‘नेशनल हेराल्ड’ विवाद एक बार फिर चरम पर है। ईडी द्वारा दर्ज की गई नई एफआईआर ने पूरे मामले को नई दिशा दे दी है। जिस ‘नेशनल हेराल्ड’ को लेकर यह सारा राजनीतिक तूफान खड़ा हुआ वही अखबार कभी आजादी की लड़ाई में ब्रिटिश सेंसरशिप को चुनौती देने वाली सबसे प्रभावी आवाजों में से था जिसके हिंदी और उर्दू संस्करण ‘नवजीवन’ और ‘कौमी आवाज’, राष्ट्रीय चेतना जगाने में अहम भूमिका निभाते थे। ऐसे ऐतिहासिक संस्थान को लेकर आज जो आरोप, एफआईआर और मनी लाॅन्ड्रिंग की बहसें हो रही हैं वे सिर्फ कानूनी दलीलों की लड़ाई नहीं हैं बल्कि वर्तमान राजनीति के उस तनाव की भी झलक हैं जिसमें विपक्ष और सत्ता एक-दूसरे की वैधता और नैतिकता पर सवाल उठाते रहते हैं। नई एफआईआर ने न सिर्फ ईडी की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए बल्कि यह भी कि क्या यह मामला कानून के तराजू में टिकेगा या आने वाले दिनों में राजनीतिक हथियार बनकर और तेजी से उछलेगा
‘नेशनल हेराल्ड’ मामला भारतीय राजनीति में लगभग एक दशक से बने हुए उस ध्रुवीकरण को फिर एक बार सामने ले आया है जिसमें कानूनी प्रक्रिया, संस्थागत सक्रियता और राजनीतिक व्याख्या एक ही जमीन पर टकराती दिखती हैं। 3 अक्टूबर 2025 को ईडी द्वारा दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) में दर्ज करवाई गई नई एफआईआर ने इस बहस को पुनः जीवित कर दिया है कि क्या यह सिर्फ एक कानूनी कदम है या फिर ईडी अपनी पहले की प्रक्रिया में हुई गलती की भरपाई कर अपनी गलती सुधारने का प्रयास कर रही है। ऐसा कदम जो उस मूल कानूनी कमी को पूरा करने के लिए उठाया गया है जिसकी ओर कांग्रेस के वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने बार-बार अदालत में इशारा किया था कि ईडी ने मनी लाॅन्ड्रिंग का केस तो दायर कर दिया, पर उसके लिए आवश्यक ‘प्रेडिकेट ऑफेन्स’ यानी मूल अपराध की पंजीकृत एफआईआर पहले से मौजूद ही नहीं थी। ईडी ने मनी लाॅन्ड्रिंग के आरोपों पर जो चार्जशीट दाखिल की थी उसके छह महीने बाद यह नई एफआईआर दर्ज हुई है और यही टाइमिंग पूरा विवाद खड़ा कर रही है। लेकिन इस ताजा विवाद को समझने के लिए सिर्फ ईडी के कदम पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। इस पूरे प्रकरण को समझने के लिए इसकी ऐतिहासिक जड़ों, ‘नेशनल हेराल्ड’ की स्थापना, उसके संस्थापकों के उद्देश्य, आजादी की लड़ाई में उसकी भूमिका, विशेष रूप से ‘कौमी आवाज’ और ‘नवजीवन’ की विचारधारा, इन सब पर वापस जाना जरूरी है। क्योंकि आज जिस मामले को मनी लाॅन्ड्रिंग या राजनीतिक प्रतिशोध के रूप में देखा जा रहा है, उसकी जड़ें उस अखबार में हैं जिसे जवाहरलाल नेहरू और प्रगतिशील स्वतंत्रता सेनानियों ने ब्रिटिश दमन-नीति के सामने जनता की आवाज के रूप में 1938 में शुरू किया था।
इन प्रकाशनों ने भारत ‘छोड़ो आंदोलन’, सैनिक विद्रोह, किसान आंदोलनों, श्रमिक संघर्षों, साम्प्रदायिक तनाव काल और ब्रिटिश दमन पर लगातार लेखन किया। अनेक बार ब्रिटिश सरकार ने ‘नेशनल हेराल्ड’ पर प्रतिबंध लगाया और इसके दफ्तर सील किए, सम्पादकों को गिरफ्तार किया गया, लेकिन यह अखबार डटा रहा। आज जिस ‘एजेएल’ की सम्पत्तियों को लेकर विवाद खड़ा किया जा रहा है वे सम्पत्तियां उसी ऐतिहासिक विरासत का विस्तार थीं। ये सम्पत्तियां सरकार ने सार्वजनिक लाभ के उद्देश्य से रियायती दरों पर दी थीं ताकि स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका निभाने वाले प्रकाशनों को चलाया जा सके। लेकिन समय बदला, मीडिया बाजार बदला और 1980-90 के दशक में एजेएल भारी वित्तीय संकट में फंस गया। प्रकाशन घाटे में जाने लगे, विज्ञापन कम हुए और कम्पनी ऐसी स्थिति में पहुंची कि कर्मचारियों के वेतन तक देने में मुश्किल आने लगी। लगभग पूरे दशक में यह स्थिति बनी रही और अंततः 2008 में ‘नेशनल हेराल्ड’ का प्रकाशन रोक दिया गया। ‘कौमी आवाज’ और ‘नवजीवन’ भी लगभग निष्क्रिय हो गए।
इसी दौर में ‘एजेएल’ ने कांग्रेस से वित्तीय मदद ली, लगभग 90 करोड़ के छोटे-छोटे ऋण जो 2002 से 2010 के बीच चेक के माध्यम से दिए गए। ‘एजेएल’ का कहना है कि यह पैसा कर्मचारियों के वेतन, टैक्स, पीएफ, ग्रेच्युटी जैसे दायित्वों को चुकाने में इस्तेमाल किया गया। लेकिन इतने ऋणों के बावजूद ‘एजेएल’ की बैलेंस शीट लगातार घाटे की बनी रही। इस स्थिति में कम्पनी के पुनर्गठन का प्रस्ताव आया और 2010 में यहीं से ‘यंग इंडियन’ नाम की गैर-लाभकारी संस्था का गठन हुआ। यह कम्पनी अधिनियम की धारा 25 (अब 8) के तहत रजिस्टर्ड संस्था है, जिसका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं बल्कि सामाजिक उद्देश्य आधारित कार्य करना है। ‘यंग इंडियन’ का गठन और उसका ‘एजेएल’ के ऋणों का अधिकार अपने पास लेना इस मामले का वह मोड़ है जहां से राजनीतिक विवाद शुरू होता है। कांग्रेस ने 50 लाख रुपए देकर ‘एजेएल’ से वसूले जाने वाले करोड़ों रुपए के ऋण का अधिकार ‘यंग इंडियन’ को ट्रांसफर कर दिया। बाद में ‘एजेएल’ ने कर्ज को इक्विटी में बदलने का प्रस्ताव दिया और इससे ‘यंग इंडियन’ बहुमत हिस्सा रखने वाली इकाई बन गई। कांग्रेस और गांधी परिवार का कहना है कि यह एक सामान्य काॅरपोरेट रीस्ट्रक्चरिंग थी जिसका उद्देश्य ‘एजेएल’ को दिवालियापन से निकालना था। 2016 में तीनों प्रकाशनों को डिजिटल रूप में दोबारा लाॅन्च किया गया, यानी कि पुनर्जीवन का उद्देश्य पूरा हुआ।
विवाद की शुरुआत 2013 में तब हुई जब हिंदुत्व समर्थक नेता डाॅ. सुब्रमण्यम स्वामी ने दिल्ली की एक अदालत में निजी आपराधिक शिकायत दायर की। उन्होंने आरोप लगाया कि गांधी परिवार ने कांग्रेस पार्टी के फंड का दुरुपयोग किया और ‘एजेएल’ की सम्पत्तियों पर कब्जा किया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ‘यंग इंडियन’ को जान-बूझकर बनाया गया ताकि यह कब्जा किया जा सके। अदालत ने मामला स्वीकार किया, समन जारी हुए और राजनीतिक भूचाल पैदा हुआ। पर स्वामी अपने आरोपों के समर्थन में कई वर्ष बीत जाने के बाद भी कोई ठोस सबूत प्रस्तुत नहीं कर सके हैं। सुनवाई के दौरान कई बार गैर हाजिर रहे और अंततः स्वयं ही हाईकोर्ट से अपना मामला स्थगित करने की मांग कर बैठे। यह निजी शिकायत आज भी लम्बित है और हर बार जब ईडी कार्रवाई करती है भाजपा इसे कांग्रेस के विरुद्ध राजनीतिक हथियार की तरह पेश करती है।
बीते कुछ अर्से से मामला ठंडा पड़ता जा रहा था कि ईडी ने पीएमएलए के तहत इस केस को उठा लिया। ईडी के तत्कालीन निदेशक राजन कटोच ने इस कदम पर सवाल उठाते हुए कहा था कि किसी निजी शिकायत को ईडी जांच की नींव नहीं बनाया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट भी कई बार कह चुका है कि ईसीआईआर उन अपराधों पर आधारित होनी चाहिए जो पहले से दर्ज हों। पर राजन कटोच का तबादला हुआ, नया नेतृत्व आया और 2021 में पूरी जांच शुरू हो गई। इसके बाद सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे सहित कई कांग्रेस नेताओं से घंटों-घंटों पूछताछ हुई।
ईडी का आरोप यह है कि ‘यंग इंडियन’ असल में एक मुखौटा कम्पनी है जिसका उद्देश्य ‘एजेएल’ की सम्पत्तियों पर कब्जा करना था। ईडी ने इन सम्पत्तियों का मूल्य 2,000 करोड़ बताया है और दावा किया है कि मात्र 50 लाख रुपए देकर ‘यंग इंडियन’ ने ‘कब्जा’ कर लिया। कांग्रेस ने इसका जवाब देते हुए कहा कि ‘एजेएल’ की सम्पत्तियां उसके पास ही रहती हैं, सुप्रीम कोर्ट भी 2012 के ‘वोडाफोन’ फैसले में स्पष्ट कह चुका है कि कम्पनी के शेयरधारकों का कम्पनी की सम्पत्तियों पर कोई सीधा अधिकार नहीं होता। कांग्रेस ने यह भी कहा कि आयकर विभाग की मूल्यांकन रिपोर्ट में 2010-11 में इन सम्पत्तियों का मूल्य 392 करोड़ बताया गया था यानी ईडी का आंकड़ा कई गुना अधिक है। ईडी का एक और आरोप है कि ‘यंग इंडियन’ ने ‘डोटेक्स’ नामक कम्पनी से 1 करोड़ रुपए का अवैध कर्ज लिया। कांग्रेस कहती है कि यह आरोप तथ्यात्मक रूप से गलत है। यह कर्ज दिसम्बर 2010 को चेक द्वारा लिया गया था, 14 प्रतिशत ब्याज पर और यह कम्पनी रिजर्व बैंक (आरबीआई)
पंजीकृत गैर बैंकिंग वित्त संस्थान (एनबीएफसी) है। कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया है कि ईडी ने चेक की तारीख 24 अक्टूबर 2010 बताई है जबकि असल तारीख 24 दिसम्बर 2010 है यानी कि चार्जशीट में ‘डेट-
फैब्रिकेशन’ हुआ है। ईडी ने इस पर आज तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी है अब इस पूरे विवाद में नई एफआईआर की भूमिका महत्वपूर्ण है। ईडी का मनी लाॅन्ड्रिंग केस तभी टिक सकता है जब कोई ‘प्रेडिकेट ऑफेन्स ’ जैसे धोखाधड़ी की धाराएं, पहले से दर्ज हों। बिना प्रेडिकेट ऑफेन्स के पीएमएलए लागू नहीं होता। वरिष्ठ वकील सारिम नावेद के शब्दों में ‘पीएमएलए तभी लागू होता है जब पहले अपराध घट चुका हो और उससे उत्पन्न धन को लाॅन्डर किया गया हो। बिना एफआईआर के कोई जांच शुरू ही नहीं की जा सकती।’ चार्जशीट के छह महीने बाद एफआईआर दर्ज करने को वे ‘कानूनी रूप से संदिग्ध रीट्रोफिटिंग’ बताते हैं जो अदालत में रद्द की जा सकती है। यही बात अभिषेक मनु सिंघवी ने भी कही कि नई एफआईआर उनके तर्कों की ‘अनचाही श्रद्धांजलि’ है, यह मानने जैसा कि पहले ‘प्रेडिकेट ऑफेन्स’ था ही नहीं।
इस प्रकार ‘नेशनल हेराल्ड’ का मामला केवल कानूनी परीक्षण नहीं बल्कि भारतीय राजनीति के संस्थागत और वैचारिक संघर्ष का भी प्रतिबिंब है। एक तरफ कांग्रेस है जो इसे राजनीतिक प्रतिशोध कहती है, दूसरी ओर भाजपा और ईडी इसे ‘गम्भीर वित्तीय अपराध’ बताते हैं पर इसकी जड़ें उस अखबार में हैं जिसने ब्रिटिश राज के विरुद्ध भारत की आवाज को मजबूत किया था। यही ऐतिहासिक विरासत आज कानूनी बहस के केंद्र में है और अदालत यह तय करेगी कि इस विरासत पर लगे आरोपों में कोई दम है या नहीं। फिलहाल नई एफआईआर ने इस बहस को और उलझाया है और यह मामला आने वाले महीनों में भारतीय राजनीति और न्यायपालिका दोनों में एक बड़ा मुद्दा बना रहने वाला है।

