Editorial

बेचारे प्रधानमंत्री करें तो क्या करें?

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कुछ क्षण ऐसे होते हैं जब देश की वास्तविक ताकत मिसाइलों, अर्थव्यवस्था या सैन्य गठबंधनों से नहीं बल्कि उसकी प्रतिक्रिया से मापी जाती है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर की गई हालिया टिप्पणियां भी ऐसा ही एक क्षण हैं। ट्रम्प का यह दावा कि प्रधानमंत्री मोदी उनसे मिलने के लिए ‘विनम्रता से अनुरोध’ करते हैं महज एक व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं है बल्कि वह भारत की सम्प्रभु गरिमा, उसकी कूटनीतिक स्थिति और वैश्विक मंच पर उसकी छवि से सीधे टकराती है। यही कारण है कि इस बयान के बाद दिल्ली में बेचैनी है लेकिन साथ ही एक असहज चुप्पी भी, जैसे सरकार खुद नहीं जानती कि इस पर बोले तो क्या बोले और न बोले तो कैसे समझाए।

डोनाल्ड ट्रम्प की राजनीतिक शैली किसी से छिपी नहीं है। वे हर बातचीत को अपने अहंकार और अपने राजनीतिक फायदे के तराजू पर तौलते हैं। उनके लिए कूटनीति आपसी सम्मान का मंच कम और आत्मप्रचार का जरिया ज्यादा रही है। वे जब किसी विदेशी नेता का जिक्र करते हैं तो अक्सर उसे अपने सामने छोटा दिखाने की कोशिश करते हैं ताकि घरेलू अमेरिकी राजनीति में यह संदेश जाए कि दुनिया के बड़े नेता भी उनके दरवाजे पर आते हैं। प्रधानमंत्री मोदी को लेकर की गई टिप्पणी भी इसी सिलसिले की एक कड़ी है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार निशाने पर दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था का मुखिया है।

दिल्ली की परेशानी इस बात से नहीं है कि ट्रम्प ने क्या कहा बल्कि इस बात से है कि इसका जवाब कैसे दिया जाए। अगर सरकार खुलकर प्रतिक्रिया देती है तो आशंका है कि अमेरिका के साथ चल रही व्यापार वार्ताओं पर असर पड़ेगा। अगर वह चुप रहती है तो देश के भीतर यह संदेश जाता है कि सरकार एक विदेशी नेता द्वारा अपने प्रधानमंत्री को कमतर दिखाए जाने पर भी असहज है लेकिन प्रतिवाद करने का साहस नहीं जुटा पा रही। यही वह द्वंद्व है जिसने इस पूरे मामले को कूटनीतिक मुद्दे से अधिक राजनीतिक संकट में बदल दिया है।

सोशल मीडिया ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। ट्रम्प के बयान के बाद मीम्स, वीडियो और व्यंग्यात्मक क्लिप्स की बाढ़ आ गई। विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस, ने इस मौके को हाथ से जाने नहीं दिया। एआई से बने वीडियो और कटाक्ष भरे पोस्ट यह सवाल पूछ रहेे हैं कि क्या भारत वाकई उस स्तर पर खड़ा है जैसा उसका दावा किया जाता है। सरकार भले ही इन मीम्स को हल्के में लेने की कोशिश करे, लेकिन आज की राजनीति में मीम्स जनता की धारणा गढ़ने का एक सशक्त औजार बन चुके हैं। वे कुछ ही सेकेंड में उस छवि को नुकसान पहुंचा सकते हैं, जिसे बनाने में सालों लगते हैं।

ट्रम्प की टिप्पणियों में सिर्फ मोदी से मिलने की बात ही नहीं थी। उन्होंने रूसी तेल खरीद को लेकर भारत पर लगाए गए टैरिफ का जिक्र करते हुए यह भी कहा कि प्रधानमंत्री मोदी उनसे ‘खुश नहीं’ हैं। इसके अलावा अपाचे हेलीकाॅप्टरों की खरीद को लेकर उन्होंने जो दावे किए वे तथ्यात्मक रूप से गलत साबित हुए। सरकारी सूत्रों ने साफ किया कि भारत ने 68 नहीं बल्कि केवल 28 अपाचे हेलीकाॅप्टर खरीदे हैं और उनकी डिलीवरी तय समयसीमा में हुई है। यह फर्क सिर्फ आंकड़ों का नहीं है। यह दिखाता है कि ट्रम्प किस तरह तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर अपनी कहानी गढ़ते हैं लेकिन सवाल यह है कि जब तथ्य सरकार के पास हैं तो उन्हें सार्वजनिक रूप से पूरे आत्मविश्वास के साथ सामने रखने में हिचक क्यों?

यह पहली बार नहीं है जब ट्रम्प ने भारत को लेकर ऐसे दावे किए हों। मई 2025 में भारत- पाकिस्तान के बीच तनाव कम होने का श्रेय उन्होंने खुद को दिया और इसे बार-बार दोहराया। उस समय भारत सरकार ने अमेरिकी राष्ट्रपति का नाम लिए बिना उनके दावे को खारिज किया था। यह रणनीति तब भी सवालों के घेरे में आई थी और आज फिर वही सवाल खड़ा हो रहा है क्या नाम लिए बिना खंडन करना पर्याप्त है या इससे भारत की स्थिति और अस्पष्ट हो जाती है?

विदेश मंत्री एस. जय शंकर का लक्जमबर्ग में दिया गया बयान जिसमें उन्होंने ‘दूर बैठे लोगों’ की लापरवाह और स्वार्थी टिप्पणियों का जिक्र किया दरअसल ट्रम्प के लिए एक कूटनीतिक संकेत था। यह बयान संतुलित था लेकिन उतना स्पष्ट नहीं जितना शायद देश के भीतर अपेक्षित था। कूटनीति में इशारों की अपनी अहमियत होती है लेकिन जब सामने वाला बार-बार सीधे शब्दों में बोल रहा हो, तब इशारों की भाषा अक्सर कमजोर पड़ जाती है।

यह पूरा प्रकरण भारत-अमेरिका सम्बंधों की उस असहज सच्चाई को भी उजागर करता है जिसमें बराबरी की साझेदारी की बात तो होती है लेकिन व्यवहार में संतुलन अक्सर अमेरिका के पक्ष में झुका रहता है। भारत खुद को एक उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है, चैथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, जी-20 का नेतृत्व, रणनीतिक स्वायत्तता का दावा, लेकिन जब अमेरिकी राष्ट्रपति सार्वजनिक मंच से ऐसे बयान देते हैं तो भारत की प्रतिक्रिया में झिझक दिखाई देती है। यह झिझक सिर्फ कूटनीतिक नहीं बल्कि मानसिक भी है।

सरकार के भीतर यह तर्क दिया जा रहा है कि हर बयान पर प्रतिक्रिया देना ‘काउंटर-प्रोडक्टिव’ हो सकता है। यह तर्क अपने आप में गलत भी नहीं है। लेकिन समस्या तब होती है जब चुप्पी एक आदत बन जाए। कूटनीति में चुप्पी तभी प्रभावी होती है, जब वह आत्मविश्वास से भरी हो। अगर चुप्पी असमंजस और डर से उपजी हो तो वह कमजोरी का संकेत बन जाती है।

देश के भीतर राजनीतिक दबाव लगातार बढ़ रहा है। विपक्ष पूछ रहा है कि क्या प्रधानमंत्री की वैश्विक छवि इतनी नाजुक है कि उसे बचाने के लिए सरकार को हर बार मौन का सहारा लेना पड़े? समर्थक वर्ग यह तर्क दे रहा है कि ट्रम्प जैसे नेता को गम्भीरता से लेना ही नहीं चाहिए। लेकिन इन दोनों ध्रुवों के बीच एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो यह जानना चाहता है कि भारत आखिर खुद को किस स्तर पर देखता है? एक आत्मविश्वासी वैश्विक शक्ति के रूप में? या अब भी एक ऐसे देश के रूप में जिसे बड़े खिलाड़ियों की नाराजगी का डर सताता है?

प्रधानमंत्री व्यक्तिगत रूप से बेचारे नहीं हैं। बेचैनी उस व्यवस्था की है जो स्पष्टता और साहस के बीच झूल रही है। सवाल यह नहीं कि ट्रम्प क्या कह रहे हैं? सवाल यह है कि भारत कब तय करेगा कि उसकी प्रतिष्ठा किन सीमाओं तक समझौते के लिए उपलब्ध है? हर व्यापार समझौता महत्वपूर्ण है लेकिन देश की गरिमा उससे भी अधिक महत्वपूर्ण होती है।

ट्रम्प का दौर भी एक दिन खत्म हो जाएगा और उनके बयान भी इतिहास के पन्नों में सिमट जाएंगे। लेकिन भारत की प्रतिक्रिया या उसकी कमी लम्बे समय तक याद रखी जाएगी। यह प्रतिक्रिया तय करेगी कि भविष्य में कोई और वैश्विक नेता भारत के बारे में बोलते समय कितनी सावधानी बरतता है। चुप्पी कभी-कभी समझदारी होती है लेकिन हर बार नहीं। और शायद यही वह क्षण है जब भारत को यह तय करना होगा कि वह केवल प्रतिक्रियाओं से बचने वाला देश बना रहेगा या आत्मविश्वास से अपनी बात रखने वाला राष्ट्र बनेगा।

यह भी उतना ही सच है कि इस पूरे प्रसंग में सबसे ज्यादा असहज स्थिति स्वयं भारतीय लोकतंत्र की है क्योंकि यहां सवाल केवल विदेश नीति का नहीं रह जाता बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति का बन जाता है, जिसे बीते वर्षों में बहुत आक्रामक आत्मविश्वास के साथ गढ़ा गया है। जब देश के भीतर लगातार यह संदेश दिया जाता रहा हो कि भारत अब ‘किसी से डरता नहीं’, ‘किसी के दबाव में नहीं आता’ और ‘विश्वगुरु’ की भूमिका में है, तब किसी विदेशी राष्ट्रपति का इस तरह सार्वजनिक मंच से प्रधानमंत्री को लेकर हल्के, लगभग उपहासपूर्ण लहजे में बोलना उस पूरे नैरेटिव को दरका देता है। यही कारण है कि सरकार की चुप्पी सिर्फ कूटनीतिक रणनीति नहीं लगती, बल्कि अपने ही दावों से पैदा हुई उलझन भी प्रतीत होती है। अगर भारत वास्तव में आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी शक्ति है तो फिर तथ्यों के साथ संतुलित लेकिन स्पष्ट शब्दों में अपनी बात रखने से उसे हिचक नहीं होनी चाहिए। कोई तीखा बयान देने की आवश्यकता नहीं, कोई टकराव खड़ा करने की मजबूरी नहीं लेकिन इतना कहना तो जरूरी है कि भारत के प्रधानमंत्री किसी के दरवाजे पर खड़े याचक नहीं हैं बल्कि बराबरी के आधार पर संवाद करने वाले निर्वाचित नेता हैं। दरअसल ट्रम्प की टिप्पणी ने यह भी उजागर किया है कि वैश्विक राजनीति में छवि निर्माण केवल ताकत से नहीं, निरंतर और सुसंगत आचरण से होता है। अगर बार-बार यह संकेत दिया जाएगा कि व्यापार समझौते या रणनीतिक साझेदारी के डर से भारत सार्वजनिक अपमान को भी नजरअंदाज कर सकता है तो भविष्य में ऐसे बयानों की पुनरावृत्ति और बढ़ेगी। यह भी समझना होगा कि आज का दौर केवल बंद कमरे की कूटनीति का नहीं है, सार्वजनिक बयान, सोशल मीडिया और वैश्विक जनमत भी उतने ही प्रभावशाली हैं। ऐसे में चुप्पी कई बार संदेश देती है और वह संदेश हमेशा वही नहीं होता जो सरकार देना चाहती है। यह अंतिम क्षणों में लिया गया कोई भावनात्मक निर्णय नहीं होना चाहिए बल्कि दीर्घकालिक सोच का हिस्सा होना चाहिए कि भारत किस तरह की भाषा, किस तरह का आत्मसम्मान और किस तरह की सीमाएं अपने लिए तय करता है।

यदि हर बार यह मान लिया जाएगा कि ‘अभी बोलना ठीक नहीं’, ‘अभी सौदे चल रहे हैं’, ‘अभी माहौल
संवेदनशील है’ तो फिर वह समय कभी नहीं आएगा जब भारत बिना झिझक अपने पक्ष को दुनिया के सामने रख सके। अंततः यह सवाल किसी एक बयान या किसी एक नेता का नहीं है बल्कि उस राजनीतिक परिपक्वता का है, जो यह तय करती है कि राष्ट्र कब मौन रहेगा और कब बोलेगा। ट्रम्प जैसे नेता आते-जाते रहेंगे, उनकी बयानबाजी भी उनके राजनीतिक स्वभाव का हिस्सा है लेकिन भारत के लिए यह एक आत्ममंथन का अवसर है कि वह केवल प्रतिक्रियाओं से बचने वाली शक्ति बनना चाहता है या अपनी गरिमा को शांत लेकिन दृढ़ स्वर में परिभाषित करने वाला राष्ट्र। यही वह चुनाव है जो इस पूरे विवाद के बाद भारत को करना होगा क्योंकि अंत में इतिहास यही नहीं देखेगा कि ट्रम्प ने क्या कहा बल्कि यह जरूर दर्ज करेगा कि भारत ने उस पर क्या किया और क्या नहीं किया। सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर जो कुछ कहा-सुना जा रहा है, प्रधानमंत्री का माखौल बनाया जा रहा है, उसके लिए सबसे अधिक कोई जिम्मेदार है तो वह है स्वयं भाजपा। भाजपा ने एक ऐसा भस्मासुर पैदा कर दिया है जो अब उसे ही भस्म करने की दिशा में बढ़ रहा है। इन परिस्थितियों पर कहावत है ‘जैसी करनी, वैसी भरनी’ सटीक बैठती है।

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