अरावली पहाड़ियां दिल्ली-एनसीआर की जीवनरेखा हैं। यही पर्वतमाला राजस्थान के थार रेगिस्तान से उठने वाली धूल-आंधियों को रोकती हैं, यही जंगल दिल्ली को ऑक्सीजन देता है और यही भूजल को रिचार्ज करता है। सुप्रीम कोर्ट की हालिया व्याख्याओं, नीतिगत ढील और खनन की बढ़ती भूख के बीच ‘सेव अरावली’ आंदोलन फिर तेज हुआ है। यह लड़ाई अब केवल आरावली को बचाने की नहीं बल्कि प्रदूषण, पानी और तापमान से जूझ रही दिल्ली और उत्तर भारत के भविष्य की है
भारत में विकास और पर्यावरण के बीच टकराव का सबसे पुराना और सबसे जटिल मैदान अगर कोई है तो वह अरावली है। हजारों वर्षों से खड़ी यह पर्वतमाला केवल चट्टानों का समूह नहीं बल्कि उत्तर भारत के पर्यावरणीय संतुलन की धुरी है। अरावली पर्वतमाला राजस्थान के थार रेगिस्तान और दिल्ली-एनसीआर के बीच एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह खड़ी है। लेकिन विडम्बना यह है कि जिस अरावली ने दिल्ली को धूल, गर्मी और जल संकट से बचाया, आज वही अपने अस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़ रही है।
बीते कुछ वर्षों में अरावली को लेकर विवाद कभी थमता नहीं। कभी अवैध खनन, कभी भूमि उपयोग में बदलाव, कभी ‘विकास’ के नाम पर पहाड़ियों को समतल करने की कोशिश, हर बार नई शक्ल में वही खतरा सामने आता है। हालिया महीनों में सुप्रीम कोर्ट की व्याख्याओं के बाद खनन गतिविधियों में आई तेजी ने पर्यावरणविदों और नागरिक समूहों की चिंताओं को फिर जगा दिया है। आरोप है कि पहाड़ियों की ऊंचाई और भू-चरित्र को रिकाॅर्ड में बदलकर उन्हें अरावली की परिभाषा से बाहर दिखाया जा रहा है ताकि खनन और निर्माण की राह आसान हो सके।
अरावली का महत्व समझने के लिए सबसे पहले उसकी उस भूमिका को देखना होगा, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, रेगिस्तान की आंधियों के सामने खड़ी आखिरी दीवार। राजस्थान के पश्चिमी हिस्से में स्थित थार रेगिस्तान से गर्मियों में जब तेज हवाएं उठती हैं तो वे अपने साथ महीन रेत, धूल और प्रदूषक कण लेकर चलती हैं। अरावली की पहाड़ियां इन हवाओं की गति को तोड़ देती हैं। यहां फैला जंगल धूल को पत्तियों और मिट्टी में समेट लेता है। यही वजह है कि अरावली के कमजोर होते हिस्सों के आस-पास डस्ट स्टॉर्म की घटनाएं अधिक देखने को मिल रही हैं। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अगर यह प्राकृतिक अवरोध और कमजोर हुआ तो दिल्ली में धूल भरी आंधियां अपवाद नहीं, बल्कि रोजमर्रा की सच्चाई बन जाएंगी।
दिल्ली पहले ही वायु प्रदूषण की मार झेल रही है। सर्दियों में पराली, वाहनों और औद्योगिक धुएं से दम घुटता है, तो गर्मियों में धूल और गर्म हवाएं हालात बिगाड़ देती हैं। अरावली इस पूरे साल चलने वाले संकट के बीच एक स्थायी सुरक्षा परत की तरह काम करती है। पर्यावरण वैज्ञानिकों के मुताबिक अरावली के बिना दिल्ली का एक्यूआई लम्बे समय तक ‘सीवियर’ श्रेणी में फंसा रह सकता है। इसका असर केवल सांस की बीमारियों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि हृदय रोग, स्ट्रोक और समय से पहले होने वाली मौतों के आंकड़े भी बढ़ेंगे।
अरावली का जंगल दिल्ली के लिए केवल धूल रोकने वाली दीवार नहीं, बल्कि एक विशाल प्राकृतिक एयर फिल्टर है। गुरुग्राम, फरीदाबाद, नूंह, अलवर और दिल्ली के रिज क्षेत्र तक फैला यह हरित विस्तार लाखों टन कार्बन डाइऑक्साइड और जहरीले कणों को हर साल सोखता है। यही कारण है कि पर्यावरणविद इसे दिल्ली की ‘ग्रीन लंग्स’ कहते हैं। खनन और रियल एस्टेट परियोजनाओं के लिए जब इन जंगलों को साफ किया जाता है तो इसका असर तुरंत महसूस होता है, हवा भारी हो जाती है, तापमान बढ़ता है और सांस लेना मुश्किल हो जाता है। विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि करोड़ों रुपए खर्च कर लगाए गए एयर प्यूरिफायर भी उस काम को अंश भर नहीं कर सकते, जो यह जंगल चुपचाप करता है।
जमीन के नीचे भी अरावली दिल्ली को बचाती है। इसकी चट्टानी संरचना और वनस्पति बारिश के पानी को धीरे-धीरे जमीन में उतारती है, जिससे भूजल रिचार्ज होता है। यही पानी आगे चलकर दिल्ली और आस-पास के क्षेत्रों के एक्विफर को जीवित रखता है। खनन से जब पहाड़ों की परतें टूटती हैं तो बारिश का पानी बहकर निकल जाता है। नतीजा यह होता है कि एक ओर अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ता है तो दूसरी तरफ भूजल स्तर तेजी से गिरता है। पहले से ही ‘डार्क जोन’ की ओर बढ़ रही दिल्ली के लिए यह दोहरी मार है।
अरावली का असर तापमान पर भी साफ दिखाई देता है। पहाड़ियां और जंगल मिलकर गर्म हवाओं की तीव्रता को कम करते हैं और वाष्पोत्सर्जन के जरिए वातावरण को ठंडा रखते हैं। कई अध्ययनों के अनुसार अरावली दिल्ली-एनसीआर के औसत तापमान को 2 से 4 डिग्री सेल्सियस तक संतुलित रखने में मदद करती है। अगर यह संतुलन टूटा तो हीटवेव अधिक लम्बी और जानलेवा होंगी। इसका सबसे बड़ा असर उन लोगों पर पड़ेगा जिनके पास न तो ठंडे घर हैं, न इलाज की आसान पहुंच यानी शहर का गरीब और मेहनतकश तबका।
इन तमाम तथ्यों के बावजूद खनन की भूख लगातार बढ़ रही है। सीमेंट, स्टील, इंफ्रास्ट्रक्चर और रियल एस्टेट सेक्टर की मांग ने पहाड़ों को ‘राॅ मटीरियल’ में बदल दिया है। विकास के नाम पर अरावली को ‘खाली जमीन’ की तरह देखा जा रहा है। यहीं अरावली संकट का वह पक्ष सामने आता है जो सीधे सट्टा बाजार से जुड़ा है। यहां सट्टा शेयर बाजार का नहीं बल्कि जमीन और रियल एस्टेट का है। दिल्ली-एनसीआर से सटी अरावली पहाड़ियां लम्बे समय से सट्टेबाजों और रियल एस्टेट हितों के निशाने पर हैं क्योंकि पहाड़ और जंगल के रूप में दर्ज यह जमीन कागजों में प्रतिबंधित होते हुए भी भविष्य के मुनाफे का सबसे बड़ा स्रोत मानी जाती है। इस सट्टे का पहला चरण पहाड़ को कागजों में पहाड़ न रहने देना होता है, कहीं उसकी ऊंचाई कम दिखाई जाती है, कहीं जंगल को बंजर या गैर-वन श्रेणी में डाला जाता है। इसके बाद खनन के जरिए पहाड़ को तोड़ा जाता है, जमीन को समतल किया जाता है और वही इलाका कुछ समय बाद फार्म हाउस, काॅलोनियों, रिसाॅर्ट और लक्जरी हाउसिंग के लिए ‘डेवलपेबल लैंड’ घोषित कर दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में मुनाफा कुछ लोगों और कम्पनियों को होता है जबकि कीमत दिल्ली और एनसीआर की हवा, पानी और तापमान को चुकानी पड़ती है। यही वजह है कि अरावली में खनन केवल खनन नहीं बल्कि रियल एस्टेट सट्टे की पहली सीढ़ी बन चुका है।
यह संकट केवल अरावली तक सीमित नहीं। यही माॅडल देश के अन्य पहाड़ी इलाकों में भी लागू किया गया है। उड़ीसा की नियमगिरि पहाड़ियां इसका बड़ा उदाहरण हैं जहां बाॅक्साइट की भूख आदिवासी आस्था और अधिकारों से टकराई। डोंगरिया कोंध समुदाय ने वर्षों तक संघर्ष किया, ग्राम सभाओं ने खनन के खिलाफ फैसले दिए और देश ने देखा कि कैसे स्थानीय समुदाय संगठित होकर बड़े काॅरपोरेट हितों के सामने खड़े हुए। नियमगिरि ने यह दिखाया कि पहाड़ केवल खनिज नहीं बल्कि संस्कृति और जीवन का आधार होते हैं।
दक्षिण भारत में पश्चिमी घाट की स्थिति और भी चिंताजनक है। यह क्षेत्र दुनिया के प्रमुख जैव-विविधता हाॅटस्पाॅट्स में गिना जाता है। लेकिन अवैध और अनियंत्रित खनन ने यहां भूस्खलन, बाढ़ और गांवों के उजड़ने की घटनाएं बढ़ा दी हैं। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि पश्चिमी घाट से छेड़छाड़ का असर पूरे प्रायद्वीपीय भारत के मानसून और जल चक्र पर पड़ सकता है। इसके बावजूद खनन माफिया और ढीली प्रशासनिक व्यवस्था के कारण नियम कागजों तक सीमित रह जाते हैं। इन उदाहरणों से सबक लेते हुए अरावली बचाओ आंदोलन अब केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं बल्कि नागरिक अधिकारों का सवाल बनता जा रहा है। दिल्ली, गुरुग्राम, फरीदाबाद और राजस्थान के कई इलाकों में डॉक्टर, जल विशेषज्ञ, शहरी नागरिक और युवा छात्र एकजुट होकर सवाल उठा रहे हैं कि अगर अरावली नहीं रही तो दिल्ली को धूल, गर्मी और पानी की कमी से बचाने का विकल्प क्या है? आंदोलनकारियों का कहना है कि यह लड़ाई विकास के खिलाफ नहीं बल्कि उस विकास माॅडल के खिलाफ है जो प्रकृति को खत्म कर तात्कालिक लाभ चुनता है।
निष्कर्ष साफ है। अरावली केवल पहाड़ नहीं, बल्कि दिल्ली-एनसीआर की सुरक्षा प्रणाली है। खनन की भूख और सट्टा आधारित विकास अगर इसी तरह हावी रहा तो नुकसान पहाड़ियों तक सीमित नहीं रहेगा। हवा जहरीली होगी, पानी और महंगा होगा और गर्मी जानलेवा। अरावली की यह आखिरी लड़ाई दरअसल शहरों के भविष्य की लड़ाई है और यह तय करेगी कि आने वाले वर्षों में दिल्ली सांस ले पाएगी या नहीं।
अरावली का महत्व समझने के लिए सबसे पहले उसकी उस भूमिका को देखना होगा, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, रेगिस्तान की आंधियों के सामने खड़ी आखिरी दीवार। राजस्थान के पश्चिमी हिस्से में स्थित थार रेगिस्तान से गर्मियों में जब तेज हवाएं उठती हैं तो वे अपने साथ महीन रेत, धूल और प्रदूषक कण लेकर चलती हैं। अरावली की पहाड़ियां इन हवाओं की गति को तोड़ देती हैं। यहां फैला जंगल धूल को पत्तियों और मिट्टी में समेट लेता है। यही वजह है कि अरावली के कमजोर होते हिस्सों के आस-पास डस्ट स्टॉर्म की घटनाएं अधिक देखने को मिल रही हैं। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अगर यह प्राकृतिक अवरोध और कमजोर हुआ तो दिल्ली में धूल भरी आंधियां अपवाद नहीं, बल्कि रोजमर्रा की सच्चाई बन जाएंगी।
दिल्ली पहले ही वायु प्रदूषण की मार झेल रही है। सर्दियों में पराली, वाहनों और औद्योगिक धुएं से दम घुटता है, तो गर्मियों में धूल और गर्म हवाएं हालात बिगाड़ देती हैं। अरावली इस पूरे साल चलने वाले संकट के बीच एक स्थायी सुरक्षा परत की तरह काम करती है। पर्यावरण वैज्ञानिकों के मुताबिक अरावली के बिना दिल्ली का एक्यूआई लम्बे समय तक ‘सीवियर’ श्रेणी में फंसा रह सकता है। इसका असर केवल सांस की बीमारियों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि हृदय रोग, स्ट्रोक और समय से पहले होने वाली मौतों के आंकड़े भी बढ़ेंगे।
अरावली का जंगल दिल्ली के लिए केवल धूल रोकने वाली दीवार नहीं, बल्कि एक विशाल प्राकृतिक एयर फिल्टर है। गुरुग्राम, फरीदाबाद, नूंह, अलवर और दिल्ली के रिज क्षेत्र तक फैला यह हरित विस्तार लाखों टन कार्बन डाइऑक्साइड और जहरीले कणों को हर साल सोखता है। यही कारण है कि पर्यावरणविद इसे दिल्ली की ‘ग्रीन लंग्स’ कहते हैं। खनन और रियल एस्टेट परियोजनाओं के लिए जब इन जंगलों को साफ किया जाता है तो इसका असर तुरंत महसूस होता है, हवा भारी हो जाती है, तापमान बढ़ता है और सांस लेना मुश्किल हो जाता है। विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि करोड़ों रुपए खर्च कर लगाए गए एयर प्यूरिफायर भी उस काम को अंश भर नहीं कर सकते, जो यह जंगल चुपचाप करता है।
जमीन के नीचे भी अरावली दिल्ली को बचाती है। इसकी चट्टानी संरचना और वनस्पति बारिश के पानी को धीरे-धीरे जमीन में उतारती है, जिससे भूजल रिचार्ज होता है। यही पानी आगे चलकर दिल्ली और आस-पास के क्षेत्रों के एक्विफर को जीवित रखता है। खनन से जब पहाड़ों की परतें टूटती हैं तो बारिश का पानी बहकर निकल जाता है। नतीजा यह होता है कि एक ओर अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ता है तो दूसरी तरफ भूजल स्तर तेजी से गिरता है। पहले से ही ‘डार्क जोन’ की ओर बढ़ रही दिल्ली के लिए यह दोहरी मार है।
अरावली का असर तापमान पर भी साफ दिखाई देता है। पहाड़ियां और जंगल मिलकर गर्म हवाओं की तीव्रता को कम करते हैं और वाष्पोत्सर्जन के जरिए वातावरण को ठंडा रखते हैं। कई अध्ययनों के अनुसार अरावली दिल्ली-एनसीआर के औसत तापमान को 2 से 4 डिग्री सेल्सियस तक संतुलित रखने में मदद करती है। अगर यह संतुलन टूटा तो हीटवेव अधिक लम्बी और जानलेवा होंगी। इसका सबसे बड़ा असर उन लोगों पर पड़ेगा जिनके पास न तो ठंडे घर हैं, न इलाज की आसान पहुंच यानी शहर का गरीब और मेहनतकश तबका।
इन तमाम तथ्यों के बावजूद खनन की भूख लगातार बढ़ रही है। सीमेंट, स्टील, इंफ्रास्ट्रक्चर और रियल एस्टेट सेक्टर की मांग ने पहाड़ों को ‘राॅ मटीरियल’ में बदल दिया है। विकास के नाम पर अरावली को ‘खाली जमीन’ की तरह देखा जा रहा है। यहीं अरावली संकट का वह पक्ष सामने आता है जो सीधे सट्टा बाजार से जुड़ा है। यहां सट्टा शेयर बाजार का नहीं बल्कि जमीन और रियल एस्टेट का है। दिल्ली-एनसीआर से सटी अरावली पहाड़ियां लम्बे समय से सट्टेबाजों और रियल एस्टेट हितों के निशाने पर हैं क्योंकि पहाड़ और जंगल के रूप में दर्ज यह जमीन कागजों में प्रतिबंधित होते हुए भी भविष्य के मुनाफे का सबसे बड़ा स्रोत मानी जाती है। इस सट्टे का पहला चरण पहाड़ को कागजों में पहाड़ न रहने देना होता है, कहीं उसकी ऊंचाई कम दिखाई जाती है, कहीं जंगल को बंजर या गैर-वन श्रेणी में डाला जाता है। इसके बाद खनन के जरिए पहाड़ को तोड़ा जाता है, जमीन को समतल किया जाता है और वही इलाका कुछ समय बाद फार्म हाउस, काॅलोनियों, रिसाॅर्ट और लक्जरी हाउसिंग के लिए ‘डेवलपेबल लैंड’ घोषित कर दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में मुनाफा कुछ लोगों और कम्पनियों को होता है जबकि कीमत दिल्ली और एनसीआर की हवा, पानी और तापमान को चुकानी पड़ती है। यही वजह है कि अरावली में खनन केवल खनन नहीं बल्कि रियल एस्टेट सट्टे की पहली सीढ़ी बन चुका है।
यह संकट केवल अरावली तक सीमित नहीं। यही माॅडल देश के अन्य पहाड़ी इलाकों में भी लागू किया गया है। उड़ीसा की नियमगिरि पहाड़ियां इसका बड़ा उदाहरण हैं जहां बाॅक्साइट की भूख आदिवासी आस्था और अधिकारों से टकराई। डोंगरिया कोंध समुदाय ने वर्षों तक संघर्ष किया, ग्राम सभाओं ने खनन के खिलाफ फैसले दिए और देश ने देखा कि कैसे स्थानीय समुदाय संगठित होकर बड़े काॅरपोरेट हितों के सामने खड़े हुए। नियमगिरि ने यह दिखाया कि पहाड़ केवल खनिज नहीं बल्कि संस्कृति और जीवन का आधार होते हैं।
दक्षिण भारत में पश्चिमी घाट की स्थिति और भी चिंताजनक है। यह क्षेत्र दुनिया के प्रमुख जैव-विविधता हाॅटस्पाॅट्स में गिना जाता है। लेकिन अवैध और अनियंत्रित खनन ने यहां भूस्खलन, बाढ़ और गांवों के उजड़ने की घटनाएं बढ़ा दी हैं। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि पश्चिमी घाट से छेड़छाड़ का असर पूरे प्रायद्वीपीय भारत के मानसून और जल चक्र पर पड़ सकता है। इसके बावजूद खनन माफिया और ढीली प्रशासनिक व्यवस्था के कारण नियम कागजों तक सीमित रह जाते हैं। इन उदाहरणों से सबक लेते हुए अरावली बचाओ आंदोलन अब केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं बल्कि नागरिक अधिकारों का सवाल बनता जा रहा है। दिल्ली, गुरुग्राम, फरीदाबाद और राजस्थान के कई इलाकों में डॉक्टर, जल विशेषज्ञ, शहरी नागरिक और युवा छात्र एकजुट होकर सवाल उठा रहे हैं कि अगर अरावली नहीं रही तो दिल्ली को धूल, गर्मी और पानी की कमी से बचाने का विकल्प क्या है? आंदोलनकारियों का कहना है कि यह लड़ाई विकास के खिलाफ नहीं बल्कि उस विकास माॅडल के खिलाफ है जो प्रकृति को खत्म कर तात्कालिक लाभ चुनता है।
निष्कर्ष साफ है। अरावली केवल पहाड़ नहीं, बल्कि दिल्ली-एनसीआर की सुरक्षा प्रणाली है। खनन की भूख और सट्टा आधारित विकास अगर इसी तरह हावी रहा तो नुकसान पहाड़ियों तक सीमित नहीं रहेगा। हवा जहरीली होगी, पानी और महंगा होगा और गर्मी जानलेवा। अरावली की यह आखिरी लड़ाई दरअसल शहरों के भविष्य की लड़ाई है और यह तय करेगी कि आने वाले वर्षों में दिल्ली सांस ले पाएगी या नहीं।

