Uttarakhand

कौन होगा अजित का उत्तराधिकारी?

कौन होगा अजित का उत्तराधिकारी?

अजित पवार जिन्हें प्यार से लोग ‘दादा’ कहते थे महाराष्ट्र की राजनीति के ऐसे ध्रव थे जिनके इर्द-गिर्द पिछले दो दशकों की सत्ता घूमती रही। बीते दिनों एक विमान हादसे में उनके निधन से न केवल सत्ताधारी महायुति गठबंधन को गहरा धक्का लगा है बल्कि मराठा राजनीति का एक मजबूत स्तम्भ भी गिर गया है। उनके निधन के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि बारामती और मराठवाड़ा की राजनीति में उनका उत्तराधिकारी कौन होगा? बारामती के इस पावर हाउस की कमान कौन सम्भालेगा? क्या फिर एकजुट होगा पवार परिवार? क्या महायुति और महाराष्ट्र की राजनीति पर इसका असर पड़ेगा जैसे तमाम प्रश्न सियासी गलियारों तैरने लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि महाराष्ट्र की राजनीति में अगर अजित पवार जैसा ताकतवर नेता अचानक मंच से हट जाए तो यह सिर्फ एक व्यक्ति की अनुपस्थिति नहीं होगी बल्कि सत्ता संतुलन, संगठनात्मक पकड़ और क्षेत्रीय राजनीति में बड़े बदलाव की शुरुआत होगी। पिछले दो दशकों में अजित पवार ने खुद को महाराष्ट्र की राजनीति के ‘पावर हाउस’ के रूप में स्थापित किया।

प्रशासन पर मजबूत पकड़, कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद और निर्णायक नेतृत्व उनकी पहचान रही। ऐसे में सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि उनके बाद इस विरासत को कौन सम्भालेगा? अजित पवार की राजनीति का केंद्र बारामती रहा है। यह सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि पवार परिवार की राजनीतिक प्रयोगशाला रहा है। अगर नेतृत्व का खालीपन पैदा होता है तो सबसे पहले नजर परिवार पर जाती है। राजनीति में विरासत अक्सर भावनात्मक जुड़ाव और संगठनात्मक स्वीकार्यता से तय होती है। ऐसी स्थिति में परिवार के भीतर उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार, बेटे पार्थ पवार और जय पवार संभावित उत्तराधिकारी माने जा रहे हैं। सुनेत्रा पवार जो वर्तमान में राज्यसभा सांसद हैं, प्रशासनिक अनुभव और बारामती में भावनात्मक पकड़ के कारण सबसे मजबूत दावेदार मानी जा रही हैं। पार्थ पवार ने 2019 में लोकसभा चुनाव लड़कर राजनीति में कदम रखा था जबकि जय पवार अभी तक सक्रिय राजनीति से दूर रहे हैं। अगर पार्टी परिवार से बाहर नेतृत्व तलाशती है तो प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे जैसे नाम सामने आते हैं। प्रफुल्ल पटेल राष्ट्रीय राजनीति में अनुभवी चेहरा हैं। गठबंधन प्रबंधन, दिल्ली की राजनीति और संकट निपटाने में उनकी भूमिका अहम रही है। वे पार्टी को स्थिरता दे सकते हैं लेकिन जमीनी जनाधार की कमी उनकी कमजोरी मानी जाती है तो सुनील तटकरे संगठनात्मक नेता के रूप में मजबूत हैं। कोकण क्षेत्र में उनकी पकड़ है और सहकारी राजनीति का लम्बा अनुभव है। वे कैडर को एकजुट रख सकते हैं लेकिन राज्यव्यापी करिश्माई नेतृत्व की कमी उनके सामने चुनौती बनेगी।

ऐसे परिदृश्य में एनसीपी के दोनों गुटों के फिर से करीब आने की सम्भावना भी बनती है। शरद पवार, सुप्रिया सुले और रोहित पवार की भूमिका निर्णायक हो सकती है। सुप्रिया सुले जो बारामती से सांसद हैं, परिवार और कार्यकर्ताओं के बीच सेतु का काम कर सकती हैं। अगर भावनात्मक और राजनीतिक संतुलन साधा गया तो एक संयुक्त नेतृत्व उभर सकता है। राजनीतिक रूप से इस घटना ने पवार परिवार को फिर करीब ला दिया है। शरद पवार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती एनसीपी के दोनों गुटों को एकजुट रखना है। सुप्रिया सुले की भूमिका भी निर्णायक मानी जा रही है। दूसरी तरफ अजित पवार के बिना महायुति गठबंधन का संतुलन भी प्रभावित होगा। मराठा वोट बैंक पर असर पड़ सकता है और विपक्ष को नए मौके मिल सकते हैं। मुख्यमंत्री के लिए सहयोगी दल को संभाले रखना चुनौतीपूर्ण होगा। यदि एनसीपी कमजोर होती है तो गठबंधन की स्थिरता पर सवाल खड़े हो सकते हैं।

कुल मिलाकर अजित पवार का जाना सिर्फ एक नेता का नहीं बल्कि महाराष्ट्र की उस राजनीति के एक युग का अंत है जहां सत्ता, संगठन और कड़क प्रशासन एक साथ चलते थे। अजित के बिना एनसीपी का ‘पावर हाउस’ कमजोर पड़ सकता है। पार्टी अगर सामूहिक नेतृत्व या मजबूत उत्तराधिकारी तय नहीं कर पाती तो उसके विघटन का खतरा भी बन सकता है। यह दौर सिर्फ उत्तराधिकारी चुनने का नहीं बल्कि एनसीपी की पहचान तय करने का होगा। क्या पार्टी पारिवारिक विरासत पर भरोसा करेगी या संगठनात्मक नेतृत्व को आगे बढ़ाएगी यही सबसे बड़ा सवाल है। इतना तय है कि अगर सही समय पर स्पष्ट नेतृत्व नहीं उभरा तो बारामती का यह ‘पावर हाउस’ कमजोर पड़ सकता है। महाराष्ट्र की राजनीति में एक युग के बाद अगला अध्याय किसके नाम होगा यह आने वाला समय तय करेगा और अब सबकी नजरें इस पर टिकी हैं कि इस खाली जगह को कौन और कैसे भरेगा।

बहरहाल,एनसीपी के दिवंगत अध्यक्ष अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे महाराष्ट्र की पहली महिला उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले ली है। सुनेत्रा के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती एनसीपी को एकजुट रखना और भाजपा और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ गठबंधन की राजनीति को संभालना है। लेकिन उनकी तात्कालिक चुनौती यह होगी कि एनसीपी का एनसीपी (शरद) के साथ बहुप्रतीक्षित विलय को आगे बढ़ाया जाए या नहीं।

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