उत्तराखण्ड में भाजपा के सबसे लम्बे समय तक मुख्यमंत्री बने रहने वाले पुष्कर सिंह धामी अब केवल एक राज्य नेता भर नहीं, बल्कि पार्टी के भावी केंद्रीय नेतृत्व की सबसे विचारशील सम्भावना के रूप में भी देखे जाने लगे हैं। अब तक के उनके कार्यकाल में जो सबसे स्पष्ट बात सामने आती है, वह यह है कि उन्होंने उत्तराखण्ड की राजनीति को ‘स्थायित्व’ दिया है और भाजपा को एक ऐसा चेहरा, जिसे न केवल राज्य, बल्कि राष्ट्र के स्तर पर भी आगे बढ़ाया जा सकता है। संघ के वैचारिक विमर्शों में अब धामी का उल्लेख एक ‘भविष्य के संयमित हिंदुत्ववादी नेता’ के रूप में होने लगा है। प्रधानमंत्री मोदी के 75 वर्ष की आयु पूरी होने के बाद अगर भाजपा नेतृत्व में बदलाव आता है तो पार्टी को ऐसे नेता की जरूरत होगी जो न केवल संघ की सोच को आगे बढ़ाए, बल्कि केंद्र और राज्यों के बीच सामंजस्य भी बनाए रखे। इस प्रोफाइल में धामी का नाम अब शीर्ष पांच में उभरकर आने लगा है
उत्तराखण्ड की राजनीति एक लम्बे समय तक अस्थिरता और नेतृत्व संकट से जूझती रही है। 2000 में राज्य गठन के बाद से एक के बाद एक मुख्यमंत्री बदलते रहे। हर 2 से 3 वर्षों में नया चेहरा सामने आता जो यह दर्शाता था कि न तो पार्टी नेतृत्व को स्थायित्व की चिंता थी, न ही जनमानस को स्पष्ट दिशा मिल रही थी। इस क्रम में 2012 में पहली बार विधायक बने पुष्कर सिंह धामी को 2021 में मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी दी गई तो इसे एक प्रयोग की तरह देखा गया।

त्रिवेंद्र सिंह रावत और तीरथ सिंह रावत की असफलताओं के बाद पार्टी के पास कोई स्थापित नाम नहीं था। गढ़वाल-कुमाऊं क्षेत्रीय संघर्ष, संगठन और सरकार के बीच बढ़ती दूरी, और युवाओं में बढ़ते असंतोष के बीच भाजपा ने एक ऐसा चेहरा सामने रखा जिसे लेकर न जनता में कोई पूर्व धारणा थी और न संगठन में कोई गुटीय पहचान। लेकिन यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी। धामी की नियुक्ति को शुरुआत में अस्थायी समाधान माना गया। यहां तक कि जब 2022 के विधानसभा चुनाव में वे अपनी सीट खटीमा से हार गए, तब भी पार्टी ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर यह स्पष्ट संकेत दिया कि नेतृत्व दिल्ली से तय हो रहा है और वह पुष्कर सिंह धामी में दीर्घकालिक सम्भावना देख रहा है।
अपने कार्यकाल के चार बरस पूरे कर चुके धामी की राजनीतिक शैली संतुलनकारी रही है। वे न तो अतिउग्र हैं, न अतिसंकोची। उन्होंने नाटकीय भाषण नहीं दिए, लेकिन प्रशासनिक निर्णय लिए। उन्होंने नारेबाजी नहीं की, लेकिन संगठन और प्रशासन के बीच पुल बनाए। यही वजह रही कि पार्टी के भीतर मौजूद गढ़वाल लाॅबी जो उन्हें अस्थायी मान रही थी, धीरे-धीरे किनारे होती गई और धामी संगठन व संघ के विश्वस्त बनते गए।
उनकी सबसे बड़ी शक्ति रही उनकी स्वीकार्यता। विपक्ष के लिए भी वे आक्रामक विरोध के पात्र नहीं बने हैं। पत्रकारों, नौकरशाहों और नीति- निर्माताओं में उन्होंने एक विनम्र लेकिन सक्षम नेता की छवि बनाई है। यह छवि भाजपा भीतर उस बदलाव का संकेत है जो मोदी-शाह युग के बाद सामने आ सकता है, जहां आक्रामकता के स्थान पर समन्वय और प्रचार के स्थान पर प्रदर्शन को प्राथमिकता मिले। बतौर मुख्यमंत्री अब तक के उनके कार्यकाल में जो सबसे स्पष्ट बात सामने आती है, वह यह है कि उन्होंने उत्तराखण्ड की राजनीति को ‘स्थायित्व’ दिया है और भाजपा को एक ऐसा चेहरा, जिसे न केवल राज्य, बल्कि राष्ट्र के स्तर पर भी आगे बढ़ाया जा सकता है।
प्रधानमंत्री के विश्वस्त सहयोगी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ पुष्कर सिंह धामी का रिश्ता केवल मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री का नहीं है, बल्कि यह विश्वास, परामर्श और वैचारिक सामंजस्य का सम्बंध है। मोदी जब उत्तराखण्ड आते हैं तो वे न केवल विकास कार्यों का उद्घाटन करते हैं, बल्कि धामी की प्रशंसा भी एक भावी नेता के रूप में करते हैं। 6 मार्च, 2025 को हर्षिल, उत्तरकाशी में एक सभा को सम्बोधित करते हुए ‘मेरे छोटे भाई और ऊर्जावान मुख्यमंत्री’ कह सम्बोधित किया। तब यह संकेत स्पष्ट हो गया कि भाजपा नेतृत्व उन्हें मात्र एक क्षेत्रीय नेता के रूप में नहीं देख रहा। मोदी का उत्तराखण्ड प्रेम सर्वविदित है। केदारनाथ पुनर्निर्माण से लेकर ऑल वेदर रोड तक चारधाम रेललाइन से लेकर ऋषिकेश-कर्णप्रयाग प्रोजेक्ट तक, हर जगह उनकी रुचि रही है। लेकिन इस सबके संचालन में धामी का प्रशासनिक संतुलन और समर्पण प्रधानमंत्री के लिए संतोष का कारण बना। यही कारण है कि वे राज्य में अन्य मुख्यमंत्रियों की तुलना में कहीं अधिक बार आए, योजनाओं की समीक्षा की, और मुख्यमंत्री को हर स्तर पर खुला समर्थन दिया।
संघ के दृष्टिकोण से देखें तो धामी की छवि एक ऐसे स्वयंसेवक की बनती है जिसने अब तक वैचारिक मोर्चे पर समझौता नहीं किया है। समान नागरिक संहिता लागू करना, भू-कानून में सख्ती लाना, धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देना, स्कूलों-मदरसों में नियमितीकरण, ये सब संघ के उस एजेंडे का हिस्सा रहे हैं जो दशकों से राजनीतिक रूप में स्थापित नहीं हो पा रहा था। धामी ने इसे क्रियान्वयन की दिशा में मोड़ा है।
यही कारण है कि संघ की नागपुर बैठकों से लेकर दिल्ली में झंडेवालान स्थित संघ कार्यालय में होने वाले वैचारिक विमर्शों में भी अब धामी का उल्लेख एक ‘भविष्य के संयमित हिंदुत्ववादी नेता’ के रूप में होने लगा है। जहां योगी आदित्यनाथ का चेहरा उग्र हिंदुत्व के लिए स्थापित है, वहीं धामी का संयमित, संवादात्मक और प्रशासनिक चेहरा नई भाजपा की जरूरतों को पूरा करता दिखता है।
राजनीतिक गलियारों में इन दिनों बड़ी चर्चा है कि प्रधानमंत्री मोदी के 75 वर्ष की आयु पूरी होने के बाद अगर भाजपा नेतृत्व में बदलाव आता है तो पार्टी को ऐसे नेता की जरूरत होगी जो न केवल संघ की सोच को आगे बढ़ाए, बल्कि केंद्र और राज्यों के बीच सामंजस्य भी बनाए रखे। इस प्रोफाइल में धामी का नाम अब शीर्ष पांच चेहरों में सामने आ चुका है।
सौम्य लेकिन धाकड़ मुख्यमंत्री की छवि
मुख्यमंत्री बनने के बाद से पुष्कर सिंह धामी ने जिस तीव्र गति से नीतिगत निर्णय लिए हैं, उन्होंने उत्तराखण्ड की राजनीतिक कार्यसंस्कृति में एक नया मापदंड स्थापित किया है। पहले तीन महीनों में ही समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के लिए समिति का गठन, नकल विरोधी कानून का प्रारूप, भू- कानून में संशोधन जैसे फैसले उनकी निर्णायक शैली को दर्शाते हैं। यूसीसी को लेकर जहां अधिकांश राज्य राजनीतिक जोखिम से बचते रहे हैं, वहीं धामी ने इसे एक वैचारिक प्राथमिकता के रूप में आगे बढ़ाया। उत्तराखण्ड देश का पहला राज्य बना जो इस कानून को लागू कर पाया है। इससे न केवल धार्मिक समानता की भावना को बल मिला है, बल्कि भाजपा के वैचारिक आधार को भी नई ऊर्जा मिली है।
नकल विरोधी कानून ने उत्तराखण्ड में युवाओं का भरोसा लौटाया है। विगत वर्षों में परीक्षा घोटाले और पेपर लीक के कारण उपजा असंतोष इस कानून से कुछ हद तक शांत हुआ है। धामी सरकार ने इसमें न केवल त्वरित गिरफ्तारी और जांच के आदेश दिए, बल्कि परीक्षा प्रक्रिया को तकनीकी रूप से पारदर्शी भी बनाया। भू-कानून का मुद्दा उत्तराखण्ड में वर्षों से एक भावनात्मक और राजनीतिक विषय रहा है। पहाड़ी राज्य होने के कारण भूमि की खरीद-फरोख्त पर नियंत्रण की मांग जनता और क्षेत्रीय संगठनों द्वारा लम्बे समय से की जा रही थी। धामी सरकार ने पुराने कानूनों की समीक्षा कर सीमांत जिलों में बाहरी खरीद पर नियंत्रण जैसे उपाय किए हैं, जिससे राज्य की भौगोलिक और सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा का संदेश गया है। महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में धामी सरकार ने 30 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण को न केवल बरकरार रखा, बल्कि इसके प्रभाव को प्रशासनिक सेवाओं तक फैलाया। ‘मुख्यमंत्री नारी शक्ति योजना’, ‘महिला उद्यमिता सहायता’ जैसी योजनाओं ने ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को आर्थिक रूप से सक्रिय किया है।
डिजिटलीकरण को बढ़ावा देने के लिए ‘ई-ऑफिस’, ‘डिजिटल भू-अभिलेख’, ‘सीएम हेल्पलाइन 1905’, ‘1064 विजिलेंस ऐप’ जैसी पहलों को जमीन पर उतारा गया। इनसे प्रशासनिक पारदर्शिता में वृद्धि हुई और जनता का विश्वास शासन में बढ़ा। भ्रष्टाचार के मामलों में कई अधिकारियों की गिरफ्तारी, निलम्बन और विभागीय कार्रवाई से यह संकेत गया कि धामी सरकार ‘जीरो टाॅलरेंस फाॅर करप्शन’ की नीति को केवल नारा नहीं, कार्यनीति मानती है।
हाल के वर्षों में उत्तराखण्ड को दो बड़ी आपदाओं का सामना करना पड़ा, जिसने राज्य प्रशासन की संवेदनशीलता और तत्परता की गंभीर परीक्षा ली- जोशीमठ भू-धंसाव और उत्तरकाशी की सिलक्यारा सुरंग आपदा। जोशीमठ में भूमि धंसने की घटनाओं ने न केवल पर्यावरणीय असंतुलन की ओर ध्यान खींचा, बल्कि पुनर्वास और राहत कार्यों में सरकार की भूमिका को भी सवालों के घेरे में ला खड़ा किया। हालांकि सरकार ने तत्काल विशेषज्ञ समितियां बनाईं, भूगर्भीय अध्ययन कराए और सैकड़ों परिवारों को अंतरिम राहत और पुनर्वास उपलब्ध कराया, लेकिन इस पर विपक्ष ने पर्यावरणीय लापरवाही और अंधाधुंध निर्माण को लेकर तीखा हमला बोला। सिलक्यारा सुरंग आपदा, जिसने नवम्बर 2023 में पूरे देश को झकझोर दिया, उसमें 41 मजदूर 17 दिनों तक सुरंग में फंसे रहे। धामी स्वयं मौके पर पहुंचे, राहत कार्यों की सतत निगरानी की और केंद्रीय एजेंसियों के साथ समन्वय कर पूरी दुनिया के सामने उत्तराखण्ड को एक संकट प्रबंधन माॅडल के रूप में प्रस्तुत किया। इस घटनाक्रम ने धामी की जनप्रतिनिधि के रूप में गम्भीरता और नेतृत्व क्षमता को और मजबूत किया।
देवभूमि की देवतुल्य जनता के स्नेह, प्रेम और आशीर्वाद से मुख्य सेवक के रूप में मैंने 4 वर्ष का कार्यकाल पूर्ण किया है। आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की प्रेरणा और मार्गदर्शन से ये 4 वर्ष देवभूमि उत्तराखण्ड को देश के श्रेष्ठ राज्यों में शामिल करने के हमारे प्रयासों को समर्पित रहे हैं। इन 4 वर्षों में हर मोर्चे पर जन-जन से मिला अपार समर्थन मेरे लिए न केवल हर्ष का विषय रहा है, बल्कि यह एक जिम्मेदारी का एहसास भी था जो दिन-रात देवतुल्य जनता की आशाओं और आकांक्षाओं की पूर्ति हेतु पूर्ण समर्पण के साथ कार्य करने के लिए प्रेरित करता रहा है। इन 4 वर्षों में समान नागरिक संहिता, सख्त नकल विरोधी कानून, सख्त धर्मांतरण कानून, दंगारोधी कानून लागू कर सुशासन के संकल्प को पूरा किया है, लैंड जिहाद, लव जिहाद, अवैध मदरसों व अतिक्रमण पर निरंतर कार्रवाई और सख्त भू-कानून लागू कर देवभूमि के मूल स्वरूप की रक्षा हेतु अपनी प्रतिबद्धता को साबित भी किया है। इन 4 वर्षों में एक ओर जहां प्रदेश सतत विकास के लक्ष्यों (एसडीजी इंडेक्स) की प्राप्ति में देश का अग्रणी राज्य बना है, वहीं दूसरी ओर कनेक्टिविटी को सुदृढ़ करने के लिए इकोलाॅजी, इकोनाॅमी और टेक्नोलाॅजी के बेहतर समन्वय से रोड, रेल और रोपवे निर्माण के क्षेत्र में भी नया कीर्तिमान स्थापित हुआ है। सीएम हेल्पलाइन 1905 और 1064 विजिलेंस ऐप से सदैव आम जनमानस के विश्वास को जीतने का प्रयास किया है और भ्रष्टाचार पर जीरो टाॅलरेंस की नीति के तहत मगरमच्छ जैसे भ्रष्टाचारियों को सलाखों के पीछे भेजकर एक सख्त संदेश भी दिया। युवा साथियों को इन 4 वर्षों में पूर्ण पारदर्शिता के साथ 23000 से भी अधिक सरकारी नौकरी दी है और महिलाओं को 30 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण देकर उनकी सशक्त भागीदारी भी सुनिश्चित की है। यही कारण है कि आज प्रदेश में बेरोजगारी दर तेजी से घटी है जो कि राष्ट्रीय औसत से भी कम है। धार्मिक पर्यटन को प्रोत्साहित करने वाली नीतियों के फलस्वरूप प्रत्येक वर्ष रिकॅर्ड संख्या में श्रद्धालु चारधाम यात्रा एवं कांवड़ यात्रा में देवभूमि उत्तराखण्ड पधार रहे हैं। आपके आशीर्वाद और आदरणीय प्रधानमंत्री जी के मार्गदर्शन में धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों के पुनर्विकास, साहसिक पर्यटन को बढ़ावा, स्थानीय उत्पादों का बढ़-चढ़कर प्रचार-प्रसार, होम स्टे योजना के माध्यम से स्वरोजगार, छात्रवृत्ति योजनाएं, खेल और खिलाड़ियों के लिए बेहतर सुविधाएं, किसान कल्याण, सैनिक कल्याण और स्वास्थ्य के क्षेत्र में हुए अभूतपूर्व कार्य आज देवभूमि उत्तराखण्ड के विकास का नया अध्याय लिख रहे हैं। प्रदेश में औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देते हुए रिकाॅर्ड 3.5 लाख करोड़ रुपए के एमओयू साइन किए और अभी तक 1 लाख करोड़ रुपए के निवेश की ग्राउंडिंग कर नया कीर्तिमान स्थापित किया है। विकसित भारत-2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में आगामी वर्षों में देवभूमि उन्नति और प्रगति के क्षेत्र में नए सोपान गढ़ने को तैयार है।
मन समर्पित, तन समर्पित,
और यह जीवन समर्पित।
चाहता हूं मातृ-भू, तुझको अभी कुछ और भी दूं।
पुष्कर सिंह धामी, मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड
भाजपा का आंतरिक कलह और धामी
उत्तराखण्ड की राजनीति में एक बार फिर उस पुराने तनाव की पुनरावृत्ति देखने को मिल रही है, जिसे अक्सर कुमाऊं बनाम गढ़वाल के अंतर्विरोध के रूप में समझा जाता है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की नेतृत्व क्षमता को देश के प्रधानमंत्री तक ने बार-बार सराहा है, लेकिन राज्य के भीतर उनकी राह आसान नहीं है। यह विडम्बना ही है कि जिस भाजपा ने धामी को दोबारा सत्ता में वापसी का नायक घोषित किया, उसी के कई बड़े नेता अब सार्वजनिक मंचों पर उनके कामकाज पर उंगली उठाने लगे हैं। ताजा उदाहरण हरिद्वार से भाजपा सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का है, जिन्होंने संसद के पटल पर उत्तराखण्ड में अवैध खनन का मुद्दा उठाया। यह कोई सामान्य आलोचना नहीं थी, बल्कि राज्य सरकार की नीति और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर एक सीधी चोट थी। त्रिवेंद्र का यह वक्तव्य यह भी दर्शाता है कि उत्तराखण्ड भाजपा में भीतर ही भीतर असंतोष का लावा फिर से उबलने लगा है। गौर करने वाली बात यह है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत अकेले नहीं हैं। प्रदेश भाजपा में गढ़वाल लाॅबी का प्रभाव हमेशा से स्पष्ट रहा है और धामी के उभार के बाद से वह लाॅबी लगातार बेचैन दिख रही है। मंत्रिमंडल विस्तार से लेकर नौकरशाही में पदस्थापन तक, गढ़वाल क्षेत्र के प्रभावशाली नेताओं को यह महसूस होता रहा है कि मुख्यमंत्री धामी उन्हें नजरअंदाज कर रहे हैं या उनका प्रभाव सीमित कर रहे हैं। यही वजह है कि समय-समय पर बयानबाजी और नाराजगी के संकेत सार्वजनिक मंचों पर आ जाते हैं। मुख्यमंत्री धामी, जिनका राजनीतिक कद हाल के वर्षों में भाजपा के ‘युवा चेहरे’ के तौर पर तेजी से उभरा है, वे अब पार्टी के ही कई अनुभवी नेताओं के लिए एक प्रकार की चुनौती बनते जा रहे हैं। यह सत्ता के केंद्र में खड़े एक युवा नेता और अनुभव के भरोसे अपनी जमीन तलाशते पुराने नेताओं के बीच संघर्ष की कहानी भी बनती जा रही है। यह राजनीतिक खींचतान केवल मुख्यमंत्री धामी की स्थिति को कमजोर नहीं करती, बल्कि सरकार की कार्यप्रणाली पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है। यदि पार्टी के भीतर विश्वास और सामंजस्य की कमी बनी रही, तो न केवल सुशासन की छवि धूमिल होगी, बल्कि जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि सरकार अपनी आंतरिक लड़ाइयों में उलझी है। इसलिए यह समय भाजपा के लिए आत्मचिंतन का है। मुख्यमंत्री को कमजोर करने की कोशिशें अंततः पूरे संगठन की कमजोरी में तब्दील हो सकती हैं। विपक्ष पहले से ही भ्रष्टाचार, अवैध खनन, बेरोजगारी और विस्थापन जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने के प्रयास में है और ऐसे समय में भीतर की कलह विपक्ष को अप्रत्याशित सम्बल दे सकती है। मुख्यमंत्री धामी के लिए यह एक चुनौती भरा समय है। उन्हें केवल प्रशासनिक दक्षता ही नहीं, बल्कि राजनीतिक कौशल भी दिखाना होगा- भीतर की असहमति को संवाद से सुलझाना और अपने विरोधियों को साथ लेकर चलना अब उनके नेतृत्व की अगली कसौटी बन चुका है।
विपक्ष के निशाने पर धामी
विपक्ष लगातार अवैध खनन, जल जीवन मिशन में भ्रष्टाचार, पेपर लीक, ट्रांसफर उद्योग और स्वास्थ्य सेवा की बदहाली जैसे मुद्दों को लेकर सरकार पर हमलावर है। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और क्षेत्रीय संगठनों ने इन विषयों को लेकर राज्यव्यापी प्रदर्शन किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि ‘भाजपा के कुछ विधायक और प्रभावशाली ठेकेदार खनन माफिया से जुड़े हुए हैं’ और ‘सीएम की ईमानदारी के बावजूद पूरी व्यवस्था भ्रष्टाचार की गिरफ्त में है।’ हालांकि उत्तराखण्ड की धामी सरकार को दोबारा सत्ता में लाने के लिए जनता ने स्पष्ट जनादेश दिया था, लेकिन समय बीतने के साथ-साथ यह सवाल तेजी से उठने लगे हैं कि क्या सरकार उस भरोसे पर खरी उतर पाई है। विपक्षी दल अब खुलकर आरोप लगा रहे हैं कि सरकार की बागडोर नौकरशाही के हाथों में चली गई है और पूरी मशीनरी में भ्रष्टाचार बेलगाम होता जा रहा है। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और उत्तराखण्ड क्रांति दल जैसे दलों ने एक सुर में यह कहना शुरू कर दिया है कि राज्य में जनप्रतिनिधियों का शासन नहीं, बल्कि अफसरशाही की तानाशाही चल रही है। अवैध खनन का मुद्दा तो अब राज्य की राजनीति का स्थायी संकट बन गया है। विपक्ष लगातार यह आरोप लगा रहा है कि प्रदेश के तमाम संवेदनशील क्षेत्रों- चम्पावत, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर, बागेश्वर में खुलेआम अवैध खनन हो रहा है और शासन-प्रशासन आंख मूंदे हुए हंै। खुद भाजपा के वरिष्ठ नेता और हरिद्वार के सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने संसद के भीतर इस मुद्दे को उठाया, जिससे विपक्ष को और बल मिल गया। कांग्रेस ने यह भी कहा कि यदि भाजपा के सांसद को ही अवैध खनन के खिलाफ संसद में बोलना पड़े तो सोचिए आम जनता की क्या सुनवाई हो रही होगी।
विपक्ष का यह भी दावा है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार
नौकरशाहों के इशारे पर चल रही है। थानों से लेकर सचिवालय तक, आम आदमी को राहत नहीं, बल्कि रिश्वत, लेट-लतीफी और चुप्पी का सामना करना पड़ रहा है। कई स्थानों पर फील्ड अधिकारियों द्वारा अवैध वसूली, ट्रांसफर-पोस्टिंग में लेनदेन और योजनाओं में बिचैलियों की भूमिका के आरोप लगातार लगते रहे हैं। यह सब एक ऐसे प्रदेश में हो रहा है जहां राज्य बनने के मूल उद्देश्यों में पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन सबसे ऊपर था। विपक्षी दलों का यह भी आरोप है कि सरकार बड़ी परियोजनाओं की घोषणाएं तो जोर-शोर से करती है, लेकिन जमीन पर उनका क्रियान्वयन लगभग शून्य है। देहरादून से लेकर पिथौरागढ़ तक अधूरी सड़कों, रुकी हुई स्वास्थ्य परियोजनाओं, शिक्षा में गिरते स्तर और पर्यटन ढांचे की जर्जर स्थिति को लेकर विपक्ष बार-बार जनता के सामने सवाल रख रहा है। गढ़वाल और कुमाऊं में भारी बारिश के दौरान राहत व बचाव की धीमी रफ्तार, आपदा प्रबंधन में लचर व्यवस्था और आंतरिक सड़कों की बदहाल स्थिति को लेकर भी जनता में गहरा असंतोष है।
पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता हरीश रावत का मानना है कि राज्य की आर्थिक स्थिति लगातार बदतर होती जा रही है। बेरोजगारी चरम पर है, युवा पलायन कर रहे हैं और सरकार केवल खोखली घोषणाओं में व्यस्त है। महंगाई को नियंत्रित करने में सरकार असफल रही है और राशन, बिजली, पानी जैसी मूलभूत आवश्यकताओं तक की व्यवस्था लगातार बिगड़ती जा रही है। पंचायतों और नगर निकायों में फंड की भारी कमी के चलते विकास कार्य ठप पड़े हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार जनहित से ज्यादा ‘इमेज बिल्डिंग’ में व्यस्त है- विज्ञापन, फोटोशूट और प्रधानमंत्री के साथ तस्वीरें साझा करना प्राथमिकता बन गया है। विपक्ष यह भी कहता है कि धामी सरकार आलोचना को सहन नहीं करती और पत्रकारों व सामाजिक कार्यकर्ताओं को दबाने की कोशिश करती है। यदि सरकार ने जल्द ही आत्ममंथन नहीं किया और शासन प्रणाली में सुधार की ठोस पहल नहीं की तो यह असंतोष भविष्य में जनाक्रोश में बदल सकता है। मुख्यमंत्री को अब इन आरोपों का जवाब सिर्फ शब्दों से नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई से देना होगा।
एक्शन मोड में मुख्यमंत्री
इन आरोपों का उत्तर धामी सरकार ने पारदर्शिता को मजबूत करते हुए दिया है- निलम्बन, गिरफ्तारी और श्वेत पत्र जारी कर जनता को विश्वास में लेने का प्रयास किया गया। लेकिन आलोचक मानते हैं कि ‘राज्य की
प्रशासनिक मशीनरी अब भी पुराने ढर्रे पर चल रही है।’ यही कारण है कि धामी सरकार के जनविश्वास की परीक्षा अभी जारी है। अब 2027 के विधानसभा चुनाव धामी के लिए अग्निपरीक्षा साबित होंगे। यदि वे भाजपा को तीसरी बार सत्ता में लाते हैं तो यह न केवल उत्तराखण्ड की राजनीति में स्थायित्व का एक नया अध्याय होगा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर उनकी स्थिति को और अधिक सशक्त बना देगा। वहीं यदि भाजपा सत्ता गंवाती है तो धामी को या तो केंद्रीय संगठन में स्थान मिलेगा या भविष्य के लिए तैयार किया जाएगा।
पुष्कर सिंह धामी का राजनीतिक व्यक्तित्व उस युग का प्रतिनिधित्व करता है, जहां शक्ति का प्रदर्शन आक्रामकता से नहीं, संयम से होता है। उन्होंने यह सिद्ध किया है कि विचारधारा को शासन में रूपांतरित करना केवल भाषणों से नहीं, बल्कि योजनाओं और क्रियान्वयन से सम्भव है। वे न तो नायकत्व की होड़ में हैं, न प्रचार की भूख में। उनका नेतृत्व नयी भाजपा की उस छवि का प्रारूप है जो सेवा, सादगी और संकल्प की त्रयी पर आधारित है।
भविष्य में यदि भाजपा नेतृत्व के समक्ष यह प्रश्न खड़ा होता है कि ‘मोदी के बाद कौन?’ तो उत्तर को केवल दिल्ली में नहीं, उत्तराखण्ड की पहाड़ियों में भी तलाशा जा सकता है। वहां एक युवा, संयमित और विचारशील नेता अपने उत्तर को तैयार कर रहा है। नाम है, पुष्कर सिंह धामी।


देवभूमि की देवतुल्य जनता के स्नेह, प्रेम और आशीर्वाद से मुख्य सेवक के रूप में मैंने 4 वर्ष का कार्यकाल पूर्ण किया है। आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की प्रेरणा और मार्गदर्शन से ये 4 वर्ष देवभूमि उत्तराखण्ड को देश के श्रेष्ठ राज्यों में शामिल करने के हमारे प्रयासों को समर्पित रहे हैं। इन 4 वर्षों में हर मोर्चे पर जन-जन से मिला अपार समर्थन मेरे लिए न केवल हर्ष का विषय रहा है, बल्कि यह एक जिम्मेदारी का एहसास भी था जो दिन-रात देवतुल्य जनता की आशाओं और आकांक्षाओं की पूर्ति हेतु पूर्ण समर्पण के साथ कार्य करने के लिए प्रेरित करता रहा है। इन 4 वर्षों में समान नागरिक संहिता, सख्त नकल विरोधी कानून, सख्त धर्मांतरण कानून, दंगारोधी कानून लागू कर सुशासन के संकल्प को पूरा किया है, लैंड जिहाद, लव जिहाद, अवैध मदरसों व अतिक्रमण पर निरंतर कार्रवाई और सख्त भू-कानून लागू कर देवभूमि के मूल स्वरूप की रक्षा हेतु अपनी प्रतिबद्धता को साबित भी किया है। इन 4 वर्षों में एक ओर जहां प्रदेश सतत विकास के लक्ष्यों (एसडीजी इंडेक्स) की प्राप्ति में देश का अग्रणी राज्य बना है, वहीं दूसरी ओर कनेक्टिविटी को सुदृढ़ करने के लिए इकोलाॅजी, इकोनाॅमी और टेक्नोलाॅजी के बेहतर समन्वय से रोड, रेल और रोपवे निर्माण के क्षेत्र में भी नया कीर्तिमान स्थापित हुआ है। सीएम हेल्पलाइन 1905 और 1064 विजिलेंस ऐप से सदैव आम जनमानस के विश्वास को जीतने का प्रयास किया है और भ्रष्टाचार पर जीरो टाॅलरेंस की नीति के तहत मगरमच्छ जैसे भ्रष्टाचारियों को सलाखों के पीछे भेजकर एक सख्त संदेश भी दिया। युवा साथियों को इन 4 वर्षों में पूर्ण पारदर्शिता के साथ 23000 से भी अधिक सरकारी नौकरी दी है और महिलाओं को 30 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण देकर उनकी सशक्त भागीदारी भी सुनिश्चित की है। यही कारण है कि आज प्रदेश में बेरोजगारी दर तेजी से घटी है जो कि राष्ट्रीय औसत से भी कम है। धार्मिक पर्यटन को प्रोत्साहित करने वाली नीतियों के फलस्वरूप प्रत्येक वर्ष रिकॅर्ड संख्या में श्रद्धालु चारधाम यात्रा एवं कांवड़ यात्रा में देवभूमि उत्तराखण्ड पधार रहे हैं। आपके आशीर्वाद और आदरणीय प्रधानमंत्री जी के मार्गदर्शन में धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों के पुनर्विकास, साहसिक पर्यटन को बढ़ावा, स्थानीय उत्पादों का बढ़-चढ़कर प्रचार-प्रसार, होम स्टे योजना के माध्यम से स्वरोजगार, छात्रवृत्ति योजनाएं, खेल और खिलाड़ियों के लिए बेहतर सुविधाएं, किसान कल्याण, सैनिक कल्याण और स्वास्थ्य के क्षेत्र में हुए अभूतपूर्व कार्य आज देवभूमि उत्तराखण्ड के विकास का नया अध्याय लिख रहे हैं। प्रदेश में औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देते हुए रिकाॅर्ड 3.5 लाख करोड़ रुपए के एमओयू साइन किए और अभी तक 1 लाख करोड़ रुपए के निवेश की ग्राउंडिंग कर नया कीर्तिमान स्थापित किया है। विकसित भारत-2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में आगामी वर्षों में देवभूमि उन्नति और प्रगति के क्षेत्र में नए सोपान गढ़ने को तैयार है।