उत्तर प्रदेश में इन दिनों एक अजीब सी बेचैनी हवा में है। यह बेचैनी न तो सिर्फ बेरोजगारी की है, न ही सिर्फ महंगाई की। यह बेचैनी उस टूटते भरोसे की भी है जो ‘धर्म’ के सहारे खड़ा किया गया था। भारतीय जनता पार्टी ने पिछले एक दशक में उत्तर प्रदेश को जिस सबसे बड़ी राजनीतिक प्रयोगशाला में बदला उसका केंद्रीय सूत्र ‘हिंदुत्व’ रहा, आस्था, परम्परा, मंदिर, तीर्थ और राष्ट्रवाद। सत्ता के मंच से बार-बार कहा गया कि अब उत्तर प्रदेश अपनी सांस्कृतिक पहचान की ओर लौट रहा है, मंदिर-मठों को सम्मान मिल रहा है, तीर्थों का विकास हो रहा है, सनातन की रक्षा हो रही है मगर आज उसी उत्तर प्रदेश में धर्म का प्रश्न इतना तीखा हो गया है कि राजनीति का संतुलन ही बिगड़ता दिख रहा है। धर्म अब सिर्फ वोट की भाषा नहीं रह गया बल्कि वह प्रशासन, अहं, प्रोटोकाॅल और टकराव की भाषा बन गया है।

प्रयागराज में माघ मेला के दौरान ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का शाही स्नान, पालकी-प्रोटोकॉल का विवाद इसी नई राजनीति का प्रतीक बन चुका है। प्रशासन ने उन्हें पालकी में स्नान के लिए अनुमति लेने को कहा, रोका और फिर नोटिस तक चिपका दिया कि वे खुद को शंकराचार्य क्यों कहते हैं? किस अधिकार से कहते हैं? यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देकर कहा गया कि इस पद का ‘आधिकारिक पट्टाभिषेक’ नहीं हुआ है इसलिए इसका इस्तेमाल न किया जाए। जवाब में स्वामी की भाषा और तेज है। वे इसे परम्परा का अपमान बता धरने पर जा बैठे हैं। उनका तर्क है कि शंकराचार्य का निर्णय सरकार नहीं करती, वह गुरु-शिष्य परम्परा और पीठों के आंतरिक नियम तय करते हैं। इस विवाद ने एक नया सवाल पैदा कर दिया कि क्या अब उत्तर प्रदेश में शंकराचार्य से भी ‘कागज’ मांगा जाएगा? अब बात केवल एक संत के स्नान की नहीं है। बात उस राजनीतिक संस्कृति की है जिसे बीजेपी ने खुद गढ़ा और तेज किया। बीजेपी ने धर्म को ‘राज्य की पहचान’ की तरह पेश किया। उसने सत्ता की वैधता का एक बड़ा हिस्सा मंदिरों, तीर्थों, परम्पराओं के साथ जोड़कर बनाया मगर जब धर्म सत्ता की राजनीति का औजार बनता है तो सत्ता कभी न कभी धर्म के भीतर के असली संरक्षकों, संतों, अखाड़ों, मठों से टकराती जरूर है। यह टकराव आज प्रयागराज में दिख रहा है और यही टकराव बनारस में मणिकर्णिका घाट पुनर्निर्माण के विवाद में भी दिखता है जहां परम्परा और विकास के बीच की लाइन धुंधली होती जा रही है।

बनारस में विरोध का स्वर यह नहीं है कि घाट सुधरना नहीं चाहिए। विरोध का स्वर यह है कि बनारस को ‘प्रोजेक्ट’ की तरह देखा जा रहा है और बनारस की आत्मा धीरे-धीरे ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर’ की भाषा में अनुवादित की जा रही है। घाटों का पुनर्निर्माण कॉरिडोर का विस्तार, स्मारकों का ‘सौंदर्यीकरण’, ये सब कागज पर शानदार लगते हैं मगर जमीन पर सवाल पैदा करते हैं कि क्या पुरानी मूर्तियां, पुराने प्रतीक, पुराने मंदिर, इनकी जगह की सुरक्षा सुनिश्चित है? क्या परम्परा की गरिमा का ध्यान है? क्या स्थानीय समुदाय की सहमति है? क्या निर्णय संवाद से हो रहे हैं या आदेश से? इन दोनों घटनाओं को जोड़कर देखें तो एक बड़ा सत्य सामने आता है और वह यह कि उत्तर प्रदेश में राजनीति ने धर्म को इतना उभार दिया है कि अब धर्म ही राजनीति को निगलने लगा है। बीजेपी ने धर्म को सत्ता का रास्ता बनाया, अब वही धर्म सत्ता का संकट बन रहा है। यह संकट इसलिए भी बड़ा है क्योंकि यहां बीजेपी के सामने विपक्ष नहीं, ‘संत समाज’ और शिव भक्त हैं और इनसे लड़ना राजनीतिक रूप से सबसे कठिन है। सरकार मंदिर तो बना सकती है मगर धर्माचार्यों को नियंत्रित नहीं कर सकती। धर्म सत्ता का विषय नहीं, वह परम्परा और मान्यता का विषय है।

यहां एक सवाल और भी है कि इस पूरे विवाद में ‘प्रोटोकाॅल’ का यह आग्रह आखिर क्यों? क्या संतों को इतना अहंकार शोभा देता है? क्या धर्माचार्यों को प्रशासनिक विशेषाधिकार चाहिए या धार्मिक सम्मान? क्या आस्था की परम्परा को पालकी से जोड़ देना जरूरी है? क्या कोई संत पैदल चलकर संगम में स्नान नहीं कर सकता? यह सवाल इसलिए जरूरी है क्योंकि सनातन परम्परा का सौंदर्य विनम्रता में है। तपस्या में है। त्याग में है। जो संत पद पर बैठा है, उसके लिए सम्मान उसकी आत्मा और साधना का होना चाहिए, न कि पालकी और प्रोटोकॉल का। यदि कोई शंकराचार्य ‘शाही स्नान’ को अपनी प्रतिष्ठा का केंद्र बना ले तो आम श्रद्धालु के मन में भी एक प्रश्न उठता है कि क्या धर्म सत्ता के करीब पहुंचकर स्वयं सत्ता की भाषा बोलने लगा है? क्या अध्यात्म, प्रशासनिक प्रोटोकॉल का बंदी बनता जा रहा है? मगर उत्तर प्रदेश का दुर्भाग्य यह है कि यहां धर्म को धीरे-धीरे साधना से हटाकर ‘सत्ता के प्रदर्शन’ में बदल दिया गया है। सत्ता मंदिर के मंच पर खड़ी है, और संत सत्ता के प्रोटोकाॅल में खड़े हैं। परिणाम यह है कि धर्म, जिसका उद्देश्य समाज को जोड़ना था, वह समाज को बांटने और भड़काने का साधन बनता जा रहा है। प्रयागराज में एक संत का विवाद बनारस के घाटों पर शोर बन जाता है। बनारस की मूर्ति का विवाद सोशल मीडिया पर प्रयागराज में ‘संतों का अपमान’ बन जाता है। आस्था धीरे-धीरे ‘नैरेटिव युद्ध’ का मैदान बन जाती है।

सबसे दिलचस्प और सबसे चिंताजनक हिस्सा विपक्ष की भूमिका है। विपक्ष इस विवाद में सरकार को घेर रहा है। यह उसका अधिकार भी है और राजनीति भी। पर विपक्ष की भाषा पर ध्यान दें। विपक्ष ‘धर्मनिरपेक्ष संविधान’ और ‘राज्य-धर्म अलग’ की भाषा बहुत कम बोलता दिख रहा है। वह सीधे ‘संत शिरोमणि’, ‘सनातन’, ‘गंगा स्नान’ और ‘शंकराचार्य का अपमान’ जैसे शब्दों में उतर आया है। यानी विपक्ष भी उसी मैदान में उतर रहा है जिसे बीजेपी ने तैयार किया। यह सॉफ्ट हिंदुत्व का वही दबाव है जिसमें विपक्ष को बीजेपी ने धकेल दिया है। बीजेपी ने वर्षों तक विपक्ष को ‘हिंदू विरोधी’ साबित करने की रणनीति चलाई। उसने यह नैरेटिव गढ़ा कि जो उसके साथ नहीं, वह राम विरोधी है। जो सवाल पूछे, वह सनातन विरोधी है। जो मंदिर पर बहस करे, वह हिंदू भावनाओं का अपमान करता है। इस नैरेटिव ने विपक्ष को मजबूर किया कि वह अब धर्मनिरपेक्षता की शुद्ध भाषा बोलकर जनता से कट न जाए। इसलिए विपक्ष अब सरकार को घेरने के लिए भी ‘धर्म’ की ही लाठी उठा रहा है। यह राजनीति की विडम्बना है। धर्म के नाम पर सत्ता में आई पार्टी ने विपक्ष को भी धर्म की भाषा बोलने पर मजबूर कर दिया। जब दोनों तरफ धर्म की भाषा होगी तो विकास की भाषा कौन बोलेगा?

आज उत्तर प्रदेश की राजनीति में विकास कहीं पीछे छूट गया है। बेरोजगार युवा की पीड़ा, परीक्षा व्यवस्था की अव्यवस्था, महंगाई का दबाव, कृषि संकट, स्वास्थ्य और शिक्षा की बदहाली, ये मुद्दे हैं मगर इनकी जगह राजनीतिक बहस में धर्म के विवाद ज्यादा प्रमुख हो गए हैं। यह चुनावी रणनीति भी है और सामाजिक मनोविज्ञान भी। धर्म भावनात्मक मुद्दा है, वह तुरंत ध्यान खींचता है। रोजगार का मुद्दा मेहनत मांगता है, आंकड़े मांगता है, जवाबदेही मांगता है और जब सत्ता को जवाबदेही से बचना हो तो भावनात्मक मुद्दे हमेशा सुविधाजनक होते हैं। स्मरण रहे एक सधी हुई राजनीति में धर्म का सम्मान होता है लेकिन धर्म का बाजारीकरण नहीं होता। दुर्भाग्य से उत्तर प्रदेश में धर्म धीरे- धीरे ‘राजनीतिक पूंजी’ बनता गया। मंदिर निर्माण, कॉरिडोर, तीर्थ विकास, ये सब धार्मिक समाज की खुशी का कारण भी बने। पर जब धार्मिक प्रोजेक्ट्स के आसपास जमीन, ठेका, कमीशन और भ्रष्टाचार के आरोप उठते हैं जैसे अयोध्या में राम मंदिर ट्रस्ट के नाम पर जमीन खरीद के समय घोटाले की बातें तो वही खुशी संदेह में बदल जाती है। आस्था का विश्वास सबसे नाजुक होता है। वह एक बार टूटे तो फिर पोस्टर और भाषण से नहीं जुड़ता, यहां बीजेपी को एक बड़ी बात समझनी होगी कि धर्म को जितना ज्यादा सत्ता का हथियार बनाया जाएगा, उतना ही धर्म सत्ता से सवाल भी पूछेगा। आज संत समाज सवाल पूछ रहा है। कल आम श्रद्धालु पूछेगा। परसों वही सवाल विपक्ष का हथियार बन जाएगा और धीरे-धीरे सत्ता ‘धर्म की रक्षा’ करने वाली नहीं, ‘धर्म से घिरी’ हुई सत्ता बन जाएगी।

प्रयागराज में शंकराचार्य के विवाद ने यह दिखा दिया कि राज्य प्रशासन धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता में हस्तक्षेप के आरोप झेलने लगा है। बनारस में मणिकर्णिका घाट के पुनर्निर्माण ने यह दिखा दिया कि विकास के नाम पर परम्परा की सीमाएं लांघने का आरोप लग सकता है और सोशल मीडिया के इस दौर में हर आरोप आग की तरह फैलता है। कोई सच हो या झूठ, पहले वह भीड़ में जाता है, फिर तथ्य उसके पीछे भागते हैं। पर इस पूरे विवाद का सबसे कठिन प्रश्न यही है, क्या धर्म अब ‘पावर गेम’ बन गया है? और क्या संत, जो समाज को संयम सिखाते हैं, वे खुद सत्ता की भाषा में प्रोटोकॉल मांग कर अपने नैतिक कद को छोटा नहीं कर रहे? यह प्रश्न संवेदनशील है पर जरूरी है क्योंकि संतों की ताकत सत्ता के करीब होने में नहीं है, संतों की ताकत सत्ता से ऊपर होने में है। वे सत्ता को दिशा दिखाते हैं, सत्ता से सुविधा नहीं लेते। अगर वे भी प्रोटोकॉल के लिए संघर्ष करेंगे तो उनकी आलोचना भी उतनी ही तीखी होगी जितनी सत्ता की।

यदि प्रशासन ने गलत व्यवहार किया, यदि किसी संत का अपमान हुआ, यदि परम्परा को जान-बूझकर चोट पहुंचाई गई तो यह निंदनीय है। पर साथ ही यह भी सच है कि संगम का जल किसी पालकी का मोहताज नहीं है। गंगा स्नान पैरों से भी होता है, श्रद्धा से भी होता है। यदि कोई संत अपनी परम्परा के नाम पर ‘विशेष दर्जा’ मांगता है तो वह भी परम्परा के भीतर ही एक बहस को जन्म देता है क्योंकि सनातन में सबसे बड़ा प्रोटोकाॅल साधना है और साधना के सामने कुर्सी, पालकी, लाठी, नोटिस सब तुच्छ हैं वहीं प्रशासन को भी यह समझना चाहिए कि संत समाज के साथ बातचीत आदेश की भाषा में नहीं होती। नोटिस चिपकाना शासन की तकनीकी शैली हो सकती है, पर धार्मिक समाज उसे अपमान की तरह लेता है। राज्य को कानून लागू करना है, लेकिन कानून का लागू होना भी गरिमा के साथ होना चाहिए। नहीं तो कानून ‘अहंकार’ दिखाई देने लगता है और फिर वह विवाद राजनीतिक बन जाता है।

विपक्ष का संकट यह है कि वह सच्ची धर्मनिरपेक्षता की बात करेगा तो बीजेपी उसे ‘हिंदू विरोधी’ बना देगी। वह धर्म की बात करेगा तो खुद अपनी पुरानी राजनीति से दूर चला जाएगा। इसलिए विपक्ष अब एक नई चाल चल रहा है, वह बीजेपी को उसके ही मैदान में घेर रहा है। ‘बीजेपी न काम की, न राम की।’ यह लाइन सुनने में चटपटी है, पर यह राजनीति की त्रासदी है क्योंकि इसका मतलब यह है कि विकास के मुद्दे पर सरकार को घेरने के बजाय विपक्ष भी धर्म के मुद्दे पर सरकार को घेर रहा है। यानी जनता के पास फिर वही बहस कि कौन बड़ा हिंदू? कौन बड़ा रामभक्त? कौन बड़ा सनातनी? और वास्तविक मुद्दे फिर भी पीछे।

उत्तर प्रदेश का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या राजनीति फिर से विकास की ओर लौटेगी या धर्म के प्रोटोकॉल में ही उलझी रहेगी। मंदिर निर्माण हो, कॉरिडोर बने, घाट सुधरें, इसमें समस्या नहीं। समस्या तब है जब हर सवाल को ‘धर्म विरोध’ बताकर कुचल दिया जाए और हर विरोध को ‘सत्ता विरोध’ बताकर पुलिसिया भाषा में बदल दिया जाए। धर्म और लोकतंत्र दोनों संवाद मांगते हैं। धर्म में संवाद शास्त्र से होता है, लोकतंत्र में संवाद जनता से। यदि सरकार संवाद छोड़ दे और संत अहंकार पकड़ लें तो नुकसान सिर्फ राजनीति का नहीं, समाज का होता है।

यही कारण है कि उत्तर प्रदेश में धर्म को वोट की खुराक नहीं, समाज की ऊर्जा के रूप में देखा जाना चाहिए। संतों को अपने भीतर झांकना चाहिए कि वे प्रोटोकॉल की मांग करके किस दिशा में जा रहे हैं। सरकार को अपने भीतर झांकना चाहिए कि वह धर्म का सम्मान कर रही है या धर्म को नियंत्रित करना चाहती है। विपक्ष को अपने भीतर झांकना चाहिए कि वह वास्तव में जनहित की राजनीति कर रहा है या सिर्फ ‘साॅफ्ट हिंदुत्व’ का नकली कवच पहनकर सत्ता के खिलाफ तालियां बटोर रहा है। यदि उत्तर प्रदेश में यह आत्ममंथन नहीं हुआ तो धर्म का मैदान और गर्म होगा। मंदिर बनेंगे, मगर मन टूटेंगे। घाट सजेंगे मगर भरोसा डूबेगा। संतों के काफिले निकलेंगे मगर साधना का तेज कमजोर होगा और राजनीति, जो जनता की भलाई के लिए होनी चाहिए, वह धर्म की आड़ में अपने ही जाल में फंसकर रह जाएगी।

धर्म के नाम पर सत्ता में आना आसान है। धर्म के नाम पर सत्ता चलाना कठिन और धर्म के नाम पर सत्ता को जवाबदेह बनाना उससे भी कठिन। पूरा देश आज उसी कठिन दौर में है। यहां धर्म और विकास की लड़ाई नहीं है, यह लड़ाई ‘धर्म का अर्थ’ तय करने की है और जब तक धर्म का अर्थ सत्ता तय करेगी या संत प्रोटोकाॅल तय करेंगे, तब तक जनता का असली विकास पीछे छूटता रहेगा।

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