ईरान के परमाणु कार्यक्रम, खाड़ी में तेल आपूर्ति की सुरक्षा और स्ट्राइट आॅफ होरमुज में बढ़ती सैन्य गतिविधियों को लेकर विवाद तेज हो गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सम्भावित खतरे के मद्देनजर अमेरिकी नौसेना को सक्रिय करते हुए विमानवाहक पोत और अतिरिक्त युद्धपोत क्षेत्र में भेजे हैं जबकि ईरान ने सैन्य अभ्यास और कड़े बयानों के जरिए यह संकेत दिया है कि उस पर दबाव बढ़ा तो वह समुद्री मार्गों पर रणनीतिक जवाब दे सकता है


पश्चिम एशिया में जब भी अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ता है, दुनिया की नजरें एक संकरी समुद्री पट्टी स्ट्रेट ऑफ होरमुजपर टिक जाती हैं। यही वह जलमार्ग है जिससे होकर प्रतिदिन लगभग दो करोड़ बैरल तेल और विश्वभर के लिए एलएनजी गैस का बड़ा हिस्सा गुजरता है। सालाना आधार पर यह व्यापार लगभग 500 अरब डाॅलर, यानी भारतीय मुद्रा में लगभग 45 लाख करोड़ रुपए के बराबर है। स्पष्ट है कि यहां किसी भी प्रकार की सैन्य या राजनीतिक हलचल का असर सीधे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।


हाल के दिनों में अमेरिका ने खाड़ी क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाई है। परमाणु ऊर्जा से संचालित विमानवाहक पोत यूएसएस गैराल्ड आर. फोर्ड की तैनाती को एक स्पष्ट संदेश के रूप में देखा जा रहा है। वहीं तेहरान ने भी सैन्य अभ्यास करते हुए संकेत दिया है कि यदि उस पर हमला हुआ तो वह होरमुज जलडमरूमध्य में आवाजाही बाधित कर सकता है। यह स्थिति एक बार फिर उस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की ओर ध्यान खींचती है जहां से अमेरिका-ईरान सम्बंधों में अविश्वास की शुरुआत हुई थी।

वर्ष 1979 की ईरान क्रांति ने न केवल ईरान की सत्ता संरचना बदली बल्कि उसकी विदेश नीति की दिशा भी पूरी तरह परिवर्तित कर दी। क्रांति से पहले ईरान के शाह मोहम्मद रजा पहलवी अमेरिका के करीबी सहयोगी थे। अमेरिका ने उनके शासन को राजनीतिक और सैन्य समर्थन दिया था लेकिन बढ़ते जनआक्रोश और विरोध-प्रदर्शनों के बीच जनवरी 1979 में शाह को देश छोड़ना पड़ा। उन्होंने एक देश में स्थायी शरण नहीं ली बल्कि मिस्र, मोरक्को, बहामास और मेक्सिको होते हुए इलाज के लिए अमेरिका पहुंचे। अंततः उन्होंने मिस्र में शरण ली जहां 1980 में उनका निधन हुआ।

शाह के अमेरिका आगमन ने ईरान में आक्रोश को और भड़का दिया। तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर 52 अमेरिकी नागरिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाए रखने की घटना ने दोनों देशों के रिश्तों को स्थायी रूप से विषाक्त बना दिया। इसके बाद राजनयिक सम्बंध टूट गए और प्रतिबंधों का लम्बा सिलसिला शुरू हुआ। यही वह मोड़ था जिसने अमेरिका और ईरान को दशकों तक प्रत्यक्ष या परोक्ष टकराव की स्थिति में बनाए रखा।

क्रांति के बाद स्थापित इस्लामी गणराज्य, जिसका नेतृत्व वर्तमान में सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के हाथों में है, ने स्वयं को पश्चिमी प्रभाव से दूर रखने और क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित करने की नीति अपनाई। दूसरी ओर अमेरिका ने प्रतिबंधों, कूटनीतिक दबाव और सैन्य उपस्थिति के जरिए ईरान पर नियंत्रण की रणनीति अपनाई। 2015 में हुआ परमाणु समझौता, (Joint Comprehensive Plan of Action) कुछ समय के लिए उम्मीद लेकर आया लेकिन 2018 में अमेरिकी प्रशासन द्वारा इससे अलग होने के बाद तनाव फिर चरम पर पहुंच गया।

आज की परिस्थिति में होरमुज जलडमरूमध्य की सामरिक अहमियत सबसे बड़ी चिंता का विषय है। इस जलमार्ग से गुजरने वाले तेल और गैस का बड़ा हिस्सा एशियाई देशों, चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करता है। यदि यहां अवरोध उत्पन्न होता है तो तेल की कीमतें 100 डाॅलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती हैं जिससे वैश्विक महंगाई और आर्थिक अस्थिरता का खतरा बढ़ जाएगा। भारत जैसे देशों के लिए जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करते हैं, इसका सीधा असर ईंधन कीमतों और औद्योगिक लागत पर पड़ेगा।

विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका की सैन्य तैनाती और ईरान की तीखी बयानबाजी दोनों ही ‘डिटरेंस’ यानी एक-दूसरे को डराकर रोकने की रणनीति का हिस्सा हो सकती हैं। पूर्ण पैमाने पर युद्ध की सम्भावना कम आंकी जा रही है क्योंकि इसकी कीमत दोनों पक्षों और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अत्यधिक होगी। हालांकि सीमित सैन्य कार्रवाई, साइबर हमले या समुद्री टकराव जैसे परिदृश्य से इनकार नहीं किया जा सकता।

कुल मिलाकर मौजूदा संकट की जड़ें 1979 की क्रांति और उसके बाद बिगड़े अमेरिका-ईरान सम्बंधों में गहराई से निहित हैं। शाह के निर्वासन से लेकर दूतावास संकट तक की घटनाएं आज भी दोनों देशों के बीच अविश्वास की दीवार को मजबूत करती हैं। होरमुज की लहरों पर तैरते टैंकर सिर्फ तेल नहीं ढोते, वे वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय राजनीति की संवेदनशीलता साथ लेकर चलते हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह टकराव कूटनीति की मेज तक सिमटता है या समुद्री सीमाओं पर और अधिक तनाव में बदलता है।

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