डाॅ. सुशील कुमार रोहिल्ला, भूकम्प विज्ञानी, पूर्व भूभौतिकी प्रमुख, वाडिया इंस्टीट्यूट, देहरादून
भारत के नए सिस्मिक मैप में पूरा हिमालय देहरादून, नैनीताल, काठगोदाम, चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ सहित उत्तराखण्ड का हर जिला सबसे खतरनाक जोन-6 में शामिल किया गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार पिछले पांच सौ वर्षों से जमा भारी टेक्टोनिक ऊर्जा किसी भी समय 8 या उससे अधिक तीव्रता का भूकम्प पैदा कर सकती है। सिलक्यारा जैसी घटनाएं हमें बताती हैं कि हिमालयी संरचना बाहर से जितनी मजबूत दिखती है, भीतर से उतनी ही कमजोर और तनावग्रस्त हैं। ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड (बीआईएस) ने जिस नए सिस्मिक हजार्ड मैप को सार्वजनिक किया है वह सामान्य तकनीकी अपडेशन नहीं बल्कि भारत के भूकम्प जोखिम की समझ में दशकों बाद आया सबसे बड़ा बदलाव माना जा रहा है। अब तक देश चार सिस्मिक जोन-2, 3, 4 और 5 के आधार पर भूकम्प के खतरे को मापता था। उत्तराखण्ड और पूरा हिमालयी क्षेत्र इन पुराने मानचित्रों में कहीं जोन-4, कहीं जोन-5 के हिस्सों में बंटा हुआ दिखाई देता था। नई मैपिंग में एक नई श्रेणी जोड़ी गई है जोन-6 और इसमें पूरा हिमालयी आर्क यानी जम्मू-कश्मीर और लद्दाख से लेकर हिमाचल, उत्तराखण्ड, नेपाल सीमा से सटे इलाके, उत्तर बंगाल और पूरा पूर्वोत्तर, सबको एक साथ इस सबसे ऊंचे खतरे वाले जोन में रख दिया है


ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड (बीआईएस) ने आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर अपना नया हजार्ड मानचित्र जारी किया  है। बीआईएस की नई गाइड लाइन के तहत यह नया हजार्ड मैप जारी किया गया है। इस कोड का लक्ष्य सिर्फ नक्शा बदलना नहीं बल्कि भारत के भवन मानकों और इंफ्रास्ट्रक्चर की मजबूती को उस स्तर पर ले जाना है जहां वे आने वाले बड़े भूकम्पों को झेल सकें। नए मैप की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह अब केवल ‘कहां भूकम्प आया था’ वाले पुराने माॅडल पर नहीं टिका आधारित है बल्कि ‘कहां कितना झटका आ सकता है और उसका असर कैसा होगा’, इस सवाल का ज्यादा सटीक जवाब देने की कोशिश करता है। पुराने जोनिंग मैप अतीत के दर्ज भूकम्पों, उनके उपकेंद्र, मैग्निट्यूडऔर ऐतिहासिक नुकसान पर ज्यादा निर्भर थे। वैज्ञानिकों के अनुसार इस तरीके में एक बड़ी कमी है कि जहां लम्बे समय से बड़ा भूकम्प नहीं आया, वहां जोखिम कम नहीं बल्कि ज्यादा हो सकता है क्योंकि प्लेटों का तनाव लगातार जमा हो रहा होता है। नई मैपिंग इस कमजोरी को ठीक करने की कोशिश करती है।

इसी संदर्भ में उत्तराखण्ड की स्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय हो जाती है। यह राज्य तीन बड़ी भूगर्भीय रेखाओं-हिमालयी फ्रंटल थ्रस्ट (एचएफटी), मेन बाउंड्री थ्रस्ट (एमबीटी) और मेन सेंट्रल थ्रस्ट (एमसीटी) के बीच स्थित है। भारतीय प्लेट हर साल लगभग 5 सेंटीमीटर की औसत गति से यूरेशियन प्लेट की ओर धकेल रही है और यही धक्का हिमालय को उठाता भी है और उसी के कारण इस क्षेत्र में गहरा टेक्टोनिक तनाव बना रहता है। पुराने नक्शों में इस पूरे बेल्ट को जोन-4 और 5 में बांट दिया गया था, मानो कहीं खतरा ज्यादा, कहीं कम हो लेकिन नई मैपिंग के अनुसार भू-गर्भीय तनाव और भूकम्पीय सम्भावनाओं के लिहाज से यह पूरा क्षेत्र वास्तव में एक ही उच्चतम श्रेणी का है, इसलिए इसे अलग-अलग जोन में बांट कर देखने की बजाय एक समग्र उच्च-जोखिम क्षेत्र के रूप में देखना होगा। नई रिपोर्ट का एक और बेहद महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अब बीआईएस के आंकड़ों अनुसार भारत के लगभग 61 प्रतिशत भू-भाग को मध्यम से उच्च भूकम्पीय जोखिम वाले जोन में रखा जा रहा है और करीब तीन-चैथाई आबादी किसी न किसी सिस्मिक जोन में रहती है।  इसका अर्थ यह है कि भूकम्प अब ‘किसी दूर दराज पहाड़ी इलाके’ का मुद्दा नहीं बल्कि भारत की आबादी और अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से से सीधे जुड़ा हुआ मसला बन चुका है। उत्तराखण्ड, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर जैसे राज्यों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के सटे हुए मैदानी जिले, जिनमें देहरादून-मोहंड बेल्ट, हरिद्वार के आस-पास का क्षेत्र और तराई के शहर आते हैं, सब इस नए जोखिम मानचित्र में उभरकर सामने आए हैं। इसका यह अर्थ नहीं कि अब तुरंत कोई विनाशकारी भूकम्प आने वाला है? ज्यादातर वैज्ञानिक इस तरह के दहशत फैलाने वाले निष्कर्ष से साफ दूरी बनाते हैं। नई मैपिंग भविष्यवाणी नहीं, सम्भावना का आकलन है। मैप यह नहीं कहता कि भूकम्प कब आएगा बल्कि कहता है कि यदि किसी क्षेत्र में भूकम्प आता है तो जमीन किस स्तर तक हिल सकती है और हिलने से कितनी तबाही होने की आशंका है। मीडिया में जो ‘करोड़ों मौतें’ या ‘पूरा उत्तर भारत डूब जाएगा’ जैसी भाषा चल रही है, वह वैज्ञानिक रिपोर्ट का हिस्सा नहीं है बल्कि उसकी गलत व्याख्या है। असली संदेश यह है कि जो क्षेत्र पहले से सक्रिय हैं, वहां अब भवन-डिजाइन और शहर नियोजन को बहुत ज्यादा गम्भीरता से लेना होगा।
उत्तराखण्ड के संदर्भ में देखा जाए तो इस नए मैप का सबसे बड़ा असर दो स्तरों पर सामने आता है पहला वैज्ञानिक और दूसरा प्रशासनिक और सामाजिक। वैज्ञानिक स्तर पर संदेश साफ है कि देहरादून, नैनीताल, काठगोदाम, टिहरी, चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ इत्यादि इन सब जगहों पर आने वाले दशकों में जरूरी है कि भवन, सड़कें, पुल, सुरंगें और अन्य ढांचे उन्हीं मानकों के अनुसार बनाए जाएं जो अब जोन-6 के लिए निर्धारित किए गए हैं। इन मानकों में केवल इतना नहीं है कि ‘दीवार मोटी हो’ या ‘सरिया ज्यादा हो’ बल्कि इसमें साइट-स्पेसिफिक जियो-टेक्निकल जांच, लिक्विफैक्शन रिस्क का परीक्षण, ढलान की स्थिरता का वैज्ञानिक मूल्यांकन और सक्रिय फाॅल्ट लाइनों के नजदीक बने ढांचों के लिए अलग से कड़े मानक शामिल हैं। नए कोड में पहली बार विशेष प्रावधान जोड़े गए हैंै। गैर-संरचनात्मक हिस्सों जैसे छज्जे, पैरापेट, झूलते हुए फाल्स
सीलिंग, ओवरहेड टैंक, कांच के फसाद, लिफ्ट शाफ्ट और अंदर लटकते भारी फिटिंग के लिए अलग से सुरक्षा पर जोर दिया गया है क्योंकि पिछले अनुभवों से पता चला है कि मध्यम तीव्रता के झटकों में भी अक्सर जानमाल का नुकसान इन्हीं हिस्सों के गिरने से होता है, न कि केवल इमारत के ढहने से। उत्तराखण्ड जैसे हिल स्टेट के लिए यह बिंदु इसलिए अहम है कि यहां पर्यटन आधारित होटल, हाॅस्टल, मल्टी स्टोरी, गेस्ट हाउस और पहाड़ी ढलानों पर बने बहुमंजिला मकानों में ऐसे हिस्से खूब मिलते हैं।

प्रशासनिक स्तर पर चुनौती और भी बड़ी है। नया मैप कहता है कि जो कस्बे दो अलग-अलग जोन की सीमा पर पड़ते हैं, उन्हें सीधे ऊंचे जोन में माना जाएगा ताकि रिस्क को कम करके न आंका जाए। इसका मतलब है कि देहरादून के आस-पास तराई और पहाड़ी संक्रमण क्षेत्र में बसे कई कस्बे अब स्वतः उच्च जोखिम श्रेणी में गिने जाएंगे। उत्तराखण्ड सरकार और स्थानीय निकायों के सामने अब यह काम है कि वे पुराने मैप और नियमों पर आधारित अपने बिल्डिंग-बायलाॅज, मास्टर प्लान और बुनियादी ढांचा योजनाओं को नए सिरे से देखें। इस प्रक्रिया में सबसे कठिन काम ‘लेगेसी इंफ्रास्ट्रक्चर’ का है अर्थात वे इमारतें और ढांचे जो पुराने मानकों पर बन चुके हैं और अभी भी इस्तेमाल में हैं। इन्हें एक झटके में तोड़ा नहीं जा सकता लेकिन इन्हें बिना जांच के छोड़ देना भी जोखिम भरा है। नए कोड और विश्लेषण यह संकेत दे रहे हैं कि स्कूल, अस्पताल, पुलिस थाने, सचिवालय, तहसील, जिला अस्पताल, मुख्य पुल और प्रमुख सड़कें इन सबकी प्राथमिकता के साथ स्ट्रक्चरल आॅडिट और जहां जरूरी हो, रिट्रोफिटिंग की जानी चाहिए।

उत्तराखण्ड में हाल के वर्षों में जो घटनाएं सामने आई हैं, वे इस नए मैप को जमीन से जोड़कर देखने में मदद करती हैं। सिलक्यारा सुरंग दुर्घटना बताती है कि पहाड़ के भीतर खोदे गए बड़े ढांचे कितने संवेदनशील होते हैं। भूगर्भीय तनाव, कमजोर चट्टान, पानी का रिसाव और डिजाइन या कार्यान्वयन की छोटी चूक मिलकर एक बड़ी दुर्घटना में बदल सकती है। सुरंग के अंदर फंसे मजदूरों को निकालने के लिए जिस तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर की तकनीक और भारी संसाधन लगाने पड़े, वह यह दिखाता है कि पहाड़ी परियोजनाएं सिर्फ कागज पर ‘लाइनें’ नहीं बल्कि बेहद जटिल और जोखिम भरे इंजीनियरिंग वातावरण हैं। जब पूरा हिमालय जोन-6 में आ चुका है तो आने वाले समय में ऐसी सभी सुरंग परियोजनाओं के डिजाइन और भूगर्भीय सर्वे के स्तर को कहीं अधिक गम्भीर होना पड़ेगा। इसी तरह उत्तरकाशी, चमोली, पिथौरागढ़ और कर्णप्रयाग-जोशीमठ बेल्ट में बार-बार सड़कों के धंसने, पहाड़ के कटाव और अचानक भूस्खलन की घटनाएं दिखाती हैं कि भूकम्पीय खतरा केवल ‘कम्पन’ तक सीमित नहीं रहेगा। बड़े भूकम्प के बाद ये इलाके कई दिनों तक कट सकते हैं राहत और बचाव टीमें फंस सकती हैं और टनल-ब्रिज जैसे ढांचे यदि सिस्मिक मानकों पर नहीं बने तो वे खुद रुकावट बन सकते हैं। इसलिए बीआईएस की नई मैपिंग और डिजाइन कोड का सबसे बड़ा संदेश यही है कि आपदा-प्रबंधन को अब केवल एनडीआरएफ या राज्य आपदा बल की ट्रेनिंग तक सीमित नहीं रखा जा सकता, उसे प्लानिंग, निर्माण और रख-रखाव की पहली सीढ़ी पर ही शामिल करना होगा।

गौरतलब है कि भारत की तेजी से बढ़ती शहरी आबादी और आर्थिक संरचना अब अधिकतर इन्हीं सक्रिय जोनों के भीतर है। उत्तराखण्ड जैसे छोटे राज्य के लिए यह बात और संवेदनशील है क्योंकि यहां नगर छोटे हैं, संसाधन सीमित हैं, लेकिन जोखिम बहुत बड़ा है। एक ओर पर्यटन, सड़क चैड़ीकरण, नई सुरंगें, हाइड्रो प्रोजेक्ट और शहरों का फैलाव है दूसरी तरफ पहाड़ की अस्थिरता, भूकम्पीय तनाव और जलवायु परिवर्तन से तेज हुई चरम मौसमी घटनाएं हैं। नए सिस्मिक मैप से साफ है कि अब विकास माॅडल को ‘कितनी जल्दी, कितनी बड़ी परियोजना’ से हटाकर ‘कितना सुरक्षित, कितनी टिकाऊ परियोजना’ की दिशा में मोड़ना पड़ेगा। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि यह मैप केवल हिमालयी राज्यों के लिए नहीं बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी है लेकिन हिमालय में इसका असर सबसे ज्यादा गहरा है। भारत सरकार, बीआईएस और विशेषज्ञ बार-बार यह स्पष्ट कर रहे हैं कि इस मैप को ‘घबराहट’ की भाषा में नहीं बल्कि ‘तैयारी’ की भाषा में पढ़ा जाना चाहिए। यानी इसका अर्थ यह नहीं कि कल सुबह ही 8.5 का भूकम्प आएगा बल्कि यह कि आने वाले वर्षों और दशकों में जब भी बड़ा भूकम्प आए, तो हमारी इमारतें, पुल, सुरंगें और शहर उसे सहने की क्षमता रखते हों।

उत्तराखण्ड के लिए यह पल एक तरह से आईना है। इस आईने में पहाड़ों की सुंदरता के साथ-साथ उनकी नाजुक हकीकत भी साफ दिख रही है। देहरादून की बढ़ती काॅलोनियां, नैनीताल की झील किनारे की भीड़, काठगोदाम की फैलती बस्तियां, चमोली और उत्तरकाशी के संकरे घाटी शहर, सभी को अब अपने भविष्य को इस नए मैप की रोशनी में देखना होगा। बीआईएस ने जो काम अपने हिस्से का कर दिया है, अब गेंद राज्य सरकार, स्थानीय निकायों, इंजीनियरों, आर्किटेक्ट्स और आम नागरिकों के पाले में है। भूकम्प कब आएगा, यह किसी के हाथ में नहीं लेकिन भूकम्प आने पर कितना नुकसान होगा, यह काफी हद तक हमारे हाथ में है। नया सिस्मिक हजार्ड मैप यही गम्भीर, शांत और तथ्य आधारित संदेश दे रहा है।

बात अपनी-अपनी

जोन सिक्स को रिवाइज किया गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि कोई नया भूकम्प आ जाएगा। हिमालय में जो हो रहा है वह तो पहले से ही हो रहा है। टेक्टोनिक प्लेट्स का मूवमेंट कोई नई बात नहीं है। भूकम्प इसी लिए आते हैं। लेकिन यह भी जरूरी नहीं है कि भूकम्प आएगा ही। हां हाई मैग्निट्यूड भूकम्प आने का चांसेज है। इसका मतलब यह भी नहीं है कि हर बार हाई मैग्नीट्यूड भूकम्प आएगा। इसके बचाव के लिए काम करना चाहिए। पहले से ही प्रिपेयर रहेंगे तो नुकसान नहीं होगा। मकान वगैरह बनाने के लिए भूकम्प विरोधी तरीकों से इंफ्रास्ट्रक्चर का काम करना चाहिए। सिक्स जोन में हिमालयी क्षेत्र डाला है तो अब हमें केयरफुल रहना होगा। पैनिक होने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। बस हमें अब केयरफुली काम करने की जरूरत है।

प्रो. के.एस. राव, रिटायर्ड प्रोफेसर, सदस्य भारतीय, जियोटेक्निकल सोसायटी, भारत सरकार

भूकम्प के लिए अभी तक जो भी वर्गीकरण होता था वह जोन फाईव ही था। लेकिन अब इसका नया वर्गीकरण किया गया है जिसमें सम्पूर्ण हिमालयी राज्यों को सिक्स जोन में डाला गया है। इसका मतलब है कि हमारा उत्तराखण्ड प्रदेश इसकी जद में आ चुका है। पहले उत्तराखण्ड राज्य जोन फोर और फाईव में था। पिछले दो सौ वर्षों से सेंटर हिमालयी रीजन में कहीं कोई बड़ा भूकम्प नहीं आया है। इसको देखते हुए सभी वैज्ञानिकों से फीड बैक लेकर ‘ब्यूरो ऑफ इंडियन’ स्टैंडर्ड ने एक नया भूकम्प कोर डिजाइन जारी किया है। अब इसमें एक नया जोन सिक्स जो कि समस्त हिमालसयी राज्यों में सबसे संवेदनशील जोन में रखा गया है। अब चाहे रामनगर की बात हो चाहे हल्द्वानी की बात हो या पिथौरागढ़ की बात हो या देहरादून की बात हो, पूरा उत्तराखण्ड राज्य इस नए सिक्स जोन का हिस्सा बन गया है। अब हमें अपने आप को पहले ही प्रोटेक्ट करना होगा। आज हम यहां करोड़ों रुपए लेकर मल्टी स्टोरी बिल्डिंगों में अपार्टमेंट ले रहे हैं। क्या उसमें भूकम्प के नए सिक्स जोन की बिल्डिंग रिक्वायरमेंट का ध्यान रखा गया है? इसके अलावा यहां जो हजारों बिल्डिंग अपार्टमेंट बने हैं उसका क्या काॅन्सिक्वैंस होगा? उस पर किस किस्म की रैट्रोफिटिंग करनी चाहिए? हमारे जो इंडिपेंडेंट घर बने हुए है या बनाए जा रहे हैं उस पर भी हमें क्या ध्यान देना चाहिए? जहां तक सरकार की बात है उनके ऊपर तो और भी बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा हो रहा है। आप लोगों ने तो किस-किस को कहां-कहां पर बिल्डिंग बनाने के लिए स्वीकृति दे रहे हैं? नदी-नाले-खालों तक में कौन-कौन कैसी बिल्डिंगें बनाई जा रही है? देहरादून की फाॅल्ट लाइन वह चाहे राजपुर रोड़ से गुजरती हो या मोंहडं से सभी इसकी जद में हैं। आने वाले दिनों में इस पर और भी जानकारी निश्चित तौर पर सामने आएगी ही लेकिन मेरा उत्तराखण्ड वासियों से निवेदन है, मेरी सलाह है कि अब हमें पूरी तरह से सजग हो जाना चाहिए।

अनूप नौटियाल, अध्यक्ष, सोशियल डेवलपमेंट फाॅर कम्युनिटीज फांउडेशन, देहरादून

यह एकदम सही है कि हिमालय का हिस्सा चाहे वह उत्तराखण्ड हो या अन्य हिमालयी क्षेत्र हो वह संसेटिव जोन में आना ही चाहिए क्योंकि हिमालय की भौगोलिक स्थिति ही ऐसी है इसीलिए इसको हाई सेंसेटिव सिक्स जोन में रखा गया है। उत्तराखण्ड को चार और पांच जोन में रखा गया था। लेकिन यह भी सही नहीं है कि हम इसको अलग-अलग दो पार्ट में रखकर इसका वर्गीकरण करें। अगर कोई 8 रिएक्टर का भूकम्प आता है तो उसका असर तो पूरे उत्तराखण्ड में होगा। इसीलिए इस मैप को माॅडिफाई किया गया है। बस अब इतना हुआ है कि पूरा हिमालयी क्षेत्र को दो पार्ट से हटाकर एक ही सिक्स जोन में रखा गया है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि कोई बड़ा भूकम्प आने वाला है या आएगा ही। हमें इससे घबराने की जरूरत नहीं है। यह तो हमारी भलाई के लिए किया गया है जिससे हम अब सचेत हो जाएं और अपने यहां अच्छी तरह से भूकम्प से बचने की योजना पर काम करें। यह उत्तराखण्ड के लिए अच्छी बात है कि हमें सिक्स जोन में रखा गया है। अब हम इसी के तहत अपनी प्लानिंग करके अपने को सेफ कर सकते हैं। देखिए भूकम्प आना तो हिमालयी क्षेत्र के लिए एक सामान्य बात है। अफगानिस्तान, नेपाल में भी बड़ा भूकम्प आया है। इससे वहां बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। भूकम्प से कभी नुकसान नहीं होता है। नुकसान बिल्डिगों से होता है, इंफ्रास्ट्रक्चर से होता है। अगर यह मजबूत है तो भूकम्प  को सहन कर लेगा। जापान में तो हर महीने कोई न कोई भूकम्प आता ही है लेकिन वहां नुकसान नहीं होता क्योंकि जापान का इंफ्रास्ट्रक्चर भूकम्प से बचाव के लिए पहले से ही काम करता रहा है। अब हमें या अन्य हिमालयी राज्य जो भी निर्माण का काम करें वह भूकम्प के सिक्स जोन के नुकसान से बचने में मदद करे। जो भी प्लानिंग है चाहे वह गवर्नमेंट की हो या हमारी अपनी हो वह भूकम्प के सिक्स जोन के अनुरूप ही होनी चाहिए। इसे आप ऐसा भी समझ सकते हैं कि यह हमें आने वाले समय के लिए समय से पहले बचाव के लिए प्रेरित करता है।

डाॅ. नरेश, वरिष्ठ वैज्ञानिक, वाडिया हिमालय भू संस्थान देहरादून

यदि हिमालय को जोन-6 में वर्गीकृत किया जाता है तो इसका अर्थ है कि इसे विश्व के सर्वोच्च जोखिम वाले भूकम्पीय क्षेत्र की श्रेणी में स्वीकार किया जा रहा है। यह वर्गीकरण वैज्ञानिक समुदाय द्वारा हिमालय में बढ़ते तनाव, सक्रिय फाॅल्टों की प्रकृति और भूकम्प गैप की गम्भीरता को देखते हुए तार्किक माना जा रहा है। इसका सीधा अर्थ है कि भविष्य में 8 रिएक्टर की तीव्रता वाला भूकम्प आने की आशांका अधिक है और इस शंका को योजना, निर्माण और विकास नीतियों में शामिल करना अनिवार्य हो जाएगा। हिमालय को जोन-6 में रखना किसी भय का संकेत नहीं बल्कि यह बताता है कि प्रकृति की वास्तविकता को समझकर हमें अपने विकास माॅडल को अधिक सुरक्षित, वैज्ञानिक और आपदा-रोधी बनाना होगा। यह उत्तराखण्ड के लिए चुनौती भी है और अवसर भी, एक ऐसा अवसर, जिससे हम भविष्य के बड़े भूकम्पों के प्रभाव को काफी हद तक कम कर सकते हैं।

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