केंद्रीय एजेंसियों की विपक्षी राज्यों में लगातार कार्रवाई ने संघवाद की जड़ों को हिला दिया है। तमिलनाडु में ईडी अधिकारी पर रिश्वत का सीधा आरोप लगाकर राज्य के विजिलेंस विभाग ने गिरफ्तारी की, पश्चिम बंगाल में ईडी रेड के बाद एफआईआर हुई और फिर मामला सुप्रीम कोर्ट जा पहुंचा। अभी इन मामलों का शोर थमा भी नहीं था कि झारखंड में तो पुलिस सीधे ईडी दफ्तर में दाखिल हो गई। इन दिनों खासा वायरल गीत ‘देश हमारा कहां जा रहा? कहो नरेंदर मजा आ रहा है’ ‘जेन जेड’ के गले से निकलकर देशभर में सत्ता के खिलाफ जन-स्वर बन सवाल कर रहा है कि मात्र 78 बरस की आजादी में यह कहां आ गए हम?
केंद्रीय एजेंसियों की लगातार, चुन-चुनकर उन्हीं राज्यों में की जा रही कार्रवाइयों ने जहां विपक्षी सरकारें हैं आज भारत के संघीय ढांचे यानी फेडरलिज्म की बुनियादी अवधारणा को खतरे में डाल दिया है। यह कोई तात्कालिक राजनीतिक आरोप नहीं बल्कि घटनाओं की एक ऐसी श्रृंखला है जिसने देश के सामने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत में संविधान द्वारा तय ‘केंद्र-राज्य संतुलन’ अब एजेंसियों की एकतरफा ताकत में बदल रहा है? अगर ऐसा है तो इसकी नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी किस पर बनती है? सीधे-सीधे केंद्र सरकार के प्रमुख नरेंद्र मोदी पर और उनके गृह मंत्रालय पर जिसके अधीन ये एजेंसियां काम करती हैं क्योंकि जब सत्ता का घोड़ा बेलगाम होकर दौड़ता है तो यह दावा करना मुश्किल हो जाता है कि सवार को उसकी दिशा का पता नहीं।
इस पूरे संकट की सबसे दिलचस्प और शायद सबसे मारक तस्वीर यह है कि अब यह लड़ाई केवल अदालतों, एजेंसियों और राजनीतिक मंचों पर नहीं रह गई है। अब यह जनता की आवाज में, सोशल मीडिया की भाषा में और ‘जेन जेड’ के गाए हुए गीत में उतर आई है। इन दिनों एक व्यंग्यात्मक गीत वायरल है जिसके मुखड़े ने पूरे राजनीतिक वातावरण का सार मानो दो पंक्तियों में बांध दिया है ‘देश हमारा कहां जा रहा…’ और फिर सवाल जो सत्ता के सबसे ऊंचे शिखर से सीधे जवाब मांगता है ‘कहो नरेंदर, मजा आ रहा है?’ यह गीत युवा गा रहे हैं, छात्र समूहों में गा रहे हैं। और जिसने भी इसे एक बार देखा है, वह या तो हंसकर चैंक जाता है या फिर खामोश होकर सोच में पड़ जाता है क्योंकि मासूम आवाजों में उठता यह सवाल किसी रैली के नारे से ज्यादा चुभता है।
यह वायरल गीत इसीलिए ‘ट्रेंड’ नहीं, ‘टिप्पणी’ बन गया है क्योंकि उसी दौर में देश यह भी देख रहा है कि केंद्रीय एजेंसियों के कारण केंद्र और राज्य के बीच तनाव किस तरह सीधे टकराव में बदलता जा रहा है। पश्चिम बंगाल इसका बड़ा उदाहरण है झारखंड इसका अगला और ज्यादा खतरनाक अध्याय बन गया और उससे पहले तमिलनाडु में यही संघर्ष एक अलग रूप में सामने आ चुका था जहां आरोप सिर्फ ‘राजनीतिक दबाव’ का नहीं था बल्कि केंद्रीय एजेंसी के अधिकारी पर सीधे रिश्वत का आरोप लगा और राज्य की भ्रष्टाचार-रोधी पुलिस ने दखल देकर उसे गिरफ्तार कर लिया।
1 दिसम्बर 2023 को तमिलनाडु में ईडी के मदुरै सब-जोनल कार्यालय में तैनात अधिकारी अंकित तिवारी को राज्य के विजिलेंस एवं एंटी करप्शन विभाग ने एक सरकारी डाॅक्टर से कथित तौर पर 20 लाख रुपए रिश्वत लेते हुए पकड़ा और गिरफ्तार भी कर लिया। ऐसा पहली बार हुआ था कि किसी राज्य की एजेंसी ने ईडी अधिकारी को ‘कानून’ के दायरे में लाकर हथकड़ी लगा दी। अगले ही दिन यानी 2 दिसम्बर 2023 को राज्य की विजिलेंस टीम ने ईडी कार्यालय में तलाशी भी ली और वहीं से उस बहस ने जन्म लिया जो अब बंगाल और झारखंड में विस्फोट की शक्ल ले चुकी है कि क्या राज्य पुलिस, विजिलेंस का केंद्रीय एजेंसी के दफ्तर में घुसकर तलाशी लेना ‘कानूनी कार्रवाई’ है या ‘केंद्रीय जांच में हस्तक्षेप’?
तमिलनाडु प्रकरण में ईडी का तर्क था कि विजिलेंस की कार्रवाई केंद्रीय एजेंसी के काम में बाधा डालने और ‘संवेदनशील मामलों’ की सामग्री तक पहुंचने की कोशिश है। यह प्रकरण सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था वहां यह सवाल पहली बार सबसे साफ रूप में उठ खड़ा हुआ कि क्या राज्यों को केंद्रीय एजेंसियों के अफसरों पर आपराधिक कार्रवाई की खुली छूट होनी चाहिए? या इससे देशभर में जांच एजेंसियों की कार्रवाई पंगु हो जाएगी? सुप्रीम कोर्ट ने माना कि केंद्रीय एजेंसियों और राज्य पुलिस विजिलेंस के अधिकार क्षेत्र में टकराव बार-बार खड़ा हो रहा है और ऐसे मामलों में ‘संतुलन’ बनाए रखने के लिए देशव्यापी स्तर पर एक समान व्यवस्था जरूरी है ताकि न केंद्रीय एजेंसी कानून से ऊपर रहे, न राज्य सरकारें एजेंसियों के काम को ठप करने का हथियार बना सकें।
8 जनवरी 2026 को कोलकाता में वही हुआ जिसने यह संकेत दिया कि अब बहस महज राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं रहेगी। प्रवर्तन निदेशालय ने आईपैक और उसके निदेशक प्रतीक जैन से जुड़े ठिकानों पर छापेमारी की। जांच का संदर्भ कुछ भी रहा हो लेकिन दृश्य राजनीति का था। छापे के दौरान माहौल बिगड़ा, राज्य प्रशासन और केंद्रीय एजेंसी आमने-सामने आए और विवाद इस हद तक पहुंच गया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद मौके पर पहुंच गईं। ईडी ने आरोप लगाया है कि जांच में बाधा डाली गई, अधिकारियों को रोका गया और कार्रवाई प्रभावित करने की कोशिश हुई। इसके बाद पश्चिम बंगाल पुलिस ने ईडी अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कर डाली। यानी केंद्रीय एजेंसी जो आमतौर पर राज्य तंत्र के बड़े-बड़े दरवाजे खटखटाती है वही अचानक राज्य के कानूनी शिकंजे में आती दिखी। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां ईडी ने यह दलील दी कि राज्य सरकारें यदि एजेंसियों पर मुकदमे कर कार्रवाई रोकने लगेंगी तो यह ‘खतरनाक ट्रेंड’ बन जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे हल्के में नहीं लिया और एफआईआर पर रोक लगाकर यह संकेत दिया कि टकराव की यह रेखा देश की न्यायिक निगाह में भी गम्भीर है।
अभी इस घटना का शोर थमा भी नहीं था कि झारखंड की घटना सामने आ गई जिसने दिखा दिया कि बंगाल कोई अपवाद नहीं बल्कि शुरुआत है। 15 जनवरी 2026 की सुबह रांची में झारखंड पुलिस की टीम सदर डीएसपी के नेतृत्व में और एयरपोर्ट थाना प्रभारी के साथ, सीधे ईडी कार्यालय में दाखिल हुई। यह सिर्फ ‘पुलिस जांच’ नहीं थी, यह एक संदेश था। यह वही राज्य है जहां केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाइयों को लेकर सत्ता लगातार संघर्ष में रही है और अब उसी राज्य की पुलिस केंद्रीय एजेंसी के कार्यालय तक पहुंच चुकी थी। तनाव इतना बढ़ा कि ईडी को अपने ही दफ्तर में सुरक्षा के लिए अर्धसैनिक बल की टुकड़ी बुलानी पड़ी। यानी देश की सबसे भय पैदा करने वाली मानी जाने वाली एजेंसी जो सामान्यतः दूसरों के दरवाजे पर दस्तक देती है उस दिन अपने ही परिसर में घिरी हुई दिखी।
इस पूरे बवाल की जड़ एक नाम है संतोष कुमार। झारखंड के पेयजल एवं स्वच्छता विभाग से जुड़े कर्मचारी संतोष कुमार कथित रूप से करीब 2 करोड़ रुपए के गबन से जुड़े मामले में ईडी की जांच के दायरे में आया है। संतोष कुमार का दावा है कि ईडी के सहायक निदेशक स्तर के अधिकारी ‘प्रतीक’ और उनके सहयोगियों ने उन्हें केबिन में बंद कर बेरहमी से पीटा, सिर में गम्भीर चोटें आईं, छह टांके लगाने पड़े। एफआईआर में यह भी दावा किया गया है कि उन पर जबरन अपराध स्वीकार कराने और पहले से तैयार दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराने का दबाव बनाया गया। शिकायत के बाद एयरपोर्ट थाने में केस दर्ज हुआ और फिर झारखंड पुलिस ईडी कार्यालय तक पहुंच गई। यानी एक ऐसे दौर में, जब ईडी विपक्षी नेताओं और अधिकारियों पर दबिश की वजह से चर्चा में रहती है, अब खुद कथित मारपीट और दबाव बनाने के आरोपों में घिर गई है।
यहां से विवाद केवल एक कर्मचारी की चोट या एफआईआर का नहीं रहा। यह उन कथित तरीकों का मामला बन गया जिन पर वर्षों से विपक्ष ईडी पर सवाल उठाता रहा है कि पूछताछ ‘कानूनी प्रक्रिया’ है या ‘दबाव की प्रक्रिया’? और ठीक इसी बिंदु पर यह संकट संघवाद में बदल जाता है क्योंकि यदि केंद्रीय एजेंसी के भीतर कथित अपराध होता है तो क्या राज्य पुलिस को जांच का अधिकार नहीं? और यदि राज्य पुलिस कार्रवाई करती है तो क्या वह केंद्रीय एजेंसी के संवैधानिक क्षेत्र में अतिक्रमण नहीं? यही दो विरोधी दावे इस लड़ाई को खतरनाक बनाते हैं और संघवाद को सबसे ज्यादा चोट लगती है क्योंकि केंद्र और राज्य अब सिर्फ राजनीति में नहीं बल्कि संस्थानों की चैखट पर आमने-सामने हैं।
ईडी ने पलटकर अदालत का दरवाजा खटखटाया और कहा कि राज्य सरकार के इशारे पर केंद्रीय एजेंसी के काम में हस्तक्षेप हो रहा है, एफआईआर की आड़ में कार्रवाई रोकी जा रही है और यदि इसे खुली छूट मिल गई तो राज्यों द्वारा केंद्रीय एजेंसियों को निशाना बनाने का ‘ट्रेंड’ बन जाएगा। एजेंसी ने यहां तक तर्क रखा कि चोटे ‘स्वयं लगाई गई’ हो सकती हैं यानी एजेंसी को फंसाने की कोशिश। इसके बाद झारखंड हाईकोर्ट का हस्तक्षेप हुआ और 16 जनवरी 2026 को अदालत की सख्ती तथा ‘मूकदर्शक नहीं रह सकते’ जैसी टिप्पणी ने इस पूरे टकराव को और गहरा कर दिया। यानी मामला अब पूरी तरह ‘राजनीति, पुलिस, जांच एजेंसी और अदालत’, चारों संस्थानों के संगम पर आ खड़ा हुआ है।
झारखंड में यह पहली बार नहीं है जब केंद्रीय एजेंसी के खिलाफ राज्य की तरफ से कानूनी जवाबी हमला हुआ हो। 29 जनवरी 2024 को ईडी ने दिल्ली स्थित हेमंत सोरेन के आवास पर कार्रवाई की थी। और उसके ठीक बाद 31 जनवरी 2024 को हेमंत सोरेन ने रांची के एससी, एसटी पुलिस स्टेशन में ईडी के वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। तब बहुतों ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध कहा था पर 2026 की घटना ने साबित कर दिया कि झारखंड में ‘काउंटर-एक्शन’ अब अपवाद नहीं, नीति बन रहा है।
और यही संघवाद की असली चोट दिखाई देती है। संविधान सभा ने भारत को ‘राज्यों का ढीला गठबंधन’ नहीं बनाया था। डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने साफ कहा था- “India is an indestructible Union of destructible States.” यानी राज्य बनते-बिगड़ते रह सकते हैं, सीमाएं बदल सकती हैं, पुनर्गठन हो सकता है लेकिन संघ अखंड रहेगा। यह संघ इसलिए अखंड रहेगा क्योंकि संविधान ने राज्यों को स्वतंत्र इकाइयों का ऐसा समूह नहीं माना जो चाहे तो अलग हो जाए, यह संघ है, अविनाशी, अटूट। लेकिन आज जब केंद्रीय एजेंसियां राज्यों में एक राजनीतिक हथियार की तरह उतरती दिखती हैं और राज्य सरकारें उसके जवाब में पुलिस- प्रशासन और एफआईआर का रास्ता अपनाती हैं तो अम्बेडकर के ‘अविनाशी संघ’ पर एक नया खतरा मंडराने लगता है, संघ टूटने का नहीं, संघ के भीतर भरोसा टूटने का खतरा। और संघवाद में सबसे पहले यही भरोसा मरता है। जब केंद्र को लगता है कि राज्य ‘जांच रोक रहे हैं’ और राज्यों को लगता है कि केंद्र ‘दमन चला रहा है’, तब संघ की आत्मा घायल हो जाती है।
इसी घायल संघवाद के बीच यह वायरल गीत अब केवल गीत नहीं रह जाता। यह एक कटाक्ष बन जाता है, एक बयान बन जाता है, एक असहज प्रश्न बन जाता है- ‘देश हमारा कहां जा रहा…?’ और फिर- ‘कहो नरेंदर, मजा आ रहा?’ यह गीत युवाओं के होंठों से निकला है, इसलिए यह और भी बड़ा सवाल बन जाता है क्योंकि वह आने वाले समय की आवाज है। और आने वाला समय यदि यही पूछ रहा है तो वर्तमान की सत्ता को यह मानना पड़ेगा कि मामला केवल ईडी की कार्रवाई या किसी एफआईआर का नहीं है। मामला उस लोकतंत्र का है, उस संविधान का है, उस संघवाद का है जिसकी जिम्मेदारी अंततः केंद्र सरकार के शीर्ष नेतृत्व पर आकर ठहरती है। और तब देश फिर वही सवाल पूछेगा कि ‘कहो नरेंदर, मजा आ रहा है? सत्ता के नशे में एजेंसियों को खुली छूट देना आसान होता है लेकिन जब वही एजेंसियां संघवाद की दीवारों पर दरार डाल दें तब इतिहास किसी को नहीं बख्शता। ईडी यदि सचमुच कानून के लिए काम कर रही है तो उसे निष्पक्ष जांच से डर क्यों? और अगर राज्य पुलिस सचमुच कानून के तहत कार्रवाई कर रही है तो वह कार्रवाई ‘धावा’ जैसी क्यों दिखती है? यही अविश्वास संघवाद की असली बीमारी है और उसका इलाज सिर्फ अदालतें नहीं, राजनीतिक संयम, संवैधानिक मर्यादा और केंद्र की जिम्मेदारी ही कर सकती है।

