अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई समेत शीर्ष सैन्य नेतृत्व की मौत ने मध्य-पूर्व को अभूतपूर्व अस्थिरता में धकेल दिया है। ईरान की जवाबी कार्रवाइयों, क्षेत्रीय प्राॅक्सी नेटवर्क की सक्रियता, पाकिस्तान में अमेरिकी दूतावास के बाहर हिंसक घटनाओं और होरमुज जलडमरूमध्य पर मंडराते खतरे ने यह प्रश्न तीखा कर दिया है कि क्या दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की ओर बढ़ रही है?


बीते 28 फरवरी को तेहरान की रात जब धमाकों की आवाज से कांपी, तब किसी को अंदाजा नहीं था कि आने वाले घंटों में पश्चिम एशिया की राजनीति का नक्शा बदल जाएगा। अमेरिका और इजरायल के संयुक्त सैन्य हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई के साथ-साथ रक्षा मंत्री और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉपर्स के प्रमुख भी मारे गए। यह केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं है बल्कि यह ईरान की सत्ता-संरचना के हृदय पर सीधा वार है। ईरान में सर्वोच्च नेता केवल धार्मिक पद नहीं होता बल्कि वही सेना का सर्वोच्च कमांडर, न्यायपालिका और प्रमुख नीतिगत संस्थाओं का अंतिम निर्णायक होता है।


वाॅशिंगटन में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इसे ‘आवश्यक और निर्णायक कदम’ बताया। अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि ईरान वर्षों से इजरायल के खिलाफ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष हमलों में शामिल रहा है और उसके परमाणु कार्यक्रम ने वैश्विक संतुलन को अस्थिर कर दिया है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि किसी सम्प्रभु देश के शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाना अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीतिक मर्यादाओं का उल्लंघन है। इससे पहले 22 जून, 2025 को भी अमेरिका ने ईरान तीन न्यूक्लियर संयत्रों पर भारी हमला किया था।

ताजा हमलों के जवाब में ईरान ने इजरायल की ओर बैलिस्टिक मिसाइलें दागी, लेबनान में हिज्बुल्लाह सक्रिय हुआ, इराक और सीरिया में ईरान समर्थित मिलिशिया ने अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया और यमन से हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में जहाजों की आवाजाही को चुनौती दी। जिसके चलते पूरा मध्य-पूर्व एक साथ सुलग उठा है। अब यह संघर्ष पारम्परिक युद्ध की रेखाओं में सीमित नहीं रहा, यह बहुस्तरीय और बहु- क्षेत्रीय हो गया, जिसमें साइबर हमले, ड्रोन हमले और प्रॉक्सी नेटवर्क सब शामिल हैं।

सबसे अधिक चिंता जिस बिंदु को लेकर है, वह है स्ट्रेट ऑफ होरमुज। यह संकरा समुद्री मार्ग, जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है, दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा वहन करता है। ईरान पहले भी संकेत दे चुका है कि यदि उस पर अस्तित्वगत खतरा आया तो वह होरमुज जलडमरूमध्य को बंद कर सकता है। ताजा संकट के बीच ईरानी कमांडरों ने फिर से यह चेतावनी दे डाली है। यदि यह मार्ग बाधित होता है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल मचना तय है। तेल की कीमतें पहले ही उछाल पर हैं और एशिया तथा यूरोप की अर्थव्यवस्थाएं इसके प्रभाव को महसूस करने लगी हैं। भारत जैसे ऊर्जा-आयात पर निर्भर देशों के लिए यह संकट केवल भू-राजनीतिक नहीं, आर्थिक भी है।

इस तनाव की लपटें पाकिस्तान तक भी पहुंचीं हैं। इस्लामाबाद स्थित अमेरिकी दूतावास के बाहर उग्र भीड़ ने प्रदर्शन किया जिसमें हिंसा और तोड़-फोड़ की घटनाएं सामने आईं। सुरक्षा बलों को हालात काबू में करने के लिए सख्ती करनी पड़ी जिसमें नौ से अधिक प्रदर्शनकारी मारे गए हैं। पाकिस्तान की स्थिति जटिल है। वह एक ओर अमेरिका का सहयोगी रहा है तो दूसरी तरफ ईरान का पड़ोसी है और क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने में उसकी भूमिका अहम है। अमेरिकी दूतावास के बाहर हुई हिंसा केवल स्थानीय गुस्से का विस्फोट नहीं बल्कि उस व्यापक असंतोष का प्रतीक है जो मुस्लिम दुनिया के बड़े हिस्से में इस हमले को लेकर देखा जा रहा है। यदि पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति इस संकट से और अस्थिर होती है तो दक्षिण एशिया भी इसके प्रभाव से अछूता नहीं रहेगा।

अब मूल प्रश्न पर लौटें कि आखिर अमेरिका चाहता क्या है? आधिकारिक रूप से अमेरिका कहता है कि उसका लक्ष्य ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना और इजरायल की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। परंतु रणनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि यह उससे कहीं अधिक व्यापक एजेंडा है। मध्य-पूर्व दशकों से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और सामरिक मार्गों के कारण महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा का केंद्र रहा है। इराक युद्ध, सीरिया संकट और अब ईरान पर कार्रवाई, इन सबको एक सतत रणनीति के रूप में देखा जा रहा है जिसमें अमेरिका क्षेत्रीय संतुलन अपने पक्ष में बनाए रखना चाहता है। ईरान, जो रूस और चीन के साथ अपने सम्बंध मजबूत कर रहा था, अमेरिका के लिए एक दीर्घकालिक चुनौती बनता जा रहा था। ऐसे में शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाकर अमेरिका सम्भवतः ईरान की राजनीतिक दिशा को बदलने या उसे आंतरिक अस्थिरता में धकेलने का दांव खेल रहा है। लेकिन इतिहास बताता है कि ऐसे दांव अक्सर उलटे भी पड़ते हैं। सत्ता का शून्य कभी-कभी और अधिक कठोर और कट्टर नेतृत्व को जन्म देता है।
 
ईरान में पहले से ही कट्टर धड़े मजबूत हैं जो अमेरिका और पश्चिम के खिलाफ सख्त रुख अपनाने की वकालत करते रहे हैं। यदि वे सत्ता पर हावी होते हैं तो बातचीत और कूटनीति की सम्भावनाएं और कम हो सकती हैं।
अब तीसरे विश्व युद्ध की आशंका को लेकर वैश्विक चिंताएं बढ़ रही हैं। रूस और चीन ने ईरान के प्रति सहानुभूति जताई है और अमेरिकी कार्रवाई की आलोचना की है। यदि यह समर्थन केवल कूटनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहता है तो संघर्ष क्षेत्रीय दायरे में रह सकता है लेकिन यदि सैन्य सहयोग या प्रत्यक्ष हस्तक्षेप का स्वरूप लेता है तो समीकरण बदल सकते हैं। नाटो देशों की गतिविधियां बढ़ी हैं, अमेरिकी नौसैनिक बेड़े फारस खाड़ी में तैनात हैं और इजरायल हाई अलर्ट पर है। यह सब मिलकर उस आशंका को जन्म देता है कि कोई छोटी सी चूक भी बड़े टकराव में बदल सकती है। इसके बावजूद कुछ विश्लेषक मानते हैं कि महाशक्तियां पूर्ण विश्व युद्ध से बचने की कोशिश करेंगी क्योंकि परमाणु युग में उसका परिणाम विनाशकारी होगा। इसलिए सम्भावना यह भी है कि तनाव उच्च स्तर पर बना रहे, प्राॅक्सी युद्ध जारी रहें लेकिन प्रत्यक्ष महाशक्ति टकराव से परहेज किया जाए। सवाल यह है कि क्या सभी पक्ष संयम बरत पाएंगे।

दुनिया इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। ईरान में सत्ता परिवर्तन, अमेरिका की रणनीति, इजरायल की सुरक्षा चिंताएं, पाकिस्तान की संवेदनशील स्थिति और होरमुज जलडमरूमध्य पर मंडराता खतरा, ये सभी मिलकर उस बड़े प्रश्न को जन्म देते हैं जो हर महाद्वीप में गूंज रहा है कि क्या हम एक और वैश्विक युद्ध की ओर बढ़ रहे हैं या इतिहास हमें आखिरी क्षण में संयम और संवाद का रास्ता दिखाएगा? अभी इसका उत्तर अनिश्चित है लेकिन इतना स्पष्ट है कि आने वाले सप्ताह और महीने विश्व राजनीति की दिशा तय करेंगे।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच भारत की प्रतिक्रिया ने भी कूटनीतिक और राजनीतिक हलकों में व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। परम्परागत रूप से भारत ने ईरान के साथ संतुलित और सहयोगपूर्ण सम्बंध बनाए रखे हैं। ऊर्जा सुरक्षा, चाबहार बंदरगाह परियोजना और मध्य एशिया तक पहुंच के संदर्भ में तेहरान नई दिल्ली का एक महत्वपूर्ण साझेदार रहा है। शीत युद्ध के बाद के दशकों में भी भारत ने ईरान के साथ संवाद के रास्ते खुले रखे, भले ही पश्चिमी देशों ने उस पर प्रतिबंध लगाए हों। यही कारण था कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत अक्सर ईरान के खिलाफ कठोर भाषा से बचता रहा और संतुलित बयान देता रहा। लेकिन इस बार स्थिति अलग दिखी। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद भारत की ओर से कोई सीधी निंदा या समर्थन का बयान सामने नहीं आया। विदेश मंत्रालय ने सामान्य शब्दों में ‘क्षेत्रीय शांति और स्थिरता’ की अपील की, परंतु ईरान पर हुए हमले को लेकर स्पष्ट टिप्पणी से परहेज किया। दूसरी ओर, जब ईरान समर्थित कार्रवाइयों के तहत सऊदी अरब में हमले की खबरें आईं, तब प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक रूप से चिंता व्यक्त की और हमले की आलोचना की। यह अंतर केवल शब्दों का नहीं बल्कि प्राथमिकताओं के संकेत का प्रतीक माना जा रहा है।

विश्लेषकों का मानना है कि भारत की विदेश नीति पिछले एक दशक में अधिक व्यावहारिक और बहुध्रुवीय हो गई है। एक ओर भारत अमेरिका के साथ सामरिक साझेदारी को गहरा कर रहा है, क्वाड जैसे मंचों में सक्रिय है और रक्षा सहयोग बढ़ा रहा है, दूसरी तरफ पश्चिम एशिया में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के साथ उसके आर्थिक और ऊर्जा सम्बंध मजबूत हुए हैं। खाड़ी देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं और भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इन्हीं देशों से आता है। ऐसे में सऊदी अरब पर हमले की खुलकर आलोचना करना भारत के आर्थिक और सामरिक हितों से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है।

इस प्रकार, ‘आखिर अमेरिका चाहता क्या है?’ के साथ-साथ एक समानांतर प्रश्न भारत को लेकर भी उठ खड़ा हुआ है कि आखिर भारत क्या चाहता है? जवाब शायद यह है कि नई दिल्ली अब आदर्शवाद की जगह व्यावहारिक संतुलन को चुन रही है। यह विदेश नीति का मौन लेकिन स्पष्ट परिवर्तन है जिसमें सम्बंधों की दिशा भावनात्मक इतिहास से अधिक वर्तमान भू-राजनीतिक गणित तय कर रहा है और जिसकी गूंज अब देश की आंतरिक राजनीतिक बहसों में भी साफ सुनाई दे रही है।

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