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वायु प्रदूषण से बढ़ती बीमारियां

श्वसन की बीमारी और दवाइयों की बढ़ती मांग पर अपनी बात रखते स्वाथ्य मंत्री प्रतापराव जाधव
दिसम्बर 2025 में श्वसन तंत्र से जुड़ी दवाओं की बिक्री 1,952.9 करोड़ रुपए तक पहुंची। वर्ष 2024 के 17,199 करोड़ रुपए के मुकाबले 2025 में यह बढ़कर 18,912 करोड़ रुपए हो गई अर्थात एक ही वर्ष में 1,713 करोड़ रुपए की वृद्धि। संसद में सरकार ने एक तरफ जहां इन आंकड़ों की पुष्टि की, वहीं दूसरी ओर वायु प्रदूषण और मृत्यु, रोग के प्रत्यक्ष सम्बंध पर ‘निर्णायक प्रमाण’ के अभाव की बात दोहराई जबकि सरकारी दस्तावेज स्वयं स्वीकार करते हैं कि वायु प्रदूषण मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा पर्यावरणीय जोखिम है और भारत में लगभग 12.5 प्रतिशत मौतें इससे जुड़ी मानी गई हैं। यह विरोधाभास केवल आंकड़ों का नहीं बल्कि नीति और जवाबदेही का प्रश्न बन गया है


संसद में 10 फरवरी को प्रस्तुत किए गए आंकड़ों ने देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य स्थिति और पर्यावरणीय संकट पर गम्भीर बहस को जन्म दे दिया है। केंद्र सरकार ने स्वीकार किया कि दिसम्बर 2025 में ही श्वसन तंत्र से सम्बंधित दवाओं की बिक्री का मूल्य 1,952.9 करोड़ रुपए रहा। यह कोई सामान्य मासिक उतार-चढ़ाव नहीं है बल्कि ऐसे समय का आंकड़ा है जब देश के कई महानगर खतरनाक स्तर के वायु प्रदूषण से जूझ रहे थे।
इसी के साथ सरकार ने यह भी बताया कि वर्ष 2024 में श्वसन तंत्र से जुड़ी दवाओं की कुल बिक्री 17,199 करोड़ रुपए थी जो वर्ष 2025 में बढ़कर 18,912 करोड़ रुपए हो गई। इस प्रकार केवल एक वर्ष में 1,713 करोड़ रुपए की वृद्धि दर्ज की गई। यह वृद्धि न केवल बाजार के विस्तार का संकेत है बल्कि श्वसन रोगों की बढ़ती व्यापकता का भी द्योतक मानी जा रही है।

 
संसद में उठे सवाल

पश्चिम बंगाल से सांसद सुष्मिता देव ने संसद में प्रश्न उठाया कि क्या सरकार ने दिसम्बर 2025 में 1,950 करोड़ रुपए से अधिक की रिकाॅर्ड बिक्री और प्रदूषण वाले महीनों में लगातार बढ़ती मांग पर ध्यान दिया है? उन्होंने यह भी पूछा कि क्या अस्थमा, दीर्घकालिक अवरोधक फुफ्फुसीय रोग और एलर्जी की दवाओं की तेज बिक्री इस बात का संकेत नहीं है कि वायु प्रदूषण से जुड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या मौसमी बीमारी से कहीं अधिक गम्भीर हो चुकी है?

इसके उत्तर में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने लिखित जवाब में बिक्री के आंकड़ों की पुष्टि की। उन्होंने बताया कि ये आंकड़े औषधि विभाग द्वारा उपलब्ध कराए गए हैं और बाजार सम्बंधी सूचनाओं के आधार पर संकलित किए गए हैं।

हालांकि जब प्रदूषण और रोग के प्रत्यक्ष सम्बंध की बात आई तो सरकार ने एक बार फिर कहा कि मृत्यु या रोग को केवल और विशेष रूप से वायु प्रदूषण से जोड़ने के लिए निर्णायक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। सरकार के अनुसार, वायु प्रदूषण श्वसन रोगों को बढ़ाने वाला एक कारक है लेकिन इसके साथ भोजन की आदतें, पेशागत परिस्थितियां, सामाजिक- आर्थिक स्थिति, रोग प्रतिरोधक क्षमता और आनुवंशिकता जैसे अन्य कारक भी प्रभाव डालते हैं।

गुजरात से सांसद गोविंद भाई लालजी भाई ढोलकिया द्वारा पूछे गए प्रश्न के उत्तर में भी सरकार ने यही रुख दोहराया। हालांकि यह जानकारी दी गई कि दीर्घकालिक श्वसन रोगों के सम्बंध में तकनीकी विशेषज्ञ समूह का गठन किया गया है जो विशेषज्ञ मार्गदर्शन और सिफारिशें प्रदान करेगा।
 
सरकारी दस्तावेजों में स्वीकारोक्ति

यहीं सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है। सरकार द्वारा 2019 से लागू नेशनल प्रोग्राम फाॅर क्लाइमेट चेंज एंड ह्यूमन हेल्थ के अंतर्गत तैयार स्वास्थ्य अनुकूलन योजना दस्तावेज में स्पष्ट उल्लेख है कि वायु प्रदूषण मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा पर्यावरणीय जोखिम है और यह एक ऐसा जोखिम कारक है जिससे बचा जा सकता है तथा जिसे रोका जा सकता है। उसी दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि भारत में लगभग 12.5 प्रतिशत मौतें वायु प्रदूषण से जुड़ी मानी गई हैं। दस्तावेज यह तर्क भी देता है कि वायु प्रदूषण के स्तर में कमी लाने से तीव्र एवं दीर्घकालिक श्वसन रोगों, हृदय रोग, स्ट्रोक तथा एलर्जी जैसी समस्याओं का बोझ घटाया जा सकता है। ऐसे में संसद में ‘निर्णायक प्रमाण उपलब्ध नहीं’ वाला कथन और सरकारी नीति दस्तावेजों की स्वीकारोक्ति, दोनों के बीच स्पष्ट विरोधाभास दिखाई देता है। यदि नीति दस्तावेज स्वयं वायु प्रदूषण को मृत्यु और रोग से जोड़ते हैं तो फिर संसद में प्रत्यक्ष सम्बंध से इनकार क्यों?
 
गैर-संचारी रोगों की बढ़ती चुनौती

सांसद अजीत कुमार भुइयां के प्रश्न के उत्तर में मंत्री ने इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि भारत में 61.8 प्रतिशत मौतें गैर-संचारी रोगों के कारण होती हैं। इनमें
28.1 प्रतिशत हृदय रोग, 10.9 प्रतिशत दीर्घकालिक श्वसन रोग, 8.3 प्रतिशत कैंसर और 6.5 प्रतिशत मधुमेह तथा अन्य सम्बंधित रोग शामिल हैं। यह भी कहा कि 1990 में गैर-संचारी रोगों का अनुपात 30.5 प्रतिशत था जो 2016 तक 55.4 प्रतिशत हो गया। यह वृद्धि केवल जीवनशैली में बदलाव का परिणाम नहीं मानी जा सकती बल्कि पर्यावरणीय कारकों, विशेषकर वायु प्रदूषण, का प्रभाव भी इसमें शामिल है।
 
अनुत्तरित प्रश्न

संसद में पूछे गए कई प्रश्नों के स्पष्ट और विस्तृत उत्तर नहीं दिए गए। पिछले पांच वर्षों में राज्यवार प्रदूषण-जनित श्वसन रोगों और मृत्यु के आंकड़े प्रस्तुत नहीं किए गए। फेफड़ों के स्वास्थ्य के लिए अलग कार्यबल के गठन के सम्बंध में भी स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। राष्ट्रीय स्तर पर वायु प्रदूषण से सम्बंधित बीमारियों की निगरानी के लिए निगरानी तंत्र होने की बात कही गई, परंतु विस्तृत परिणाम सार्वजनिक नहीं किए गए।
 
बढ़ती बिक्री का अर्थ

रेस्पिरेटरी दवाओं की बिक्री में 1,713 करोड़ रुपए की वार्षिक वृद्धि अपने आप में एक संकेत है। यह केवल औषधि उद्योग के विस्तार की कहानी नहीं है बल्कि यह उन लाखों लोगों की पीड़ा का आर्थिक प्रतिबिम्ब है जो अस्थमा, एलर्जी और दीर्घकालिक फेफड़ों की बीमारियों से जूझ रहे हैं। सर्दियों में उत्तर भारत के कई शहर घने धुंध और स्माॅग की चपेट में रहते हैं। ऐसे समय में बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों पर इसका गम्भीर प्रभाव पड़ता है। अस्पतालों में श्वसन रोगियों की संख्या बढ़ती है और दवाओं की मांग में तेज उछाल देखा जाता है।

यदि वायु प्रदूषण केवल ‘उत्तेजक कारक’ है तो प्रदूषण के चरम महीनों में दवाओं की मांग का बढ़ना किस ओर संकेत करता है? यह प्रश्न विशेषज्ञों और नागरिक समाज दोनों के सामने है।
 
नीति और जवाबदेही

स्वास्थ्य पर बढ़ता आर्थिक बोझ अंततः समाज और अर्थव्यवस्था दोनों पर प्रभाव डालता है। दवाओं पर होने वाला खर्च, अस्पतालों का दबाव, कार्यक्षमता में कमी और दीर्घकालिक रोगों का बोझ, ये सभी कारक देश की उत्पादकता और विकास को प्रभावित करते हैं।

वायु प्रदूषण को केवल पर्यावरणीय समस्या मानना पर्याप्त नहीं है। यह एक व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है। यदि 12.5 प्रतिशत मौतें इससे जुड़ी मानी जाती हैं तो यह केवल आंकड़ा नहीं बल्कि राष्ट्रीय चेतावनी है।

निष्कर्ष : संसद में प्रस्तुत आंकड़े स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि देश श्वसन और गैर-संचारी रोगों के बढ़ते संकट का सामना कर रहा है। 1,713 करोड़ रुपए की वार्षिक वृद्धि एक गम्भीर संकेत है।

सरकार के अपने दस्तावेज वायु प्रदूषण को मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा पर्यावरणीय जोखिम बताते हैं। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि समस्या को स्वीकार करते हुए ठोस कदम उठाए जाएं, वायु गुणवत्ता में सुधार, स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा, शहरी नियोजन में सुधार और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करना। आंकड़े केवल संख्या नहीं होते, वे समाज की सांसों का लेखा-जोखा होते हैं और जब सांसें महंगी होने लगें तो यह संकेत है कि नीति और प्राथमिकताओं की पुनर्समीक्षा का समय आ चुका है।

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