ता के पक्ष में झुक जाए। ये कानून नाजी विचारधारा का वह दर्पण हैं जिसमें दिखता है कि जब कोई शासन यह ठान ले कि एक समुदाय को मिटाना है तो वह पहले उसकी नागरिकता छीनता है, फिर उसके सम्बंधों पर रोक लगाता है, फिर उसे सामाजिक रूप से अलग करता है और अंत में उसके खिलाफ हिंसा को सामान्य कर देता है।
हिटलर का यह सफर दिखाता है कि जनता को धीरे-धीरे इस तरह प्रशिक्षित किया जा सकता है कि वह हिंसा को भी राष्ट्रहित माने। उसने प्रेस को अपने नियंत्रण में लिया, विपक्ष को गद्दार कहा, यहूदियों को राष्ट्रद्रोही और सामाजिक अपशिष्ट बताया। समाज का बड़ा वर्ग यह मानने लगा कि यहूदियों की मौजूदगी ही जर्मनी की आर्थिक बदहाली और सांस्कृतिक संकट का मूल कारण है। लोगों ने यह भूलना शुरू कर दिया कि उनके पड़ोसी उसी देश के नागरिक हैं, उनकी अपनी तरह की इच्छाएं और पीड़ा हैं। जब इंसान दूसरे इंसान को मनुष्य के रूप में देखना छोड़ देता है तब इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियां जन्म लेती हैं। अंततः वही हुआ भी, 60 लाख से अधिक यहूदियों का नरसंहार मानव इतिहास का सबसे बड़ा नरसंहार है। लेकिन हिटलर के बाद जर्मन समाज के भीतर गहरा पश्चाताप जन्मा। जर्मनी के हर नागरिक को यह लगा कि उनकी चुप्पी और सहमति भी अपराध का हिस्सा थी। ‘न्यूरेमबर्ग लाॅज’ ही आगे चलकर जर्मन शर्म का प्रतीक बने क्योंकि दुनिया ने माना कि ये कानून लोकतंत्र का उपयोग कर लोकतंत्र को खत्म करने का उदाहरण थे। हिटलर चला गया पर उसका आत्म-प्रताड़ना जर्मनी में पीढ़ियों को शर्मसार करता आ रहा है।
हमारे संदर्भ में यह तुलना इसलिए जरूरी है क्योंकि हम एक ऐसा राष्ट्र हैं जिसकी बुनियादी कल्पना ही हिटलर के विचारों के बिल्कुल उलट रची गई थी। हमारे संविधान निर्माताओं ने विभाजन और हिंसा का नंगा रूप देखा था। वे जानते थे कि समाज में धार्मिक पहचान कितनी जल्दी घृणा का हथियार बन सकती है। इसी अनुभव ने संविधान सभा को प्रेरित किया कि ‘हम’ शब्द को सबसे व्यापक, सबसे समावेशी और सबसे इंसानी अर्थों में गढ़ा जाए।
प्रस्तावना में ‘हम भारत के लोग’ का अर्थ यह नहीं है कि कोई एक पहचान प्रभुत्व में रहे बल्कि इसका अर्थ है कि यह देश हर उस व्यक्ति का है जो यहां रहता है, चाहे उसका धर्म, जाति, भाषा, पंथ, परम्परा, भोजन या पहनावा कुछ भी हो।
संविधान सभा की बहसों में एक बात बहुत स्पष्ट थी कि हमारा राष्ट्र किसी धार्मिक, सांस्कृतिक या नस्लीय श्रेष्ठता पर आधारित नहीं होगा। पंडित नेहरू ने संविधान की उद्देशिका के प्रस्ताव में कहा था कि यह देश सभी का है। सरदार पटेल ने स्पष्ट कहा था कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करना इस राष्ट्र की नैतिक जिम्मेदारी है क्योंकि अगर कोई समुदाय भय में जीता है तो वह पूरे राष्ट्र की आत्मा को असुरक्षित कर देता है। अम्बेडकर ने अपनी अंतिम चेतावनी में कहा था कि अगर हम सामाजिक लोकतंत्र नहीं बनाएंगे तो राजनीतिक लोकतंत्र एक दिन जरूर ढह जाएगा। उनके शब्द आज और भी अधिक सटीक प्रतीत होते हैं कि ‘‘अगर हम एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान करना बंद कर देंगे तो लोकतंत्र का ढांचा अपने आप टूट जाएगा, चाहे संविधान कितना भी मजबूत क्यों न हो।’’ लेकिन दुखद यह है कि आज हम जिस मोड़ पर खड़े हैं, वहां संविधान की मूल चेतना को चुनौती दी जा रही है। आज कई बार ऐसी आवाजें मुखर होती दिखती हैं जो नागरिकता को संदेह से जोड़ देती हैं, किसी समुदाय को राष्ट्रभक्ति की कसौटी पर परखती हैं या किसी समूह को संस्कृति के लिए खतरा बताती हैं।
सोशल मीडिया ने नफरत को तेज, गहरा और सर्वव्यापी बना दिया है। आज नफरत फैलाने के लिए किसी तानाशाह को मंच की नहीं, एक मोबाइल फोन की जरूरत है। यही वह स्थिति है जिसे इतिहासकार सबसे खतरनाक मानते हैं जहां समाज विभाजन को सामान्य समझने लगे और कानून उस विभाजन को वैधता देने लगे।
अगर हम ईमानदारी से दर्पण में झांकें तो दिखेगा कि हम भी आज एक ऐसे कालखंड से गुजर रहे हैं जहां असहमति को राष्ट्रद्रोह समझा जाता है, जहां प्रेस पर दबाव है, जहां विपक्ष को ‘देश के खिलाफ’ कहा जाता है, जहां नागरिकता और धार्मिक पहचान को एक साथ रखकर देखा जा रहा है और जहां कानूनों की दिशा पर यह संदेह बढ़ रहा है कि वे समानता स्थापित करने के लिए हैं या किसी समूह को संदेह के घेरे में डालने के लिए। यही वह बिंदु है जहां हिटलर का इतिहास हमें जोर से झकझोरता है।
हमारे संविधान निर्माताओं ने ऐसी ही स्थिति से बचाने के लिए लोकतंत्र की नींव रखी थी, एक ऐसा लोकतंत्र जहां ‘हम’ का अर्थ सभी हों। लेकिन आज यह ‘हम’ शब्द कई बार सिकुड़ता दिखने लगा है। जब किसी व्यक्ति को उसके धर्म, भोजन, पोशाक या नाम के आधार पर संदेह की निगाह से देखा जाता है, जब भीड़ किसी कानून से ऊपर उठकर फैसला करने लगती है, जब नफरत को राजनीतिक लाभ के लिए उपयोग किया जाता है तो यह संकेत है कि ‘हम’ की अवधारणा कमजोर हो रही है।
स्मरण रहे हिटलर का इतिहास कहता है कि नफरत हमेशा शुरुआत में शक्तिशाली लगती है लेकिन उसका अंत हमेशा शर्म, विनाश और अपराधबोध होता है। जर्मन समाज ने यह कीमत चुकाई। उनका लोकतंत्र ढह गया, उनका समाज टूट गया, उनकी मानवता रक्त में डूब गई। हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह है कि हम इस इतिहास से सीखें। हमारी चेतना को यह याद रखना होगा कि संविधान की आत्मा समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व है। अगर ये कमजोर पड़े तो कोई भी तानाशाह जनता को नफरत में बदल सकता है। हम यह तय करें कि हमारा ‘हम’ वही रहेगा जो संविधान ने गढ़ा था, समावेशी, बराबरी वाला और विविधता को सम्मान देने वाला। इतिहास को दोहराने से रोकने का यही एकमात्र तरीका है।
‘हिटलर की परछाइयां’ एक प्रतीक है, जिनकी प्रवृत्तियां धीरे- धीरे हमारे आस-पास भी दिखाई देने लगी हैं। यह कोई एक घटना नहीं होती, यह धीरे-धीरे बनता वातावरण होता है जिसमें लोग अपने पड़ोसी पर शक करने लगते हैं, जिसमें बहुसंख्यकता अपनी पहचान को सर्वोच्च मानने लगती है और जिसमें किसी समूह को ‘कम राष्ट्रभक्त’ या ‘कम भारतीय’ घोषित करना आसान हो जाता है। इसी वातावरण की जड़ में वह विचारधारा होती है जो समाज को दो हिस्सों में बांटती है, ‘हम और वे’ जबकि संविधान ने स्पष्ट कहा था कि इस देश में सिर्फ ‘हम’ होंगे, ‘वे’ नहीं।
आज हम जिस मोड़ पर खड़े हैं, वहां हमें अपने बच्चों के भविष्य को देखकर यह निर्णय लेना होगा कि हम किस तरह का समाज उन्हें सौंपना चाहते हैं, एक ऐसा समाज जो नफरत को सामान्य बना दे या एक ऐसा समाज जहां हर आवाज की कीमत हो, हर नागरिक की बराबरी स्वीकार की जाए और हर समुदाय को सम्मानजनक जिंदगी मिले। इतिहास कहता है कि नफरत तात्कालिक रूप से लाभ दे सकती है, पर दीर्घकाल में वह राष्ट्र की आत्मा को खोखला कर देती है। जर्मनी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इसलिए ‘हिटलर की परछाइयां’ केवल अतीत की कहानी नहीं, आज की चेतावनी भी हैं और यह चेतावनी हमें सुननी ही होगी, क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता होती है और उसका सबसे बड़ा खतरा भी जनता की उदासीनता ही होती है।
