शपथ लेते बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान
बांग्लादेश में तारिक रहमान के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हो चुका है लेकिन संविधान सुधार, जमात और एनसीपी की चेतावनियों तथा भारत में मौजूद शेख हसीना के प्रश्न ने राजनीतिक परिदृश्य को जटिल बना दिया है। ढाका की बदलती सत्ता का असर भारत-बांग्लादेश सम्बंधों पर भी गहरा पड़ सकता है


ढाका में सत्ता परिवर्तन औपचारिक रूप से पूरा हो चुका है। बांग्लादेश नेशनेलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के नेता तारिक रहमान ने प्रधानमंत्री पद की शपथ लेकर नई सरकार की कमान सम्भाल ली है। 12 फरवरी को हुए आम चुनाव में बीएनपी ने 300 सदस्यीय संसद में 209 सीटें जीतकर दो-तिहाई बहुमत प्राप्त किया है। यह परिणाम पार्टी के लिए ऐतिहासिक वापसी के रूप में देखा जा रहा है। चुनाव के दौरान धांधली और हिंसा के आरोप लगे किंतु निवार्चन आयोग ने परिणामों को वैध ठहराया।

हालांकि सरकार गठन की औपचारिकता पूरी होते ही विवादों की शुरुआत भी हो गई है। संसद सदस्यों को दो शपथ लेनी थीं, एक सांसद के रूप में और दूसरी संविधान सुधार आयोग के सदस्य के रूप में। बीएनपी सांसदों ने पहली शपथ तो ले ली लेकिन दूसरी शपथ से इनकार कर दिया। पार्टी  तर्क है कि जब तक संविधान में औपचारिक संशोधन नहीं होता, तब तक इस आयोग की वैधानिक स्थिति स्पष्ट नहीं है। यही असहमति वर्तमान राजनीतिक तनाव की जड़ बन गई है।
 
जुलाई चार्टर और संवैधानिक टकराव
 
जुलाई चार्टर, जो 2024 के छात्र आंदोलन से निकला दस्तावेज है, बांग्लादेश की राजनीति का अब केंद्र बिंदु बन गया है। इसी आंदोलन ने शेख हसीना सरकार के पतन का मार्ग प्रशस्त किया था। चार्टर के तहत संसद को 180 दिनों के भीतर संविधान सभा में बदलकर व्यापक संशोधन करने की परिकल्पना की गई है। जनमत-संग्रह में 62 प्रतिशत मतदाताओं ने इसके पक्ष में मतदान किया। बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी और नेशनल सिटिजंस पार्टी  ने इसे जनता की इच्छा का प्रतीक बताया है। उनका कहना है कि यदि संसद संविधान सुधार की प्रक्रिया को टालती है तो यह जनादेश के साथ  विश्वासघात होगा। हालांकि प्रारम्भिक बहिष्कार की धमकी के बाद इन दलों ने दोनों शपथ ले लीं लेकिन उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वे सुधारों पर दबाव बनाए रखेंगे। ढाका और अन्य शहरों में विरोध-प्रदर्शनों की चेतावनी ने यह संकेत दिया है कि सड़क की राजनीति अभी शांत नहीं हुई है।
 
शेख हसीना की पार्टी का रुख और चुनावी प्रदर्शन

अवामी लीग, जिसकी नेता और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना हैं, इस चुनाव में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सकी। पार्टी को केवल 52 सीटों पर जीत मिली जो उसके पूर्व बहुमत की तुलना में भारी गिरावट है। अवामी लीग ने चुनाव परिणामों को स्वीकार तो किया है किंतु उसने कई निर्वाचन क्षेत्रों में अनियमितताओं और प्रशासनिक पक्षपात के आरोप लगाए हैं।

पार्टी का आधिकारिक रुख यह है कि वह लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर रहकर विपक्ष की भूमिका निभाएगी। अवामी लीग ने जुलाई चार्टर पर सैद्धांतिक समर्थन जताया है परंतु वह यह भी कहती है कि किसी भी संवैधानिक परिवर्तन को व्यापक सहमति और संसदीय बहस के बाद ही लागू किया जाना चाहिए।

शेख हसीना के भारत में रहने का मुद्दा भी अवामी लीग के लिए संवेदनशील है। पार्टी का कहना है कि उनकी सुरक्षा और न्यायिक प्रक्रिया सुनिश्चित की जानी चाहिए। वहीं बीएनपी के कुछ नेता यह संकेत दे चुके हैं कि यदि कानूनी मामलों में प्रगति होती है तो प्रत्यर्पण का प्रश्न उठ सकता है।
 
वर्तमान हालात : स्थिरता की तलाश

नई सरकार के सामने आर्थिक चुनौतियां भी कम नहीं हैं। महंगाई, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव और वैश्विक बाजार की अनिश्चितता ने प्रशासन के लिए कठिन परिस्थिति पैदा कर दी है। राजनीतिक असहमति के बीच यदि व्यापक आंदोलन शुरू होते हैं तो निवेश और व्यापारिक विश्वास प्रभावित हो सकता है।

तारिक रहमान ने अपने शपथ भाषण में राष्ट्रीय एकता, आथिर्क सुधार और क्षेत्रीय सहयोग को प्राथमिकता बताया है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि संविधान सुधार पर संवाद के लिए सभी दलों के साथ बातचीत की जाएगी किंतु यह स्पष्ट है कि संसद और सड़क के बीच संतुलन बनाए रखना उनकी सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
 
भारत-बांग्लादेश सम्बंध : नई दिल्ली की कूटनीतिक परीक्षा

भारत और बांग्लादेश के संबंध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामरिक रूप से गहरे रहे हैं। हसीना सरकार के दौरान दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग, सीमा प्रबंधन, ऊजाज़् व्यापार और संपर्क परियोजनाओं में उल्लेखनीय प्रगति हुई थी।

अब नई सरकार के साथ संबंधों की दिशा को लेकर स्वाभाविक जिज्ञासा है। बीएनपी का ऐतिहासिक रुख अपेक्षाकृत राष्ट्रवादी और अधिकांशत: भारत-आलोचनात्मक रहा है किंतु हाल के वर्षों में उसने व्यावहारिक कूटनीति का संकेत दिया है। भारत के लिए सबसे संवेदनशील प्रश्न शेख हसीना की भारत में उपस्थिति है। यदि नई सरकार कानूनी प्रक्रिया के तहत प्रर्त्यापण की मांग करती है तो यह द्विपक्षीय सम्बंधों में जटिलता ला सकता है।
इसके अतिरिक्त सीमा सुरक्षा, पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद-रोधी सहयोग और व्यापारिक मार्गों की निरंतरता भी महत्वपूर्ण विषय हैं। बांग्लादेश भारत का एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार है और दोनों देशों के बीच रेल, सड़क और जल सम्पकज़् परियोजनाएं रणनीतिक महत्व रखती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक हित और क्षेत्रीय स्थिरता दोनों देशों को सहयोग की राह पर बनाए रखेंगे किंतु राजनीतिक बयानबाजी और घरेलू दबाव सम्बंधों में अस्थायी तनाव ला सकते हैं।
 
अवसर और आशंका का संगम

कुल मिलाकर तारिक रहमान के नेतृत्व में नई सरकार का गठन बांग्लादेश की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत है। बहुमत स्पष्ट है, परंतु सहमति अस्पष्ट। जुलाई चार्टर और संविधान सुधार पर असहमति, जमात और एनसीपी की सक्रियता तथा अवामी लीग की विपक्षी भूमिका आने वाले महीनों को निणार्यक बनाएगी।

भारत के साथ सम्बंधों का भविष्य भी इसी संतुलन पर निर्भर करेगा। यदि नई सरकार व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाती है और भारत संवेदनशील मुद्दों पर संयम बरतता है तो सहयोग जारी रह सकता है लेकिन यदि
राजनीतिक टकराव कूटनीतिक स्तर तक पहुंचता है तो दक्षिण एशिया की स्थिरता पर असर पड़ सकता है।
यह कहना ठीक होगा कि नई शुरुआत हो चुकी है, पर राह अभी भी अनिश्चित है। आने वाले 180 दिन न केवल बांग्लादेश के संवैधानिक भविष्य को आकार देंगे बल्कि भारत-बांग्लादेश सम्बंधों की दिशा भी तय करेंगे।

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