सिडनी के बाॅन्डी बीच पर हनुक्का उत्सव के दौरान हुई आतंकी गोलीबारी ने आॅस्ट्रेलिया को दहला दिया लेकिन उसी भयावह क्षण में एक आम नागरिक अहमद अल-अहमद असाधारण साहस की मिसाल बनकर सामने आए। निहत्थे अहमद ने बंदूकधारी आतंकी से भिड़कर उसकी राइफल छीन ली और अपनी जान जोखिम में डालकर कई लोगों को सुरक्षित निकलने का मौका दिया। गोली लगने के बावजूद उनका जज्बा नहीं टूटा। युद्ध से भागकर आए एक शरणार्थी ने शांति के देश में यह साबित कर दिया कि इंसानियत किसी पहचान की मोहताज नहीं होती
गत् 14 दिसम्बर की शाम सिडनी के बाॅन्डी बीच पर आम दिनों से कहीं ज्यादा रौनक थी। समंदर की लहरों के साथ हंसी, संगीत और उत्सव का माहौल घुला हुआ था। यहूदी समुदाय के लोग हनुक्का पर्व मना रहे थे। परिवारों के साथ आए बच्चे रोशनी और रंगों में मग्न थे, बुजुर्ग आपस में बातें कर रहे थे और पर्यटक इस उत्सव को करीब से देख रहे थे। किसी को अंदाजा नहीं था कि यह खुशी कुछ ही पलों में दहशत में बदल जाएगी।
अचानक गोलियों की आवाज गूंजी। पहले कुछ सेकेंड तक लोग समझ ही नहीं पाए कि क्या हो रहा है। फिर चीख-पुकार शुरू हो गई। लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। बच्चे रो रहे थे, माता-पिता उन्हें ढाल बनाकर आगे-पीछे कर रहे थे। दो हथियारबंद हमलावर भीड़ पर अंधाधुंध फायरिंग कर रहे थे। गोलियां हवा को चीरती हुई निकल रही थीं और हर पल मौत और करीब आती महसूस हो रही थी। इसी भीड़ में अहमद अल-अहमद भी मौजूद थे। 44 साल के अहमद अपने चचेरे भाई जोजाय अलकंज के साथ हनुक्का कार्यक्रम में आए थे। दोनों कुछ देर के लिए काॅफी लेने बाहर निकले थे कि तभी यह हमला शुरू हो गया। अहमद ने देखा कि लोग कारों, दुकानों और दीवारों के पीछे छिपने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने भी जोजाय के साथ एक कार के पीछे पनाह ली।
जोजाय डर से कांप रहे थे। गोलियों की आवाज लगातार तेज होती जा रही थी। लेकिन अहमद का ध्यान एक ही बात पर था कि अगर हमलावरों को रोका नहीं गया तो और लोग मारे जाएंगे। उन्होंने देखा कि एक आतंकी, साजिद अकरम, राइफल लेकर भीड़ की ओर बढ़ रहा है। यह साफ था कि उसका इरादा किसी को छोड़ने का नहीं था।
जोजाय ने अहमद को रोका। कहा कि यह पागलपन है, जान चली जाएगी। लेकिन अहमद का फैसला हो चुका था। उन्होंने अपने भाई से कहा, ‘‘अगर मुझे कुछ हो जाए तो परिवार को बता देना कि मैं लोगों को बचाते हुए गया।’’ यह कोई भावुक कथन भर नहीं था बल्कि एक शांत, ठोस निर्णय था, एक ऐसे इंसान का जिसने डर को खुद पर हावी नहीं होने दिया। अहमद निहत्थे थे। उनके पास न कोई हथियार था, न कोई सुरक्षा कवच। फिर भी उन्होंने हमलावर की हर हरकत को ध्यान से देखा। जैसे ही उन्हें मौका मिला, वे पूरी ताकत से उसकी ओर दौड़े। पीछे से झपट्टा मारते हुए उन्होंने आतंकी को धक्का दिया। अचानक हुए इस हमले से साजिद अकरम संतुलन खो बैठा। इसी अफरा-तफरी में अहमद ने उसकी राइफल छीन ली।
कुछ पल के लिए दृश्य ही बदल गया। जो आदमी मौत बांट रहा था वही अब पीछे हटने को मजबूर था। अहमद ने राइफल उसकी ओर तान दी। उन्हें बंदूक चलानी नहीं आती थी लेकिन उनकी आंखों में ऐसा संकल्प था कि आतंकी डर गया और पीछे की ओर भागने लगा। इसी दौरान कई लोग वहां से सुरक्षित निकल पाए।
अहमद ने राइफल को पास के एक पेड़ के पास रख दिया ताकि कोई और उसका इस्तेमाल न कर सके। लेकिन खतरा अभी टला नहीं था। तभी दूसरी दिशा से आतंकी का बेटा नवीद अकरम सामने आया। उसने बिना चेतावनी के अहमद पर गोलियां चला दीं। दो गोलियां अहमद के बाएं कंधे में लगीं। वे वहीं गिर पड़े और बेहोश हो गए। कुछ ही देर में पुलिस और सुरक्षा बल मौके पर पहुंच गए। आतंकियों को काबू में किया गया। घायलों को अस्पताल ले जाया गया। अहमद को सिडनी के सेंट जाॅर्ज अस्पताल में भर्ती कराया गया है जहां उनकी सर्जरी हुई। डाॅक्टरों के मुताबिक अब उनकी हालत स्थिर है और वे खतरे से बाहर हैं।
अस्पताल के बिस्तर पर लेटे अहमद ने कहा कि उस पल उन्हें खुद नहीं पता था कि वे क्या कर रहे हैं। ‘‘ऐसा लगा जैसे किसी ने मुझे ताकत दे दी हो। मैंने बस यही सोचा कि लोगों को बचाना है।’’ अहमद ने साफ शब्दों में कहा कि अगर फिर कभी ऐसा मौका आया तो वे दोबारा वही करेंगे। अहमद की कहानी सिर्फ उस एक शाम की नहीं है। यह उस जीवन की कहानी है जिसने युद्ध, विस्थापन और संघर्ष को बहुत करीब से देखा है। अहमद 2006 में सीरिया में गृहयुद्ध के दौरान अपना देश छोड़कर आॅस्ट्रेलिया आए थे। उन्होंने शरणार्थी के तौर पर एक नई जिंदगी शुरू की। मेहनत की, काम किया और धीरे-धीरे अपना छोटा-सा व्यवसाय खड़ा किया। आज वे एक तम्बाकू की दुकान चलाते हैं। वे दो छोटी बेटियों के पिता हैं, जिनकी उम्र पांच और छह साल है।
उनके पिता कहते हैं कि अहमद हमेशा से दूसरों की मदद के लिए तैयार रहते थे। ‘‘मुझे गर्व है कि मेरा बेटा जिंदा है और उसने निर्दोष लोगों की जान बचाई।’’ वहीं अहमद की मां को जब इस घटना के बारे में पता चला तो वे रो पड़ीं, डर और गर्व, दोनों भावनाओं के साथ।
इस घटना के बाद अहमद को लेकर पूरे ऑस्ट्रेलिया में चर्चा शुरू हो गई है। सोशल मीडिया पर लोग उन्हें ‘हीरो’ कहने लगे हैं। आम लोग, राजनेता और अंतरराष्ट्रीय हस्तियां, सबने उनकी बहादुरी की तारीफ की। आॅस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने कहा कि संकट के समय दूसरों की मदद के लिए आगे बढ़ना आॅस्ट्रेलियाई समाज की पहचान है और अहमद ने यही दिखाया।
न्यू साउथ वेल्स के प्रीमियर क्रिस मिन्स ने कहा कि इस दुखद घटना के बीच अहमद जैसे लोग उम्मीद की किरण हैं। उनके मुताबिक अगर अहमद ने समय पर कदम न उठाया होता तो जानमाल का नुकसान कहीं ज्यादा हो सकता था।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी अहमद की तारीफ करते हुए कहा है कि जिस व्यक्ति ने सीधे हमलावर से भिड़कर लोगों की जान बचाई उसके प्रति उनके मन में गहरा सम्मान है।
अहमद की बहादुरी ने आम लोगों के दिलों को इतना छू लिया कि उनके लिए क्राउडफंडिंग शुरू की गई। ‘गोफन्डमी’ ;ळवथ्नदकडमद्ध पर अब तक 5,70,000 डाॅलर यानी करीब 3.43 करोड़ रुपए से अधिक की राशि जुटाई जा चुकी है। करीब 5700 लोगों ने इस अभियान में योगदान दिया। अमेरिकी अरबपति बिल एकमैन ने भी एक लाख डाॅलर का दान दिया है। इस बीच घटना से जुड़े कई सवाल भी सामने आ रहे हैं। आॅस्ट्रेलिया के गृहमंत्री टोनी बर्क के अनुसार आतंकी साजिद अकरम आॅस्ट्रेलिया का नागरिक नहीं था। वह 1998 में छात्र वीजा पर आया था और बाद में पार्टनर वीजा तथा रेजिडेंट रिटर्न वीजा पर रह रहा था। उसका बेटा नवीद ऑस्ट्रेलिया में जन्मा था और नागरिक था।
गौरतलब है कि यह हमला उस समय हुआ जब बाॅन्डी बीच पर हनुक्का उत्सव मनाया जा रहा था। इसलिए इसे यहूदी समुदाय पर लक्षित हमला माना जा रहा है। घटना के बाद मेलबर्न में होने वाला हनुक्का फेस्टिवल रद्द कर दिया गया। ऑस्ट्रेलिया में यहूदी समुदाय की सुरक्षा को लेकर चिंता और गहरी हो गई है।
इन तमाम सवालों और बहसों के बीच अहमद अल-अहमद की कहानी एक मानवीय संदेश बनकर उभरती है। एक ऐसा इंसान जो खुद युद्ध और हिंसा से बचकर आया था, उसने हिंसा के सामने हथियार नहीं उठाया, बल्कि इंसानियत को ढाल बनाया। उसकी पहचान, उसका अतीत, उसका मजहब, सब उस पल पीछे रह गए। सामने सिर्फ लोग थे, जिन्हें बचाना जरूरी था।
शायद यही इस कहानी का सबसे बड़ा सबक है। जब नफरत हथियार उठाती है, तब इंसानियत को निहत्थे भी खड़ा होना पड़ता है। अहमद अल-अहमद ने यह साबित कर दिया कि हीरो कोई खास पद या वर्दी नहीं पहनता, कभी-कभी वह एक आम आदमी होता है, जो सही वक्त पर डर से बड़ा फैसला कर लेता है।

