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महात्मा का देश भी मौनमासूमों का जनाजा, दुनिया की खामोशी

ईरान में अमेरिका-इजरायल के कथित हमलों के बाद मानवीय त्रासदी गहराती जा रही है। दक्षिणी शहर मिनाब के एक लड़कियों के स्कूल पर हुए हमले में 165 स्कूली बच्चियों और शिक्षकों की मौतों ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया है। ईरान का दावा है कि पिछले दिनों के हमलों में अब तक एक हजार से अधिक नागरिक मारे जा चुके हैं जिनमें बड़ी संख्या महिलाओं और बच्चों की है। इसी बीच हिंद महासागर में ईरान के एक युद्धपोत को भी अमेरिका द्वारा तबाह किए जाने की खबरें सामने आई हैं जिसमें कई नौ सैनिकों के मारे जाने की आशंका है। संयुक्त राष्ट्र, यूनेस्को और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई ने इस हमले की निंदा और निष्पक्ष जांच की मांग की है जबकि अमेरिका ने स्कूल पर हमले की जानकारी से इनकार किया है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच महात्मा गांधी की अहिंसा की विरासत वाला भारत अब तक खामोश है, जिसे लेकर अंतरराष्ट्रीय और
राजनीतिक हलकों में सवाल उठने लगे हैं


ईरान के दक्षिणी प्रांत होर्मोजगान के मिनाब शहर में 3 मार्च को हजारों लोगों की भीड़ उस दृश्य की गवाह बनी जिसने पूरे देश को शोक और आक्रोश में डुबो दिया है। यहां एक सामूहिक अंतिम संस्कार में 165 स्कूली बच्चियों और स्कूल स्टाफ को सुपुर्द-ए-खाक किया गया जिनकी मौत उस हमले में हुई जिसे ईरान अमेरिका और इजरायल का संयुक्त हमला बता रहा है।


मिनाब के एक लड़कियों के प्राथमिक विद्यालय पर हुए इस हमले ने पूरे विश्व को झकझोर दिया है। मलबे के नीचे दबे स्कूल बैग, किताबें और बच्चों की काॅपियां इस बात की गवाही दे रही थीं कि यह हमला किसी सैन्य ठिकाने पर नहीं बल्कि पढ़ने-लिखने आई मासूम बच्चियों के स्कूल पर हुआ था। ईरान के अधिकारियों का कहना है कि हाल के दिनों में अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए हमलों में अब तक एक हजार से अधिक नागरिक मारे जा चुके हैं। इनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। सबसे अधिक दर्दनाक तथ्य यह है कि इस संघर्ष में डेढ़ सौ से अधिक बच्चियां अपनी जान गंवा चुकी हैं।
 
मिनाब में हजारों लोगों का जनसैलाब

मिनाब में आयोजित सामूहिक अंतिम संस्कार में हजारों लोग शामिल हुए। ईरानी सरकारी टेलीविजन के अनुसार शहर के मुख्य चैक में लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई थी। पुरुष ईरान के झंडे लहरा रहे थे जबकि महिलाएं काले चादरों में शोक व्यक्त कर रही थीं। मंच से बोलते हुए एक महिला, जिसने खुद को ‘अतेना’ नाम की बच्ची की मां बताया ने अपनी बेटी की तस्वीर उठाते हुए कहा ‘यह अमेरिकी अपराधों का दस्तावेज है।’ उसने कहा कि उसकी बेटी और उसकी सहेलियां ‘ईश्वर के रास्ते में शहीद’ हुई हैं। इस दौरान भीड़ में अमेरिका और इजरायल के खिलाफ नारे गूंजते रहे और ‘नो सरेंडर’ के नारे लगाए गए।
 
हमले का विवरण

ईरान के अनुसार यह हमला एक मार्च को उस समय हुआ जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ संयुक्त सैन्य कार्रवाई शुरू की थी। मिनाब का यह स्कूल उस समय निशाना बना जब वहां पढ़ाई चल रही थी। विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि स्कूल की पूरी इमारत ढह गई और आस-पास की इमारतें भी क्षतिग्रस्त हो गईं। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि कई बच्चियां मलबे में दब गईं और उनके शवों को निकालने में घंटों लग गए। ईरान का कहना है कि यह हमला अब तक के संघर्ष का सबसे घातक हमला था जिसमें बड़ी संख्या में नागरिक मारे गए। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका और इजरायल पर सीधे तौर पर बच्चियों की हत्या का आरोप लगाया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफाॅर्म एक्स पर लिखा ‘‘ये कब्रें उन 160 से अधिक मासूम बच्चियों के लिए खोदी जा रही हैं जो अमेरिका-इजरायल की बमबारी में मारी गईं। उनके शरीर टुकड़ों में बिखर गए।’’ उन्होंने आगे लिखा ‘‘मिस्टर ट्रम्प द्वारा वादा किया गया ‘राहत’ वास्तव में ऐसी दिखती है। गाजा से मिनाब तक मासूमों को ठंडे खून से मार दिया गया।’’

ईरान का कहना है कि अमेरिका और इजरायल नागरिक इलाकों, अस्पतालों और स्कूलों को निशाना बना रहे हैं।
अस्पतालों और रिहायशी इलाकों पर हमले का आरोप ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने आरोप लगाया है कि अमेरिका और इजरायल बिना किसी भेदभाव के रिहायशी इलाकों पर हमला कर रहे हैं। उन्होंने कहा ‘‘वे रिहायशी इलाकों पर अंधाधुंध हमले कर रहे हैं और न अस्पतालों को छोड़ रहे हैं, न स्कूलों को, न रेड क्रिसेंट की सुविधाओं को और न ही सांस्कृतिक स्मारकों को।’’ ईरान ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस पर कार्रवाई की मांग की है।
 
अमेरिका का इनकार

अमेरिका ने स्कूल पर हमले में अपनी भूमिका से इनकार किया है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने पत्रकारों से कहा ‘‘अगर यह हमला हमारी ओर से हुआ होता तो रक्षा विभाग इसकी जांच करता। इस बारे में सवाल वहीं पूछे जाने चाहिए।’’ उन्होंने कहा ‘‘संयुक्त राज्य अमेरिका जानबूझकर किसी स्कूल को निशाना नहीं बनाएगा।’’ हालांकि अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने कहा है कि वह सैन्य अभियानों के दौरान नागरिकों को हुए नुकसान की रिपोर्टों की जांच कर रहा है।
 
संयुक्त राष्ट्र की चिंता

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने इस घटना पर गहरी चिंता व्यक्त की है और निष्पक्ष जांच की मांग की है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की प्रवक्ता रविना शामदासानी ने कहा ‘‘यह बिल्कुल भयावह घटना है। सोशल मीडिया पर जो तस्वीरें सामने आई हैं वे इस संघर्ष की क्रूरता और निरर्थकता को दिखाती हैं।’’ उन्होंने कहा कि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि यह हमला युद्ध अपराध की श्रेणी में आता है या नहीं, लेकिन इसकी गहन जांच जरूरी है।
 
यूनेस्को और मलाला की प्रतिक्रिया

संयुक्त राष्ट्र की शिक्षा और संस्कृति संस्था यूनेस्को ने भी इस हमले की निंदा की है। यूनेस्को का कहना है कि शिक्षा संस्थानों को निशाना बनाना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है। नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई ने भी इस घटना पर दुख व्यक्त किया और कहा कि बच्चों और स्कूलों को कभी भी युद्ध का निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए।
 
हिंद महासागर में ईरानी युद्धपोत तबाह

इस बीच संघर्ष का दायरा समुद्र तक फैल गया है। ईरान के एक युद्धपोत को हिंद महासागर में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के दौरान तबाह किए जाने की खबरें सामने आई हैं। रिपोर्टों के अनुसार यह जहाज ईरानी नौसेना के अभियान का हिस्सा था और उस पर बड़ी संख्या में नौसैनिक मौजूद थे। जहाज के नष्ट होने से कई लोगों की मौत की आशंका जताई जा रही है। ईरान ने इस घटना को भी ‘‘आक्रामक सैन्य कार्रवाई’’ बताया है और कहा है कि यह संघर्ष को और भड़का सकता है।
 
क्या कहता है अंतरराष्ट्रीय कानून

अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के अनुसार स्कूल, अस्पताल और अन्य नागरिक संस्थान संरक्षित श्रेणी में आते हैं। जान-बूझकर ऐसे संस्थानों को निशाना बनाना युद्ध अपराध माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह साबित होता है कि स्कूल को जान-बूझकर निशाना बनाया गया था तो यह अंतरराष्ट्रीय कानून का गम्भीर उल्लंघन होगा।
 
भारत की खामोशी पर सवाल

इस पूरे घटनाक्रम के बीच भारत की प्रतिक्रिया को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। भारत, जो महात्मा गांधी की अहिंसा की विरासत का दावा करता है, उसने अब तक इस हमले पर कोई स्पष्ट टिप्पणी नहीं की है।
विश्लेषकों का कहना है कि भारत की यह चुप्पी उसकी कूटनीतिक संतुलन नीति का हिस्सा हो सकती है क्योंकि भारत के अमेरिका, इजरायल और ईरान तीनों के साथ महत्वपूर्ण सम्बंध हैं। लेकिन आलोचकों का कहना है कि जब मासूम बच्चियां मारी जा रही हों, तब नैतिक आवाज उठाना भी उतना ही जरूरी होता है।
 
इतिहास का सवाल

मिनाब में दफन की गई बच्चियों की कब्रें अब सिर्फ एक शहर की त्रासदी नहीं हैं। वे उस बड़े सवाल का प्रतीक बन गई हैं जो हर युद्ध के बाद उठता है कि आखिर इसकी कीमत कौन चुकाता है? जवाब अक्सर वही होता है, आम नागरिक, महिलाएं और बच्चे। मिनाब की माओं की चीखें और बिखरे हुए स्कूल बैग शायद आने वाले वर्षों तक यह याद दिलाते रहेंगे कि युद्ध के मैदान में सबसे बड़ी हार हमेशा इंसानियत की होती है और शायद इतिहास भी यही पूछेगा, जब मासूम बच्चियां मारी जा रही थीं, तब दुनिया कहां थी?

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