धौलास भूमि प्रकरण को ‘डेमोग्राफी चेंज’ और ‘मुस्लिम यूनिवर्सिटी’ का मुद्दा बनाकर भाजपा ने कांग्रेस पर हमला बोल खुद के लिए मुसीबत मोल ली है। कारण है इसका भू-उपयोग परिवर्तन और 167 बैनामे भाजपा शासनकाल में ही 2022-23 हुए हैं और अधिकांश खरीददार स्थानीय पर्वतीय मूल के हिंदू हैं
वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मतदाताओं के ध्रुवीकरण को भाजपा ने एक बार फिर अपना चुनावी हथियार बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही भाजपा खुद के बिछाए जाल में धौलास भू-प्रकरण में फंसती नजर आ रही है। गौरतलब है कि पिछले दो वर्षों से भाजपा संगठन और सरकार ‘लैंड जेहाद’, ‘थूक जेहाद’, ‘मजार जेहाद’ और ‘डेमोग्राफी चेंज’ जैसे मुद्दों को लगातार उठाती रही है। इसी कड़ी में गत् पखवााड़े धौलास भूमि प्रकरण को भी बड़ा राजनीतिक रंग देने का प्रयास किया गया। धौलास क्षेत्र में 15-19 एकड़ कृषि भूमि पर आवासीय प्लाॅटिंग के मामले को भाजपा ने राज्य की डेमोग्राफी बदलने की साजिश बताते हुए इसे हिंदू-मुस्लिम मुद्दा बनाने की कोशिश की। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मामले की गहन जांच के आदेश तक जारी कर दिए।
पूरा मामला वर्ष 2004 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के समय शुरू हुआ। शेखउल हिंद एजुकेशन सोसायटी, बहादुर शाह जफर मार्ग, नई दिल्ली ने शिक्षण संस्थान की स्थापना के लिए 20 एकड़ कृषि भूमि खरीदने की अनुमति मांगी। 15 मार्च 2004 को सरकार ने कुछ शर्तों के साथ अनुमति प्रदान कर दी। उसी वर्ष राज्य में नया भू-कानून लागू हुआ, जिसमें बाहरी निवासियों के लिए भूमि खरीद की सीमा तय की गई। औद्योगिक प्रयोजन और शिक्षण संस्थानों के लिए विशेष अनुमति के बाद ही तय सीमा से अधिक भूमि खरीद संभव थी। सोसायटी को उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम की धारा 154(2) के तहत अनुमति दी गई। इस प्रावधान में 180 दिन की समय-सीमा तय थी। यदि निर्धारित अवधि में भूमि क्रय नहीं होती तो अनुमति स्वतः निरस्त मानी जाती है। सोसायटी इस तय समय-सीमा के भीतर केवल 15-19 एकड़ भूमि ही खरीद सकी। समय-सीमा बढ़ाने का अनुरोध किया गया, जिसे सरकार ने चार माह के लिए स्वीकार किया जबकि धारा 154(2) में अतिरिक्त समय का प्रावधान नहीं था।
वर्ष 2006 में राज्य गृह विभाग की रिपोर्ट सामने आई। धौलास क्षेत्र को भारतीय सैन्य अकादमी के समीप संवेदनशील क्षेत्र बताया गया। रिपोर्ट में आशंका व्यक्त की गई कि किसी इस्लामिक शैक्षणिक संस्थान की स्थापना से सैन्य क्षेत्र की गोपनीयता और सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। साथ ही यह भी उल्लेख किया गया कि धारा 154(2) में अतिरिक्त समय देने का कोई प्रावधान नहीं है। इन आधारों पर 1 नवम्बर 2006 को सरकार ने भूमि खरीद की अनुमति वापस ले ली और खरीदी गई भूमि को राज्य सरकार में निहित करने का आदेश जारी कर दिया।
2007 में राज्य में सत्ता परिवर्तन हुआ और भाजपा सरकार बनी। सूत्रों के अनुसार सोसायटी ने भाजपा सरकार पर भी अपनी भूमि बचाने के प्रयास किए, लेकिन राहत नहीं मिली। अंततः 2010 में सोसायटी ने हाईकोर्ट नैनीताल में सरकार के निर्णय को चुनौती दी। हाईकोर्ट ने सोसायटी को बड़ी राहत देते हुए भूमि का स्वामित्व सोसायटी के पक्ष में माना लेकिन स्पष्ट और कड़ी शर्त लगाई कि भूमि का स्वरूप कृषि ही रहेगा और उसमें किसी भी सूरत में परिवर्तन नहीं किया जाएगा। भूमि बेचने का अधिकार दिया गया, पर उसकी श्रेणी कृषि ही मान्य रहेगी।
हाईकोर्ट के फैसले के बाद सोसायटी ने भूमि बेचने की प्रक्रिया शुरू की और रईस अहमद को बिक्री हेतु अधिकृत किया। 2022 में भाजपा फिर सत्ता में आई और पुष्कर सिंह धामी मुख्यमंत्री बने। इसके बाद विकासनगर तहसील प्रशासन ने भूमि को धारा 143 के तहत कृषि से गैर-कृषि में परिवर्तित कर दिया। यह परिवर्तन हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश के विपरीत माना जा रहा है, जिसमें भूमि का स्वरूप बदलने पर रोक थी। 2022-23 के बीच 167 लोगों के नाम बैनामे हुए। 23 फरवरी 2023 को रईस अहमद ने भी अपनी हिस्सेदारी बेच दी। सूत्रों के अनुसार खरीददारों में कई सरकारी अधिकारी भी शामिल हैं और भू-उपयोग परिवर्तन उनके हितों के अनुरूप किया गया।
ध्रुुवीकरण को गति देने की जल्दबाजी में भाजपा नेताओं, विनोद चमोली और महेंद्र भट्ट ने कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टीकरण और ‘मुस्लिम यूनिवर्सिटी’ स्थापित करने की साजिश का आरोप लगाने में देर नहीं लगाई लेकिन जब यह तथ्य सामने आया कि अधिकांश खरीददार स्थानीय हिंदू हैं और भू-उपयोग परिवर्तन भाजपा शासनकाल में हुआ तो इस मुद्दे पर भाजपा नेताओं के स्वर धीमे पड़ गए।
यह मामला राज्य में पिछले 25 वर्षों में सामने आए भूमि प्रकरणों की श्रृंखला का हिस्सा प्रतीत होता है। औद्योगिक, पर्यटन या शैक्षणिक संस्थानों के नाम पर भूमि खरीदकर बाद में आवासीय कॉलोनियों में बदलने के कई मामले सामने आए हैं।
‘दि संडे पोस्ट’ पहले ‘उत्तराखण्ड में जमीनों की लूट’ शीर्षक से श्ृंखला प्रकाशित कर चुका है। ऋषिकेश तहसील के रानीपोखरी क्षेत्र में 80 बीघा भूमि पर्यटन गतिविधियों के नाम पर खरीदकर बाद में आवासीय काॅलोनी के रूप में बेचे जाने का खुलासा ‘उत्तराखण्ड में खोसला का घोसला’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया था।
देहरादून जिला प्रशासन ने जांच शुरू कर दी है। 167 खरीददारों में अपनी भूमि और निवेश को लेकर चिंता है। प्रशासन को पत्र लिखकर कहा है कि उन्होंने सभी नियमों का पालन करते हुए भूमि खरीदी है। अब देखना यह है कि जांच में क्या निष्कर्ष निकलता है और प्रशासन क्या कार्रवाई करता है। यह मामला फिलहाल राजनीतिक आरोपों से आगे बढ़कर राज्य की भू-नीति, प्रशासनिक जवाबदेही और न्यायिक आदेशों के पालन का गम्भीर प्रश्न बन चुका है।
भाजपा का झूठ सामने आ गया है। 2022 में भाजपा में मुझ पर मुस्लिम यूनिवर्सिटी का जो झूठा आरोप लगाया था वह धौलास प्रकरण में भी झूठा साबित हो गया, अब मुस्लिम यूनिवर्सिटी का भूत भाजपा के कंधे पर आ गया और अब वही भूत उसको कह रहा है कि मैं कहां उतरूं। भाजपा हिंदू-मुस्लिम करके इतना नीचे गिर गई है कि धौलास में जमीन खरीदने वाले हिंदुओं को भी मुसलमान बता रही है जबकि उनमें ज्यादातर फौजी हैं और सभी लोग उत्तराखण्ड के ही निवासी हैं। अब वे लोग भी कह रहे हैं कि पहले भाजपा ने हमें मुसलमानों के खिलाफ भड़काया और अब अपनी राजनीति के लिए हमें भी मुसलमान बता रही है। मुझे पूरा विश्वास है कि कांग्रेस और हमारे नेता धौलास जमीन के मामले की सच्चाई जनता के बीच पुरजोर तरीके से ले जाए तो 2027 के चुनाव में प्रदेश की जनता भाजपा को उखाड़ फेंकेगी।
धौलास भूमि का मामला अब सरकार के संज्ञान में आ गया है, इसकी जांच हो रही है, मामला हिंदू मुसलमान का नहीं, मामला तो यह है कि जिस प्रयोजन के लिए जमीन ली गई थी उसका उस प्रयोजन में उपयोग ना करके जमीन को खुर्द-बुर्द करके बेचा जा रहा है। अब इसकी जांच शुरू हो चुकी है जांच के बाद जो निकल कर आएगा उसके आधार पर सरकार कार्यवाही करेगी।
महेंद्र प्रसाद भट्ट, प्रदेश अध्यक्ष, भाजपा
प्रदेश की भाजपा सरकार कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टीकरण और मुस्लिम यूनिवर्सिटी के लिए जमीन देने का आरोप लगा रही है जो कि पूरी तरह से सफेद झूठ है। सिलसिलेवार बात करें तो 2004 में तिवारी सरकार के समय शेख उल हिंद ऐजुकेशन सोसायटी ने प्रदेश में शैक्षणिक संस्थान की स्थापना के लिए सरकार से 20 एकड़ जमीन खरीदने की अनुमति मांगी। सरकार ने कुछ शर्तों पर उनको जमीन खरीदने की अनुमति प्रदान की लेकिन सोसायटी प्रस्ताव के अनुरूप जमीन सिर्फ 15-19 एकड़ ही भूमि खरीद पाई। इसी बीच यह सामने आया कि वह भूमि भारतीय सैन्य क्षेत्र से समीप है जिससे सुरक्षा और गोपनीयता को खतरा हो सकता है। इसके बाद सरकार ने 2006 में अनुमति वापस लेकर भूमि को सरकार में निहित करने का आदेश दिया। इस पूरे प्रकरण में किसी भी डॉक्यूमेंट में मुस्लिम यूनिवर्सिटी का कहीं नाम नहीं आया। इसके बाद सोसायटी हाईकोर्ट चली गई जिस पर हाईकोर्ट ने सोसायटी को भूमि का स्वामित्व धारी माना और उसे बेचने का भी अधिकारी माना लेकिन हाईकोर्ट ने यह भी शर्त लगाई कि इस भूमि का स्वरूप कृषि भूमि ही रहेगा जिसे कभी बदला नहीं जा सकेगा। 2017 में भाजपा की सरकार आई और इस भूमि को बेचने के लिए अनुमति सरकार ने ही दी। 2022-23 में भाजपा सरकार ने ही इस भूमि के बैनामे करवाए और दाखिल खारिज भी करवा दिया। कई भूखंडों को 143 में दर्ज करके कृषि भूमि से बदल कर गैर कृषि कर दिया। लेकिन कांग्रेस पर आरोप लगाया जा रहा है कि कांग्रेस सरकार ने ही मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनाने के लिए जमीन दी जबकि इस भूमि पर सभी हिंदू और उत्तराखण्ड के ही नागरिकों ने जमीनें खरीदी हैं। यही नहीं भाजपा सरकार ने ही हाईकोर्ट के आदेशों को बदल कर हाई कोर्ट की अवमानना की है। 2022 से अब तक प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी हैं उनके ही कार्यकाल में जमीनों का सबसे बड़ा घपला हो रहा है। इस मामले में पूरी तरह से सरकार और धामी ही दोषी हैं।
अभिनव थापर, प्रदेश प्रवक्ता, कांग्रेस
हमने जमीन पूरी तरह से नियमों और तहसील प्रशासन से जानकारी लेकर ही खरीदी। हमने रजिस्ट्री कर सभी स्टाम्प ड्यूटी चुकाई। प्रशासन ने हमारे नाम भूमि का दखिला ख़ारिज किया और भू अभिलेखों में जमीन हमारे नाम दर्ज की तो हम पर किस आधार पर आरोप लग रहे हैं कि हमने गलत तरीके से जमीनें खरीदी हंै। हमारी जमीन कृषि भूमि के नाम से ही रजिस्टर्ड है। हमने कोई गलत काम नहीं किया। हमने सरकार और प्रशासन को अपना जवाब दे दिया है लेकिन इस मामले में सिर्फ राजनीति हो रही है जिस कारण इसका कोई सॉल्यूशन नहीं निकाला जा रहा है। हमें तो लगता है कि इसका सोल्यूशन सिर्फ कोर्ट से ही होगा। हम इस मामले को लेकर कोर्ट जाने वाले हैं।
अरिहंत जैन, अधिवक्ता व भूमि क्रेता, देहरादून
हमने सरकार के सभी नियमों के आधार पर ही जमीन खरीदी। हम उत्तराखण्ड के ही नागरिक हैं। हमारे बारे में गलत बातें कही जा रही हैं कि हमने गलत तरीके से जमीनें खरीदी है। सरकार को हमने अपनी बात कही और इसके लिए हमें एसडीएम विकास नगर ने बुलाया। हम दो सौ लोग हैं जिन्होंने जमीन खरीदी है उनसे मिलने के लिए गए लेकिन एसडीएम साहब कहीं और चले गए हमसे नहीं मिले। कहा जा रहा है कि हम अपनी बात प्रशासन के सामने रखे नहीं तो सरकार हमारी जमीन को सरकार में निहित कर देगी। जब हम अपनी बात रखने के लिए प्रशासन के पास जाते हैं तो अधिकारी हमसे मिलने की बजाय व्यस्तता का बहाना बनाकर कहीं और चले जाते हैं। इसमें सिर्फ राजनीति हो रही है और कुछ नहीं। हमारी जमीनें हमसे छीनने का प्रयास किया जा रहा है।
कर्नल रवि, भूमि क्रेता, देहरादून
मुझे पता चला कि धौलास में जमीन पर प्लाटिंग हो रही है तो मैं भी वहां जमीन लेने के लिए गया। गांव के लोगों ने बताया कि इस जमीन के टाइटल में कोई समस्या है तो मैं एसडीएम विकास नगर के ऑफिस गया। वहां मैंने इसके टाइटल और प्रॉब्लम के बारे में पूछा। एसडीएम विकास नगर ने हमें तहसीलदार विकास नगर के पास भेजा जहां उन्होंने बताया कि इसके टाइटल में कोई गड़बड़ी नहीं है, जमीन साफ और कानून के तहत बेची जा सकती है तो मैंने और कई रिटायर्ड सैन्य अधिकारियों ने जमीन खरीदी। करीब 170 लोग ऐसे हैं जो ब्यूरोक्रेट, सैन्य अधिकारी, ओएनजीसी और प्रदेश सरकार के अधिकारी, एडवोकेट भी हैं, ने जमीन खरीदी। सभी की रजिस्ट्री हुईं और एक महीने बाद सभी का म्यूटेशन भी हो गया लेकिन अब कहा जा रहा है कि यह जमीन मुस्लिमों द्वारा खरीदी गई है जिससे राज्य की डेमोग्राफी बदलने का प्रसास किया जा रहा है। यह पूरी तरह से झूठ है। सिर्फ दो-चार ही मुस्लिम लोग हैं बाकी सभी हिंदू और प्रदेश के निवासी ही हैं। पता नहीं क्यों इस तरह से झूठ फैलाया जा रहा है। हमारी जमीन को विवादित करके हमारा अपमान किया जा रहा है। हमने प्रशासन को अपनी बात कह दी है।

