गत् सप्ताह प्रर्वतन निदेशालय (ईडी) ने कोलकाता में एक कम्पनी पर छापा क्या मारा कि प्रदेश की मुख्यमंत्री ममता बौखला उठीं। उन्होंने भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंची ईडी की कार्यवाही को न केवल रोका बल्कि कई फाइल्स और कम्प्यूटर आदि भी लेकर चली गई। केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय ने ममता बनर्जी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाकर संघर्ष को कानूनी-राजनीतिक युद्ध में बदल दिया है। एजेंसी का दावा है कि ‘इंडियन पाॅलिटिकल एक्शन कमेटी’ (आईपैक) से जुड़े छापों के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य के शीर्ष अफसरों के साथ मिलकर जांच में ‘बाधा’, ‘हस्तक्षेप’, ‘सबूतों से छेड़छाड’ और उन्हें ‘नष्ट’ करने की कोशिश की। बंगाल में चुनाव नजदीक आने के साथ ही संघ-राज्य सम्बंधों की पुरानी दरार एक बार फिर खाई में बदलती दिख रही है
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर वही पुरानी पटकथा तेज रफ्तार से दोहराई जा रही है, केंद्र की जांच एजेंसियां, राज्य सरकार और बीच में खड़ा लोकतंत्र। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार टकराव सीधे सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर जाकर खड़ा हो गया है। प्रवर्तन निदेशालय ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य के शीर्ष पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी है। आरोप गम्भीर हैं, ‘जांच में व्यवधान’, ‘एजेंसी की कार्रवाई को रोकना’, ‘राज्य मशीनरी का इस्तेमाल’ और यहां तक कि ‘सबूतों को नष्ट करने की कोशिश।’
यह प्रकरण एक कम्पनी ‘इंडियन पाॅलिटिकल एक्शन कमेटी’ से जुड़े ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय की छापेमारी के दौरान उत्पन्न विवाद से जुड़ा है। ‘इंडियन पाॅलिटिकल एक्शन कमेटी’ का नाम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के राजनीतिक प्रबंधन से लगातार जोड़ा जाता रहा है। प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई और उसके बाद मुख्यमंत्री का मौके पर पहुंचना, पुलिस और प्रशासन की उपस्थिति तथा राज्य बनाम केंद्र की बयानबाजी, इन सबने मिलकर इसे केवल ‘एक छापे’ का मामला नहीं रहने दिया। मामला अब संघीय ढांचे (फेडरलिज्म) की बुनियादी समझ, संस्थानों की स्वायत्तता और चुनावी लोकतंत्र की नैतिकता तक पहुंच गया है।
प्रवर्तन निदेशालय का कहना है कि ‘इंडियन पाॅलिटिकल एक्शन कमेटी’ से जुड़े व्यक्ति पर चल रही जांच के दौरान उसकी टीम ने कानूनी प्रक्रिया के अनुसार तलाशी अभियान शुरू किया था। लेकिन उसी दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं घटनास्थल पर पहुंचीं और राज्य के शीर्ष पुलिस अधिकारियों जैसे पुलिस महानिदेशक और कोलकाता पुलिस आयुक्त की उपस्थिति में प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई बाधित कर डाली। प्रवर्तन निदेशालय ने सुप्रीम कोर्ट में यह मांग रखी है कि उसे प्राथमिकी दर्ज कराने तथा कथित ‘हस्तक्षेप’ की जांच के लिए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की कार्रवाई की अनुमति या दिशा-निर्देश दिए जाएं।
कानूनी भाषा में देखें तो यह बेहद बड़ा कदम है। सामान्य तौर पर एजेंसियां राज्य सरकारों से टकराव की स्थितियों में उच्च न्यायालय में राहत ढूंढती हैं लेकिन प्रवर्तन निदेशालय का सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंचना बताता है कि टकराव का स्तर साधारण नहीं रहा। यह एक तरह से राज्य सरकार के ‘अधिकार क्षेत्र’ और केंद्र की ‘एजेंसी शक्तियों’ के बीच सीमारेखा तय करने की कोशिश भी बन गया है। प्रवर्तन निदेशालय की याचिका के मुताबिक यह मामला कथित तौर पर कोयला घोटाला जांच से भी जुड़ा है जिसमें एजेंसी को आशंका है कि ‘इंडियन पाॅलिटिकल एक्शन कमेटी’ या उससे जुड़े व्यक्ति का सम्बंध जांच से हो सकता है। ममता बनर्जी का पलटवार है कि यह ‘राजनीतिक बदले’ की कार्रवाई है और चुनावी रणनीतियों से डेटा को निशाना बनाया जा रहा है।
इस घटनाक्रम का तापमान अचानक नहीं बढ़ा, यह कई चरणों में सुलगा और फिर भड़क उठा। जनवरी 2026 के पहले सप्ताह में प्रवर्तन निदेशालय ने ‘इंडियन पाॅलिटिकल एक्शन कमेटी’ से जुड़े ठिकानों पर कार्रवाई शुरू की थी। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इसमें ‘इंडियन पाॅलिटिकल एक्शन कमेटी’ के एक प्रमुख रणनीतिकार और सह-संस्थापक माने जाने वाले प्रतीक जैन का नाम सामने आया जो बंगाल की चुनावी रणनीति और तृणमूल कांग्रेस के राजनीतिक संचालन के संदर्भ में एक चर्चित चेहरा रहे हैं।
इसके बाद वह दृश्य सामने आया जिसने बंगाल की राजनीति को एक झटके में ‘जांच’ से ‘टकराव’ की तरफ मोड़ दिया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं उस स्थान पर पहुंचीं जहां छापा चल रहा था। उनके साथ प्रशासनिक- पुलिस ढांचा भी सक्रिय दिखा। भारतीय जनता पार्टी का आरोप है कि मुख्यमंत्री का इस तरह छापे के स्थान पर जाना ‘जांच में हस्तक्षेप’ है तो तृणमूल कांग्रेस इसे राज्य के अधिकारों की रक्षा और एजेंसी ‘ज्यादती’ के खिलाफ चुनी हुई सरकार के हस्तक्षेप के रूप में पेश कर रही है।
इसी बीच तृणमूल कांग्रेस ने केंद्र सरकार, विशेषकर गृह मंत्री अमित शाह पर गम्भीर आरोपों की बौछार कर दी है। तृणमूल कांग्रेस प्रवक्ता द्वारा कथित व्हाट्सएप चैट स्क्रीनशॉट साझा कर गृह मंत्री की भूमिका पर सवाल उठाए और इसे ‘वाटरगेट 2.0’ जैसी संज्ञा दी गई, मतलब विपक्षियों में जासूसी का आरोप। हालांकि यह चैट सत्यापित नहीं है फिर भी इसका राजनीतिक संदेश स्पष्ट है, तृणमूल कांग्रेस इसे सिर्फ जांच नहीं बल्कि ‘चुनावी युद्ध’ मान रही है। इतना ही नहीं ममता ने कथित कोयला तस्करी के पैसा सीधे गृह मंत्री अमित शाह तक पहुंचने का दावा भी कर डाला है।
इसी बीच मामला कलकत्ता उच्च न्यायालय तक भी गया, जहां सुनवाई टलने और कोर्ट रूम में अव्यवस्था की रिपोर्टें आईं। इसके बाद प्रवर्तन निदेशालय ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। बंगाल सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में पूर्व सूचना आपत्ति (केविएट) दाखिल कर दी यानी कोर्ट से अनुरोध कि राज्य का पक्ष सुने बिना कोई आदेश न दिया जाए। अब स्थिति यह है कि संघर्ष कोलकाता की सड़कों और प्रेस काॅन्फ्रेंस से निकलकर दिल्ली की संवैधानिक चैखट पर जा पहुंचा है।
वर्तमान स्थिति में तीन स्तरों पर लड़ाई चल रही है, कानूनी, राजनीतिक और नैरेटिव (प्रचार) युद्ध। कानूनी स्तर पर प्रवर्तन निदेशालय की सुप्रीम कोर्ट में याचिका पर कार्यवाही आगे बढ़ रही है। प्रवर्तन निदेशालय ने
प्राथमिकी और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो जांच जैसी मांगें उठाई हैं। राज्य ने पूर्व सूचना आपत्ति दाखिल कर दी है ताकि कोर्ट कोई एकतरफा आदेश न दे।
राजनीतिक स्तर पर यह मुद्दा चुनावी हथियार बन चुका है। ममता बनर्जी का संदेश सीधा है कि ‘भारतीय जनता पार्टी एजेंसियों के जरिए विपक्षी राज्यों को डराना चाहती है।’ दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी का संदेश भी उतना ही सीधा है, ‘कानून अपना काम करेगा, मुख्यमंत्री का छापा स्थल पर पहुंचना जांच में हस्तक्षेप है।’
नैरेटिव युद्ध में दोनों तरफ के समर्थक इसे ‘लोकतंत्र बचाओ’ बनाम ‘भ्रष्टाचार पर वार’ के रूप में पेश कर रहे हैं। यही वह बिंदु है जहां लोकतंत्र का स्वास्थ्य सवालों के घेरे में आता है क्योंकि जब कानून व्यवस्था और जांच एजेंसियां चुनावी पोस्टर वाॅर का हिस्सा बन जाएं तो न्याय, निष्पक्षता और विश्वास सबसे पहले घायल होते हैं।
भारत का संघीय ढांचा कागज पर ‘सहकारी संघवाद’ की बात करता है लेकिन जमीन पर अब ‘टकरावकारी संघवाद’ एक नई सामान्य स्थिति बनती दिख रही है। बंगाल में यह टकराव सबसे उग्र रूप में दिखता है, क्योंकि यहां संघर्ष सिर्फ नीतियों पर नहीं, सत्ता की वैधता और संस्थानों के नियंत्रण पर है। प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो, राष्ट्रीय जांच एजेंसी जैसी केंद्रीय एजेंसियां कानून के तहत काम करती हैं और कोई भी राज्य सरकार उन्हें रोक नहीं सकती, यह भी सच है। लेकिन लोकतंत्र सिर्फ कानून के पालन का नाम नहीं, लोकतंत्र का मतलब है कि कानून सत्ता का औजार न बने। जब विपक्षी राज्य यह आरोप लगाते हैं कि एजेंसियां चुनिंदा ढंग से सक्रिय होती हैं तो यह आरोप चाहे राजनीतिक लगे लेकिन लोकतांत्रिक अविश्वास का सबसे बड़ा प्रमाण यही होता है।
ममता बनर्जी और केंद्र सरकार के बीच टकराव कोई ताजा घटना नहीं है। पिछले एक दशक में यह कई बार खुलकर सामने आया है, कभी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो, कभी प्रवर्तन निदेशालय, कभी राज्यपाल, कभी कानून- व्यवस्था, कभी राष्ट्रीय नागरिक पंजी/नागरिकता संशोधन कानून जैसे मुद्दों पर। सबसे चर्चित टकरावों में 2019 का वह एपिसोड याद किया जाता है जब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो और कोलकाता पुलिस के बीच तत्कालीन पुलिस कमिश्नर ‘राजीव कुमार’ प्रकरण में टकराव हुआ था और ममता बनर्जी धरने पर बैठ गई थीं। उस समय भी ममता ने इसे संघवाद पर हमला बताया था और केंद्र ने इसे जांच में बाधा। इस तरह के एपिसोड बंगाल में एक पैटर्न बन चुके हैं, एजेंसी कार्रवाई, राज्य का प्रतिरोध, राजनीतिक विस्फोट और फिर अदालत।
इस प्रकरण का सबसे चिंताजनक पहलू सिर्फ यह नहीं कि प्रवर्तन निदेशालय सुप्रीम कोर्ट गई या ममता बनर्जी छापे के दौरान मौके पर पहुंचीं। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि भारतीय लोकतंत्र में संस्थाओं की प्रतिष्ठा और उनकी ‘निष्पक्षता की धारणा’ लगातार कमजोर पड़ रही है।
लोकतंत्र में सरकारें बदलती हैं, नीतियां बदलती हैं, विपक्ष और सत्ता में बहस होती है लेकिन संस्थाएं, जांच एजेंसियां, पुलिस, प्रशासन, अदालतें, इनका काम राजनीतिक युद्ध का मोर्चा बनना नहीं है। जैसे ही ये संस्थाएं ‘फील्ड’ बनती हैं, लोकतंत्र अपनी आत्मा खोने लगता है।
कुल मिलाकर बंगाल में एजेंसियों और सरकार के बीच टकराव अब ‘कानूनी कार्रवाई’ नहीं बल्कि ‘संवैधानिक द्वंद्व’ बन चुका है। अगर संघ और राज्यों का रिश्ता इसी प्रकार शक, दंड और दवाब से चलेगा तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होने में देर नहीं लगेगी।

