उत्तराखण्ड भाजपा में विधानसभा चुनाव से पहले बड़े संगठनात्मक बदलाव की तैयारी तेज हो गई है। अंकिता भंडारी प्रकरण के बाद विवादों में आए प्रदेश प्रभारी दुष्यंत गौतम को हटाया जाना लगभग तय है, वहीं संगठन और सरकार के बीच तालमेल और कथित भ्रष्टाचार के आरोप चलते संगठन मंत्री अजय कुमार की विदाई की चर्चा भी जोरों पर है। गढ़वाल और ब्राह्माण समीकरण साधने के लिए पूर्व महामंत्री आदित्य कोठारी को बड़ी जिम्मेदारी दिए जाने तथा पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को फिर से मुख्यधारा की राजनीति में सक्रिय करने की चर्चाएं तेज हैं। पार्टी के आंतरिक सर्वे में करीब एक दर्जन विधायकों की रिपोर्ट कमजोर आने की खबरों ने सत्ता और संगठन की बेचैनी बढ़ा दी है। कई मौजूदा विधायकों के टिकट कटने की सम्भावना जताई जा रही है। कुल मिलाकर भाजपा चुनाव से पहले संगठन स्तर पर बड़े फेरबदल की तैयारी में दिखाई दे रही है
उत्तराखण्ड की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी अब पूरी तरह चुनावी मोड में दिखाई देने लगी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का लक्ष्य लेकर चल रही भाजपा अब सरकार के बाद संगठन में बड़े बदलाव की तैयारी कर रही है। दिल्ली से लेकर देहरादून तक राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि पार्टी हाईकमान आगामी विधानसभा चुनाव से पहले उत्तराखण्ड भाजपा के संगठनात्मक ढांचे में व्यापक फेरबदल करने जा रहा है।
धामी मंत्रिमंडल का विस्तार पहले ही किया जा चुका है। इसके बाद अब संगठन की बारी मानी जा रही है। भाजपा नेतृत्व का मानना है कि केवल सरकार के फैसलों से चुनाव नहीं जीते जाते बल्कि बुथ स्तर तक मजबूत और चुस्त संगठन ही चुनावी जीत की असली गारंटी होता है। यही कारण है कि दिल्ली में बैठे केंद्रीय नेतृत्व ने उत्तराखण्ड संगठन की समीक्षा शुरू कर दी है।
सूत्रों के अनुसार इस समीक्षा में कई चैंकाने वाले निष्कर्ष सामने आए हैं। पार्टी के भीतर यह स्वीकार किया जा रहा है कि सरकार की लोकप्रियता और मुख्यमंत्री धामी की व्यक्तिगत छवि के बावजूद संगठनात्मक स्तर पर कई कमियां हैं। कुछ जिलों में पार्टी कार्यकर्ताओं में असंतोष है, कई विधायक जनता के बीच कमजोर माने जा रहे हैं और कुछ नेताओं को लेकर लगातार विवाद भी पार्टी की चिंता बढ़ा रहे हैं। यही वजह है कि भाजपा अब ‘सर्जिकल बदलाव’ की रणनीति पर काम कर रही है।
सबसे अधिक चर्चा प्रदेश प्रभारी दुष्यंत गौतम को लेकर है। अंकिता भंडारी हत्याकांड के बाद जिस तरह से गौतम का नाम कथित वीआईपी बतौर उछला और विपक्ष ने भाजपा तथा उसके नेताओं को घेरा, उसका असर पार्टी संगठन के भीतर भी महसूस किया जा रहा है। पिछले कुछ महीनों में कई कार्यक्रमों और बैठकों में दुष्यंत गौतम की भूमिका सीमित दिखाई दी। यहां तक कि पार्टी के कुछ बड़े आयोजनों के पोस्टरों और होर्डिंग्स से भी उनका चेहरा गायब देखा गया। इससे स्पष्ट है कि भाजपा नेतृत्व ने उन्हें धीरे-धीरे किनारे करना शुरू कर दिया है।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि भाजपा आगामी चुनाव में अंकिता भंडारी प्रकरण की छाया से बाहर निकलना चाहती है। विपक्ष लगातार यह आरोप लगाता रहा है कि इस मामले में गौतम समेत कई प्रभावशाली लोगों को बचाने की कोशिश हुई है। कांग्रेस ने इसे सत्ता संरक्षण और वीआईपी संस्कृति से जोड़ा। ऐसे में भाजपा कोई भी ऐसा चेहरा चुनाव से पहले नहीं रखना चाहती जिस पर विपक्ष हमला बोल सके। यही कारण है कि दुष्यंत गौतम को हटाने की चर्चा अब लगभग तय मानी जा रही है। सूत्र बताते हैं कि भाजपा नेतृत्व उत्तराखण्ड के लिए नए प्रभारी की तलाश कर चुका है। संगठन के भीतर ऐसे नेता को जिम्मेदारी देने की चर्चा है जिसकी छवि अपेक्षाकृत साफ हो और जो पहाड़ तथा मैदान दोनों क्षेत्रों में संतुलन बना सके। भाजपा की केंद्रीय रणनीति यह है कि चुनाव से पहले राज्य इकाई में नई ऊर्जा और नया संदेश दिया जाए।
इसी तरह संगठन मंत्री अजय कुमार का नाम भी चर्चाओं में है। पार्टी के भीतर लम्बे समय से यह कहा जा रहा है कि संगठन और सरकार के बीच तालमेल अपेक्षित स्तर का नहीं रहा। कई जिलों से कार्यकर्ताओं की शिकायतें लगातार दिल्ली तक पहुंची हैं। अजय कुमार की कार्यशैली, विशेषकर संगठन एवं सरकार में पदों की बंदरबांट और आर्थिक लेन-देन के आरोप चलते उनकी भी विदाई तय बताई जा रही है। राजनीतिक गलियारों में यह भी कहा जा रहा है कि संघ की तरफ से भी कुछ नामों पर चर्चा चल रही है।
कोठारी की हो सकती है वापसी
पार्टी के भीतर जिन नामों को लेकर सबसे अधिक चर्चा है उनमें प्रदेश भाजपा के महामंत्री रह चुके आदित्य कोठारी का नाम तेजी से उभर रहा है। संगठन के भीतर यह माना जाता रहा है कि जब वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का कार्यकाल समाप्ति की ओर था तब आदित्य कोठारी का नाम नए प्रदेश अध्यक्ष के रूप में लगभग तय माना जा रहा था। संगठन में लम्बे समय तक सक्रिय रहने और प्रदेश महामंत्री के रूप में मजबूत पकड़ रखने वाले कोठारी को केंद्रीय नेतृत्व की पसंद भी बताया जा रहा था। हालांकि अंतिम समय में भाजपा नेतृत्व ने निरंतरता बनाए रखने के पक्ष में फैसला लेते हुए महेंद्र भट्ट को ही दोबारा मौका दे दिया।
अब नई चर्चाएं यह संकेत दे रही हैं कि भाजपा गढ़वाल क्षेत्र में राजनीतिक और सामाजिक संतुलन साधने के लिए किसी प्रभावशाली चेहरे को आगे लाना चाहती है। ऐसे में आदित्य कोठारी को फिर से महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दिए जाने की सम्भावनाएं तेज हो गई हैं। पार्टी के भीतर यह तर्क दिया जा रहा है कि कोठारी संगठन और कार्यकर्ताओं दोनों के बीच स्वीकार्य चेहरा हैं। यही कारण है कि संगठनात्मक फेरबदल में उनका कद बढ़ाया जा सकता है।
फिर से मेनस्ट्रीम में निशंक
भाजपा इस बार केवल पदों का बंटवारा नहीं कर रही बल्कि क्षेत्रीय और जातीय संतुलन की व्यापक रणनीति पर काम कर रही है। कुमाऊं से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पहले ही पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा हैं, इसलिए गढ़वाल में भी मजबूत राजनीतिक संदेश देने की जरूरत महसूस की जा रही है। यही कारण है कि गढ़वाल क्षेत्र से किसी प्रभावशाली ब्राह्माण या संगठनात्मक रूप से मजबूत नेता को आगे लाने की रणनीति बन रही है।
इसी क्रम में पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ का नाम भी सक्रिय राजनीतिक चर्चाओं में लौट आया है। लम्बे समय तक उत्तराखण्ड भाजपा की राजनीति का बड़ा चेहरा रहे निशंक पिछले कुछ समय से सक्रिय राजनीति के केंद्र में दिखाई नहीं दे रहे थे लेकिन अब भाजपा उन्हें फिर से मुख्यधारा में लाने की तैयारी करती दिखाई दे रही है। पार्टी के भीतर यह धारणा है कि निशंक अब भी गढ़वाल क्षेत्र में प्रभाव रखते हैं और ब्राह्मााण समाज के बीच उनकी स्वीकार्यता बनी हुई है।
भाजपा नेतृत्व यह समझता है कि आगामी विधानसभा चुनाव में केवल सरकार की उपलब्धियां पर्याप्त नहीं होंगी बल्कि सामाजिक समीकरणों को भी मजबूती से साधना होगा। ऐसे में निशंक जैसे अनुभवी नेता को फिर से सक्रिय भूमिका देना भाजपा की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि उन्हें संगठन में कोई बड़ी जिम्मेदारी देने या फिर संसदीय राजनीति में नई भूमिका देने पर विचार किया जा रहा है। यहीं से राज्यसभा की राजनीति का एंगल भी महत्वपूर्ण हो जाता है। उत्तराखण्ड से राज्यसभा की तीन सीटों में से भाजपा सांसद नरेश बंसल का कार्यकाल नवम्बर 2026 में समाप्त होने जा रहा है। ऐसे में पार्टी में अभी से इस सीट को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। सूत्रों के अनुसार पार्टी इस सीट का इस्तेमाल बड़े सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन के लिए कर सकती है। चूंकि भाजपा नेतृत्व गढ़वाल क्षेत्र को और मजबूती से साधना चाहता है, इसलिए यह सम्भावना जताई जा रही है कि किसी बड़े ब्राह्माण चेहरे को राज्यसभा भेजा जा सकता है। इस चर्चा में रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है।
कई विधायकों का कटेगा टिकट
भाजपा की चिंता केवल संगठन तक सीमित नहीं है। पार्टी ने आगामी विधानसभा चुनाव के लिए आंतरिक सर्वे भी शुरू कर दिए हैं। इन सर्वे रिपोर्टों ने कई विधायकों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार भाजपा के कई मौजूदा विधायकों का प्रदर्शन बेहद कमजोर पाया गया है और उनमें से कुछ के टिकट कटने की आशंका जताई जा रही है। सूत्रों के मुताबिक जिन विधायकों को ‘डेंजर जोन’ में माना जा रहा है, उनमें वे नेता शामिल हैं जिनके क्षेत्रों में एंटी-इनकम्बेंसी अधिक है, जनता के बीच पहुंच कमजोर है या जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार और अहंकार जैसी शिकायतें सामने आई हैं। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व इस बार उम्मीदवार चयन में बेहद सख्त रुख अपनाने के मूड में दिखाई दे रहा है।
पार्टी ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि केवल पुराने चेहरे होने के कारण टिकट नहीं मिलेगा। जनता के बीच सक्रियता, संगठन से तालमेल, स्थानीय लोकप्रियता और जीतने की क्षमता, इन सभी पैमानों पर उम्मीदवारों को परखा जाएगा। यही कारण है कि कई विधायक लगातार अपने क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ा रहे हैं।
भाजपा की रणनीति का एक बड़ा हिस्सा एंटी-इनकम्बेंसी को नियंत्रित करना है। उत्तराखण्ड में अब तक कोई भी दल लगातार दो बार सत्ता में वापसी नहीं कर पाया था लेकिन भाजपा ने 2022 में इतिहास बदलते हुए दोबारा सरकार बनाई। अब पार्टी तीसरी बार सत्ता में लौटकर नया रिकाॅर्ड बनाना चाहती है। लेकिन भाजपा नेतृत्व यह भी जानता है कि लगातार सत्ता में रहने से स्वाभाविक असंतोष पैदा होता है। इसीलिए पार्टी ने
‘परफाॅर्म या बाहर’ का संदेश देना शुरू कर दिया है। खबरें सामने आई हैं कि भाजपा नेतृत्व मंत्रियों और विधायकों को साफ संकेत दे चुका है कि उन्हें अपनी सीटों पर ही प्रदर्शन करना होगा और ‘सुरक्षित सीट’ खोजने की राजनीति नहीं चलेगी।
दिल्ली में बैठे रणनीतिकारों का मानना है कि मुख्यमंत्री धामी की छवि अभी भी भाजपा की सबसे बड़ी ताकत है। धामी को युवा, निर्णायक और आक्रामक नेता के रूप में पेश किया जा रहा है। समान नागरिक संहिता, नकल विरोधी कानून, धार्मिक स्थलों और सांस्कृतिक मुद्दों पर उनके फैसलों को भाजपा चुनावी नैरेटिव का हिस्सा बनाना चाहती है लेकिन भाजपा नेतृत्व यह भी समझता है कि केवल मुख्यमंत्री की लोकप्रियता से चुनाव नहीं जीता जा सकता। यदि स्थानीय विधायक और संगठन कमजोर होंगे तो विपक्ष को मौका मिलेगा। इसलिए पार्टी अब ‘धामी प्लस नया संगठन’ मॉडल पर काम करती दिख रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा के भीतर इस समय दो स्तरों पर गतिविधियां चल रही हैं। पहला सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की तैयारी। दूसरा संगठन के भीतर सफाई अभियान। यही कारण है कि पार्टी बूथ समितियों से लेकर जिला इकाइयों तक रिपोर्ट कार्ड तैयार कर रही है। हाल के स्थानीय निकाय चुनावों और पंचायत चुनावों ने भी भाजपा को चेतावनी दी है। हालांकि भाजपा ने कई नगर निकायों में जीत दर्ज की लेकिन कई जगहों पर पार्टी उम्मीदवारों को अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा। इसके अलावा पार्टी को दल-बदल की राजनीति से भी झटका लगा है। पिछले कुछ महीनों में भाजपा के कई पूर्व विधायक और वरिष्ठ नेता कांग्रेस में शामिल हुए। इनमें कुछ ऐसे चेहरे भी थे जो कभी भाजपा की मजबूत पहचान माने जाते थे।
इन घटनाओं ने भाजपा नेतृत्व को यह एहसास करा दिया है कि यदि संगठनात्मक असंतोष समय रहते नहीं सम्भाला गया तो चुनावी नुकसान हो सकता है। यही वजह है कि अब केंद्रीय नेतृत्व सीधे हस्तक्षेप करता दिखाई दे रहा है।
दिलचस्प बात यह भी है कि भाजपा अब उत्तराखण्ड में ‘माइक्रो मैनेजमेंट’ की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी प्रत्येक विधानसभा सीट का अलग-अलग विश्लेषण कर रही है। किन क्षेत्रों में कांग्रेस मजबूत हो रही है, किन सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार नुकसान पहुंचा सकते हैं, किन इलाकों में स्थानीय नाराजगी है, इन सभी बिंदुओं पर पार्टी के केंद्रीय स्तर से विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जा रही है।
सूत्रों के अनुसार भाजपा का आंतरिक सर्वे तीन चरणों में कराया जा रहा है। इसमें जनता की राय, कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया और स्थानीय संगठन की रिपोर्ट को आधार बनाया गया है। कुछ विधायकों के खिलाफ जनता में तीखा असंतोष दर्ज होने की बात कही जा रही है। यही कारण है कि टिकट कटने की चर्चाएं अब खुलकर सामने आने लगी हैं। भाजपा के भीतर यह भी माना जा रहा है कि उत्तराखण्ड में कांग्रेस भले अभी कमजोर दिखाई दे रही हो लेकिन चुनाव आते-आते राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल सकते हैं। कांग्रेस संगठन में भी बदलाव हुए हैं और पार्टी लगातार भाजपा सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। ऐसे में भाजपा कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। पार्टी का लक्ष्य केवल चुनाव जीतना नहीं बल्कि भारी बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करना है। इसके लिए भाजपा ‘चेहरा बदलो, संदेश बदलो, संगठन मजबूत करो’ की नीति पर आगे बढ़ती दिख रही है।
देहरादून से दिल्ली तक इस समय सबसे अधिक चर्चा इसी बात की है कि आखिर किन नेताओं की छुट्टी होगी और किन नए चेहरों को जिम्मेदारी मिलेगी। प्रदेश प्रभारी और संगठन मंत्री स्तर पर बदलाव की चर्चाओं ने पार्टी के भीतर हलचल बढ़ा दी है। वहीं विधायकों के टिकट कटने की आशंका ने सत्ता और संगठन दोनों में बेचैनी पैदा कर दी है। हालांकि भाजपा का आधिकारिक बयान यही है कि संगठन में बदलाव एक सामान्य प्रक्रिया है और पार्टी चुनावी तैयारियों को मजबूत करने के लिए नियमित समीक्षा करती रहती है लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे साधारण प्रक्रिया नहीं बल्कि बड़े चुनावी आॅपरेशन के रूप में देखा जा रहा है।
कुल मिलाकर उत्तराखण्ड भाजपा अब उस मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है जहां उसे तय करना है कि क्या वह पुराने चेहरों और पुराने ढांचे के साथ चुनाव में जाएगी या फिर बड़े बदलाव कर जनता के सामने नई टीम पेश करेगी। इससे साफ संकेत है कि दिल्ली बदलाव चाहती है, संगठन में नई ऊर्जा लाना चाहती है और चुनाव से पहले हर उस चेहरे को किनारे करना चाहती है जो पार्टी के लिए बोझ बन सकता है।