देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस ने जब से राज्यसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की घोषणा की है तब से कई राज्यों में पार्टी भीतर असंतोष के स्वर सुनाई देने लगे हैं। हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में उभरे ताजा घटनाक्रम ने कांग्रेस के भीतर बढ़ती नाराजगी को सार्वजनिक कर दिया है जिससे सियासी सरगर्मी के साथ पार्टी की अंतर्कलह भी सतह पर आ गई है। सूत्रों के अनुसार हरियाणा में पार्टी के कुछ विधायक कथित तौर पर निर्दलीय नेता गोपाल कांडा के सम्पर्क में हैं। बताया जा रहा है कि गोपाल कांडा राज्यसभा चुनाव के लिए अपनी सम्भावनाएं तलाश रहे हैं और इसी सिलसिले में राजनीतिक समीकरण साधने की कोशिश कर रहे हैं। अगर यह सम्पर्क आगे बढ़ता है तो हरियाणा की राजनीति में नया मोड़ आ सकता है और कांग्रेस के लिए चुनौती भी बढ़ सकती है। दूसरी ओर हिमाचल प्रदेश में भी पार्टी के फैसले को लेकर असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं। कांग्रेस ने राज्यसभा चुनाव के लिए कांगड़ा जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अनुराग शर्मा को उम्मीदवार बनाया है। इस फैसले के बाद प्रदेश कांग्रेस की वरिष्ठ नेता प्रतिभा सिंह के नाराज होने की चर्चा राजनीतिक गलियारों में तेज हो गई है। हालांकि इस मुद्दे पर अभी तक कोई औपचारिक बयान सामने नहीं आया है लेकिन अंदरखाने असंतोष की खबरों ने पार्टी के भीतर खींचतान की चर्चा को हवा दे दी है। गौरतलब है कि कांग्रेस ने बीते 5 मार्च को राज्यसभा चुनाव के लिए छह उम्मीदवारों के नामों की घोषणा की थी। इसी सूची में हिमाचल प्रदेश से अनुराग शर्मा और हरियाणा से कर्मवीर सिंह बौद्ध को उम्मीदवार बनाया गया है। उम्मीदवारों के नाम सामने आते ही कई जगहों पर स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा और असहमति के स्वर भी उभरने लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्यसभा चुनाव अक्सर पार्टियों के भीतर मौजूद समीकरणों और असंतोष को भी उजागर कर देता है। ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह असंतुष्ट नेताओं और विधायकों को साधकर पार्टी की एकजुटता बनाए रखे। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस इन अंदरूनी मतभेदों को सम्भाल पाती है या नहीं।
करीब ढाई दशक तक बिहार की सत्ता के केंद्र में रहे नीतीश कुमार ने अचानक दिल्ली का टिकट ले लिया है। वह चेहरा जिसे बिहार की राजनीति का स्थायी दूल्हा माना जाने लगा था अचानक बारात से हटता दिखाई दिया। दिलचस्प यह है कि अभी हाल तक सहयोगी दलों के नेता यही कहते रहे कि बिहार में मुख्यमंत्री का चेहरा नीतीश कुमार ही होंगे। ऐसे में उनका अचानक राज्यसभा जाने का फैसला स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बन गया। राजनीतिक गलियारों से लेकर आम जनमानस तक सवाल खड़े कर रहा है कि क्या यह निजी फैसला है या फिर यह किसी बड़े राजनीतिक फार्मूले की शुरुआत है? राजनीतिक पंडितों का कहना है कि सियासत की तासीर बड़ी अजीब होती है। यहां फैसले कभी सीधे नहीं होते और इशारे अक्सर दूर तक जाते हैं। दुनिया की राजनीति हो या देश की, हर मोड़ पर नया समीकरण बनता है। वैश्विक स्तर पर कभी-कभी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जैसे नेताओं के फैसले पूरी दुनिया की राजनीति में हलचल पैदा कर देते हैं वैसे ही भारत की राजनीति में भी अचानक लिए गए फैसले सबको चौंका देते हैं। राजनीति में यह भी सच है कि सत्ता में बने रहने के लिए केवल चुनाव जीतना ही जरूरी नहीं होता और सत्ता से बाहर होने के लिए हारना भी जरूरी नहीं। नीतीश कुमार का यह कदम इसी राजनीतिक यथार्थ का उदाहरण माना जा रहा है। उनके करीबी नेताओं का कहना है कि यह उनका निजी और सोचा-समझा निर्णय है जबकि विपक्ष इसे अलग राजनीतिक रणनीति या ‘महाराष्ट्र फाॅर्मूला’ से जोड़कर देख रहा है। बहरहाल नीतीश कुमार का दिल्ली जाना केवल एक पद परिवर्तन नहीं बल्कि बिहार की राजनीति में नए समीकरणों की शुरुआत है। सवाल कई हैं जवाब अभी बाकी हैं लेकिन इतना तय है कि नीतीश का दिल्ली जाना बिहार की राजनीति में नई पटकथा लिखने का संकेत दे रहा है।
देश के पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर एक ओर जहां सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी कमर कसने में जुटे हैं वहीं दूसरी तरफ चुनावी तैयारियों को लेकर केंद्रीय चुनाव आयोग एक्टिव मोड में नजर आ रहा है। जमीनी हालात का आकलन करने और चुनावी तैयारियों की समीक्षा के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की टीम असम, तमिलनाडु और पुडुचेरी का दौरा कर चुकी है और अब पांच मार्च को केरल दौरे के बाद 8 मार्च को पश्चिम बंगाल पहुंची, वहां 10 मार्च तक रही। इस दौरान आयोग ने राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों और राजनीतिक दलों के साथ बैठकों के जरिए चुनावी तैयारियों का जायजा लिया। ऐसे में पश्चिम बंगाल का दौरा इस पूरी प्रक्रिया का अंतिम चरण माना जा रहा है। सम्भावना जताई जा रही है कि 10 मार्च को आयोग के दिल्ली लौटने के बाद कभी भी चुनावों की तारीखों का ऐलान हो सकता है। सूत्रों की मानें तो 15 मार्च को पांचों राज्यों के विधानसभा चुनाव का पूरा कार्यक्रम जारी हो सकता है। अनुमान है कि असम और पश्चिम बंगाल में दो से तीन चरणों में मतदान कराया जाएगा जबकि तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में परम्परा के अनुसार एक ही चरण में वोटिंग कराई जा सकती है।
आजाद समाज पार्टी के प्रमुख और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद (रावण) ने बीते दिनों सहारनपुर में पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ अहम बैठक कर संगठन विस्तार और आगामी 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीति पर चर्चा की। हसनपुर चुंगी स्थित सभागार में आयोजित बैठक में उन्होंने बूथ स्तर से लेकर हर घर तक पार्टी की पहुंच मजबूत करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 13 पिछड़ी जातियों को साथ लेकर ‘भाईचारा संगठन’ बनाया गया है, जिसमें प्रजापति, कश्यप, विश्वकर्मा जैसी जातियों को अहम जिम्मेदारियां दी गई हैं। पार्टी का मानना है कि इस तरह के सामाजिक गठजोड़ से न केवल संगठन की पकड़ मजबूत होगी बल्कि समाज के अलग-अलग वर्गों को भी एक साझा मंच मिल सकेगा। ऐसे में राजनीतिक हलकों में चर्चा जोरों है कि क्या चंद्रशेखर बसपा सुप्रीमो मायावती की राह पर चल रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह रणनीति काफी हद तक उस माॅडल से मिलती-जुलती है जिसे कभी मायावती ने बसपा के विस्तार के दौरान अपनाया था। उस समय ‘भाईचारा समितियों’ के जरिए अलग-अलग जातियों को जोड़कर एक व्यापक सामाजिक आधार तैयार किया गया था। यही वजह है कि अब यह चर्चा भी तेज हो गई है कि क्या चंद्रशेखर आजाद मायावती के नक्शे-कदम पर चलते हुए संगठन विस्तार, सामाजिक समीकरणों की नई बनावट और जमीनी स्तर पर सक्रियता के जरिए अपनी राजनीति को नई दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं। आने वाले समय में यह रणनीति कितनी सफल होती है यह तो चुनावी मैदान ही तय करेगा लेकिन इतना तय है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया प्रयोग जरूर शुरू हो गया है। गौरतलब है कि इस बैठक में संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए सेक्टर और बूथ स्तर पर समितियां बनाने की योजना भी सामने आई। कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया गया कि वे गली-मोहल्लों तक पहुंचकर लोगों से सीधा संवाद करें और पार्टी की नीतियों को घर-घर तक पहुंचाएं। माना जा रहा है कि यह रणनीति आगामी पंचायत और विधानसभा चुनावों में पार्टी के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

