बर्फीली चादरों से ढकी रानीखेत का विहंगम दृश्य (इनसेट में ब्रिगेडियर संजय यादव)
कुमाऊं रेजीमेंट सेंटर रानीखेत के कमांडर ब्रिगेडियर संजय यादव का बयान कि ‘रानीखेत पर्यटन नगरी नहीं बल्कि एक छावनी है’ ने दशकों से चली आ रही उस धारणा को तोड़ दिया है जिसके सहारे शहर की पहचान गढ़ी जाती रही। इस कथन ने रानीखेत के वजूद, उसके राजनीतिक भविष्य और वर्षों से लम्बित जिला व नगर पालिका की मांग को फिर से बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है


रानीखेत पर्यटन शहर है या फिर केवल एक छावनी? इस सवाल पर हाल में छिड़ी बहस ने रानीखेत की पहचान को लेकर गहरे आत्ममंथन की स्थिति पैदा कर दी है। हाल ही में कुमाऊं रेजीमेंट सेंटर, रानीखेत के कमांडर ब्रिगेडियर संजय यादव ने एक कार्यक्रम में स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘‘रानीखेत नैनीताल की तरह पर्यटन नगरी नहीं है, यह एक छावनी है।’’ इस एक वाक्य ने वर्षों से चले आ रहे उस भ्रम को तोड़ दिया जिसमें रानीखेत को लगातार पर्यटन नगरी के रूप में प्रचारित किया जाता रहा। पहली बार यह मुद्दा इतनी साफगोई से सामने आया कि रानीखेत का प्राथमिक वजूद छावनी के रूप में है जबकि पर्यटन उसकी द्वितीयक पहचान मात्र है।

दरअसल यह बहस केवल पर्यटन बनाम छावनी तक सीमित नहीं है बल्कि यह रानीखेत के समूचे प्रशासनिक और राजनीतिक इतिहास से जुड़ी हुई है। कभी नगर पालिका और कभी जिला बनने की उम्मीदों के बीच झूलता यह शहर आज अपने अस्तित्व को लेकर सवालों से घिरा है। जिस रानीखेत को कभी लाॅर्ड मेयो ने ग्रीष्मकालीन राजधानी के रूप में विकसित करने का सपना देखा था, उसी शहर के पर्यटन नगरी होने पर आज प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।

स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि इस दुर्दशा के लिए जिम्मेदार कौन है, सरकारें, राजनेता, प्रशासन या फिर वह जनता, जो हमेशा की तरह खामोश रही? या फिर यह मान लिया जाए कि रानीखेत को कभी ऐसा निर्णायक राजनीतिक नेतृत्व मिला ही नहीं जो शहर के हितों और उसके वजूद को मजबूती से उठा पाता।
यह अक्सर कहा जाता है कि हरीश रावत, बची सिंह रावत, अजय भट्ट, करण माहरा और प्रमोद नैनवाल जैसे नेताओं की राजनीतिक शुरुआत रानीखेत से जुड़ी रही लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि रानीखेत की बदौलत जिन ऊंचाइयों तक ये नेता पहुंचे, उसका कोई ठोस प्रतिफल शहर को नहीं मिला। समय के साथ नेताओं का कद बढ़ता गया और उनके सामने रानीखेत का कद बौना होता चला गया।

कभी उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी तहसीलों में शुमार रानीखेत, जिसे रानीखेत उपमंडल के नाम से जाना जाता था और जहां संयुक्त आयुक्त स्तर के अधिकारी तैनात रहते थे, आज सिमटकर महज एक तहसील मुख्यालय बनकर रह गया है। नगर पालिका और जिला बनने की उम्मीदें समय के साथ टूटती चली गईं। नगर पालिका बनने की खुशी में कभी गांधी चैक पर मोमबत्तियां जलाई गईं तो जिला बनने की घोषणा पर कभी मिठाइयां बांटी गईं, लेकिन उत्तराखण्ड राज्य बने 25 साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी न नगर पालिका का कोई ठोस अस्तित्व सामने आया और न जिले का।

इतिहास पर नजर डालें तो 1869 में अंग्रेजों ने रानीखेत में छावनी बसाई और इसके साथ ही एक अलग प्रशासनिक इकाई की नींव भी रखी। पाली से तहसील को रानीखेत लाया गया और यहां आईसीएस व आईएएस स्तर के सहायक आयुक्त, संयुक्त मजिस्ट्रेट तैनात रहे। आजादी के बाद से ही अल्मोड़ा जिले को विभाजित कर अलग रानीखेत जिला बनाने की मांग उठती रही।

1960 के दशक से जिले के लिए आंदोलन शुरू हुए जो 1985 तक काफी व्यापक और गहरे हो चुके थे। 1987 में उत्तर प्रदेश राजस्व परिषद के अध्यक्ष वेंकट रमानी की समिति ने रानीखेत जिले की संस्तुति की और 1989 में आठवें वित्त आयोग ने इसके लिए वित्तीय मंजूरी भी दे दी। इसके बावजूद जिला अस्तित्व में नहीं आया।
1993-94 में फिर से आंदोलन तेज हुआ, जिसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की पहल पर रानीखेत में सीओ और एडीएम की नियुक्ति की गई। निवेदिता शुक्ला वर्मा पहली एडीएम बनीं लेकिन बाद में यह पद भी समाप्त कर दिया गया। इसी दौरान जिले की मांग के साथ रानीखेत तहसील से काटकर 1986 में भिकियासैंण, 2005 में सल्ट, द्वाराहाट और चौखुटिया तहसीलें बना दी गईं, जिससे रानीखेत का दावा और कमजोर होता चला गया।

2004-05 और फिर 2010 में जिले की मांग को लेकर बड़े आंदोलन हुए। 2007 में प्रशासन ने राज्य सरकार को रानीखेत जिले का आधिकारिक प्रस्ताव भेजा, जिसमें छह ब्लाॅक, पांच तहसीलें, 1309 राजस्व गांव, 59 न्याय पंचायतें और 120 पटवारी क्षेत्र शामिल थे। 2001 की जनगणना के अनुसार प्रस्तावित जिले की जनसंख्या 3,40,456 और क्षेत्रफल 13,735.74 हेक्टेयर था।

15 अगस्त 2011 को तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश चंद्र पोखरियाल ‘निशंक’ ने रानीखेत जिले की घोषणा भी की लेकिन गजट नोटिफिकेशन जारी न होने के कारण यह घोषणा महज एक चुनावी स्टंट बनकर रह गई।
विडम्बना यह है कि प्रशासनिक, ऐतिहासिक और भौगोलिक दृष्टि से रानीखेत का दावा मजबूत होने के बावजूद राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ने इस दावे को लगातार कमजोर किया। बागेश्वर और चंपावत जैसे जिले बिना बड़े संघर्ष के अस्तित्व में आ गए, लेकिन रानीखेत की मांग हर बार राजनीति की भेंट चढ़ती रही। जब-जब रानीखेत को जिला बनाने की मांग उठी, आस-पास के क्षेत्रों से नई जिला मांगें खड़ी कर दी गईं, जिससे रानीखेत का पक्ष कमजोर होता गया।

राजनीतिक दलों के लोग क्षेत्रीय नाराजगी से बचने के लिए रानीखेत जिले के समर्थन में खुलकर बोलने से बचते रहे। अधिवक्ताओं के आंदोलनों को छोड़ दें तो जिले के लिए चले आंदोलनों की कमान अक्सर उन्हीं लोगों के हाथ में रही, जिनका सीधा सम्बंध कांग्रेस या भाजपा से था, न तो आंदोलन दलीय सीमाओं से बाहर निकल पाए और न ही आम जनता को व्यापक रूप से जोड़ सके। नतीजा यह हुआ कि जिले की राजनीति कुछ चौराहों और कुछ चेहरों तक सिमट कर रह गई।

आज स्थिति यह है कि जिला भी चाहिए, लेकिन आंदोलन में सरकार या सत्ताधारी दलों के खिलाफ नारे लगाने से परहेज है। नगर पालिका भी चाहिए, लेकिन छावनी परिषद की छाया भी नहीं छोड़नी। ‘गुड़ खाएंगे लेकिन गुलगुले से परहेज’ वाली यही सोच रानीखेत की सबसे बड़ी बाधा बन गई है। नई पीढ़ी इन आंदोलनों से दूर होती जा रही है और दशकों से चला आ रहा रानीखेत जिला आंदोलन अब कुछ गिने-चुने लोगों तक सीमित होता दिख रहा है। इतने वर्षों के संघर्ष के बाद रानीखेत के हिस्से में यदि कुछ आया है तो वह है निराशा। इस खामोश शहर में कहने को बहुत कुछ है। दिलों में आग भी होगी लेकिन शायद यह ऐसी आग है, जिसमें धुआं उठता ही नहीं। ब्रिगेडियर संजय यादव के बयान ने भले ही एक सच्चाई सामने रख दी हो लेकिन रानीखेत की पहचान का सवाल आज भी जस का तस खड़ा है।

बात अपनी-अपनी

रानीखेत जिला ना बन पाने की  सबसे बड़ी वजह यहां के जनप्रतिनिधियों की उदासीनता है। यहां से जो भी जनप्रतिनिधि रहे चाहे वह सांसद हो या विधायक, भाजपा के हों या फिर कांग्रेस के सबने जिले के लिए उदासीनता ही दिखाई। सरकार चाहे किसी की भी रही हो जनप्रतिनिधियों का अपना कर्तव्य होता है।  पूरे उत्तराखण्ड में या राज्य बनने से पहले की बात करें तो जिला बनाने की मांग रानीखेत के लिए ही सबसे पहले उठी थी और समय-समय पर यही के लिए आंदोलन भी हुए। मैंने जो अध्ययन किया है, मैंने पाया कि पूरे हिंदुस्तान के पर्वतीय क्षेत्रों में जनसंख्या और क्षेत्रफल के लिहाज से रानीखेत सबसे बड़ी तहसील रही है। कुमाऊं रेजिमेंट का मुख्यालय यहां है, एसएसबी का बड़ा कार्यालय है यहां पर है और बड़ी बात यह है कि उत्तर प्रदेश
के समय से ही उद्यान निदेशालय रानीखेत की चौबटिया में है। लखनऊ और देहरादून में तो सिर्फ इसके कैम्प कार्यालय रहे हैं। जिले के लिए जो भी आधारभूत ढांचा और मुख्य कार्यालय जो जिले स्तर के लिए चाहिए वह यहां पहले से ही मौजूद हैं। हरीश रावत जब मुख्यमंत्री थे तो हमें पूरी उम्मीद थी कि जिले की मांग जरूर पूरी करेंगे लेकिन उन्होंने भी निराश किया। जब मैं रानीखेत बार एसोसिएशन का अध्यक्ष था तब बार के नेतृत्व में 8 माह तक एक लम्बा जिले के लिए आंदोलन चला, जिसके परिणाम स्वरूप तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश चंद्र पोखरियाल ‘निशंक’ ने 2011 में रानीखेत को जिला घोषित तो किया  लेकिन उसके लिए शासनादेश हुआ, गजट नोटिफिकेशन नहीं हुआ। उसके बाद निशंक के जाने के बाद मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खण्डूड़ी जी ने वित्तीय स्थिति का हवाला देकर इस पर आगे विचार नहीं किया। रानीखेत जिला बनने के सारे मानकों को पूरा करता है। अगर यहां के जनप्रतिनिधि अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय दें तो रानीखेत जिला बनने में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए।

प्रमोद चन्द्र पांडे, पूर्व अध्यक्ष, रानीखेत बार एसोसिएशन

रानीखेत जिले की मांग पर रानीखेत उपमंडल के क्षेत्र वासी वर्षों से छले जाते रहे हैं। अनेक बार  हुए बड़े आंदोलनों के बाद भी लोग आज भी कोरी घोषणा की ओस चाटने को विवश हैं। ऐसे वक्त में जब विधानसभा चुनाव को मात्र सालभर शेष है। पिछले माह  रानीखेत आए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से उम्मीद जगी थी कि पूर्व घोषित जिले को जमीन पर उतारने  का ऐलान करेंगे लेकिन निराशा ही हाथ लगी।  रानीखेत उपमंडल को जिला बनाने जाने की मांग पचास के दशक से चली आ रही है। 1984-85 के आंदोलन से हमें भी इससे जुड़ने का मौका मिला। 1995 में इस मांग पर जब अनशन आंदोलन हुआ तब मैं ‘जिला बनाओ संघर्ष समिति’ का महासचिव था। छात्रसंघ अध्यक्ष रहते भी इस मांग को हमेशा अपने मांग पत्र में रखा। कहने का मतलब यह है कि आंदोलन का हिस्सा होने के कारण जन संघर्ष और येन-केन- प्रकारेण इसे तोड़ने की सियासी करतूतों को करीब से देखा है। राजनीतिक दलों के लिए भले ही यह अपनी सुविधानुसार एक दूसरे की ओर लुढ़काने वाला मुद्दा या कहें घेरने का नागपाश हो, मगर रानीखेत  के लिए जिला, आजीविका के संकट से उबरने और प्रशासनिक सुविधाओं को करीब से हासिल करने का स्वप्न है। निशंक सरकार में जब रानीखेत जिले की घोषणा हुई तो रानीखेत झूम उठा लेकिन यह छलावा मात्र था इसका पता घोषणाओं की ओस चाट कर तृप्त होने वाले हम लोगों को बाद के दिनों में चला। तीन साल हरीश रावत जी की  सरकार के भी रानीखेत जिले के निर्माण के लिए अहम थे। इसलिए क्योंकि सीएम और नेता प्रतिपक्ष दोनों स्थानीय थे, मगर इस स्वर्णिम समय को एक ने अरायजनवीस की भांति हर रोज चिट्ठी लिख कर तो दूसरे ने कातिल मुस्कान के साथ ‘धीरे -धीरे रे मना …’ की आश्वस्ति देकर रानीखेत के लोगों को भरमाने मंे सफलता अर्जित की जबकि जरूरी था कि ये दोनों महानुभाव अगर रानीखेत का अस्तित्व बचाने के लिए सियासी तलवारेंनीचे रखकर सिर मिला लेते तो शायद रानीखेत उप मंडल क्षेत्र के लोगों को आंदोलन की राह पुनः नहीं तलाशनी पड़ती। खैर तबसे गगास से लेकर राम गंगा तक काफी पानी बह चुका। मुख्यमंत्री धामी से जिला घोषित करने की उम्मीद इसलिए भी थी क्योंकि मौजूदा वक्त में अपनी सुविधा के अनुसार ‘जिला-नगर पालिका आंदोलन’ बन जाने वाले प्रमुख स्थानीय राजनीतिक लोग जनप्रतिनिधि से या कहें सत्ता दल से जाहिरा तौर पर जुड़े हैं। ऐसे में इन चेहरों से भी उम्मीद बलवती हुई थी कि मंच पर मुख्यमंत्री के बाजू-बगल बैठे ये आंदोलनकारी जिले की महत्वपूर्ण घोषणा कराने के लिए रानीखेत के जनप्रतिनिधि के साथ मुख्यमंत्री से विनती करेंगे लेकिन क्षेत्र की जनता के हिस्से निराशा ही आई। भविष्य में निराशा का ये कुहासा छंटने की उम्मीद भी नहीं है क्योंकि विधायकी के लिए मैदान में उतरने वाले वर्तमान और पूर्व विधायक रानीखेत और रामगंगा जिला की दोहरी मांग के बीच मौन साधे हैं। उन्हें क्षेत्र विशेष के वोट खोने की चिंता है। इसीलिए इस मुद्दे पर वे मुंह में दही जमाए बैठे हैं।

You may also like