जेपी एसोसिएट्स मामले में वेदांता की सुप्रीम कोर्ट में चुनौती ने उस बहस को फिर जिंदा कर दिया है जिसे नेता विपक्ष राहुल गांधी वर्षों से उठाते रहे हैं। ‘हम दो, हमारे दो’ का आरोप अब बदलकर ‘हम दो, हमारा एक, सिर्फ अडानी’ की राजनीतिक धारणा में तब्दील होता दिख रहा है। वेदांता के चेयरमैन अनिल अग्रवाल के ‘हमें लिखित में जीत की सूचना दी गई थी लेकिन फैसला बदल दिया गया’ वाले बयान ने इस धारणा को और गहरा कर दिया है कि क्या देश की बड़ी आर्थिक सम्पत्तियां और फैसले लगातार एक ही काॅरपोरेट समूह की ओर झुकते जा रहे हैं
यह सिर्फ एक खबर नहीं है बल्कि उस दौर की कहानी है जहां देश का आर्थिक ढांचा, नीतिगत फैसले और काॅरपोरेट ताकत एक-दूसरे से इस तरह उलझते नजर आ रहे हैं कि सच और धारणा के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। वेदांता लिमिटेड द्वारा अडानी एंटरप्राइजेज की जेपी एसोसिएट्स के लिए दिवालिया समाधान योजना को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के बाद यह विवाद अब केवल अदालत की फाइलों तक सीमित नहीं है बल्कि यह उस बड़े सवाल का हिस्सा बन गया है, क्या भारत में बड़े आर्थिक फैसले वास्तव में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा से तय होते हैं या फिर शक्ति संतुलन कहीं और तय होता है।
इस पूरे घटनाक्रम को सबसे ज्यादा धार उस समय मिली जब वेदांता समूह के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने 29 मार्च 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफाॅर्म एक्स पर एक लम्बा संदेश लिखा। उन्होंने शुरुआत भगवद्गीता के श्लोक से की-‘‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।।’’
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।।’’
और फिर उसका अंग्रेजी अर्थ लिखा-“You have a right to perform your duty, but not to the fruits of your actions.” इसके बाद उन्होंने जो कहा, उसने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए-“We participated in the resolution process for Jaiprakash Associates with full sincerity and transparency. It was a transparent process. We were informed in writing that we had won. But life is never so simple. After some days, the decision was changed. I do not want to go into details, but this has been a learning experience- We will continue to pursue the matter through appropriate channels.” (हमने जयप्रकाश एसोसिएट्स को खरीदने के लिए पूरी पारदर्शिता और ईमानदारी से प्रयास किया। हमें लिखित में बताया गया कि हम टेंडर जीत गए हैं। जीवन लेकिन इतना सरल नहीं होता। कुछ दिनों बाद निर्णय बदल दिया गया। मैं विस्तार में नहीं जाना चाहता लेकिन यह एक सबक है। हम इस सम्बंध में सही कदम उठाते रहेंगे।) यह केवल एक बयान नहीं था बल्कि उस प्रक्रिया पर सीधा आरोप था जिसे आधिकारिक तौर पर ‘पारदर्शी’ बताया जा रहा था।
करीब 57 हजार करोड़ रुपए के कर्ज में डूबी जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड के लिए चली इस प्रक्रिया में अंततः अडानी समूह की योजना को 93.81 प्रतिशत वोट के साथ मंजूरी मिली और राष्ट्रीय कम्पनी विधि अधिकरण ने इसे स्वीकृति दे दी। लेकिन वेदांता के आरोपों ने इस पूरी प्रक्रिया को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है।
अगर इस एक मामले को अलग रखकर देखा जाए तो यह सामान्य काॅरपोरेट प्रतिस्पर्धा लग सकती है लेकिन जब इसे पिछले कुछ वर्षों में अडानी समूह को मिले बड़े प्रोजेक्ट्स और फैसलों के साथ जोड़ा जाता है तो एक अलग तस्वीर उभरती है, एक ऐसा समूह जो बंदरगाह से लेकर एयरपोर्ट, बिजली से लेकर सीमेंट और अब बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर स्टेेट्स तक तेजी से फैलता जा रहा है।
2019-20 का एयरपोर्ट निजीकरण इसका सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। बिना किसी पूर्व अनुभव के अडानी समूह को देश के छह प्रमुख एयरपोर्ट्स का संचालन मिलना अपने आप में बड़ा सवाल बना। खास तौर पर छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, जो पहले जीवीके समूह के पास था, बाद में अडानी समूह के नियंत्रण में चला गया। जीवीके समूह वित्तीय दबाव में जरूर था लेकिन आलोचकों का कहना रहा कि यह केवल एक सामान्य अधिग्रहण नहीं था। आरोप लगे कि बैंकों, नीतिगत फैसलों और परिस्थितियों ने मिलकर ऐसा माहौल बनाया जिसमें अंततः नियंत्रण एक ही दिशा में गया। यह भी कहा गया कि वैश्विक स्तर पर अनुभवी कम्पनियों की मौजूदगी के बावजूद जिस तेजी से यह ट्रांजिशन हुआ, उसने कई सवाल खड़े किए।
अंडमान-निकोबार में ग्रेट निकोबार परियोजना इस बहस को और जटिल बनाती है। यहां एक तरफ इसे रणनीतिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण बताया जाता है वहीं दूसरी ओर पर्यावरणविद इसे पारिस्थितिकी के लिए गम्भीर खतरा मानते हैं। लाखों पेड़ों की कटाई, संवेदनशील जैव विविधता पर प्रभाव और स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले असर को लेकर लगातार चिंता जताई गई है। सवाल यह है कि क्या विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन वास्तव में कायम है या फिर बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए नियमों को लचीला बनाया जा रहा है।
बिहार में जमीन आवंटन का मामला इस पूरे विमर्श में एक और अहम कड़ी जोड़ता है। औद्योगिक निवेश के नाम पर अडानी समूह को दी गई जमीन को लेकर यह आरोप सामने आए कि लीज दरें वास्तविक बाजार मूल्य की तुलना में काफी कम थीं। यह भी कहा गया कि लम्बे समय के लिए तय की गई इन लीज शर्तों से कम्पनी को स्थायी लाभ मिल सकता है जबकि राज्य को तत्काल राजस्व के रूप में सीमित फायदा होता है।
यह तर्क दिया जाता है कि निवेश आकर्षित करने के लिए राज्यों को ऐसी नीतियां अपनानी पड़ती हैं लेकिन सवाल यह है कि क्या यही सुविधा हर निवेशक को समान रूप से मिलती है या फिर कुछ चुनिंदा समूहों को प्राथमिकता दी जाती है।
2023 में हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट ने अडानी समूह को वैश्विक स्तर पर विवादों में ला दिया। शेयर बाजार में आई भारी गिरावट और उसके बाद की जांचों ने यह सवाल उठाया कि क्या भारत में कॉर्पोरेट गवर्नेंस के मानक पर्याप्त मजबूत हैं। हालांकि समूह ने इन सभी आरोपों को खारिज किया लेकिन इससे यह धारणा जरूर बनी कि निगरानी और जवाबदेही को लेकर अभी भी कई खामियां हैं।
इन सभी घटनाओं को एक साथ देखने पर एक पैटर्न उभरता है, तेजी से विस्तार करता एक समूह, हर बड़े सेक्टर में मौजूदगी और हर बड़े फैसले के साथ उठते सवाल। यही वह पैटर्न है जिसे लेकर राहुल गांधी लगातार सरकार पर निशाना साधते रहे हैं।
अब जब जेपी एसोसिएट्स का मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच चुका है तो यह केवल एक डील का मामला नहीं रहेगा। यह तय करेगा कि क्या भारत की काॅरपोरेट प्रक्रियाएं वास्तव में निष्पक्ष हैं या फिर वे उस बड़े प्रभाव का हिस्सा हैं जिसकी चर्चा अब खुलकर होने लगी है।
अंततः यह सवाल सिर्फ अडानी या वेदांता का नहीं है। यह उस भरोसे का सवाल है जिस पर देश की आर्थिक व्यवस्था टिकी होती है। अगर फैसलों पर सवाल उठते रहेंगे और उनके जवाब स्पष्ट नहीं होंगे तो यह बहस और गहरी होती जाएगी।
‘सब कुछ अडानी का…’, यह अब केवल एक नारा नहीं बल्कि एक ऐसी बहस का केंद्र बन चुका है जिसका असर आने वाले समय में भारत की आर्थिक और राजनीतिक दिशा दोनों को प्रभावित कर सकता है।