चुनाव आयोग का असल दबदबा टीएन शेषन के जमाने में हुआ करता था। शेषन ने मुख्य चुनाव आयुक्त रहते सभी राजनीतिक दलों पर नकेल कसने का ऐसा काम किया था कि चुनावी मौसम में चुनाव आयोग के चाबुक के डर से नेता और नौकरशाह पूरी ईमानदारी से आचार संहिता का पालन करने लगे थे। शेषन के बाद लेकिन आयोग का जलवा कम होता चला गया। वर्तमान में हालात इस कदर बिगड़े हैं कि स्वयं आयोग की निष्पक्षता पर संदेह के बादल मंडरा रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों को आचार संहिता का उल्लंघन न मानने का निर्णय देने के बाद चुनाव आयोग ने अपने ट्वीटर हैंडल में विदेश मंत्रालय द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति को शेयर कर डाला। नियम अनुसार चुनाव आयोग केंद्र सरकार अथवा राज्य सरकारों की उपलब्धियों अथवा उनके प्रेस विज्ञप्ति पर टिप्पणी नहीं करता है। आयोग का पूरी तरह स्वतंत्रत और निष्पक्ष होना चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता बरतने के लिए जरूरी है। ऐसे में इस प्रेस ब्रिफिंग को ट्वीटर से आयोग ने तुरंत ही हटा तो डाला, लेकिन तब तक विपक्षी दलों ने हो-हल्ला मचाना शुरू कर दिया था।
निशाने पर चुनाव आयोग

