Uttarakhand

विधानसभा चुनाव-2027/ कालाढूंगी कांग्रेस में जोश, भाजपा खामोश

उत्तराखण्ड विधानसभा के चुनाव में एक वर्ष से भी कम का समय बचा है। राजनीतिक दलों के अंदर चुनाव के लिए दावेदारों की सुगबुगाहट तेज होती जा रही है। विधानसभा क्षेत्रों में जगह-जगह पोस्टर, होर्डिंग और सोशल मीडिया के जरिए दावेदार अपनी उम्मीदवारी पेश कर रहे हैं। नैनीताल जिले की कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र में भी अलग-अलग दावेदारों की सक्रियता क्षेत्र में दिख रही है। राष्ट्रीय दल होने के नाते कांग्रेस के भीतर भी दावेदारों ने अपने दावे पेश करने शुरू कर दिए हैं। कांग्रेस में उम्मीदवारों की अधिकता के चलते सोशल मीडिया पर जोश दिख रहा है तो भाजपा ने खामोशी की चादर ओढ़ी हुई है। भाजपा का प्रत्याशी कौन होगा यह किसी को नहीं पता लेकिन कांग्रेस के अंदर दावेदारों की बाढ़ सी आई हुई है

कालाढूंगी विधानसभा सीट उत्तराखण्ड की उन सीटों में गिनी जाती है जहां भाजपा लम्बे समय से मजबूत स्थिति में रही है। वर्तमान राजनीति में यह सीट भाजपा के वरिष्ठ नेता बंशीधर भगत के प्रभाव क्षेत्र के रूप में देखी जाती है। ऐसे में कांग्रेस के लिए 2027 का चुनाव केवल सीट जीतने का नहीं बल्कि संगठन को पुनर्जीवित करने का भी संघर्ष होगा। कालाढूंगी सीट पर कांग्रेस का सबसे बड़ा संकट संगठनात्मक बिखराव और स्थानीय स्तर पर स्थायी चेहरा न होना रहा है। बूथ स्तर पर भाजपा की तुलना में कांग्रेस कमजोर दिखती है। हालांकि हल्द्वानी विस्तार, युवा मतदाता, महंगाई, बेरोजगारी और स्थानीय विकास के मुद्दे कांग्रेस को अवसर दे सकते हैं। कहा जा रहा है कि यदि कांग्रेस एकजुट होकर मजबूत स्थानीय उम्मीदवार उतारती है तो मुकाबला दिलचस्प हो सकता है।

कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र के अस्तित्व में आने से पहले 2002 से 2012 तक वर्तमान कालाढूंगी विधानसभा का एक बड़ा हिस्सा हल्द्वानी विधानसभा, रामनगर विधानसभा और कुछ हिस्सा नैनीताल विधानसभा में आता था। परिसीमन के बाद कालाढूंगी विधानसभा अस्तित्व में आई और यहां से 2012 में भारतीय जनता पार्टी के बंशीधर भगत विधायक चुने गए। 2002 और 2007 के दौर की बात करें तो 2002 में इंदिरा हृदयेश ने बंशीधर भगत को मात देकर कांग्रेस को जीत की राह दिखाई थी। पांच साल के बाद 2007 में बंशीधर भगत और इंदिरा हृदयेश फिर आमने-सामने थे लेकिन 2007 में कांग्रेस की अंदरूनी कलह के चलते बंशीधर भगत बाजी मार ले गए और उन्होंने इंदिरा हृदयेश को पराजित किया। 2012 में अस्तित्व में आने के बाद कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र में 2012, 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों बंशीधर भगत ने लगातार यहां से जीत की हैट्रिक लगाई और कांग्रेस के लिए यहां सूखा ही रहा। 2012 के बाद हर विधानसभा चुनावों में यहां पर भारतीय जनता पार्टी की जीत का अंतर बढ़ता ही चला गया और कांग्रेस कमजोर होती चली गई। 2012 के विधानसभा चुनाव में कालाढूंगी विधानसभा सीट से बंशीधर भगत को 22744 वोट मिले जबकि कांग्रेस के प्रकाश जोशी 20374 वोटों के साथ दूसरे नम्बर पर रहे जहां बंशीधर भगत को कुल पड़े वोटो का 29 प्रतिशत मत प्राप्त हुआ वहीं कांग्रेस के प्रकाश जोशी को 26 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। कांग्रेस से बगावत कर चुनाव लड़े महेश शर्मा को 11809 वोट मिले जो कि कुल पड़े मतों का 15 प्रतिशत था। इस चुनाव में एक खास बात यह थी कि भूपेंद्र सिंह निर्दलीय चुनाव लड़कर 8925 वोट  और बहुजन समाज पार्टी के दीवान सिंह बिष्ट को 9636 वोट मिले। 2017 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के बंशीधर भगत 44.9 प्रतिशत के साथ 45700 मत लाए जबकि इस बार कांग्रेस के प्रकाश जोशी का मत प्रतिशत घट कर 24.7 रह गया और उन्हें 25 हजार 107 वोट मिले वहीं निर्दलीय चुनाव लड़े महेश शर्मा 19.9 प्रतिशत मतों के साथ 20214 वोट लेकर आए जहां 2012 में बंशीधर भगत की जीत का अंतर 2000 था वो 2017 में 10 गुना बढ़कर 20597 हो गया। इसी प्रकार 2022 के चुनाव में बंशीधर भगत 58 प्रतिशत मतों के साथ 67916 वोट लाए, वहीं कांग्रेस से उम्मीदवार बने महेश शर्मा 37.6 प्रतिशत मतों के साथ 43916 वोट ले कर आए। इस बार भाजपा की जीत का अंतर बढ़कर 23931 हो गया। बंशीधर भगत ने इस विधानसभा सीट में भाजपा का अच्छा संगठन खड़ा कर पार्टी को मजबूत स्थिति में ला दिया।

भारतीय जनता पार्टी के मुकाबले कांग्रेस का नैरेटिव कालाढूंगी विधानसभा में कमजोर दिखता है। कांग्रेस आज भी यहां संगठनात्मक रूप से मजबूत नजर नहीं आती। 2012 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की हार की पटकथा कांग्रेस की अंदरूनी कलह ने लिखी। उस वक्त कांग्रेस ने जमीनी स्तर पर काम कर रहे महेश शर्मा को नजरअंदाज कर अपने राष्ट्रीय सचिव प्रकाश जोशी को यहां से उम्मीदवार बनाया था लेकिन महेश शर्मा के निर्दलीय चुनाव लड़ने के चलते कांग्रेस यह सीट हार गई जबकि प्रकाश जोशी और महेश शर्मा को मिले कुल मत बंशीधर भगत को मिले मतों से कई ज्यादा थे। अगर प्रकाश जोशी के खिलाफ महेश शर्मा बगावत न करते या कांग्रेस ने महेश शर्मा को अपना प्रत्याशी बनाया होता तो कांग्रेस यह सीट जीत सकती थी। प्रकाश जोशी कांग्रेस के केंद्रीय संगठन के नेताओं के नजदीक होने के चलते पार्टी से टिकट तो ले आए लेकिन वो स्थानीय स्तर पर अपनी स्वीकार्यता नहीं बना पाए। 2012 में प्रकाश जोशी को मिले मत प्रकाश जोशी का न होकर वह कांग्रेस का था। प्रकाश जोशी के आने से स्थानीय नेताओं में असंतोष के स्वर उठे और उन्हें पैराशूट प्रत्याशी माना गया क्योंकि प्रकाश जोशी का स्थानीय स्तर पर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के साथ संवाद नहीं था जिससे वह अपनी जीत सुनिश्चित नहीं कर पाए। हालांकि कुछ नेताओं को वह अपने साथ लाने में जरूर कामयाब हुए लेकिन वह महेश शर्मा को नहीं मना पाए। बताया तो यहां तक जाता है कि महेश शर्मा को मनाने के लिए उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी से मिलने की सलाह दी गई थी लेकिन उनके राष्ट्रीय सचिव के ओहदे ने नारायण दत्त तिवारी से मिलना मुनासिब नहीं लगा लेकिन 2012 की हार से भी कांग्रेस नेताओं कोई सबक नहीं लिया। नेता यहां खुद को मजबूत करने की कोशिशों में लग गए, संगठन की मजबूती पर उन्होंने कोई ध्यान दिया ही नहीं जिससे कांग्रेस का संगठन कमजोर होता चला गया। जनता से सम्पर्क, जनहित के मुद्दों पर न बोलना और नेताओं का संगठन के कार्यक्रमों से दूरी बनाने के कारण कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटता रहा और कुछ कार्यकर्ताओं ने भाजपा की तरफ रुख कर लिया। ऐसे में न नेता मजबूत हो पाए न ही कांग्रेस पार्टी मजबूत हो पाई।

फलस्वरूप टुकड़ों में बंटी कांग्रेस 2017 और 2022 का चुनाव संगठित रूप से नहीं लड़ पाई। 2012 के बाद 2017 के चुनाव में भी कांग्रेस ने प्रकाश जोशी को अपना प्रत्याशी बनाया लेकिन 2017 के चुनाव में कांग्रेस की पराजय का अंतर बढ़ता ही चला गया। 2022 के विधानसभा चुनाव में कालाढूंगी से कांग्रेस प्रत्याशी के चयन में अफरा-तफरी रही। जब महेश शर्मा का टिकट लगभग पक्का हो चुका था तो कालाढूंगी से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में पूर्व सांसद महेंद्र पाल की एंट्री हो गई लेकिन फिर विरोध के चलते उन्हें रामनगर से टिकट दिया गया और कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र से महेश शर्मा कांग्रेस के प्रत्याशी घोषित किए गए लेकिन प्रत्याशी चयन की इस अफरातफरी से जो नुकसान जमीन पर कांग्रेस को होना था वो हो चुका था। इस बार भी कांग्रेस गुटों में बटी थी और उसे 2022 में फिर पराजय का सामना करना पड़ा।  2024 लोकसभा चुनाव में प्रकाश जोशी लोकसभा प्रत्याशी के रूप में नैनीताल- ऊधमसिंह नगर लोकसभा सीट से सामने आए लेकिन उनको टिकट मिलने के विरोध में महेश शर्मा ने कांग्रेस से इस्तीफा दिया और भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। लगातार कमजोर होती कांग्रेस में जहां पर एक धड़ा प्रकाश जोशी का था तो दूसरा धड़ा उन नेताओं का था जिन्हें प्रकाश जोशी का कालाढूंगी विधानसभा में हस्तक्षेप पसंद नहीं था। हालांकि प्रकाश जोशी ने कुछ नेताओं को अपने पक्ष में जरूर किया। इस बीच कांग्रेस के नेताओं ने भी कांग्रेस संगठन को खड़ा करने में विशेष दिलचस्पी नहीं दिखाई और वह व्यक्तिगत संगठन खड़ा करने की कोशिशों में ज्यादा लगे रहे। यह कांग्रेस की पुरानी आदत है कि उसके नेता पार्टी संगठन की कीमत पर खुद को मजबूत करते हैं।

अब जब 2027 का विधानसभा चुनाव नजदीक है तो सवाल है कि कांग्रेस का प्रत्याशी इस बार कौन होगा? क्या कांग्रेस फिर से प्रकाश जोशी पर ही दांव खेलेगी या फिर किसी नए चेहरे को सामने लाया जाएगा। कांग्रेस के अंदरूनी हालात देखें तो अब कांग्रेस के अंदर जो लोग बचे हैं उनमें महेश शर्मा जैसा व्यक्तिगत जनाधार नहीं है। कांग्रेस का कोई भी नेता इस विधानसभा क्षेत्र में व्यापक जनाधार नहीं रखता भले ही वह पूर्व प्रमुख भोला दत्त भट्ट हों, पूर्व राष्ट्रीय सचिव प्रकाश जोशी हों, नीरज तिवारी हों या फिर संजय किरौला हों। कुल मिलाकर देखा जाए तो आज भी कांग्रेस के लिए जीत की राह पर पहुंचना आसान नहीं है। कद्दावर नेता बंशीधर भगत की सियासी पारी को रोकने के लिए या फिर भाजपा के किसी अन्य नेताओं की तैयारी को रोकने के लिए कांग्रेस के पास ऐसा कोई मजबूत चेहरा नजर नहीं आता जो 2027 में कांग्रेस के लिए बहुत उम्मीद जगा सके।  प्रकाश जोशी को छोड़ दें तो पूर्व जिला पंचायत सदस्य नीरज तिवारी और पूर्व ब्लाॅक प्रमुख भोला भट्ट जरूर दावेदारों के रूप में नजर आ सकते हैं लेकिन क्या ये चेहरे भाजपा को हराने की स्थिति में हैं? नीरज तिवारी युवा हैं और ग्रामीण परिवेश से आते हैं। पूर्व में जिला पंचायत सदस्य रह चुके नीरज तिवारी सोशियल मीडिया पर भी काफी सक्रिय हैं और अपने आसपास के क्षेत्र में अच्छी पकड़ रखते हैं। जनहित के मुद्दे उठाकर भाजपा को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करते रहते हैं लेकिन हल्द्वानी से जुड़े इलाके में वह अपनी उतनी मजबूत पकड़ नहीं बना पाए। पिछले लम्बे समय से उनकी सक्रियता क्षेत्र में दिखाई दे रही है। बताया जाता है कि इस दौरान प्रकाश जोशी और नीरज तिवारी के बीच नजदीकियां बढ़ी हैं लेकिन सवाल है कि क्या प्रकाश जोशी नीरज तिवारी जैसे युवा चेहरे को अपना समर्थन देंगे? हालांकि कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव और उत्तराखण्ड प्रभारी कुमारी शैलजा के हल्द्वानी दौरे के दौरान प्रकाश जोशी और नीरज तिवारी के बीच अच्छी केमिस्ट्री देखने को मिली थी। पूर्व  ब्लॉक प्रमुख भोला भट्ट जो पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के करीबी माने जाते हैं, जाहिर तौर पर वो प्रकाश जोशी विरोधी खेमे के लोगों में शुमार हैं। वो हल्द्वानी के एक बार ब्लॉक प्रमुख भी रह चुके हैं लेकिन ब्लॉक प्रमुख रहते हुए भी वह अपना जनाधार व्यापक रूप से नहीं बना पाए। हालांकि भोला दत्त भट्ट अपने करीबियों के बीच दावेदारी की चर्चा तो करते हैं लेकिन अभी उन्होंने खुलकर अपनी दावेदारी पेश नहीं की है, जिससे उनके खेमे के लोगों में अभी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। दरअसल भोला दत्त भट्ट के पास हल्द्वानी ब्लॉक प्रमुख रहते अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने का अवसर था लेकिन वो इस अवसर का लाभ उठा नहीं पाए। बड़े नेताओं से सम्बंध के साथ जमीनी स्तर पर भी मजबूत जनाधार जरूरी है। भाजपा के मुकाबले कांग्रेस में दावेदारों की संख्या उतनी तो नहीं है, फिर भी प्रकाश जोशी भोला दत्त भट्ट, नीरज तिवारी के अलावा कुछ नाम और भी हैं जिनमें संजय किरौला, दीप सती सरीखे नेताओं के नाम जरूर चर्चा में हैं। दीप सती लम्बे समय तक कालाढूंगी नगर पंचायत के अध्यक्ष जरूर रहे लेकिन वो राजनीतिक रूप से खुद को मजबूत नहीं कर पाए। संजय किरौला लालकुआं दुग्ध संघ के लम्बे समय तक अध्यक्ष रहे लेकिन उनकी स्वीकार्यता पूरे कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र में संदिग्ध है। हालांकि उन्हें प्रकाश जोशी का करीबी माना जाता है।

सीमित विकल्पों के बीच कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस के पास कोई बड़े जनाधार वाला नेता फिलहाल नजर नहीं आता। कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस की गतिविधियां राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले प्रकाश जोशी के इर्द-गिर्द ही सीमित होकर रह गई हैं क्योंकि उनके केंद्रीय नेतृत्व से सीधे सम्बंधों के चलते महेश शर्मा सरीखे नेताओं के सामने कोई विकल्प नहीं था कि वो कांग्रेस में रह पाते। अगर कांग्रेस के अंदर कोई बड़ा राजनीतिक समीकरण का बदलाव न हो तो ऐसे में तय है कि कालाढूंगी विधानसभा में कांग्रेस का प्रत्याशी प्रकाश जोशी की ही पसंद का होगा फिर भले ही वो खुद प्रकाश जोशी ही क्यों न हों।

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