महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां भावनाएं, पारिवारिक रिश्ते, सत्ता का गणित और रणनीतिक चालें एक साथ उलझ गई हैं। 28 फरवरी को हुए विमान हादसे में उपमुख्यमंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख नेता अजित पवार की आकस्मिक मृत्यु ने न केवल राज्य की राजनीति को झकझोर दिया बल्कि सत्ता के भविष्य को लेकर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सवाल उठता है कि क्या महाराष्ट्र सरकार खतरे में है? आंकड़ों के लिहाज से सरकार के पास बहुमत है, लेकिन राजनीति सिर्फ संख्या का खेल नहीं होती, भरोसे का भी खेल होती है। अजित पवार उस पुल की तरह थे जो भाजपा-शिंदे सरकार और एनसीपी गुट के बीच संतुलन बनाए हुए थे। उनके जाने के बाद यह संतुलन भावनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तर पर कमजोर हुआ है। यदि एनसीपी के भीतर असंतोष बढ़ता है, यदि शरद पवार विपक्षी खेमे को फिर से संगठित करते हैं या यदि उपचुनावों में सत्ता पक्ष को झटका लगता है तो सरकार पर दबाव बढ़ सकता है
अजित पवार लम्बे समय से महाराष्ट्र की राजनीति के प्रभावशाली चेहरों में रहे। प्रशासनिक अनुभव, वित्तीय फैसलों और संगठन पर पकड़, इन सबने उन्हें सत्ता का व्यावहारिक खिलाड़ी बनाया। लेकिन उनके राजनीतिक जीवन पर एक छाया हमेशा बनी रही, सिंचाई घोटाले के आरोप। विपक्ष ने वर्षों तक उन पर हजारों करोड़ के घोटाले का आरोप लगाया, भले ही कई मामलों में जांच एजेंसियों से उन्हें राहत मिली। यह विरोधाभास भी महाराष्ट्र की राजनीति की विडम्बना रहा कि जिन आरोपों को लेकर कभी भाजपा उन्हें घेरती थी, वही भाजपा बाद में उनके साथ सत्ता में साझेदार बनी।
उनकी राजनीतिक यात्रा का सबसे बड़ा मोड़ 2023 में आया जब उन्होंने अपने चाचा शरद पवार से अलग रास्ता चुन लिया। यह केवल पार्टी का विभाजन नहीं था, बल्कि पवार परिवार के भीतर नेतृत्व और भविष्य की दिशा को लेकर गहराई तक जाता संघर्ष था। अजित पवार को लगता था कि वे संगठन और प्रशासन दोनों स्तर पर पार्टी का स्वाभाविक नेतृत्व सम्भाल सकते हैं लेकिन पार्टी की कमान शरद पवार और सुप्रिया सुले के इर्द-गिर्द सिमटती दिख रही थी। यही असंतोष अंततः अलगाव में बदला और एनसीपी दो हिस्सों में बंट गई, एक शरद पवार के साथ, दूसरा अजित पवार के नेतृत्व में। लेकिन राजनीति स्थायी दुश्मनी नहीं मानती। पिछले कुछ महीनों में संकेत मिलने लगे थे कि दोनों गुटों के बीच बातचीत चल रही है। स्थानीय चुनावों में तालमेल, नेताओं की मुलाकातें और अंदरखाने संवाद, इन सबने यह आभास दिया कि एनसीपी फिर से एक हो सकती है। कहा जा रहा था कि अजित पवार स्वयं इस विलय के पक्ष में थे और परिवार तथा संगठन दोनों को फिर एक मंच पर लाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था।
अजित की आकस्मिक मृत्यु के बाद सबसे तेज घटनाक्रम हुआ। उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार को उपमुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी गई। यह फैसला जितना तेज था, उतना ही विवादित भी। सबसे बड़ा झटका तब लगा जब शरद पवार ने सार्वजनिक रूप से कहा कि उन्हें इस निर्णय की पूर्व जानकारी नहीं थी। न केवल वे शपथ समारोह में शामिल नहीं हुए बल्कि सुप्रिया सुले भी अनुपस्थित रहीं। इससे यह संदेश गया कि पवार परिवार के भीतर संवाद की डोर अब भी कमजोर है और राजनीतिक निर्णय भावनात्मक एकता से ज्यादा शक्ति संतुलन को ध्यान में रखकर लिए जा रहे हैं।
यही वह बिंदु है जहां से ‘शरद मास्टर स्ट्रोक’ की चर्चा शुरू होती है। शरद पवार भारतीय राजनीति के सबसे अनुभवी रणनीतिकारों में गिने जाते हैं। वे तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं देते बल्कि समय लेकर चाल चलते हैं। अजित पवार की मृत्यु के बाद उन्होंने बेहद संयमित प्रतिक्रिया दी लेकिन साथ ही यह भी संकेत दिया कि अब एनसीपी के विलय की प्रक्रिया अनिश्चित हो गई है। यह बयान सिर्फ शोक प्रतिक्रिया नहीं था बल्कि एक राजनीतिक संकेत था कि पार्टी की दिशा अब फिर से उनके हाथों में लौट सकती है। शरद पवार की राजनीति को अगर एक वाक्य में समझाना हो तो कहा जा सकता है कि वे दरवाजे कभी पूरी तरह बंद नहीं करते, बस समय आने तक आधे खुले रखते हैं। यही बात उनके कांग्रेस दौर में भी साफ दिखाई देती थी।
मुख्यमंत्री बनने के शुरुआती दौर के बाद शरद पवार राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हुए और राष्ट्रीय नेशनल कांग्रेस के भीतर एक बड़े क्षेत्रीय नेता के रूप में उभरे। महाराष्ट्र में उनकी पकड़ मजबूत थी और दिल्ली की
राजनीति में भी उनका कद लगातार बढ़ रहा था। वे संगठन और सत्ता, दोनों के बीच संतुलन साधने वाले नेता माने जाते थे लेकिन 1990 के दशक के आखिर में कांग्रेस खुद अंदरूनी अस्थिरता से जूझ रही थी। इसी दौर में वह मुद्दा उठा जिसने भारतीय राजनीति में एक बड़ा मोड़ पैदा किया, सोनिया गांधी के विदेशी मूल का सवाल।
1999 में शरद पवार, पी.ए. संगमा और तारिक अनवर ने खुलकर सवाल उठाया कि क्या विदेशी मूल की नेता यानी सोनिया गांधी देश के सर्वोच्च पद की दावेदार हो सकती हैं। यह कांग्रेस नेतृत्व को सीधी चुनौती थी। पार्टी हाईकमान ने इसे अनुशासनहीनता माना और शरद पवार समेत तीनों नेताओं को पार्टी से बाहर कर दिया गया।
लेकिन राजनीति में स्थायी दूरी जैसी कोई चीज नहीं होती और यही शरद पवार की शैली की असली पहचान है।
2004 में जब आम चुनाव हुए और भाजपा नेतृत्व वाला एनडीए सत्ता से बाहर हुआ, तब कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए का गठन हुआ। सबको लगा कि पवार, जिन्होंने सोनिया गांधी के विदेशी मूल पर सवाल उठाया था, शायद कांग्रेस से दूरी बनाए रखेंगे, लेकिन हुआ ठीक उल्टा। शरद पवार ने बिना किसी झिझक के कांग्रेस के साथ गठबंधन किया और यूपीए सरकार में शामिल हो गए। इतना ही नहीं वे केंद्र सरकार में कृषि मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पर रहे और पूरे एक दशक तक यूपीए सरकार के प्रमुख चेहरों में गिने गए।
यही वह राजनीतिक लचीलापन है जिसने पवार को ‘मौके का खिलाड़ी’ नहीं बल्कि ‘मौके का निर्माता’ बनाया। वे जानते थे कि वैचारिक मतभेद और राजनीतिक साझेदारी दो अलग चीजें हैं। सत्ता के समीकरण बदलते हैं और वे उन बदलते समीकरणों में अपने लिए जगह बनाना जानते हैं। अब वर्तमान पर लौटते हैं। महाराष्ट्र में सत्ता समीकरण फिर अस्थिर हैं। एनसीपी पहले ही विभाजित हो चुकी थी। परिवार में दरारें थीं। अजित पवार के सत्ता में जाने से शरद पवार राजनीतिक रूप से कमजोर नहीं हुए, बल्कि उन्होंने संगठन, सहानुभूति और कार्यकर्ताओं के भरोसे पर ध्यान केंद्रित किया। वे सीधे टकराव में नहीं आए लेकिन चुप भी नहीं बैठे। यह वही रणनीति है जो वे पहले भी अपनाते रहे हैं। जब सामने वाला तेजी से चलता है, तब वे शांत रहकर जमीन तैयार करते हैं।
इतिहास बताता है कि शरद पवार सीधे हमला कम करते हैं बल्कि हालात को इस मुकाम तक आने देते हैं जहां दूसरा पक्ष खुद असंतुलित हो जाए। 1978 में उन्होंने यही किया था। अपने गुरु और तत्कालीन मुख्यमंत्री शंकरराव चव्हाण को हटा मात्र 38 बरस की उम्र में वे मुख्यमंत्री बन गए थे। उनकी राजनीति का एक और पहलू है, व्यक्तिगत रिश्तों को कभी पूरी तरह खत्म न करना। वे विरोधी से भी संवाद का रास्ता खुला रखते हैं। यही वजह है कि पवार परिवार के भीतर भी संवाद की सम्भावनाएं हमेशा बनी रहती हैं, चाहे राजनीतिक रास्ते अलग हों।
शरद पवार की शैली को समझने वाले कहते हैं कि वे ‘तुरंत जीत’ के खिलाड़ी नहीं बल्कि ‘अंतिम चाल’ के खिलाड़ी हैं। वे जानते हैं कि राजनीति में समय सबसे बड़ा हथियार है। जब दूसरे नेता बयानबाजी में व्यस्त होते हैं, पवार चुपचाप संगठन, सहकारी संस्थाओं, क्षेत्रीय नेताओं और जमीनी नेटवर्क को मजबूत करते हैं। यही नेटवर्क संकट के समय उनकी असली ताकत बनता है।
यही पैटर्न आज भी दिखाई देता है। चाहे परिवार के भीतर मतभेद हों, पार्टी का विभाजन हो या सत्ता पक्ष से टकराव, पवार सार्वजनिक रूप से दूरी दिखाते हैं लेकिन संवाद के पुल कभी पूरी तरह नहीं तोड़ते। यही वजह है कि वे बार-बार वापसी की सम्भावनाएं बनाए रखते हैं। सुनेत्रा पवार की शपथ ग्रहण के बाद अजित पवार के पुत्र पार्थ पवार ने शरद पवार से लम्बी मुलाकात की। इस मुलाकात को कई तरह से देखा जा रहा है। कुछ इसे पारिवारिक संवाद की वापसी मानते हैं तो कुछ इसे एनसीपी के भविष्य की राजनीतिक संरचना को लेकर बातचीत का संकेत। पार्थ पहले चुनाव हार चुके हैं लेकिन उनकी महत्वाकांक्षा बरकरार है। शरद पवार से उनकी मुलाकात ने यह संदेश दिया कि अगली पीढ़ी भी समीकरणों का हिस्सा बनने जा रही है।
अब सवाल उठता है कि क्या महाराष्ट्र सरकार खतरे में है? आंकड़ों के लिहाज से सरकार के पास बहुमत है लेकिन राजनीति सिर्फ संख्या का खेल नहीं होती, भरोसे का भी खेल होती है। अजित पवार उस पुल की तरह थे जो भाजपा-शिंदे सरकार और एनसीपी गुट के बीच संतुलन बनाए हुए थे। उनके जाने के बाद यह संतुलन भावनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तर पर कमजोर हुआ है। यदि एनसीपी के भीतर असंतोष बढ़ता है, यदि शरद पवार विपक्षी खेमे को फिर से संगठित करते हैं या यदि उपचुनावों में सत्ता पक्ष को झटका लगता है तो सरकार पर दबाव बढ़ सकता है।
शरद पवार का मास्टर स्ट्रोक सीधे सरकार गिराना नहीं भी हो सकता। वह संगठन मजबूत करने, सहकारी क्षेत्र में पकड़ बढ़ाने, ग्रामीण महाराष्ट्र में सहानुभूति लहर खड़ी करने और अजित गुट के विधायकों से व्यक्तिगत सम्पर्क साधने जैसी धीमी लेकिन प्रभावी रणनीतियां भी हो सकती हैं। वे जानते हैं कि महाराष्ट्र की सत्ता अक्सर एक झटके से नहीं बल्कि धीरे-धीरे खिसकती है। सुनेत्रा पवार अब सत्ता में हैं लेकिन उन्हें संगठन और परिवार दोनों में स्वीकार्यता हासिल करनी होगी। वहीं पार्थ पवार की सक्रियता यह संकेत देती है कि पवार परिवार की अगली पीढ़ी भी अब राजनीतिक मंच पर आने को तैयार है। इन सबके बीच सुप्रिया सुले का संतुलित लेकिन सतर्क रुख बताता है कि परिवार के भीतर नेतृत्व की कहानी अभी खत्म नहीं हुई।
कुल मिलाकर महाराष्ट्र में सरकार तुरंत गिरती नहीं दिखती लेकिन पूरी तरह सुरक्षित भी नहीं है। अजित पवार की मृत्यु ने एक खाली जगह बनाई है और राजनीति में खाली जगह ज्यादा समय तक खाली नहीं रहती। शरद पवार शांत हैं लेकिन निष्क्रिय नहीं। सुनेत्रा सत्ता में हैं लेकिन परीक्षा बाकी है। पार्थ मैदान में उतरना चाहते हैं। महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर उसी मोड़ पर है जहां हर चाल का असर दूर तक जाता है।
आने वाले महीनों में तय होगा कि यह सिर्फ शोक के बाद की राजनीतिक हलचल है या सचमुच एक बड़ा ‘मास्टर स्ट्रोक’ आकार ले रहा है। महाराष्ट्र की सत्ता का खेल फिर से खुल चुका है और शतरंज की बिसात पर सबसे अनुभवी खिलाड़ी अब भी मौजूद है।
यही वह राजनीतिक लचीलापन है जिसने पवार को ‘मौके का खिलाड़ी’ नहीं बल्कि ‘मौके का निर्माता’ बनाया। वे जानते थे कि वैचारिक मतभेद और राजनीतिक साझेदारी दो अलग चीजें हैं। सत्ता के समीकरण बदलते हैं और वे उन बदलते समीकरणों में अपने लिए जगह बनाना जानते हैं। अब वर्तमान पर लौटते हैं। महाराष्ट्र में सत्ता समीकरण फिर अस्थिर हैं। एनसीपी पहले ही विभाजित हो चुकी थी। परिवार में दरारें थीं। अजित पवार के सत्ता में जाने से शरद पवार राजनीतिक रूप से कमजोर नहीं हुए, बल्कि उन्होंने संगठन, सहानुभूति और कार्यकर्ताओं के भरोसे पर ध्यान केंद्रित किया। वे सीधे टकराव में नहीं आए लेकिन चुप भी नहीं बैठे। यह वही रणनीति है जो वे पहले भी अपनाते रहे हैं। जब सामने वाला तेजी से चलता है, तब वे शांत रहकर जमीन तैयार करते हैं।
इतिहास बताता है कि शरद पवार सीधे हमला कम करते हैं बल्कि हालात को इस मुकाम तक आने देते हैं जहां दूसरा पक्ष खुद असंतुलित हो जाए। 1978 में उन्होंने यही किया था। अपने गुरु और तत्कालीन मुख्यमंत्री शंकरराव चव्हाण को हटा मात्र 38 बरस की उम्र में वे मुख्यमंत्री बन गए थे। उनकी राजनीति का एक और पहलू है, व्यक्तिगत रिश्तों को कभी पूरी तरह खत्म न करना। वे विरोधी से भी संवाद का रास्ता खुला रखते हैं। यही वजह है कि पवार परिवार के भीतर भी संवाद की सम्भावनाएं हमेशा बनी रहती हैं, चाहे राजनीतिक रास्ते अलग हों।
शरद पवार की शैली को समझने वाले कहते हैं कि वे ‘तुरंत जीत’ के खिलाड़ी नहीं बल्कि ‘अंतिम चाल’ के खिलाड़ी हैं। वे जानते हैं कि राजनीति में समय सबसे बड़ा हथियार है। जब दूसरे नेता बयानबाजी में व्यस्त होते हैं, पवार चुपचाप संगठन, सहकारी संस्थाओं, क्षेत्रीय नेताओं और जमीनी नेटवर्क को मजबूत करते हैं। यही नेटवर्क संकट के समय उनकी असली ताकत बनता है।
यही पैटर्न आज भी दिखाई देता है। चाहे परिवार के भीतर मतभेद हों, पार्टी का विभाजन हो या सत्ता पक्ष से टकराव, पवार सार्वजनिक रूप से दूरी दिखाते हैं लेकिन संवाद के पुल कभी पूरी तरह नहीं तोड़ते। यही वजह है कि वे बार-बार वापसी की सम्भावनाएं बनाए रखते हैं। सुनेत्रा पवार की शपथ ग्रहण के बाद अजित पवार के पुत्र पार्थ पवार ने शरद पवार से लम्बी मुलाकात की। इस मुलाकात को कई तरह से देखा जा रहा है। कुछ इसे पारिवारिक संवाद की वापसी मानते हैं तो कुछ इसे एनसीपी के भविष्य की राजनीतिक संरचना को लेकर बातचीत का संकेत। पार्थ पहले चुनाव हार चुके हैं लेकिन उनकी महत्वाकांक्षा बरकरार है। शरद पवार से उनकी मुलाकात ने यह संदेश दिया कि अगली पीढ़ी भी समीकरणों का हिस्सा बनने जा रही है।
अब सवाल उठता है कि क्या महाराष्ट्र सरकार खतरे में है? आंकड़ों के लिहाज से सरकार के पास बहुमत है लेकिन राजनीति सिर्फ संख्या का खेल नहीं होती, भरोसे का भी खेल होती है। अजित पवार उस पुल की तरह थे जो भाजपा-शिंदे सरकार और एनसीपी गुट के बीच संतुलन बनाए हुए थे। उनके जाने के बाद यह संतुलन भावनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तर पर कमजोर हुआ है। यदि एनसीपी के भीतर असंतोष बढ़ता है, यदि शरद पवार विपक्षी खेमे को फिर से संगठित करते हैं या यदि उपचुनावों में सत्ता पक्ष को झटका लगता है तो सरकार पर दबाव बढ़ सकता है।
शरद पवार का मास्टर स्ट्रोक सीधे सरकार गिराना नहीं भी हो सकता। वह संगठन मजबूत करने, सहकारी क्षेत्र में पकड़ बढ़ाने, ग्रामीण महाराष्ट्र में सहानुभूति लहर खड़ी करने और अजित गुट के विधायकों से व्यक्तिगत सम्पर्क साधने जैसी धीमी लेकिन प्रभावी रणनीतियां भी हो सकती हैं। वे जानते हैं कि महाराष्ट्र की सत्ता अक्सर एक झटके से नहीं बल्कि धीरे-धीरे खिसकती है। सुनेत्रा पवार अब सत्ता में हैं लेकिन उन्हें संगठन और परिवार दोनों में स्वीकार्यता हासिल करनी होगी। वहीं पार्थ पवार की सक्रियता यह संकेत देती है कि पवार परिवार की अगली पीढ़ी भी अब राजनीतिक मंच पर आने को तैयार है। इन सबके बीच सुप्रिया सुले का संतुलित लेकिन सतर्क रुख बताता है कि परिवार के भीतर नेतृत्व की कहानी अभी खत्म नहीं हुई।
कुल मिलाकर महाराष्ट्र में सरकार तुरंत गिरती नहीं दिखती लेकिन पूरी तरह सुरक्षित भी नहीं है। अजित पवार की मृत्यु ने एक खाली जगह बनाई है और राजनीति में खाली जगह ज्यादा समय तक खाली नहीं रहती। शरद पवार शांत हैं लेकिन निष्क्रिय नहीं। सुनेत्रा सत्ता में हैं लेकिन परीक्षा बाकी है। पार्थ मैदान में उतरना चाहते हैं। महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर उसी मोड़ पर है जहां हर चाल का असर दूर तक जाता है।
आने वाले महीनों में तय होगा कि यह सिर्फ शोक के बाद की राजनीतिक हलचल है या सचमुच एक बड़ा ‘मास्टर स्ट्रोक’ आकार ले रहा है। महाराष्ट्र की सत्ता का खेल फिर से खुल चुका है और शतरंज की बिसात पर सबसे अनुभवी खिलाड़ी अब भी मौजूद है।

