भारत आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां विकास, बुनियादी ढांचे और औद्योगिक विस्तार की रफ्तार तेज है। सड़कें बन रही हैं, बंदरगाह विकसित हो रहे हैं, खनन परियोजनाएं बढ़ रही हैं और बड़े औद्योगिक घरानों को नई परियोजनाओं के लिए जमीन दी जा रही है लेकिन इस विकास की कीमत कौन चुका रहा है? उत्तर है पर्यावरण। ऐसे में जब जंगलों की सुरक्षा पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो चुकी है, फाॅरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (एफएसआई) की एक महत्वपूर्ण तकनीकी पहल अचानक बंद हो जाना कई गम्भीर सवाल खड़े करती है
अंग्रेजी दैनिक ‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ ने 10 मार्च को एक समाचार प्रकाशित किया है जो पर्यावरण संरक्षण को लेकर केंद्र सरकार की मंशा पर बड़े सवाल खड़े करता है। इस समाचार के अनुसार केंद्र सरकार के फाॅरेस्ट सर्वे आॅफ इंडिया (एफएसआई) ने अपनी एआई आधारित ‘अनावरण डिफाॅरेस्टेशन अलर्ट प्रणाली’ के तहत राज्यों को भेजे जाने वाले पंद्रह-दिवसीय चेतावनी संदेश बंद कर दिए हैं। यह प्रणाली उपग्रह चित्रों और मशीन लर्निंग के आधार पर जंगलों में होने वाली कटाई की पहचान करती थी और राज्यों को तुरंत सूचना देती थी। यह पहल न केवल तकनीकी रूप से उन्नत थी बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी मानी जा रही थी लेकिन अब यह लगभग ठप हो चुकी है और इसी के चलते सवाल पैदा होता है कि जब यह प्रणाली काम कर रही थी तो इसे बंद क्यों किया गया?
क्या है ‘अनावरण डिफॉरेस्टेशन अलर्ट सिस्टम’
‘अनावरण’ नाम की यह प्रणाली भारत में जंगलों की निगरानी के लिए विकसित की गई एक आधुनिक तकनीकी व्यवस्था है। इसे 2024 में शुरू किया गया था और इसका उद्देश्य है जंगलों में हो रही कटाई की लगभग वास्तविक समय में निगरानी करना। यह प्रणाली यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के उपग्रहों के डेटा तथा गूगल अर्थ (Google Earth Engine) प्लेटफार्म का उपयोग करती थी।
मशीन लर्निंग एल्गोरिद्म उपग्रह चित्रों का विश्लेषण करके यह पहचान लेते हैं कि किसी क्षेत्र में पेड़ों की संख्या कम हुई है या नहीं। यदि किसी क्षेत्र में जंगल का नुकसान दिखाई देता था तो सिस्टम उस स्थान की सटीक लोकेशन के साथ राज्यों को चेतावनी भेज देता है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि राज्य सरकारें तुरंत मौके पर जाकर जांच कर सकती हैं और यदि कटाई अवैध है तो उसे रोक सकती हैं।
इस प्रणाली के आंकड़े बताते हैं कि जनवरी 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच 12 हजार से अधिक डिफाॅरेस्टेशन अलर्ट जारी किए गए। औसतन हर महीने लगभग 561 चेतावनियां राज्यों को भेजी जाती थीं। दिलचस्प बात यह भी है कि गत् वर्ष नवम्बर से मार्च के बीच यह संख्या बढ़कर लगभग 1000 से अधिक अलर्ट प्रति माह तक पहुंच गई थी। इसका कारण यह बताया गया कि इस समय मौसम अनुकूल होता है और कई जगहों पर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई होती है। यानी यह प्रणाली केवल प्रयोगात्मक नहीं है बल्कि यह वास्तव में जंगलों में हो रहे बदलावों की पहचान कर रही है।
समाचार के अनुसार इस प्रणाली का डेटा नवम्बर 2025 के बाद अपडेट नहीं किया गया है और जनवरी 2026 से राज्यों को चेतावनियां मिलना बंद हो गई हैं। ‘फाॅरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया’ के अधिकारियों का कहना है कि यह केवल एक पायलट प्रोजेक्ट था और अभी इसकी उपयोगिता का आकलन किया जा रहा है लेकिन यह तर्क कई लोगों को संतोषजनक नहीं लगता। यदि कोई तकनीक दो वर्षों तक काम कर रही थी और हजारों चेतावनियां जारी कर चुकी थी तो अचानक उसकी उपयोगिता पर सवाल क्यों उठाया गया?
अनावरण प्रणाली के आंकड़ों के अनुसार कई राज्यों में जंगलों की कटाई के संकेत मिले थे। जिनमें प्रमुख रूप से पंजाब, आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश नागालैंड, मणिपुर, उत्तराखण्ड, असम, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्य शामिल हैं। यह सूची बताती है कि जंगलों पर दबाव केवल एक या दो राज्यों तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे देश में जंगल विभिन्न कारणों से प्रभावित हो रहे हैं।
पिछले कुछ वर्षों में भारत में बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे की परियोजनाएं शुरू हुई हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग, बंदरगाह, खनन, औद्योगिक काॅरिडोर और ऊर्जा परियोजनाओं के लिए बड़ी मात्रा में भूमि की आवश्यकता होती है। कई बार यह भूमि जंगलों से ली जाती है। सरकार का तर्क है कि विकास के लिए यह जरूरी है लेकिन पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि जंगलों की निगरानी कमजोर कर दी जाएगी तो इसका परिणाम दीर्घकालिक पर्यावरणीय संकट के रूप में सामने आ सकता है।
देश के कई हिस्सों में चल रही परियोजनाओं को लेकर पर्यावरणीय चिंताएं सामने आती रही हैं। उदाहरण के तौर पर अडानी समूह को दिया गया अंडमान-निकोबार में ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट खनन और ऊर्जा परियोजनाएं, औद्योगिक काॅरिडोर, बंदरगाह विकास परियोजनाएं आदि को लेकर स्थानीय नागरिक एवं पर्यावरण समूह आरोप लगाते रहते हैं कि इनके कारण बड़े पैमाने पर जंगल प्रभावित हो रहे हैं।
यहां एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है। यदि हर 15 दिन में उपग्रह के आधार पर जंगलों की कटाई का डेटा उपलब्ध रहेगा तो यह केवल सरकार ही नहीं बल्कि नागरिक समाज और मीडिया के लिए भी एक महत्वपूर्ण निगरानी उपकरण बन सकता है। इससे यह पता लगाया जा सकता था कि कहां जंगल तेजी से कम हो रहे हैं, किन परियोजनाओं के कारण कटाई हो रही है और क्या पर्यावरणीय नियमों का पालन हो रहा है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि सम्भवतः यही पारदर्शिता कुछ शक्तिशाली हितों के लिए असहज हो सकती है।
गौरतलब है कि दुनिया के कई देशों में जंगलों की निगरानी के लिए उपग्रह आधारित प्रणाली का उपयोग किया जा रहा है। उदाहरण के लिए लैटिन अमेरिका के कई देशों में डिफॉरेस्टेशन अलर्ट सिस्टम पहले से लागू हैं। पेरू ने 2014 में उपग्रह आधारित प्रणाली शुरू की थी जो नियमित रूप से जंगलों की स्थिति पर निगरानी रखती है। भारत की अनावरण प्रणाली तो इससे भी आगे मानी जा रही थी क्योंकि यह हर 15 दिन में चेतावनी भेज रही थी।
क्या यह कदम पीछे जाना है?
आज जलवायु परिवर्तन दुनिया की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। जंगल कार्बन को अवशोषित करके पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत ने भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कार्बन उत्सर्जन कम करने और हरित क्षेत्र बढ़ाने के वादे किए हैं। ऐसे समय में जंगलों की निगरानी करने वाली प्रणाली का बंद हो जाना बेहद चिंता का विषय है।
इस पूरे मामले में कुछ बुनियादी सवाल उठते हैं जैसे क्या अनावरण प्रणाली को स्थायी रूप से बंद कर दिया गया है? यदि नहीं तो इसे कब दोबारा शुरू किया जाएगा? क्या जंगलों की निगरानी के लिए कोई नई प्रणाली विकसित की जा रही है? सबसे महत्वपूर्ण कि क्या देश में विकास परियोजनाओं के कारण जंगलों पर पड़ रहे दबाव को छिपाने की कोशिश तो नहीं हो रही?
जंगलों का सवाल केवल पर्यावरण का नहीं, जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते। वे जलवायु संतुलन बनाए रखते हैं, नदियों को जीवन देते हैं, जैव विविधता को सुरक्षित रखते हैं और लाखों आदिवासी तथा ग्रामीण समुदायों की आजीविका का आधार होते हैं। यदि जंगल कमजोर होंगे तो उसका असर केवल पर्यावरण पर नहीं बल्कि समाज और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।
एक तकनीकी पहल जो उम्मीद जगा रही थी ‘अनावरण प्रणाली’ यह दिखाती थी कि आधुनिक तकनीक का उपयोग करके जंगलों की बेहतर निगरानी की जा सकती है। यह पहल भारत को पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में तकनीकी रूप से आगे ले जा सकती थी लेकिन इसका अचानक रुक जाना यह संकेत देता है कि शायद विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना अभी भी हमारे नीति-निर्माताओं के लिए एक चुनौती बना हुआ है। अंततः सवाल नीति का है।
जंगलों की रक्षा केवल कानूनों या तकनीक से नहीं होगी बल्कि इसके लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति भी जरूरी है। यदि देश वास्तव में पर्यावरण संरक्षण के प्रति गम्भीर है तो जंगलों की निगरानी को और मजबूत किया जाना चाहिए, न कि कमजोर। ‘अनावरण प्रणाली’ को बंद करने का निर्णय केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं है वरन् यह भारत के पर्यावरणीय भविष्य से जुड़ा हुआ सवाल है और इस सवाल का जवाब देश को जरूर मिलना चाहिए।
दो वर्षों में हजारों चेतावनियां
इस प्रणाली के आंकड़े बताते हैं कि जनवरी 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच 12 हजार से अधिक डिफाॅरेस्टेशन अलर्ट जारी किए गए। औसतन हर महीने लगभग 561 चेतावनियां राज्यों को भेजी जाती थीं। दिलचस्प बात यह भी है कि गत् वर्ष नवम्बर से मार्च के बीच यह संख्या बढ़कर लगभग 1000 से अधिक अलर्ट प्रति माह तक पहुंच गई थी। इसका कारण यह बताया गया कि इस समय मौसम अनुकूल होता है और कई जगहों पर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई होती है। यानी यह प्रणाली केवल प्रयोगात्मक नहीं है बल्कि यह वास्तव में जंगलों में हो रहे बदलावों की पहचान कर रही है।
नवम्बर 2025 के बाद क्यों बंद हो गई प्रणाली?
समाचार के अनुसार इस प्रणाली का डेटा नवम्बर 2025 के बाद अपडेट नहीं किया गया है और जनवरी 2026 से राज्यों को चेतावनियां मिलना बंद हो गई हैं। ‘फाॅरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया’ के अधिकारियों का कहना है कि यह केवल एक पायलट प्रोजेक्ट था और अभी इसकी उपयोगिता का आकलन किया जा रहा है लेकिन यह तर्क कई लोगों को संतोषजनक नहीं लगता। यदि कोई तकनीक दो वर्षों तक काम कर रही थी और हजारों चेतावनियां जारी कर चुकी थी तो अचानक उसकी उपयोगिता पर सवाल क्यों उठाया गया?
किन राज्यों में मिले थे सबसे ज्यादा संकेत
अनावरण प्रणाली के आंकड़ों के अनुसार कई राज्यों में जंगलों की कटाई के संकेत मिले थे। जिनमें प्रमुख रूप से पंजाब, आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश नागालैंड, मणिपुर, उत्तराखण्ड, असम, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्य शामिल हैं। यह सूची बताती है कि जंगलों पर दबाव केवल एक या दो राज्यों तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे देश में जंगल विभिन्न कारणों से प्रभावित हो रहे हैं।
विकास बनाम पर्यावरण
पिछले कुछ वर्षों में भारत में बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे की परियोजनाएं शुरू हुई हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग, बंदरगाह, खनन, औद्योगिक काॅरिडोर और ऊर्जा परियोजनाओं के लिए बड़ी मात्रा में भूमि की आवश्यकता होती है। कई बार यह भूमि जंगलों से ली जाती है। सरकार का तर्क है कि विकास के लिए यह जरूरी है लेकिन पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि जंगलों की निगरानी कमजोर कर दी जाएगी तो इसका परिणाम दीर्घकालिक पर्यावरणीय संकट के रूप में सामने आ सकता है।
अंडमान-निकोबार और अन्य परियोजनाओं पर विवाद
देश के कई हिस्सों में चल रही परियोजनाओं को लेकर पर्यावरणीय चिंताएं सामने आती रही हैं। उदाहरण के तौर पर अडानी समूह को दिया गया अंडमान-निकोबार में ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट खनन और ऊर्जा परियोजनाएं, औद्योगिक काॅरिडोर, बंदरगाह विकास परियोजनाएं आदि को लेकर स्थानीय नागरिक एवं पर्यावरण समूह आरोप लगाते रहते हैं कि इनके कारण बड़े पैमाने पर जंगल प्रभावित हो रहे हैं।
क्या पारदर्शिता से असहजता?
यहां एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है। यदि हर 15 दिन में उपग्रह के आधार पर जंगलों की कटाई का डेटा उपलब्ध रहेगा तो यह केवल सरकार ही नहीं बल्कि नागरिक समाज और मीडिया के लिए भी एक महत्वपूर्ण निगरानी उपकरण बन सकता है। इससे यह पता लगाया जा सकता था कि कहां जंगल तेजी से कम हो रहे हैं, किन परियोजनाओं के कारण कटाई हो रही है और क्या पर्यावरणीय नियमों का पालन हो रहा है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि सम्भवतः यही पारदर्शिता कुछ शक्तिशाली हितों के लिए असहज हो सकती है।
दुनिया में बढ़ रही है ऐसी निगरानी
गौरतलब है कि दुनिया के कई देशों में जंगलों की निगरानी के लिए उपग्रह आधारित प्रणाली का उपयोग किया जा रहा है। उदाहरण के लिए लैटिन अमेरिका के कई देशों में डिफॉरेस्टेशन अलर्ट सिस्टम पहले से लागू हैं। पेरू ने 2014 में उपग्रह आधारित प्रणाली शुरू की थी जो नियमित रूप से जंगलों की स्थिति पर निगरानी रखती है। भारत की अनावरण प्रणाली तो इससे भी आगे मानी जा रही थी क्योंकि यह हर 15 दिन में चेतावनी भेज रही थी।
क्या यह कदम पीछे जाना है?
आज जलवायु परिवर्तन दुनिया की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। जंगल कार्बन को अवशोषित करके पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत ने भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कार्बन उत्सर्जन कम करने और हरित क्षेत्र बढ़ाने के वादे किए हैं। ऐसे समय में जंगलों की निगरानी करने वाली प्रणाली का बंद हो जाना बेहद चिंता का विषय है।
सरकार को देना होगा स्पष्ट जवाब
इस पूरे मामले में कुछ बुनियादी सवाल उठते हैं जैसे क्या अनावरण प्रणाली को स्थायी रूप से बंद कर दिया गया है? यदि नहीं तो इसे कब दोबारा शुरू किया जाएगा? क्या जंगलों की निगरानी के लिए कोई नई प्रणाली विकसित की जा रही है? सबसे महत्वपूर्ण कि क्या देश में विकास परियोजनाओं के कारण जंगलों पर पड़ रहे दबाव को छिपाने की कोशिश तो नहीं हो रही?
जंगलों का सवाल केवल पर्यावरण का नहीं, जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते। वे जलवायु संतुलन बनाए रखते हैं, नदियों को जीवन देते हैं, जैव विविधता को सुरक्षित रखते हैं और लाखों आदिवासी तथा ग्रामीण समुदायों की आजीविका का आधार होते हैं। यदि जंगल कमजोर होंगे तो उसका असर केवल पर्यावरण पर नहीं बल्कि समाज और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।
एक तकनीकी पहल जो उम्मीद जगा रही थी ‘अनावरण प्रणाली’ यह दिखाती थी कि आधुनिक तकनीक का उपयोग करके जंगलों की बेहतर निगरानी की जा सकती है। यह पहल भारत को पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में तकनीकी रूप से आगे ले जा सकती थी लेकिन इसका अचानक रुक जाना यह संकेत देता है कि शायद विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना अभी भी हमारे नीति-निर्माताओं के लिए एक चुनौती बना हुआ है। अंततः सवाल नीति का है।
जंगलों की रक्षा केवल कानूनों या तकनीक से नहीं होगी बल्कि इसके लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति भी जरूरी है। यदि देश वास्तव में पर्यावरण संरक्षण के प्रति गम्भीर है तो जंगलों की निगरानी को और मजबूत किया जाना चाहिए, न कि कमजोर। ‘अनावरण प्रणाली’ को बंद करने का निर्णय केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं है वरन् यह भारत के पर्यावरणीय भविष्य से जुड़ा हुआ सवाल है और इस सवाल का जवाब देश को जरूर मिलना चाहिए।