Uttarakhand

देरी से न्याय, जीत नहीं त्रासदी

सेना के पूर्व सैनिकों और युद्ध विधवाओं के कई मामले ऐसे हैं जिनमें पेंशन, भत्ते और देयकों के लिए परिवारों को वर्षों नहीं, दशकों तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है। विशना देवी का संघर्ष लगभग 50 वर्षों का है, वीर नारी गुड्डी को 46 वर्ष बाद विशेष पारिवारिक पेंशन का अधिकार मिला जबकि कुसुम के मामले में लापता रिपोर्ट, एफआईआर में देरी से आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा। सवाल यह है कि न्याय मिल भी जाए तो इतनी देर से कि वह जीत नहीं, एक जीवन-त्रासदी बन जाए। यह स्थिति संविधान की सामाजिक-आर्थिक न्याय की अवधारणा और अनुच्छेद 21 की भावना पर भी गम्भीर प्रश्न खड़े करती है


कहते हैं कि न्याय में देरी न्याय की हार है। विलंबित न्याय अन्याय के समान है। देरी से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है। यह बात उन लोगों पर लागू होती है जो अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा न्याय पाने में खपा देते हैं। इस बीच उन्हें बहुत कुछ खोना पड़ता है लेकिन बावजूद इसके अगर वह कानूनी लड़ाई जीत जाते हैं तो यह उनकी जीजीविषा की एक बड़ी जीत बनकर उभरती है जो बताती है कि न्याय भले देर से मिले लेकिन लड़ाई जारी रहनी चाहिए।

केस नं. 1 : विशना देवी पिछले 50 साल से अपने हकों के लिए लड़ रही हैं। 48 साल के संघर्ष के बाद जब उसे भत्ते व पेंशन मिले तो वह पूरे नहीं थे लेकिन विशना देवी ने हार नहीं मानी। वह ले. कर्नल एस.पी. गुलेरिया के मार्गदर्शन में अपनी लड़ाई लड़ती रही। इस बीच विशना देवी ने बहुत कुछ खोया, जवानी खोई, आर्थिक मुफलिसी झेली, बच्चों की शिक्षा से लेकर शादी विवाह तक की जिम्मेदारी को अपनी हाड़तोड़ मेहनत के जरिए जैसे-तैसे निभाती रही लेकिन अपने हकों के लिए वह संघर्ष करती रही। अब करीब 50 वर्ष बाद उम्मीद जगी है कि विशना देवी को उसका पूरा हक-हकूक मिलेगा। उसके साथ पूरा न्याय होगा। उल्लेखनीय है कि विशना देवी के पति स्वर्गीय सोबन 61 इंजीनियर रेजीमेंट राजस्थान में हवलदार पद पर कार्यरत थे। अचानक 11 अगस्त 1976 को अपनी यूनिट से वह लापता हो गए। इस केस पर लगातार पैरवी होती रही जिसके परिणाम स्वरूप इन्हें इनका हक मिल पाया। लेकिन कानूनन उन्हें जो हक मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल पाया। इसकी वजह यह थी कि विशना देवी के पति 11 अगस्त 1976 को लापता होते हैं लेकिन इनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट 3 अप्रैल 1993 में लिखी जाती है जबकि ग्राम प्रधान के द्वारा दिए गए प्रमाण पत्र में भी इनके लापता होने का उल्लेख वर्ष 1976 है। लेकिन बाद में काफी लिखा-पढ़ी के बाद जब इनकी पेंशन स्वीकृत होती है तो वह वर्ष 2014 से स्वीकृत होती है जबकि कानून पुलिस में लिखी गई गुमशुदगी की रिपोर्ट के आधार पर विशना देवी को 3 अपै्रल 1993 से पेंशन मिलनी चाहिए। यानी विशना देवी को 21 साल की पेंशन व गे्रच्युटी से वंचित किया गया था। अब उम्मीद जगी है कि उन्हें उनका पूरा हक मिलेगा इस तरह का यह कोई पहला मामला नहीं है।

केस नं. 2 : यह उस वीर नारी की कहानी है जिसने 46 साल तक कानूनी जंग लड़ी। कहानी कुछ इस तरह है कि गुड्डी के पति पूरन चंद्र भारतीय सेना में हवलदार के पद पर तैनात थे। सेवाकाल के दौरान वर्ष 1978 में करंट लगने से उनका निधन हो गया। गुड्डी ने वर्ष 1979 में विशेष पारिवारिक पेंशन के लिए आवेदन किया लेकिन इन्हें साधारण पेंशन दी गई। जब गुड्डी द्वारा विशेष पारिवारिक पेंशन के लिए दावा किया तो पेंशन स्वीकृति प्राधिकरण ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि हवलदार पूरन चंद की मृत्यु सैन्य सेवा के कारण नहीं हुई। इसके बाद महिला ने एएफटी (सशस्त्र बल ट्रिब्यूनल) में याचिका दायर की जिसे एएफटी ने स्वीकार कर लिया। एएफटी ने अपने निर्णय में सैन्यकर्मी के निधन के बाद उसकी पत्नी को विशेष पारिवारिक पेंशन देने का निर्देश दिया। केंद्र ने इस मामले पर दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया। अब दिल्ली हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति सी. हरिशंकर व न्यायमूर्ति ओपी शुक्ला की पीठ ने केंद्र सरकार को विशेष पारिवारिक पेंशन का बकाया भुगतान करने के आदेश दिए हैं। इस मामले पर दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र की याचिका खारिज करते हुए एएफटी के निर्णय को बरकरार रखा। तात्पर्य यह कि सरकारी तंत्र के ढुलमुल रवैए के कारण एक पत्नी को 46 साल तक अपने हकों की कानूनी जंग लड़नी पड़ी।

केस नं. 3 : कुसुम के पिता मथुरा दत्त भारतीय सेना से 2006 में लापता होते हैं। तमाम कोशिशों के बाद पेंशन 2014 में स्वीकृत होती है।  लापता के दो साल बाद वर्ष 2008 में एफ.आई.आर. लिखी जाती है। इस वजह से इन्हें पेंशन व अन्य धनराशि में इसे दो साल का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।

सवाल यह है कि सालों तक पेंशन के मामले न निपटने से पूर्व सैनिकों के परिवारों को आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ता है। उनकी आजीविका भी प्रभावित होती है। बच्चों की शिक्षा, शादी जैसे महत्वपूर्ण कार्य समय पर सम्पन्न नहीं हो पाते हैं जिससे कई तरह की त्रासदियों का सामना परिवार के हर सदस्य को करना पड़ता है। पेंशन व धनराशि पाने में इन परिवारों को वर्षों लग जाते हैं। इनका बचा-खुचा पैसा भी आवश्यक कार्यों की भागा-दौड़ी में खर्च हो जाता है। आज भी भारतीय सेना में कार्यरत कई सैनिक परिवार कई कारणों के चलते समस्याओं से दो-चार हो रहे हैं। दशकों गुजर जाने के बाद भी उन्हें समय पर न्याय नहीं मिल पा रहा है जबकि भारतीय संविधान की सामाजिक व आर्थिक न्याय की अवधारणा कहती है कि व्यक्ति को उसके हकों से वंचित नहीं किया जा सकता है। आज भी सैनिकों की समस्याओं से सम्बन्धी हजारों मामले सैन्य अदालतों में अटके पड़े हैं। समय पर समस्याओं के निस्तारण न होने से हजारों सैनिक व उनके परिवारों को समय पर पेंशन, भत्ते व अन्य देयकों का भुगतान नहीं हो पाता है। यह एक तरह से भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के सामाजिक व आर्थिक समानता के अधिकार का भी उल्लघंन है। विशना देवी का मामला हो या फिर अन्य सैनिक परिवारों का, उन्हें इसकी एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।

बात अपनी-अपनी

भारतीय सेना व अर्धसैनिक बलों के उन परिवारों को जो भारतीय संविधान की समानता व न्याय की अवधारणा से वंचित रह गए हैं, उन्हें उनका हक दिलाने के प्रयास किए जा रहे हैं। अभी तक मैं 3700 से अधिक पूर्व सैनिकों व युद्ध विधवाओं को उनका हक दिलाने में सफल रहा हूं। 180 उन असाधारण केसों को भी सुलझाने में हम सफल रहे जिसमें पूर्व सैनिकों को न्याय नहीं मिल पाया था। दर्जनों केस ऐसे थे जो 20 से लेकर 40 वर्षों तक चलते रहे। असम राइफल्स के रेड एंट्री जवानों को पेंशन दिलाने का सफल प्रयास किया गया। इसके लिए पेंशन रूल 40. 49, 1972 को आधार बनाया गया। फलस्वरूप असम राइफल्स के रेड एंट्री जवानों को आज पेंशन प्राप्त हो रही है। अब यही लाभ भारतीय सेना के उन रेड एंट्री धारकों को दिलाने के लिए सेना मुख्यालय व रक्षा मंत्रालय से लगातार पत्राचार चल रहा है ताकि इन सैनिकों को भी संविधान अनुरूप लाभ प्राप्त हो सके। अगर देखा जाए तो सैनिकों पर गलत सुनवाई वाले मामले हों या फिर मानसिक बीमारी से ग्रस्त सैनिकों के साथ ही अपंगता पेंशन के मामले रहे हों, इन पर समय पर लाभ मिलना चाहिए। कानूनन जो हक पूर्व सैनिकों व उनके परिवारों को मिलना चाहिए उसमें देरी ठीक नहीं है। देरी से मिला न्याय या हक एक तरह से व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन ही माना जा सकता है। देरी से न्याय राइट टू जस्टिस, राइट टू अपील, राइट टू लाइफ, राइट टू प्रिंसिपल ऑफ नेचुरल जस्टिस भारतीय संविधान की अवधारणा के खिलाफ जाता है। अंग्रेजों के समय बने सैन्य कानून गैर जरूरी हैं, इनमें बदलाव होना चाहिए। इन कानूनों के चलते 40 प्रतिशत जवानों को न्याय नहीं मिल पाता है। यही वजह है कि जवानों द्वारा अधिकारियों के साथ ही अपने साथियों पर गोली चलाने जैसी घटनाएं सामने आ रही हैं। आत्महत्या के पीछे भी आर्मी का अनुचित अनुशासन रहा है। भारतीय सेना में सैनिकों की समस्याओं को सुनने के लिए ब्रिटिश व अमेरिकी सुनवाई जैसा तरीका ठीक नहीं है। यहां जवान को कमाडिंग ऑफिसर तक पहुंचने में ही तीन चरणों से होकर गुजरना पड़ता है।

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