Uttarakhand

गीत जिंदगी के हम गाएंगे सुनाएंगे

चौतरफा फैले भ्रष्टाचार, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, एपस्टीन फाइल्स की गूंज, ईरान-अमेरिका तनाव, हिंसा और धर्मांधता की खबरों के बीच यह मान लेना आसान है कि दुनिया केवल नकारात्मक घटनाओं से भरी है लेकिन इसी समय, इसी देश में, कुछ लोग चुपचाप ऐसी कहानियां रच रहे हैं जो उम्मीद की तरह खिलती हैं। कभी पहाड़ों की रसोई से तो कभी किसी शहर की सड़कों पर झरते गुलाबी फूलों की तरह।

तो चलिए कुछ सकारात्मक बात करते हैं। उत्तराखण्ड की पहाड़ियों और दूसरी बेंगलुरु की सड़कों से दो खबरें ऐसी निकली हैं जो आपाधापी और कोलाहल से मेरे जीवन में थोड़ा-सा ही सही, सुकून लेकिन अवश्य देती हैं। दोनों अलग हैं लेकिन दोनों में एक साझा सूत्र है, परम्परा, पर्यावरण और साहस।

पहले बात उत्तराखण्ड की जहां पहाड़ियों में ‘पिस्यू लूण’ कभी सिर्फ नमक नहीं था। यह एक परम्परा थी, स्वाद से अधिक एक स्मृति। सिलबट्टे पर पीसा गया सेंधा नमक, तीखी लाल मिर्च और पहाड़ी जड़ी-बूटियों की सुगंध से बना यह मिश्रण रसोई की आत्मा हुआ करता था। सर्दियों की दोपहरें, सादा खाना और साथ बैठकर खाने का अपनापन, ‘पिस्यू लूण’ उस जीवन-शैली का हिस्सा था जिसमें स्वाद के साथ संवेदना भी घुली होती थी। लेकिन बाजार बदल गया। चमकीली पैकेजिंग और फैक्ट्री में बने उत्पादों ने घर की बनी चीजों को पीछे धकेलना शुरू किया। धीरे-धीरे यह परम्परा भी हाशिए पर जाने लगी। यहीं से शुरू होती है शशि बहुगुणा रतूड़ी की कहानी।
52 वर्ष की उम्र में जब समाज अक्सर कहता है कि अब रफ्तार कम कर दो, उन्होंने शुरुआत करने का फैसला किया। उनके पास पूंजी थी सिर्फ 1,000 रुपए। एक सहायक। कुछ कागज के पैकेट और बेटे का सोशल मीडिया सहयोग। बहुत सारी आशंकाओं के बीच उत्साह था। शशि जानती थीं कि वह ‘सिर्फ नमक’ नहीं बेच रहीं। वह पीढ़ियों का स्वाद, पहाड़ की विरासत और महिलाओं की मेहनत को पहचान दे रही हैं। उन्होंने पहले कल्पना की फिर उस कल्पना को धरातल पर उतारने का साहस किया। स्थानीय महिलाओं को जोड़ा। विश्वास का निर्माण किया, एक-एक पैकेट के साथ। इंस्टाग्राम पर धीरे-धीरे चर्चा शुरू हुई। मीडिया ने कहानी उठाई। बाद में उन्होंने अपनी वेबसाइट लाॅन्च की और अब देशभर से आर्डर आने लगे हैं।

आज उनका ब्रांड ‘नमकवाली’ सिर्फ एक उत्पाद नहीं, एक आंदोलन है। 35 महिलाओं को रोजगार, लगभग 500 किसानों को समर्थन और हर आर्डर पर एक पेड़ लगाने की अनूठी पहल। 1,000 रुपए से शुरू हुई यात्रा आज 5 करोड़ रुपए के राजस्व तक पहुंच चुकी है। कहने में अतिशयोक्ति नहीं कि उन्होंने सिर्फ नमक नहीं बेचा बल्कि परम्परा को पुनर्जीवित किया, महिलाओं को आर्थिक पहचान दी और यह साबित किया कि ‘गृहिणी’ कोई सीमा नहीं, एक सम्भावना है।

शशि बहुगुणा रतूड़ी की तरह ही एक सेवानिवृत्त नौकरशाह ने भी सपना देखा, साहस किया और अपने सपने को साकार कर दिखाया है। हर गर्मी में बेंगलुरु के कुछ हिस्से गुलाबी हो उठते हैं। सड़कों पर झरते गुलाबी तुरही (Tabebuia rosea) के फूल शहर की भागदौड़ को एक पल के लिए थमा देते हैं। लेकिन यह रंग अचानक नहीं आया। 1980 के दशक में बेंगलुरु तेजी से फैल रहा था। सड़कें चौड़ी हो रही थीं। पेड़ कट रहे थे। शहर की पहचान बदल रही थी। नई सड़कों के किनारे पौधे लगाए गए, पर वे टिक नहीं पाए। तभी सामने आए भारतीय वन सेवा के अधिकारी सेतूराम गोपालराव नेगिनहल। उन्होंने कागजी योजना नहीं बनाई बल्कि उन्होंने पैदल चलना शुरू किया। मिट्टी को परखा। धूप की दिशा देखी। ट्रैफिक के प्रवाह को समझा। फिर पेड़ों की प्रजातियां चुनीं, जिनमें Tabebuia rosea भी शामिल था जो छाया भी देता है और हर साल रंग भी। उन्होंने महंगे कंक्रीट गार्ड की जगह बांस और जाली से कम लागत वाले ट्री गार्ड बनाए। स्थानीय निवासियों को शामिल किया, पूछा कि वे अपनी सड़क पर कौन-सा पेड़ चाहते हैं। पांच वर्षों तक लगातार काम चला। कई बार रात में रोपण हुआ ताकि दिन में यातायात बाधित न हो।

परिणाम आज कंक्रीट का जंगल बन चुके बेंगलुरु में 15 लाख से अधिक पेड़ खिलखिला रहे हैं और शहरों को दे रहे हैं एक हरित सुरक्षा घेरा। उस समय जब ‘क्लाइमेट क्राइसिस’ शब्द सार्वजनिक विमर्श में भी नहीं था, एक अधिकारी भविष्य की सांसों की रक्षा कर रहा था। आज जब बेंगलुरु की सड़कों पर गुलाबी फूल गिरते हैं तो वे केवल मौसम नहीं बताते बल्कि वे एक दूरदर्शी सोच की कहानी कहते हैं। उम्मीद की ये दो तस्वीरें, एक पहाड़ की रसोई से उठी। दूसरी शहर की सड़कों पर जमी। एक ने स्वाद बचाया है तो दूसरी ने सांस। एक ने महिलाओं को जोड़ा। दूसरी ने नागरिकों को।

इन दोनों कहानियों में पूंजी से ज्यादा विश्वास है। उम्र से ज्यादा साहस है। पद से ज्यादा प्रतिबद्धता है। ऐसे समय में जब खबरों का शोर निराशा बढ़ाता है, यह याद रखना जरूरी है कि बदलाव केवल क्रांति या जनआंदोलनों के जरिए ही नहीं पैदा होता। कभी वह सिलबट्टे पर पीसते हाथों से भी निकलता है तो कभी वह मिट्टी को छूते कदमों से। दुनिया में अंधेरा है, पर रोशनी भी है और कभी- कभी, वह रोशनी गुलाबी फूलों की तरह हर साल लौट आती है।

इन दोनों कहानियों को देखकर जोड़ा जाए तो यह केवल प्रेरक प्रसंग मात्र नहीं है बल्कि एक बड़ा सामाजिक संदेश भी है। दरअसल, हमारे समय में अक्सर यह धारणा बनती जा रही है कि परिवर्तन केवल बड़े संसाधनों, बड़ी संस्थाओं या बड़े राजनीतिक निर्णयों से ही सम्भव होता है लेकिन जब हम उत्तराखण्ड की पहाड़ियों से उठी शशि बहुगुणा रतूड़ी की पहल को देखते हैं और दूसरी ओर बेंगलुरु की सड़कों को हरियाली और गुलाबी मौसम देने वाले सेतुराम गोपालराव नेगिनहल के काम को समझते हैं तो यह भ्रम स्वतः टूट जाता है। इन दोनों उदाहरणों में कोई चकाचैंध नहीं है, कोई विशाल पूंजी नहीं है, कोई प्रचार का शोर भी नहीं है। यहां केवल एक व्यक्ति का विश्वास, धैर्य और अपने आसपास की दुनिया को बेहतर बनाने की ईमानदार इच्छा है।

शशि बहुगुणा रतूड़ी की कहानी यह बताती है कि परम्परा केवल अतीत की स्मृति नहीं होती बल्कि यदि उसे समझदारी और साहस के साथ आगे बढ़ाया जाए तो वही परम्परा भविष्य का आधार भी बन सकती है। पहाड़ की रसोई में पीढ़ियों से बनता आया पिस्यू लूण कभी घरेलू स्वाद का हिस्सा था लेकिन धीरे-धीरे बाजार की चमक-दमक में वह पीछे छूटने लगा। ऐसे समय में उन्होंने यह विश्वास किया कि स्थानीय स्वाद, स्थानीय ज्ञान और घरेलू कौशल की अपनी एक ताकत होती है। उन्होंने उसी ताकत को पहचान कर उसे एक उद्यम में बदला। परिणाम यह हुआ कि जो चीज कभी घरों तक सीमित थी, वही आज सैकड़ों परिवारों की आजीविका और आत्मसम्मान का आधार बन गई। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि समाज में अक्सर जिन भूमिकाओं को ‘साधारण’ समझ लिया जाता है, उनमें भी असाधारण सम्भावनाएं छिपी होती हैं।

दूसरी ओर नेगिनहल की कहानी हमें यह समझाती है कि विकास और पर्यावरण को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में देखने की आवश्यकता नहीं है। जब बेंगलुरु तेजी से फैल रहा था और पेड़ कट रहे थे, तब उन्होंने यह सोचा कि शहर की प्रगति के साथ उसकी हरियाली को भी बचाया जा सकता है। उन्होंने पेड़ लगाने को एक औपचारिक सरकारी कार्यक्रम की तरह नहीं बल्कि एक दीर्घकालिक दृष्टि के साथ देखा। मिट्टी को समझना, सही प्रजाति का चयन करना, स्थानीय लोगों को इस प्रक्रिया में शामिल करना, ये सभी कदम यह बताते हैं कि यदि किसी काम को दूरदृष्टि और संवेदनशीलता के साथ किया जाए तो उसका प्रभाव दशकों तक दिखाई देता है। आज जब बेंगलुरु की सड़कों पर टेबेबुइया के गुलाबी फूल गिरते हैं तो वे केवल एक मौसम का संकेत नहीं होते बल्कि यह याद दिलाते हैं कि किसी व्यक्ति की दूरदर्शिता पूरे शहर की पहचान बदल सकती है।

इन दोनों कहानियों को एक साथ देखने पर यह भी समझ में आता है कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन कई बार बहुत साधारण परिस्थितियों से शुरू होते हैं। एक महिला के मन में यह विचार आता है कि वह अपनी रसोई की परम्परा को बचाएगी और वही विचार आगे चलकर सैकड़ों लोगों की जिंदगी में उम्मीद बन जाता है। एक अधिकारी यह निर्णय लेता है कि शहर की सड़कों पर पेड़ लगाए जाएं और वही निर्णय आने वाली पीढ़ियों को छाया, हवा और सुंदरता का उपहार दे देता है। परिवर्तन का यह स्वरूप बहुत शांत होता है, उसमें शोर नहीं होता, लेकिन उसका असर गहरा और दीर्घकालिक होता है।

शायद यही इन कहानियों का सबसे बड़ा संदेश है। दुनिया चाहे कितनी भी जटिल क्यों न हो जाए, चाहे खबरों में कितनी भी नकारात्मकता क्यों न दिखाई दे, समाज के भीतर ऐसे लोग हमेशा मौजूद रहते हैं जो उम्मीद के छोटे-छोटे बीज बोते रहते हैं। समय के साथ वही बीज परम्परा बनते हैं, वही पेड़ बनते हैं, वही रोजगार बनते हैं और वही भविष्य की नींव बनते हैं। इसलिए इन कहानियों को पढ़ते समय हमें केवल प्रेरणा ही नहीं मिलती बल्कि यह विश्वास भी मजबूत होता है कि सकारात्मक बदलाव किसी एक बड़े क्षण से नहीं बल्कि अनेक छोटे लेकिन साहसी निर्णयों से जन्म लेते हैं और वही निर्णय अंततः समाज की दिशा तय करते हैं।

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