प्रभात डबराल, वरिष्ठ पत्रकार

‘मेरा नाम मोहम्मद दीपक है।’ यह महज पांच शब्द नहीं प्रतिकार के वो शब्द हैं, जिन्होंने पूरे देश में एक संदेश दिया कि अब जरूरत है इस धर्म के नाम पर इस प्रकार के विभाजनकारी तत्वों के खिलाफ लामबंद होने की। कोटद्वार में एक दुकान के नाम में ‘बाबा’ शब्द इस्तेमाल होने पर जिस प्रकार साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने की कोशिश की उससे लगता है कि उत्तराखण्ड साम्प्रदायिक तनाव की बड़ी तस्वीर का हिस्सा बनता नजर आ रहा है। ।ेेवबपंजपवद वित च्तवजमबजपवद व िब्पअपस त्पहीजे (।ब्च्त्) की रिपोर्ट भी इस बात की तस्दीक करती है, जिसमें 2021 से 2025 के बीच राज्य में हुई कई साम्प्रदायिक घटनाओं का दस्तावेजीकरण किया गया है, में कहा गया है कि बीते कुछ वर्षों में उत्तराखण्ड में मुसलमानों को निशाना बनाने का एक लगातार पैटर्न सामने आया है जो सिर्फ शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है बल्कि आर्थिक और सामाजिक बहिष्कार भी शामिल है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि किस तरह ‘डर का रणनीतिक इस्तेमाल’, ‘इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करना’ और राज्य की मशीनरी का उपयोग कर एक खास समुदाय के खिलाफ नफरत का माहौल बनाया गया।

कोटद्वार के पटेल मार्ग स्थित बाबा स्कूल एंड मैचिंग सेंटर का नाम ‘बाबा’ रखने पर बजरंग दल को आपत्ति इसलिए हो गई क्योंकि दुकान के मालिक वकील अहमद मुस्लिम है। बजरंग दल का कहना है कि कोटद्वार स्थित सिद्धबली बाबा के बाबा शब्द का इस्तेमाल बाबा हनुमान मंदिर का भ्रम पैदा करता है। बजरंग दल वाले इसका नाम से बाबा हटाने पर दबाव डाल रहे थे और विरोध कर रहे थे। करीब ढाई करीब ढाई महीने पहले वकील अहमद पर दुकान का नाम बदलने के लिए दबाव डाला गया था, हालांकि वकील अहमद ने दुकान शिफ्ट करने के बाद नाम बदलने की बात कही थी लेकिन जब नई जगह जाने के बाद भी वकील अहमद ने नाम नहीं बदला तो 28 जनवरी को प्रदर्शनकारियों और वकील अहमद के बीच झड़प हुई। वकील अहमद के दोस्त दीपक कुमार जो कोटद्वार के ही रहने वाले हैं, जिम ट्रेनर हैं और उनके दोस्त विजय रावत ने बीच बचाव की कोशिश की। जब मामला बढ़ता गया और प्रदर्शनकारियों से ज्यादा बहस होने लगी तो तो प्रदर्शनकारियों ने दीपक से पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है? दीपक ने जवाब दिया ‘मोहम्मद दीपक’। ऐसे जवाब की अपेक्षा प्रदर्शकारियों ने नही की होगी। दीपक कुमार ने सार्वजनिक रूप से दुकानदार का समर्थन किया और कहा कि वर्षों पुराने नाम को जबरन बदलने की मांग उचित नहीं है। उनका यह रुख कुछ समूहों को नागवार गुजरा। दीपक के सामने आने पर पहले दिन बजरंगी पीछे तो हट गए लेकिन वह धमकी देकर गए कि जल्द लौटेंगे। वह जल्द आए भी, गौ रक्षा दल के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उनियाल के नेतृत्व में एक प्रायोजित भीड़ के साथ लेकिन पुलिस ने उन्हें दीपक के जिम और घर तक जाने दिया। खास बात यह थी कि अब निशाने पर बाबा शब्द नहीं, दीपक था क्योंकि एक लम्बे समय बाद किसी ने इन हिंसक हिंदूवादियों की गतिविधियों का प्रतिकार किया था और इन्हें यह मंजूर नहीं था कि कोई हिंदू उनके इस कृत्य पर उन्हें चुनौती दे और उनके हिंदूत्ववादी अभिमान को ललकारे। उनको डर था कि अगर आज दीपक को नहीं दबाया गया तो कई ‘मोहम्मद दीपक’ बनकर न सही दीपक बनकर खड़े हो जाएंगे। दीपक को हिंसा का डर दिखाकर वह भविष्य में खड़े होने वाले नए दीपक को संदेश देना चाहते थे। वरना उनके इस हिंदूत्ववादी अभिमान को खतरा था लेकिन दीपक की निडरता के जरिए समाज में संदेश गया कि हिंदुओं में अभी सक्रियता गई नहीं है और उनमें अभी मानव मूल्यों की रक्षा का जज्बा बाकी है, बस उसके बाहर आने की देर है। यही खतरा इन संगठनों के लिए जो खुद को हिंदुत्व का ठेकेदार समझते हैं और उनके द्वारा की गई हिंसा एक स्वीकार्य हिंदूवादी अभिव्यक्ति मानते हैं। जिम ट्रेनर द्वारा एक मुस्लिम दुकानदार का समर्थन करने से शुरू हुआ विवाद अब उत्तराखण्ड में बढ़ते साम्प्रदायिक तनाव की बड़ी तस्वीर का हिस्सा बनता दिख रहा है। हल्द्वानी, उत्तरकाशी और नैनीताल जैसी पूर्व घटनाएं संकेत देती हैं कि छोटे स्थानीय विवाद तेजी से धार्मिक टकराव में बदल रहे हैं।

देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखण्ड में हालिया घटनाएं सामाजिक ताने-बाने को लेकर नई चिंता पैदा कर रही हैं। कोटद्वार में इस प्रकरण के चलते तनाव की स्थिति बन गई। पुलिस ने मामले में कई एफआईआर दर्ज कीं और सुरक्षा बलों की तैनाती कर हालात को काबू में करने की कोशिश जरूर की लेकिन पुलिस की भूमिका पर भी कई सवाल खड़े होते हैं। जहां दीपक पर तो एफआईआर पुलिस द्वारा की गई लेकिन अशांति फैलाने वाले लोगों के झुंड पर अज्ञात लोगों के नाम से शिकायत दर्ज करना पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े  करता है। सीसीटीवी खंगाल कर अपराधियों को ढूंढ़ निकालने का दावा करने वाली पुलिस को वीडियो में अशांति फैलाने वालों के चेहरे नजर नहीं आए और चेहरे पहचाने जाने के बावजूद अज्ञात के खिलाफ फिर दर्ज करना पुलिस की भूमिका पर कहीं न कहीं सवाल खड़े करता है लेकिन इस घटना ने स्थानीय स्तर पर अविश्वास की रेखा खींच दी। कोटद्वार की यह घटना अकेली नहीं है। इससे पहले भी उत्तराखण्ड के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे विवाद सामने आ चुके हैं जहां स्थानीय मुद्दों ने जल्दी ही साम्प्रदायिक रूप ले लिया।

हल्द्वानी में मस्जिद और मदरसे से जुड़े एक प्रशासनिक कार्रवाई के बाद व्यापक हिंसा भड़क गई थी। भीड़बाजी, आगजनी और पत्थरबाजी की घटनाओं ने शहर को तनाव में डाल दिया था, जिसके चलते कफ्र्यू और इंटरनेट बंदी जैसे कदम उठाने पड़े। इस घटना ने दिखाया कि धार्मिक पहचान से जुड़े मुद्दे कितनी तेजी से जनभावनाओं को भड़का सकते हैं।

इसी तरह उत्तरकाशी जिले के पुरोला क्षेत्र में एक आपराधिक आरोप से शुरू हुआ विवाद साम्प्रदायिक तनाव में बदल गया था। अफवाहों और उग्र भीड़ की वजह से स्थानीय समुदायों के बीच डर और असुरक्षा की भावना पैदा हुई और कुछ परिवारों को अस्थायी रूप से क्षेत्र छोड़ना पड़ा।

नैनीताल में भी एक स्थानीय आपराधिक मामले ने बाजार क्षेत्र में साम्प्रदायिक झड़प का रूप ले लिया था, जहां दुकानों को निशाना बनाया गया और व्यापार प्रभावित हुआ। नैनीताल में भी इन हिंदूवादी संगठनों द्वारा मुसलमानों पर हमले का विरोध करने पर शैला नेगी को निशाना बनाया गया। हत्या और बलात्कार तक की धमकियां मिलने लगीं थीं। प्रशासन ने स्थिति सम्भाली, पर घटना ने यह संकेत दिया कि सामाजिक भरोसा पहले जैसा मजबूत नहीं रहा। ऐसी घटनाओं की कमी नहीं है जहां पर सोशल मीडिया के जरिए इन हिंदूवादी संगठनों ने अशांति फैलाने की कोशिश की नैनीताल के नैना मंदिर के सामने से एक मुस्लिम परिवार द्वारा जूते पहन कर जाने की घटना को बेवजह तूल दिया गया। इसी प्रकार देहरादून के देहरा पब्लिक स्कूल में हिंदू संगठनों द्वारा स्कूल की प्रातःकालीन प्रार्थना पर ही सवाल खड़े कर दिए गए क्योंकि उस प्रार्थना में ‘बख्शीश’ शब्द आता था, जब वहां के टीचरों और अध्यापकों द्वारा उनको समझाया गया और कबीर, रहीम का जिक्र किया गया तो उन्होंने कहा कि हम कबीर और रहीम को नहीं जानते हम जानते हैं तो सिर्फ राम को जानते हैं। उन्होंने स्कूल वालों को हिदायत दी कि स्कूल में हनुमान चालीसा, सुंदरकांड कराए जाएं। हिंदूवादी संगठनों के अंदर हिंदू समाज के लिए आत्म निरीक्षण की कोई जगह नहीं है। देहरादून और ऋषिकेश में दो महिलाओं की हत्या पर इन संगठनों ने कोई आवाज नहीं उठाई क्योंकि वहां पर आरोपी हिंदू थे।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन घटनाओं में एक साझा पैटर्न उभर रहा है। छोटे विवाद, सोशल मीडिया पर फैलती अपुष्ट सूचनाएं और समुदायों के बीच संवाद की कमी। जब प्रशासनिक प्रतिक्रिया देर से या केवल दंडात्मक रूप में दिखती है तो जमीनी स्तर पर असंतोष और अविश्वास बढ़ता है।

उत्तराखण्ड की पहचान लम्बे समय तक धार्मिक सहअस्तित्व और शांत सामाजिक जीवन से जुड़ी रही है। लेकिन हालिया घटनाएं संकेत देती हैं कि बदलते सामाजिक-राजनीतिक माहौल का असर यहां भी दिखाई देने लगा है। स्थानीय नागरिक समूहों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि समय रहते संवाद, शांति समितियों की सक्रियता और तथ्य-आधारित सूचना तंत्र मजबूत न किया गया तो ऐसी घटनाएं भविष्य में और गहरे विभाजन का कारण बन सकती हैं।

फिलहाल प्रशासन का कहना है कि सभी मामलों में कानून के तहत कार्रवाई की जा रही है और शांति बनाए रखना प्राथमिकता है। मगर जमीनी सच्चाई यह भी है कि भरोसे की जो दरार एक बार दिखने लगती है, उसे भरने में कानून से ज्यादा समाज की भागीदारी की जरूरत होती है। देवभूमि की सामाजिक आत्मा को बचाए रखने की चुनौती अब केवल सरकार की नहीं बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी बनती जा रही है।

बात अपनी-अपनी

बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है यह घटना। हम पर्यटक प्रदेश हैं और उत्पाती संस्कृति किसी भी रूप में राज्य के लिए शुभ नहीं है। हम पर्यटन प्रदेश हैं, धार्मिक स्थल भी हैं यहां, शैक्षिक संस्थान भी हैं और शैक्षिक पर्यटन भी एक बड़ा आधार आजीविका का बन सकता है। हम पर्यटकों की पहली पसंद इसलिए हैं क्योंकि हमारे यहां शांति व्यवस्था लोगों में रहती है। यदि हमारे राज्य के लिए धारणा बन गई कि हमारा राज्य अशांत राज्य है तो किसी भी रूप में हमारे लिए शुभकारी नहीं है। दूसरे के मामलों में दखलअंदाजी, विद्वेष फैलाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। मुझे तकलीफ इस बात की है कि दीपक को उसके शानदार काम के लिए पुरस्कृत करने की बजाय, उस पर मुकदमा लगा दिया। किसी भी तरीके से धार्मिक कट्टरता, धर्म आधारित उग्रवाद राज्य के लिए घातक है। हमारी आजीविका शांति और सौहार्द पर है। अगर हमारे राज्य की यह छवि बन जाए कि हमारे यहां शांति सुरक्षा नहीं है तो जो निवेश उत्तराखण्ड में आने की बात कही जा रही है वह नहीं आ पाएगा। अगर हम सैद्धांतिक बातों को छोड़ भी दें और आजीविका की नजर से देखें तो यह घटनाएं राज्य के हित में नहीं हैं।

हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड

कोटद्वार में जो माहौल खराब करने का प्रयास किया जा रहा है, मैं उसकी भरपूर निंदा करती हूं, यह सही नहीं है। 4 साल से मैं यहां से विधायक हूं और यहां का हमेशा माहौल शांतिपूर्ण रहा है। कोटद्वारवासी शांतिपूर्वक रह रहे हैं और उन्होंने शांतिपूर्ण वातावरण रखने का पूरा प्रयास किया है। जिस दिन यह समस्या हो रही थी और वह लोग आपस में भिड़ रहे थे तो पुलिस ने मुस्तैदी से काम किया। मैं पुलिस प्रशासन का धन्यवाद करती हूं कि उन्होंने शांतिपूर्वक इस मामले को निपटने का प्रयास किया। इसे राजनीतिक मुद्दा न बनाया जाए, माहौल शांतिपूर्ण बनाए रखने का प्रयास किया जाए और इसे शांतिपूर्वक साॅर्ट आउट किया जाए। बाहर से आने वाले लोगों, चाहे वह उत्तर प्रदेश से हों या जहां से भी आ रहे हो, सख्ती के साथ कह दिया गया है कि उनको कोटद्वार के अंदर कतई नहीं आने दिया जाए जो यहां आकर कोटद्वार का माहौल खराब कर रहे हैं।

ऋतू भूषण खण्डूड़ी, अध्यक्ष, उत्तराखण्ड विधानसभा

बहुत पुरानी बात है, ठीक से याद नहीं पर शायद 1967-68 को होगी।  मैं इंटर काॅलेज में पढ़ता था, तब की बात है। किसी बात पर यहां बसाए गए पंजाबी रिफ्यूजियों और पुराने बाशिंदों में ठन गई। शाम होते-होते स्टेशन के नजदीक जीएमओयू के सामने दोनों पक्ष आमने-सामने डट गए। दोनों ओर से पत्थर चलने लगे। मैं मौके पर था। मैं गवाह हूं इस बात का कि शहर के कुछ जाने-माने नेता जान की परवाह न करते हुए भारी पथराव के बीच हाथ जोड़ते हुए दोनों पक्षों के बीच आकर खड़े हो गए। पथराव रुक गया। इन नेताओं में रूपचंद वर्मा, संतन बड़थ्वाल, मधुर शास्त्री के चेहरे आज भी मेरे जेहन में अंकित हैं। आज देखिए बाहर से गाड़ियों में भरकर लाए गए बजरंगी छोकरों ने दीपक के जिम को घेर लिया। उसके मां-बाप परिवार वालों का नाम लेकर गालियां दीं, धमकाया, धक्का-मुक्की की, सड़क जाम कर दी, क्यों? क्योंकि दीपक ने एक मुस्लिम व्यापारी की बजरंगी टोली के कोप से रक्षा की थी। कोटद्वार के नेताओं ने क्या किया? उनके बोल भी नहीं फूट रहे। बीजेपी वालों को तो छोड़िए, कांग्रेसियों की जबान पर भी ताले लगे हैं। क्या ऐसा उत्तराखण्ड मांगा था हमने?

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