अक्टूबर 2025, हिंदी सिनेमा के लिए शोक का महीना बन गया। 20 अक्टूबर को असरानी गए, ‘हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं’ की गूंज छोड़कर और पांच दिन बाद 25 अक्टूबर को सतीश शाह, ‘डि’मेलो’ की मौन मुस्कान के साथ। दो पीढ़ियां, दो शैलियां, पर एक ही आत्मा, दोनों ने सिखाया कि हंसी सबसे सच्ची मानवीय अभिव्यक्ति है
कभी शोले के जेलर की ठहाकेदार आवाज थिएटरों में गूंजती थी ‘‘हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं’’ तो कभी ‘‘जाने भी दो यारों’’ में सतीश शाह का चेहरा ताबूत में लेटा हुआ दिखाई देता था, मृत होकर भी व्यंग्य में जीवित। दो दृश्य, दो दशक, दो अभिनेता पर दोनों के अभिनय में एक जैसी सच्चाई थी। उनकी हंसी अभिनय नहीं लगती थी, जीवन की सहज प्रतिक्रिया लगती थी।
हंसी में सादगी और मर्यादा का संगीत
गोवर्धन असरानी, जिन्हें सिनेमा ने प्यार से ‘असरानी’ कहा, का जन्म 1 जनवरी 1941 को जयपुर में हुआ। एक मध्यमवर्गीय गुजराती परिवार से आने वाले असरानी को बचपन से अभिनय का शौक था। उन्होंने पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया (एफटीआईआई) से अभिनय की औपचारिक शिक्षा ली, जहां उनके सहपाठियों में जया भादुड़ी (अब जया बच्चन) जैसी प्रतिभाएं शामिल थीं। वहीं से उन्होंने अभिनय को ‘संवेदना’ के रूप में समझा।
साठ के दशक में मुम्बई पहुंचे असरानी को शुरुआत में छोटे किरदार मिले पर उनका चेहरा अलग था, उनकी आवाज अलग थी और उनकी टाइमिंग अद्भुत। ‘बावर्ची’, ‘छुपके छुपके’, ‘अभिमान’, ‘प्रेमनगर’, ‘दुल्हे राजा’ हर फिल्म में उन्होंने एक ऐसे आदमी का चेहरा रचा जो साधारण होते हुए भी याद रह जाता है। वे सिर्फ काॅमेडी नहीं करते थे, मानवीय मूर्खताओं का दर्पण दिखाते थे। 1975 की शोले ने उन्हें अमर कर दिया। जब असरानी के जेलर ने कहा कि ‘‘हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं’’ तो वह संवाद सिनेमा से निकलकर भारत के मुहावरों में दर्ज हो गया। उन्होंने इस किरदार में हिटलर जैसी चाल, लेकिन बच्चे जैसी मासूमियत से मिलाई। नतीजा एक ऐसा हास्य जो कभी पुराना नहीं होता।
निर्देशक रमेश सिप्पी ने बाद में कहा, ‘‘असरानी इस किरदार के लिए जैसे बने ही थे।’’ उनकी हंसी में हमेशा एक विनम्रता थी। वे किसी का मजाक नहीं उड़ाते थे। वे जीवन की विसंगतियों को सहज बनाते थे। वे उन दुर्लभ अभिनेताओं में थे जिनकी काॅमेडी में दया और गम्भीरता साथ चलती थी।
20 अक्टूबर 2025 को जब असरानी नहीं रहे तो सिनेमा-जगत सन्न रह गया। अगले दिन, 21 अक्टूबर को अमिताभ बच्चन ने एक्स पर लिखा ‘‘हमने एक और साथी खो दिया… असरानी सर, एक अत्यंत प्रतिभाशाली सहयोगी, जया के फिल्म इंस्टीट्यूट के शिक्षक… उनका जाना अचानक और बेहद दुखद है।’’ हेमा मालिनी ने लिखा, ‘‘हमने एक और रत्न खो दिया। असरानी जी ने अपनी शानदार काॅमेडी से दशकों तक दर्शकों को आनंदित किया। हमने कई फिल्मों में साथ काम किया लेकिन ‘शोले’ में उनका जेलर बनना तो वाकई दिमाग हिला देने वाला था।’’
असरानी ने चार सौ से अधिक फिल्मों में अभिनय किया। वे 70 के दशक के उस दौर के प्रतिनिधि बने जब काॅमेडी को ‘हास्य से परे कला’ माना जाने लगा। उन्होंने साबित किया कि काॅमेडियन होना ‘साइड रोल’ नहीं, बल्कि कहानी का हृदय हो सकता है। उनकी निजी जिंदगी भी उतनी ही सादगीभरी थी। उनकी पत्नी कोमल असरानी भी अभिनेत्री थीं और दोनों की जोड़ी फिल्म इंडस्ट्री में अपने सौहार्द के लिए जानी जाती थी।
असरानी ने कभी स्टार बनने की कोशिश नहीं की। वे बस ‘अभिनेता’ बने रहना चाहते थे। वे कहा करते थे कि ‘‘मेरा उद्देश्य ठहाका नहीं, मुस्कान है।’’
व्यंग्य में छिपा करुणा का चेहरा
सतीश शाह का जन्म 25 जून 1951 को हुआ। उन्होंने 1970 के दशक में अभिनय शुरू किया और धीरे-धीरे अपने आपको उस पीढ़ी का चेहरा बना दिया जो शहरी भारत की बेतुकी हकीकतों को जानती थी। उनकी सबसे यादगार भूमिका बनी ‘जाने भी दो यारो’ (1983) का कमिश्नर डि’मेलो। यह एक ऐसा किरदार था जो मरकर भी जीवित रहा। जब वह शवयात्रा का हिस्सा बनता है और फिर मंच पर उठकर बैठ जाता है तो दर्शक एक साथ हंसते भी हैं और सोचते भी हैं। वो दृश्य भारतीय सिनेमा में व्यंग्य का शिखर है। डि’मेलो का चेहरा, उसकी स्थिरता और उसके मौन में वह सब कुछ कहा गया जो एक पूरा समाज कहने से डरता था।
सतीश शाह का हास्य किसी शब्द या हाव-भाव से नहीं, उनके ठहराव से जन्म लेता था। वे अभिनय के भीतर ‘आवाज से ज्यादा मौन’ को महत्व देते थे। उनकी यह शैली उन्हें बाकियों से अलग करती थी। 90 के दशक में टेलीविजन पर साराभाई वर्सेस साराभाई ने उन्हें घर-घर का चेहरा बना दिया। इंद्रवदन साराभाई, व्यंग्यभरे पिता का वह किरदार, जो अपनी बहू से स्नेह भी रखता है और हंसी में उसे टोकता भी है। उनका संवाद ‘मोनिशा, ये क्या है?’ अब भी भारतीय हास्य का सबसे प्यारा प्रतीक है। वे अपनी काॅमेडी में कभी ऊंचा सुर नहीं लगाते थे। उनका हास्य बुद्धिमत्ता से जन्म लेता था, वह ठहरता था, सोचने पर मजबूर करता था।
25 अक्टूबर 2025 की शाम जब उनके निधन की खबर आई तो उनके साथी कलाकारों ने कहा- ‘‘डि’मेलो ने हमें जिंदगी दी।’’ साराभाई के निर्माता जे.डी. मजीठिया ने बताया कि ‘‘वो जाने से दो घंटे पहले तक बात कर रहे थे। ऐसा लग रहा था कि जीवन ने अपनी भूमिका पूरी कर ली और हंसकर पर्दा गिरा दिया।’’
सतीश शाह ने करीब 250 फिल्मों और टीवी कार्यक्रमों में काम किया। वे ऐसे कलाकार थे जो हर जगह समान सहजता से उपस्थित रहते थे।
‘मैं न हूं ना’, ‘कल हो ना हो’, ‘ओम शांति ओम’, ‘हेरा फेरी’, ‘हंगामा’, हर जगह उनकी झलक किसी स्थिर बिंदु जैसी थी, जो दृश्य को जीवंत कर देती थी। उनका हास्य कभी अपमानजनक नहीं हुआ। वे हमेशा कहा करते थे ‘हंसाना आसान है, लेकिन सम्मानपूर्वक हंसाना सबसे कठिन।’ और यह वाक्य आज उनके पूरे करियर का परिचय है।
दो चेहरे, एक आत्मा
असरानी और सतीश शाह, दो युगों के कलाकार थे। पहला 70 के दशक का सिनेमा, दूसरा 80-90 के दशक का टेलीविजन और नई फिल्मों का दौर। एक ने हास्य को रंगीन बनाया, दूसरे ने उसे बौद्धिक। पर दोनों में एक बात समान रही, वे जीवन को गम्भीरता से लेते थे, पर खुद को कभी गम्भीर नहीं बनाते थे। असरानी का हास्य ‘लोकप्रियता का विज्ञान’ था, वे जानते थे कि जनता को किस हद तक ले जाना है। शाह का हास्य
‘सामाजिक मनोविज्ञान’ था, वे जानते थे कि हंसी में विचार कैसे डालना है। दोनों का संगम भारतीय हास्य-सिनेमा की सम्पूर्णता बनाता है।

