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दुनिया चिंतित, पाक में सन्नाटा

इमरान के समर्थन में दुनिया के दिग्गज पूर्व क्रिकेटर एवं पाक पीएम इमरान खान
राजनीतिक और न्यायिक व्यवस्था की परीक्षा भी है। जहां दुनिया के पूर्व क्रिकेट कप्तान मानवता के आधार पर आवाज उठा रहे हैं, वहीं पाकिस्तान के भीतर राजनीतिक खामोशी चर्चा का विषय बन गई है। ‘घर में तिरस्कार, बाहर पुरस्कार’ यह पंक्ति इमरान खान की परिस्थिति पर सटीक बैठती नजर आती है। यह मामला मानवीय गरिमा, न्यायिक पारदर्शिता और राज्य की जिम्मेदारी से जुड़ा हुआ है। चाहे राजनीतिक मतभेद कितने भी गहरे क्यों न हों, एक बीमार व्यक्ति को उचित इलाज मिलना किसी भी लोकतंत्र की बुनियादी कसौटी है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अंतरराष्ट्रीय अपीलों का असर पड़ता है या यह मामला भी पाकिस्तान की सियासत की भेंट चढ़ जाएगा


खेल जगत में इन दिनों एक ओर जहां टी-20 विश्व कप की धूम है वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और 1992 एकदिवसीय क्रिकेट विश्व कप विजेता कप्तान इमरान खान की सेहत को लेकर दुनियाभर के खिलाड़ियों द्वारा लिखी गई चिठ्ठी सुर्खियों में है। तीन साल से जेल में बंद 73 वर्षीय इमरान खान के स्वास्थ्य को लेकर दुनिया के14 पूर्व अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट कप्तानों ने पाकिस्तान सरकार को पत्र लिखकर उचित इलाज की मांग की है। यह विडम्बना ही है कि जिस शख्स ने पाकिस्तान को क्रिकेट के शिखर पर पहुंचाया वही आज अपने देश में उपेक्षा का शिकार बताया जा रहा है जबकि विदेशों में उसके लिए सम्मान और संवेदना व्यक्त की जा रही है। इस पत्र पर जिन पूर्व कप्तानों ने हस्ताक्षर किए हैं वे क्रिकेट इतिहास के बड़े नाम हैं। इनमें भारत के सुनील गावस्कर, कपिल देव, ग्रेग चैपल, बेलिंडा क्लार्क, माइकल एथरटन, नासिर हुसैन, इयान चैपल, एलन बाॅर्डर, माइकल ब्रियरली, डेविड गावर, किम ह्यूजेस, क्लाइव लाॅयड, स्टीव वाॅ और जाॅन राइट का नाम शामिल है। इन्होंने पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ से इमरान को उचित इलाज दिए जाने की अपील की है। हैरानी की बात यह है कि इस चिट्ठी पर किसी भी पूर्व पाकिस्तानी कप्तान ने हस्ताक्षर नहीं किए हैं।

ऐसे में इमरान खान का व्यक्तित्व दो ध्रुवों में बंटा दिखाई देता है। एक ओर वे 1992 में पाकिस्तान को विश्व कप जिताने वाले करिश्माई कप्तान हैं जिनकी छवि एक वैश्विक खेल नायक की रही है। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद वे अपने ही देश में गम्भीर कानूनी और राजनीतिक संकटों से जूझ रहे हैं। यह स्थिति सवाल खड़े करती है कि क्या राजनीतिक मतभेद मानवीय सरोकारों से ऊपर हो गए हैं? क्या एक पूर्व प्रधानमंत्री और विश्व कप विजेता को न्यूनतम चिकित्सा सुविधा भी विवाद का विषय बननी चाहिए? क्या अंतरराष्ट्रीय दबाव से पाकिस्तान सरकार पर नैतिक जिम्मेदारी बढ़ेगी? इस कानूनी और राजनीतिक खींचतान के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या एक बंदी को, चाहे वह पूर्व प्रधानमंत्री ही क्यों न हो, न्यूनतम स्वास्थ्य सुविधाएं सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी नहीं है?

खेल विश्लेषकों और राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगस्त 2023 से जेल में बंद इमरान खान की शारीरिक और मानसिक स्थिति को लेकर जो जानकारियां सामने आई हैं, उन्होंने उनके समर्थकों, अंतरराष्ट्रीय समुदाय और खेल जगत के कई दिग्गजों को चिंतित कर दिया है। यह मामला अब केवल राजनीतिक नहीं रहा बल्कि मानवीय और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। इमरान खान की मौजूदा स्थिति केवल एक व्यक्ति की सेहत का मामला नहीं है बल्कि यह पाकिस्तान की राजनीतिक और न्यायिक व्यवस्था की परीक्षा भी है। जहां दुनिया के पूर्व क्रिकेट कप्तान मानवता के आधार पर आवाज उठा रहे हैं, वहीं पाकिस्तान के भीतर राजनीतिक खामोशी चर्चा का विषय बन गई है। ‘घर में तिरस्कार, बाहर पुरस्कार’ यह पंक्ति आज इमरान खान की परिस्थिति पर सटीक बैठती नजर आती है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अंतरराष्ट्रीय अपीलों का असर पड़ता है या यह मामला भी पाकिस्तान की सियासत की भेंट चढ़ जाएगा।

गौरतलब है कि तीन साल से जेल में बंद इमरान खान की दाहिनी आंख की लगभग 85 प्रतिशत रोशनी जा चुकी है। पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हुई मेडिकल जांच में यह खुलासा हुआ है। जांच में पाया गया कि उनकी आंख में खून का थक्का (ब्लड क्लाॅट) जम गया था, जिससे गम्भीर नुकसान हुआ। इंजेक्शन और उपचार के बाद भी उनकी दाहिनी आंख में मात्र 15 प्रतिशत दृष्टि शेष है। इमरान का दावा है कि उन्हें निजी चिकित्सक से इलाज की अनुमति नहीं दी गई। यह आरोप अगर सही है तो यह न केवल राजनीतिक बल्कि मानवीय प्रश्न भी खड़ा करता है।

चिकित्स्कों के अनुसार अगर उन्हें तत्काल इलाज न मिले तो स्थायी नुकसान हो सकता है। आंख के भीतर विशेष इंजेक्शन और कभी-कभी लेजर उपचार जरूरी है। हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और कोलेस्ट्राॅल जैसी बीमारियां जोखिम बढ़ाती हैं। यह बीमारी सामान्य क्लिनिक में नहीं बल्कि रेटिना विशेषज्ञ और उन्नत चिकित्सा सुविधा में ही ठीक तरह से सम्भाली जा सकती है।
 
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट जगत की अपील

इमरान खान केवल एक राजनेता नहीं बल्कि विश्व क्रिकेट के महानतम ऑलराउंडरों में गिने जाते हैं। 1992 में उन्होंने पाकिस्तान को पहला और अब तक का एकमात्र एकदिवसीय क्रिकेट विश्वकप जिताया है। उनकी इसी विरासत के कारण अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट जगत के कई पूर्व कप्तानों ने पाकिस्तान सरकार से अपील की कि उन्हें उचित चिकित्सा सुविधा दी जाए। भारत, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, वेस्टइंडीज और न्यूजीलैंड के कई पूर्व कप्तानों ने मानवीय आधार पर पत्र लिखकर यह मांग उठाई कि राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर एक पूर्व प्रधानमंत्री और विश्वकप विजेता खिलाड़ी को समुचित इलाज मिलना चाहिए। यह तथ्य उल्लेखनीय है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके लिए चिंता जताई जा रही है जबकि पाकिस्तान के भीतर राजनीतिक माहौल बेहद ध्रुवीकृत बना हुआ है।
 
क्या है सेंट्रल रेटिनल वेन ऑक्लूजन?

इमरान खान को सेंट्रल रेटिनल वेन ऑक्लूजन नामक गम्भीर नेत्र रोग है। सेंट्रल रेटिनल वेन ऑक्लूजन में रेटिना से रक्त बाहर ले जाने वाली मुख्य नस में अवरोध हो जाता है। इससे खून जमा होने लगता है, सूजन आती है और दृष्टि तेजी से प्रभावित होती है।
 
जेल में स्वास्थ्य सुविधाओं पर सवाल

अक्टूबर 2023 से इमरान खान को रावलपिंडी की अडियाला जेल में रखा गया है। उनके वकीलों और पार्टी नेताओं का कहना है कि उन्हें पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं नहीं दी गईं। आरोप है कि नियमित ब्लड टेस्ट नहीं कराए गए। दांतों की समस्या के बावजूद डेंटिस्ट से मुलाकात नहीं कराई गई। आंखों की शिकायत के बावजूद समय पर विशेषज्ञ नहीं बुलाया गया। परिवार और वकीलों से मिलने में प्रतिबंध लगाए गए। हालांकि जेल प्रशासन की ओर से इन आरोपों पर अलग-अलग समय पर सफाई दी गई है लेकिन मेडिकल रिपोट्र्स और कोर्ट में प्रस्तुत दस्तावेजों ने बहस को और तेज कर दिया है।
 
कानूनी जाल में फंसे इमरान

इमरान खान पर 100 से अधिक मुकदमे दर्ज हैं। उन्हें तोषाखाना मामले में 14 साल की सजा सुनाई जा चुकी है। इसके अतिरिक्त अल-कादिर ट्रस्ट मामले में भी जांच चल रही है, जिसमें पाकिस्तान के नेशनल अकाउंटेबिलिटी ब्यूरो ने उनकी पत्नी बुशरा बीबी समेत कई अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। 9 मई 2023 को उनकी गिरफ्तारी के बाद पाकिस्तान में हिंसक प्रदर्शन हुए, जिनमें सेना के प्रतिष्ठानों को भी निशाना बनाया गया था। सरकार का कहना है कि कानून अपना काम कर रहा है और इमरान को अन्य कैदियों की तरह ही रखा गया है। वहीं उनकी पार्टी पीटीआई का आरोप है कि उनके साथ राजनीतिक प्रतिशोध के तहत व्यवहार किया जा रहा है।
 
मानसिक दबाव और अलगाव

इमरान खान लम्बे समय से मानसिक दबाव और अलगाव की स्थिति में हैं। बताया जा रहा है कि उन्हें लम्बे समय तक एकांत में रखा गया, जिससे उनके मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ा। उनके बेटों कासिम और सुलेमान से सीमित फोन सम्पर्क की अनुमति दी गई। परिवार के सदस्यों और वकीलों से मुलाकात में भी कई बार बाधाएं आईं। हालांकि हाल ही में जेल प्रशासन में बदलाव के बाद उनकी पत्नी से सप्ताह में एक बार 30 मिनट की मुलाकात की अनुमति दी गई है, लेकिन समर्थकों का कहना है कि यह पर्याप्त नहीं है। एक पूर्व प्रधानमंत्री जो कभी लाखों लोगों की रैलियों को संबोधित करते थे, आज सीमित सम्पर्क और स्वास्थ्य समस्याओं के बीच संघर्ष कर रहे हैं और यह दृश्य उनके समर्थकों के लिए भावनात्मक रूप से भी भारी है।
 
मानवीय दृष्टिकोण, राजनीतिक टकराव

इमरान खान की सेहत का मुद्दा अब केवल एक व्यक्ति की बीमारी का मामला नहीं है। यह न्याय, मानवाधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा भी है। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार हर कैदी को पर्याप्त चिकित्सा सुविधा, नियमित जांच और विशेषज्ञ उपचार का अधिकार है। यदि किसी कैदी की हालत गम्भीर हो और उसे विशेषज्ञ चिकित्सा की आवश्यकता हो, तो राज्य की जिम्मेदारी बनती है कि वह आवश्यक प्रबंध करे। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय और मानवाधिकार संगठनों की निगाहें इस मामले पर टिकी हैं।
 
आगे क्या होगा?

इमरान खान की सेहत को लेकर जारी बहस आने वाले समय में और तेज हो सकती है। अदालतों में दायर याचिकाएं, मेडिकल रिपोट्र्स और अंतरराष्ट्रीय दबाव इस मुद्दे को केंद्र में बनाए रखेंगे। यदि उनकी आंखों की स्थिति और बिगड़ती है या अन्य स्वास्थ्य समस्याएं सामने आती हैं तो सरकार पर दबाव और बढ़ सकता है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान की राजनीति में यह मामला भावनात्मक और चुनावी मुद्दा भी बन सकता है। उनके समर्थक इसे अन्याय का प्रतीक मानते हैं, जबकि विरोधी इसे कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा बताते हैं।

बहरहाल, इमरान खान की सेहत आज पाकिस्तान की राजनीति से कहीं अधिक बड़ा प्रश्न बन चुकी है। एक विश्व कप विजेता कप्तान, एक पूर्व प्रधानमंत्री और करोड़ों लोगों के नेता की स्वास्थ्य स्थिति को लेकर उठते सवाल केवल राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं हैं। यह मामला मानवीय गरिमा, न्यायिक पारदर्शिता और राज्य की जिम्मेदारी से जुड़ा हुआ है। चाहे राजनीतिक मतभेद कितने भी गहरे क्यों न हों, एक बीमार व्यक्ति को उचित इलाज मिलना किसी भी लोकतंत्र की बुनियादी कसौटी है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि पाकिस्तान इस कसौटी पर कितना खरा उतरता है।

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