पश्चिम बंगाल में जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं वैसे-वैसे ‘बांग्लादेशी घुसपैठ’ का मुद्दा एक बार फिर राजनीति के केंद्र में आ गया है लेकिन अब यह बहस केवल सीमा सुरक्षा या अवैध प्रवासन तक सीमित नहीं रही। यह एक ऐसे नैरेटिव में बदलती जा रही है जिसके तहत आमजन की नागरिकता पर शक किया जा रहा है। पुलिस-प्रशासन की भूमिका सवालों के घेरे में है और कई जगह हिंसा को भी जायज ठहराने की कोशिशें दिख रही हैं। पड़ोसी देश बांग्लादेश में अगले महीने 12 फरवरी 2026 को होने वाले राष्ट्रीय चुनाव से पहले भारत के अलग- अलग हिस्सों से सामने आ रही घटनाएं इस बदलते माहौल की ओर इशारा करती हैं।
हाल ही में कर्नाटक के मंगलुरु में झारखंड के प्रवासी मजदूर दिलजान अंसारी पर बांग्लादेशी होने के शक में हमला इसका ताजा उदाहरण है। जांच में अंसारी के भारतीय नागरिक होने की पुष्टि हुई लेकिन पहचान पत्र मांगने से शुरू हुआ शक हिंसा तक पहुंच गया। इसी तरह देहरादून में एक बांग्लादेशी महिला की गिरफ्तारी के मामले में फर्जी दस्तावेजों का जाल सामने आया जिसने अवैध प्रवासन की वास्तविक चुनौती को उजागर किया लेकिन इन दोनों घटनाओं के बीच एक अहम फर्क है कि जहां एक ओर अवैध प्रवासन का ठोस मामला है, वहीं दूसरी तरफ शक के आधार पर एक भारतीय नागरिक को निशाना बनाया गया। यही फर्क आज की नागरिकता बहस को सबसे ज्यादा जटिल बनाता है। ऐसे ही गाजियाबाद, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में ‘आॅपरेशन टाॅर्च’ और ‘आॅपरेशन इंट्रूडर’ जैसे अभियानों के दौरान बंगाली भाषा बोलने वाले, असम के
मुसलमानों और प्रवासी मजदूरों को संदेह की नजर से देखा गया। पहचान जांच के नाम पर की गई कार्रवाइयों ने डर और असुरक्षा का माहौल पैदा किया। कई मामलों में भारतीय नागरिकों को भी बांग्लादेशी बताकर अपमानित किया गया।
इन घटनाओं को जोड़कर देखें तो स्पष्ट होता है कि अब निशाने पर सिर्फ अवैध प्रवासी नहीं बल्कि गरीब, प्रवासी मजदूर, अल्पसंख्यक और हाशिए पर खड़े समुदाय हैं। राज्य की दस्तावेजी अव्यवस्था और प्रशासनिक कमजोरियों का बोझ आम लोगों पर डाला जा रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह राजनीतिक लाभ बनाम सामाजिक सौहार्द की लड़ाई है? क्या लोकतंत्र में नागरिकता अधिकार है या विशेषाधिकार? क्या है शक की राजनीति और जमीनी हकीकत? क्या यह सुरक्षा अभियान है या नागरिकों की परीक्षा? क्या नागरिकता केवल कागजों से तय होगी? ऐसे तमाम प्रश्न आमजन के मन-मस्तिष्क में घूम रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भारत में बांग्लादेश से प्रवासन का इतिहास वर्ष 1947 के विभाजन और 1971 के मुक्ति संग्राम से जुड़ा है। असम समझौते में 25 मार्च 1971 की कट ऑफ़ तारीख तय की गई लेकिन समस्या कभी पूरी तरह सुलझी नहीं। समय के साथ यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति का हथियार बन गया। ‘घुसपैठिए’ और ‘डेमोग्राफिक इन्वेजन’ जैसे शब्द चुनावी भाषणों का हिस्सा बनते गए। नतीजा यह हुआ कि नागरिकता अब अधिकार से ज्यादा संदेह का विषय बन गई। एनआरसी और नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) ने इस बहस को और गहरा किया। असम में एनआरसी के दौरान लाखों लोग दस्तावेजों के अभाव में सूची से बाहर रह गए जिनमें गरीब, महिलाएं और ग्रामीण आबादी बड़ी संख्या में शामिल थी। जहां तक सवाल है कि क्या नागरिकता केवल कागजों से तय होगी तो सीएए को लेकर भी यही चिंता उभरी कि नागरिकता को धर्म से जोड़ने से सामाजिक ताने-बाने पर गहरा असर पड़ सकता है। बांग्लादेशी का शक अक्सर मुस्लिम पहचान से जुड़ता दिखा, जिससे भय और विभाजन को बढ़ावा मिला।
अवैध प्रवासन एक वास्तविक चुनौती है जिसे नकारा नहीं जा सकता। लेकिन इसका समाधान डर, हिंसा और शक की राजनीति में नहीं है। मजबूत सीमा प्रबंधन, निष्पक्ष प्रशासन और मानवीय दृष्टिकोण ही इसका स्थायी रास्ता है। अभी भी सवाल यही है कि भारत नागरिकता को कैसे परिभाषित करना चाहता है। संविधान से मिला एक मौलिक अधिकार या एक ऐसा विशेषाधिकार, जिसे बार-बार साबित करना पड़े। राजनीतिक फायदे की बात करें तो बांग्लादेशी शब्द का इस्तेमाल तात्कालिक फायदा दे सकता है लेकिन इसकी कीमत सामाजिक सौहार्द और लोकतांत्रिक मूल्यों को चुकानी पड़ती है। अगर नागरिकता की राजनीति समावेशन और न्याय की ओर नहीं बढ़ी तो शक का यह दायरा और गहराएगा और उसका नुकसान पूरे समाज को होगा।
गौरतलब है कि भारत की राजनीति में ‘बांग्लादेशी’ शब्द अब केवल एक राष्ट्रीयता का संकेत नहीं रह गया है बल्कि यह संदेह, भय और राजनीतिक ध्रुवीकरण का प्रतीक बन चुका है। दशकों से भारत के पूर्वी और उत्तर-पूर्वी राज्यों में अवैध प्रवासन का मुद्दा मौजूद रहा है लेकिन हाल के वर्षों में इसे जिस तरह नागरिकता, पहचान और वोट की राजनीति से जोड़ा गया है, उसने इसे कहीं अधिक संवेदनशील और विस्फोटक बना दिया है। आज
‘बांग्लादेशी’ होना या कहे जाना, कई बार कागजों से अधिक शक की राजनीति का विषय बन जाता है। कुल मिलाकर राजनीतिक लाभ के लिए अपनाई गई रणनीतियों का सीधा असर सामाजिक सौहार्द पर पड़ता है।

