उत्तराखण्ड कांग्रेस की राजनीति इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है जहां सतह पर भले ही सब कुछ सामान्य दिखे लेकिन भीतर गहरे स्तर पर असंतोष, असहमति और शक्ति संतुलन की जंग चल रही है। इस पूरे परिदृश्य के केंद्र में एक बार फिर वही नाम है जिसने राज्य गठन के बाद से कांग्रेस की राजनीति को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है हरीश रावत। हाल ही में रावत द्वारा लिया गया ‘अर्जित अवकाश’ जिसमें उन्होंने 15 दिनों तक राजनीति पर कुछ भी न बोलने की घोषणा की है, केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संकेत माना जा रहा है।
दरअसल यदि इस ‘अर्जित अवकाश’ को समझना है तो उससे पहले के संकेतों को पढ़ना होगा, खासतौर पर वे जो खुद हरीश रावत ने सार्वजनिक रूप से दिए थे। अक्टूबर 2025 में उनकी दो महत्वपूर्ण फेसबुक पोस्ट इस पूरे घटनाक्रम को समझने की कुंजी प्रदान करती हैं।
लालबत्ती तब से लेकर मेरे कार्यकाल तक गले की फांस बनी रही।’’
यह उनका आधिकारिक पक्ष है लेकिन जमीनी अनुभव और
राजनीतिक स्मृतियां एक अलग तस्वीर भी प्रस्तुत करती हैं। मैं स्वयं गवाह हूं उस दौर का। एक बार देहरादून की विथिकाओं में मुझे अपनी सरकारी कार में घुमाते हुए स्वयं एन.डी. तिवारी ने मुझसे कहा था कि हरीश रावत मेरी सरकार को अस्थिर करने में लगे हुए हैं। इसी तरह, जब हरीश रावत ने मुरली मनोहर जोशी को हराकर अपनी पहचान बनाई, उसके बाद अल्मोड़ा के ब्राह्माण मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग उनसे दूरी बनाता हुआ नजर आया। स्वयं हरीश रावतजी ने मुझे यह बात कही थी, हालांकि बाद में उन्होंने इससे इनकार किया। यानी हरीश रावत की राजनीति में एक निरंतर विरोधाभास दिखाई देता है, छवि और धारणा के बीच का। आज जब 2027 का चुनाव सामने है तो कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि वह इस विरोधाभास को कैसे संतुलित करती है। यदि पार्टी रावत को पूरी तरह नजरअंदाज करती है तो वह अपने सबसे बड़े जनाधार वाले नेता को खोने का जोखिम उठाएगी और यदि केवल उन्हीं पर निर्भर रहती है तो नए नेतृत्व के उभार को रोकने का खतरा रहेगा। फिलहाल, ‘अर्जित अवकाश’ केवल एक ब्रेक नहीं है, यह एक राजनीतिक संदेश है और यह संदेश साफ है कि उत्तराखण्ड कांग्रेस भीतर असंतोष अब गहराई तक पहुंच चुका है और यदि इसे समय रहते संतुलित नहीं किया गया तो 2027 में इसका सीधा असर दिखाई देगा।
करीब 59 वर्षों से अधिक के परिणय-सूत्र बंधन के इस लम्बे दौर में निरंतर कर्तव्यरत रहने के दौरान एक छोटा अर्जित अवकाश लेना मेरा स्वाभाविक अधिकार बनता है। अटूट गठबंधन के दौरान कभी-कभी कुछ ऐसे क्षण आ सकते हैं, जब आप थोड़ी असहजता का अनुभव कर सकते हैं। बड़े परिप्रेक्ष्य में स्थितियों को समझना पड़ता है। मैं विनती पूर्वक कहना चाहता हूं कि मेरे इस ‘अर्जित अवकाश’ को लेकर पक्ष-विपक्ष न बनाया जाए। श्री
गोविंद सिंह कुंजवाल जी से मेरा लम्बा मानसिक, भावनात्मक सम्बंध है, उनके शब्द स्वाभाविक हैं। कुछ लोग तो होंगे जिन्होंने मुझे भ्रातृवत् या पितृवत माना होगा, उनकी भी कुछ भावनाएं हो सकती हैं, फिर भी मैं माफी चाहूंगा। मुझे हमेशा 59 वर्षों की अथक यात्रा के दौरान इस बात का स्मरण रहा है कि मैं पार्टी का कार्यकर्ता हूं, अंतिम रूप से पार्टी के सर्वोच्च नेतृत्व का निर्णय ही मैंने हमेशा शिरोधार्य माना है। कभी थोड़ी विनती कर दी होगी, मगर अंततोगत्वा शीर्ष के निर्णय को ही शिरोधार्य किया है। इतने लम्बे व्रत, जो अब संकल्प का रूप ले चुका है, वह अब न टूटेगा और न बदलेगा। नौजवान, जिनको 2027 में अपने लिए सम्भावनाएं दिखाई दे रही हैं, मैं उनसे कहना चाहता हूं, महर्षि दधीचि की तरह यदि उन्हें मेरी हड्डियों की आवश्यकता भी होगी तो हरीश रावत की हड्डियां भी उनके भविष्य को संवारने के लिए हमेशा उपलब्ध रहेंगी। अवकाश के दौरान भी मैं निरंतर सक्रिय हूं और निरंतर अपनी हड्डियां घिस रहा हूं। इस लम्बे अंतराल के दौरान मेरा कई लोगों, समूहों, क्षेत्रों, मान्यताओं, जन अपेक्षाओं के साथ जुड़ाव रहा है। जीवन के इस मोड़ में मुझे उनके परामर्श की भी आवश्यकता है और उनसे अपने जुड़ाव को दोहराने के लिए उनके मध्य जाने की आवश्यकता को भी मैं महसूस करता हूं। मुझको लेकर उत्सुकता रखने वाले समीक्षकों का मैं आभारी हूं।
हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड