कृष्ण कल्पित
वरिष्ठड्ढ साहित्यकार
यह सही है कि गीता प्रेस कोई सुधारवादी संस्था नहीं है। वह यथास्थितिवाद की हिमायती है। वर्णाश्रम और सनातन का प्रचार ही इसका उद्देश्य है। जैसे दुनिया के सभी धर्मों में दकियानूसी विचार पाए जाते हैं वे सनातन और हिंदू धर्म में भी हैं। हमारा ऐतराज गीता प्रेस की आरएसएस से तुलना करने पर था। दोनों की स्थापना आस-पास ही हुई लेकिन दोनों के विचारों में दिन और रात का अंतर है। गीता प्रेस ने सनातन का प्रचार किया लेकिन कभी सांप्रदायिकता की बात नहीं की। गीता प्रेस आरएसएस की तरह अंग्रेज परस्त और मुसलमान विरोधी नहीं रही। गीता प्रेस की एक भजन की किताब में इतने मुसलमान कवि संकलित हैं जितने रामचंद्र शुक्ल की किताब ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में भी नहीं हैं। गीता प्रेस ने कभी हिंदू राष्ट्र की बात नहीं की। गीता प्रेस के विरोधी जिस एक अक्षय मुकुल की अंग्रेजी किताब का हवाला दे रहे हैं उसकी मूल अवधारणा ही भ्रामक है। गीता प्रेस ने कभी हिंदू राष्ट्र बनाने की तो छोड़िए, कभी उसकी बात भी नहीं की। किताब का शीर्षक ही गलत है। कितनी शर्मनाक बात है कि गीता प्रेस की भूमिका पर हिंदी के किसी लेखक, पत्रकार ने आज तक कुछ नहीं लिखा। अक्षय मुकुल की किताब कोई सनद नहीं है। हमारा मानना है कि यदि गीता प्रेस जैसा संस्थान/ छापाखाना जर्मनी जैसे किसी उन्नत देश में होता तो उसे अब तक राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया जाता। यह दुनिया का संभवतः सबसे बड़ा प्रेस है जिसने अब तक कोई सौ करोड़ किताबें प्रकाशित की होंगी। ज्ञान का ऐसा प्रसार अभूतपूर्व है
हिंदी के कुछ वामपंथी आलोचकों, पत्रकारों और जातीय बुद्धिजीवियों के मन में गीता प्रेस के प्रति जैसी नफ़रत भरी हुई है, उससे लगता है कि उनके पास यदि सत्ता होती तो वे गीता प्रेस पर कभी का बुलडोजर चलवा देते। जबकि हमारा मानना है कि यदि गीता प्रेस जैसा संस्थान/छापाखाना जर्मनी जैसे किसी उन्नत देश में होता तो उसे अब तक राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया जाता। यह दुनिया का संभवतः सबसे बड़ा प्रेस है जिसने अब तक कोई सौ करोड़ किताबें प्रकाशित की होंगी। ज्ञान का ऐसा प्रसार अभूतपूर्व है।
यह सही है कि गीता प्रेस कोई सुधारवादी संस्था नहीं है। वह यथास्थितिवाद की हिमायती है। वर्णाश्रम और सनातन का प्रचार ही इसका उद्देश्य है। जैसे दुनिया के सभी धर्मों में दकियानूसी विचार पाए जाते हैं वे सनातन और हिंदू धर्म में भी हैं। हमारा ऐतराज गीता प्रेस की आरएसएस से तुलना करने पर था। दोनों की स्थापना आस-पास ही हुई लेकिन दोनों के विचारों में दिन और रात का अंतर है। गीता प्रेस ने सनातन का प्रचार किया लेकिन कभी सांप्रदायिकता की बात नहीं की। गीता प्रेस आरएसएस की तरह अंग्रेज परस्त और मुसलमान विरोधी नहीं रही। गीता प्रेस की एक भजनों की किताब में इतने मुसलमान कवि संकलित हैं जितने रामचंद्र शुक्ल की किताब ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में भी नहीं हैं।
गीता प्रेस ने कभी हिंदू राष्ट्र की बात नहीं की। गीता प्रेस के विरोधी जिस एक अक्षय मुकुल की अंग्रेजी किताब का हवाला दे रहे हैं उसकी मूल अवधारणा ही भ्रामक है। गीता प्रेस ने कभी हिंदू राष्ट्र बनाने की तो छोड़िए, कभी उसकी बात भी नहीं की। किताब का शीर्षक ही गलत है। कितनी शर्मनाक बात है कि गीता प्रेस की भूमिका पर हिंदी के किसी लेखक, पत्रकार ने आज तक कुछ नहीं लिखा। अक्षय मुकुल की किताब कोई सनद नहीं है।
गीता प्रेस के लेखकों में गांधी, रविंद्र, प्रेमचंद, निराला तक रहे हैं। करपात्री की किताब माक्र्सवाद और रामराज्य भी गीता प्रेस से छपी। गांधी के सुझाव पर ही कल्याण आज तक विज्ञापन नहीं लेता न किताब की समीक्षा प्रकाशित करता। बाद में हनुमान प्रसाद पोद्दार की गांधी के साथ दूरियां बढ़ी। गांधी से मतभेद तो नेहरू के भी थे, अंबेडकर के भी थे इससे क्या होता है? यह भी कारण हो सकता है कि गांधी ने जो गीता पर टीका लिखी थी, उसे गीता प्रेस ने अस्वीकृत कर दिया था।
यह सही है कि गांधी की हत्या के बाद जिन पांच सौ के करीब लोगों को गिरफ्तार किया गया उनमें भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार भी थे। लेकिन बाद में वे आरोप मुक्त हुए। क्या कांग्रेस सरकार ने गीता प्रेस पर और भाईजी पर डाक टिकट प्रकाशित नहीं की? क्या कांग्रेस की सरकार ने हनुमान प्रसाद पोद्दार को भारत रत्न देने की पेशकश नहीं की थी, जिसे हनुमान प्रसाद पोद्दार ने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया था? ये तथ्य आपके प्रिय अक्षय मुकुल की किताब में ही दर्ज हैं।
गीता प्रेस का निर्माण जयदयाल गोयंदका और हनुमान प्रसाद पोद्दार जैसे मारवाड़ी व्यवसायियों ने न केवल अपना जीवन बल्कि अपने व्यापार को दांव पर लगाकर किया। अपना जीवन होम दिया। गीता प्रेस ने आज तक किसी से कोई चंदा नहीं लिया। करोड़ों रुपए देने की पेशकश होती रहती है लेकिन गीता प्रेस इस मामले में अडिग है। अभी भी उन्होंने गांधी स्मारक पुरस्कार लिया लेकिन एक करोड़ की पुरस्कार राशि के लिए मना कर दिया। ऐसे सैंकड़ों उदाहरण हैं।
गीता प्रेस ने हमारे आर्ष ग्रंथों का प्रकाशन और प्रचार किया, वह अभूतपूर्व है। महाभारत गीता प्रेस का सर्वाधिक प्रामाणिक है यह विष्णु खरे का मानना था। विष्णु खरे भी मेरी तरह गीता प्रेस के घोर प्रशंसक थे। रामायण, रामचरित मानस और गीता भी सर्वाधिक गीता प्रेस की ही पढ़ी जाती है। गीता प्रेस ने न जाने कितने खोए हुए ग्रंथों का कल्याण किया।
जैसे ताड़न के अधिकारी जैसी एकाध दोहे चैपाई को लेकर रामचरित मानस का विरोध किया जाता है वैसे ही स्त्रियों, बच्चों को लेकर गीता प्रेस की कुछ दकियानूसी पुस्तिकाओं को लेकर गीता प्रेस का विरोध किया जा रहा है। स्त्रियों को लेकर ऐसे पिछड़े हुए विचार सभी धर्मों और संप्रदायों में हैं। इसका अध्ययन अलग से किया जाना चाहिए। हाली का मुसद्दस पढ़ लीजिए। बाइबिल पढ़ लीजिए। यह मुआमला अलग है।
गीता प्रेस की किताबों ने हिंदी पट्टी के करोड़ों लोगों को पढ़ना सिखाया। पढ़कर ही पता चलेगा कि कोई बात सही है या नहीं? अनपढ़ तो विचार कर नहीं सकता। आज हिंदी में जितने भी प्रगतिशील जनवादी कवि, लेखक, आलोचक हैं वे गीता प्रेस की किताबें पढ़कर ही उसकी आलोचना के काबिल हुए हैं। यह एक सतत् प्रक्रिया है।
गीता प्रेस ने सनातन का और हिंदू धर्म का प्रचार किया, हिंदुत्व का नहीं। हिंदू धर्म गरीबों और सताए हुए लोगों का धर्म है जबकि हिंदुत्व धनपशुओं का खतरनाक राजनीतिक एजेंडा है। हिंदू धर्म और हिंदुत्व एक नहीं है। जो इसे एक समझने की गलती करते हैं वे ही गीता प्रेस का विरोध कर सकते हैं। यही मूर्खता हो रही है।
मुझे गीता प्रेस की एक बाल पोथी की एक कहानी कभी नहीं भूलती। एक स्वतंत्रता सेनानी डाकू और उसका मुस्लिम दोस्त अंग्रेजों की पुलिस से बचते हुए किसी मंदिर में पनाह लेते हैं और भूखे-प्यासे हैं। तभी एक वृद्ध स्त्री जल का लोटा और प्रसाद की कटोरी लेकर भगवान को अर्पित करने मंदिर जाती है तो देखती है कि कोई मनुष्य भूखा-प्यासा मंदिर में छुपा हुआ है तो वह अपना प्रसाद और जल का लोटा उसे समर्पित कर देती है। तभी गोलियां चलती हैं और अपने साथी को बचाने के लिए मुस्लिम दोस्त खुद सीने पर गोली खाकर मर जाता है। ऐसी प्रेरणास्पद कहानियां भी गीता प्रेस ने छापी हैं।
सनातन धर्म में स्त्रियों, अछूतों के बारे में जो प्रतिगामी विचार हैं वे गीता प्रेस की देन नहीं हैं। गीता प्रेस कोई सुधारवादी संगठन नहीं है। उसका इसका दावा भी नहीं है। वह यथास्थितिवादी है। इसीलिए भाईजी के गांधी से मतभेद हुए। गांधी जी ऐसे स्वप्नजीवी विचारक थे कि उनके अनुयायियों को छोड़कर सब से उनका मतभेद था। इस आधार पर हम किसी निर्णय पर नहीं पहुंचेंगे तो हम सही निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सकते। और गीता प्रेस के आलोचक गांधी जी के स्त्रियों के बारे में विचारों का अध्ययन करेंगे तो सोच में पड़ जायेंगे लेकिन इससे गांधी की महानता पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
गीता प्रेस एक असंभव स्वप्न था जो साकार हुआ। सौ बरस से अधिक हो गए। गीता प्रेस हमारी राष्ट्रीय धरोहर है। विश्व का एक अजूबा। प्रिटिंग प्रेस का आविष्कार भारत में नहीं हुआ लेकिन उसका ऐसा उपयोग किसी देश में नहीं हुआ। इसे इसी तरह देखना चाहिए, तभी आपके ज्ञानचक्षु खुलेंगे। वरना, चार किताबें पढ़कर हम भी तुझ जैसे हो जाएंगे!
गीता प्रेस की स्थापना को सौ बरस हो गए। इन सौ बरसों में गीता प्रेस ने कोई सौ करोड़ किताबों का प्रकाशन किया और उन्हें देश-विदेश के सुदूर गांवों/कस्बों/शहरों तक पहुंचाया। यह प्रकाशन की दुनिया में एक रिकाॅर्ड है। इन सौ करोड़ किताबों में से पचास करोड़ प्रतियां (सभी तरह के संस्करण मिलाकर) केवल रामचरित मानस, गीता और महाभारत की प्रकाशित की। यदि रामचरित मानस, गीता और महाभारत पतनशील/ प्रतिगामी/सांप्रदायिक साहित्य है तो मुझे कुछ नहीं कहना। आप गीता प्रेस को गालियां देने के लिए स्वतंत्र हैं।
(लेखक के फेसबुक वाॅल से।)

