गुजरात को लम्बे समय से उद्योग और निवेश के सबसे अनुकूल राज्यों में गिना जाता है। पिछले दो दशकों में राज्य ने बंदरगाहों, एक्सप्रेसवे, औद्योगिक काॅरिडोर, सौर ऊर्जा पार्कों और बिजली ट्रांसमिशन नेटवर्क जैसी अनेक विशाल परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाया है। इन परियोजनाओं ने गुजरात को औद्योगिक शक्ति के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई लेकिन इसी विकास माॅडल के साथ एक दूसरा पक्ष भी लगातार सामने आता रहा है और वह है भूमि, पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के अधिकारों का प्रश्न। इन्हीं सवालों के केंद्र में इन दिनों मोरबी जिले का छोटा-सा गांव जेटपार है जहां किसान पिछले कई सप्ताह से अडानी समूह की बिजली ट्रांसमिशन परियोजना के विरोध में आंदोलन कर रहे हैं। शुरुआत प्रतीकात्मक धरनों से हुई फिर किसानों ने सिर मुंडवाकर विरोध दर्ज कराया और अंततः आमरण अनशन का रास्ता चुना। सरकार ने आंदोलन तेज होने के बाद मुआवजा बढ़ाने की घोषणा की लेकिन किसानों ने इसे पर्याप्त नहीं माना। उनका कहना है कि उन्हें केवल मौखिक आश्वासन नहीं बल्कि विधिवत लिखित सरकारी आदेश चाहिए, ताकि भविष्य में उनकी मांगों से पीछे न हट जाया जाए। किसानों की दूसरी प्रमुख मांग यह है कि मुआवजा बाजार मूल्य का दोगुना नहीं बल्कि चार गुना दिया जाए।
गुजरात में अडानी परियोजन पर किसानों का सत्याग्रह क्या विकास की रफ्तार किसानों की जमीन से होकर ही गुजरेगी?
गुजरात के मोरबी जिले में अडानी समूह की बिजली ट्रांसमिशन परियोजना के खिलाफ किसानों का आंदोलन अब केवल मुआवजे का विवाद नहीं रह गया है। सरकार द्वारा मुआवजा बढ़ाने की घोषणा के बाद भी किसान लिखित आदेश और बाजार मूल्य का चार गुना भुगतान मांग रहे हैं। यह संघर्ष उस बड़े सवाल को जन्म दे रहा है कि क्या देश की विशाल आधारभूत संरचना परियोजनाओं में विकास और किसानों के अधिकारों के बीच संतुलन बन पा रहा है या फिर विकास की कीमत हमेशा ग्रामीण भारत ही चुकाता रहेगा
यह विवाद केवल मोरबी जिले तक सीमित नहीं है। जिस बिजली ट्रांसमिशन काॅरिडोर का विरोध हो रहा है, वह कच्छ के खावड़ा स्थित विशाल नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र से बिजली देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाने के लिए बनाया जा रहा है। इस परियोजना का संचालन अडानी एनर्जी साॅल्यूशंस लिमिटेड की विशेष प्रयोजन कम्पनी (एसपीवी) हलवद ट्रांसमिशन लिमिटेड कर रही है। लगभग 246 किलोमीटर लम्बी इस उच्च क्षमता की ट्रांसमिशन लाइन का उद्देश्य खावड़ा के विशाल सौर और पवन ऊर्जा पार्क से उत्पादित बिजली को राष्ट्रीय ग्रिड से जोड़ना है। सरकार इसे भारत के ऊर्जा परिवर्तन कार्यक्रम की महत्वपूर्ण कड़ी मानती है लेकिन जिन खेतों से होकर यह लाइन गुजर रही है, वहां किसानों की चिंता बिल्कुल अलग है। उनका कहना है कि बिजली के विशाल टावर खड़े होने और हाई-वोल्टेज लाइन गुजरने के बाद जमीन का मालिकाना हक भले उनके पास रहे लेकिन उसकी उपयोगिता और बाजार कीमत दोनों प्रभावित होंगी। कई किसानों का तर्क है कि ऐसी जमीन खरीदने में भविष्य में कोई रुचि नहीं दिखाएगा और खेती भी पहले जैसी नहीं रह जाएगी। इसलिए वे इसे केवल ‘राइट आॅफ वे’ का मामला नहीं बल्कि अपनी आजीविका और संपत्ति के स्थायी नुकसान का प्रश्न मान रहे हैं।
सरकार ने पहले जंत्री दर (सर्कल रेट) के आधार पर मुआवजा देने की नीति अपनाई थी लेकिन व्यापक विरोध के बाद नीति में बदलाव करते हुए बाजार मूल्य का दोगुना भुगतान करने की घोषणा की। साथ ही बाजार मूल्य तय करने के लिए नई समिति बनाने, टावर क्षेत्र की गणना किसानों के पक्ष में संशोधित करने तथा पूरी राशि एकमुश्त देने जैसे बदलाव भी किए गए। सरकार का दावा है कि नई व्यवस्था अधिक पारदर्शी और किसान हितैषी है। दूसरी ओर आंदोलनकारी किसानों का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में उनकी बात मान रही है तो इसे सरकारी राजपत्र और स्पष्ट लिखित आदेश के रूप में जारी किया जाए। उनका यह भी आरोप है कि प्रस्तावित व्यवस्था में बाजार मूल्य तय करने की प्रक्रिया अभी भी पूरी तरह किसानों के हित में नहीं है।
इस आंदोलन की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इसे केवल विपक्षी दलों का समर्थन ही नहीं मिला बल्कि स्थानीय स्तर पर ऐसे लोग भी किसानों के साथ खड़े दिखाई दिए जिनका सम्बंध सत्तारूढ़ दल से रहा है। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि यह विवाद सामान्य राजनीतिक विरोध से आगे बढ़कर ग्रामीण असंतोष का रूप ले चुका है। हजारों किसानों की रैलियां, ट्रैक्टर मार्च और लगातार चल रहा सत्याग्रह इस बात का संकेत हैं कि यह मुद्दा केवल एक गांव या एक जिले का नहीं रह गया है। हालांकि अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस लिमिटेड का पक्ष इससे अलग है। कम्पनी का कहना है कि उसने जिला प्रशासन के निर्देशों और लागू कानूनों के अनुरूप ही पूरी प्रक्रिया अपनाई है। कम्पनी का दावा है कि सभी आवश्यक अनुमतियां प्राप्त करने के बाद ही काम शुरू किया गया और मुआवजा भी प्रशासन द्वारा तय नियमों के अनुसार दिया जा रहा है। कम्पनी का यह भी कहना है कि कुछ तत्व किसानों को भड़काकर परियोजना में अनावश्यक बाधा उत्पन्न कर रहे हैं जबकि कम्पनी संवाद और कानूनी प्रक्रिया के तहत समाधान निकालने के लिए तैयार है।
मामला केवल ट्रांसमिशन लाइन नहीं है
इस पूरे विवाद को केवल एक ट्रांसमिशन लाइन के विरोध तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। पिछले कुछ वर्षों में अडानी समूह देश की सबसे बड़ी आधारभूत संरचना परियोजनाओं का प्रमुख भागीदार बनकर उभरा है। बंदरगाहों से लेकर हवाई अड्डों तक, बिजली से लेकर नवीकरणीय ऊर्जा पार्कों तक और अब ग्रेटर निकोबार मेगा डेवलपमेंट प्रोजेक्ट जैसी रणनीतिक परियोजनाओं तक समूह की मौजूदगी लगातार बढ़ी है। इन परियोजनाओं में कई राष्ट्रीय महत्व की मानी जाती हैं और सरकारें उन्हें आर्थिक विकास तथा ऊर्जा सुरक्षा के लिए आवश्यक बताती हैं, वहीं दूसरी ओर, कई परियोजनाओं के साथ भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय मंजूरियों, स्थानीय समुदायों के अधिकार और पुनर्वास जैसे प्रश्न भी बार-बार उठते रहे हैं। यही कारण है कि मोरबी का आंदोलन अब केवल गुजरात का स्थानीय मुद्दा नहीं बल्कि भारत के विकास मॉडल पर राष्ट्रीय बहस का नया अध्याय बनता दिखाई दे रहा है।
जेटपार के किसानों का आंदोलन ऐसे समय सामने आया है जब भारत में ऊर्जा, परिवहन और आधारभूत ढांचे के क्षेत्र में अभूतपूर्व निवेश किया जा रहा है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य रखा है जिसके लिए बिजली उत्पादन, ग्रीन एनर्जी, बंदरगाह, हवाई अड्डे, रेलवे, औद्योगिक काॅरिडोर और लाॅजिस्टिक्स नेटवर्क का तेजी से विस्तार किया जा रहा है। इन परियोजनाओं में निजी क्षेत्र की बड़ी कम्पनियों की भूमिका लगातार बढ़ी है और अडानी समूह उनमें सबसे प्रमुख नामों में शामिल है। समर्थकों का तर्क है कि इतनी विशाल परियोजनाओं के बिना भारत की आर्थिक वृद्धि की गति बनाए रखना सम्भव नहीं होगा जबकि आलोचकों का कहना है कि विकास की यह रफ्तार तभी टिकाऊ मानी जाएगी जब स्थानीय समुदायों के अधिकारों और पर्यावरणीय संतुलन का भी समान रूप से सम्मान किया जाए।
गुजरात में जिस ट्रांसमिशन लाइन को लेकर विवाद है उसका सम्बंध केवल मोरबी से नहीं बल्कि कच्छ के खावड़ा क्षेत्र में विकसित किए जा रहे दुनिया के सबसे बड़े नवीकरणीय ऊर्जा परिसरों में से एक से है। यहां हजारों मेगावाट क्षमता का सौर और पवन ऊर्जा उत्पादन विकसित किया जा रहा है। इस परियोजना में अडानी समूह के अलावा अन्य कम्पनियां भी निवेश कर रही हैं। सरकार का उद्देश्य है कि इस क्षेत्र में बनने वाली हरित बिजली देश के विभिन्न राज्यों तक पहुंचाई जाए। इसके लिए अत्यधिक क्षमता वाली ट्रांसमिशन लाइनें और सब-स्टेशन बनाए जा रहे हैं। सरकार का कहना है कि यदि ऐसी ट्रांसमिशन परियोजनाएं समय पर पूरी नहीं हुईं तो ग्रीन एनर्जी उत्पादन का पूरा लाभ देश को नहीं मिल पाएगा। दूसरी ओर, प्रभावित किसान पूछ रहे हैं कि यदि यह परियोजना राष्ट्रीय हित में है तो उसका बोझ केवल कुछ गांवों के किसानों पर ही क्यों डाला जाए और उन्हें उनकी जमीन के वास्तविक मूल्य के अनुरूप मुआवजा क्यों न मिले।
इसी प्रकार अडानी समूह को ग्रेटर निकोबार द्वीप में प्रस्तावित मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका मिली है। इस परियोजना में एक अंतरराष्ट्रीय ट्रांस-शिपमेंट बंदरगाह, हवाई अड्डा, ऊर्जा अवसंरचना और नया शहरी क्षेत्र विकसित करने की योजना है। केंद्र सरकार का कहना है कि हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की सामरिक स्थिति मजबूत करने और वैश्विक समुद्री व्यापार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए यह परियोजना अत्यंत महत्वपूर्ण है लेकिन इस परियोजना को लेकर पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और आदिवासी अधिकारों से जुड़े संगठनों ने कई सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य से द्वीप की जैव विविधता, घने वर्षावन और वहां रहने वाले आदिम जनजातीय समुदायों पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। सरकार और परियोजना से जुड़े पक्षों का कहना है कि सभी आवश्यक पर्यावरणीय और वैधानिक मंजूरियां प्राप्त की गई हैं और विकास तथा संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया जा रहा है।
मुद्रा पोर्ट भी विवादित
अडानी समूह का सबसे पुराना और चर्चित निवेश मुंद्रा पोर्ट भी समय-समय पर बहस का विषय रहा है। मुंद्रा आज भारत का सबसे बड़ा वाणिज्यिक बंदरगाह बन चुका है और देश के आयात-निर्यात में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। समर्थकों के अनुसार इस परियोजना ने गुजरात के कच्छ क्षेत्र की अर्थव्यवस्था बदल दी, हजारों लोगों को रोजगार मिला और भारत की लाॅजिस्टिक्स क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। वहीं विभिन्न समयों पर पर्यावरणीय प्रभाव, तटीय पारिस्थितिकी, मैंग्रोव क्षेत्र तथा स्थानीय मछुआरा समुदायों से जुड़े मुद्दों पर अदालतों और नियामक संस्थाओं तक शिकायतें भी पहुंचती रही हैं। वर्षों में इनमें से कई मामलों पर सुनवाई हुई, कुछ में सुधारात्मक निर्देश दिए गए और कई मुद्दों पर अलग-अलग स्तर पर कार्रवाई भी हुई। यह उदाहरण बताता है कि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट अक्सर केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय विमर्श का भी हिस्सा बन जाते हैं।
धारावी पुनर्विकास पर भी सवाल
इसी तरह धारावी पुनर्विकास परियोजना भी राष्ट्रीय चर्चा का विषय रही है। हालांकि यह भूमि अधिग्रहण का पारम्परिक ग्रामीण मामला नहीं है लेकिन यहां भी पुनर्वास, पात्रता, स्थानीय निवासियों के अधिकार और परियोजना की पारदर्शिता जैसे प्रश्न लगातार उठते रहे हैं। महाराष्ट्र सरकार इस परियोजना को एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती के पुनर्विकास का ऐतिहासिक अवसर बताती है जबकि विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक संगठनों ने समय-समय पर इसके विभिन्न पहलुओं पर सवाल उठाए हैं। अडानी समूह इन आरोपों से इनकार करता रहा है और परियोजना को नियमानुसार आगे बढ़ाने की बात कहता है।
पिछले कुछ वर्षों में अडानी समूह के पास देश के कई प्रमुख हवाई अड्डों के संचालन की जिम्मेदारी भी आई है। इसके अलावा बंदरगाह, डेटा सेंटर, सीमेंट, गैस वितरण, सड़क परियोजनाएं, रक्षा और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में भी समूह का तेजी से विस्तार हुआ है। समर्थकों का कहना है कि इतने बड़े निवेश से भारत की आधारभूत संरचना मजबूत हुई है और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा बढ़ी है लेकिन आलोचकों का तर्क है कि जब किसी एक निजी समूह की मौजूदगी अनेक रणनीतिक क्षेत्रों में बढ़ती है तो पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा और सार्वजनिक जवाबदेही पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।
हमेशा किसान ही क्यों विस्थापित हों, का सवाल
मोरबी के जेटपार से उठी यह लड़ाई अब एक ऐसे प्रश्न में बदल चुकी है जो केवल गुजरात या अडानी समूह तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि जब देश में किसी बड़ी सार्वजनिक या निजी आधारभूत संरचना परियोजना के लिए किसानों की जमीन या उस पर अधिकार की आवश्यकता होती है तो क्या वर्तमान कानूनी व्यवस्था प्रभावित लोगों को पर्याप्त सुरक्षा और न्याय दिला पाती है? यही कारण है कि यह आंदोलन राष्ट्रीय महत्व का विषय बन चुका है।
किसानों की सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि सरकार और कम्पनियां इस परियोजना को भूमि अधिग्रहण नहीं बल्कि ‘राइट आॅफ वे’ (Right of Way) का मामला बता रही हैं। दोनों के बीच यही अंतर पूरे विवाद की जड़ है। भूमि अधिग्रहण की स्थिति में सरकार प्रभावित व्यक्ति को मुआवजा, पुनर्वास और अन्य कानूनी अधिकार देने के लिए बाध्य होती है लेकिन बिजली ट्रांसमिशन लाइन के अधिकांश मामलों में जमीन का स्वामित्व किसान के पास ही रहता है और केवल उसके ऊपर से लाइन गुजरती है या टावर स्थापित किए जाते हैं। सरकार का तर्क है कि ऐसे मामलों में भूमि का पूर्ण अधिग्रहण नहीं होता, इसलिए अलग व्यवस्था लागू होती है।
किसानों का कहना है कि यह तर्क केवल कागजों तक सीमित है। व्यवहार में जिस खेत में विशाल ट्रांसमिशन टावर खड़ा हो जाए और जिसके ऊपर से अत्यधिक क्षमता वाली बिजली लाइन गुजरने लगे, वहां खेती की प्रकृति बदल जाती है। कई प्रकार की मशीनों का उपयोग कठिन हो जाता है, सिंचाई व्यवस्था प्रभावित होती है और भविष्य में उस भूमि का बाजार मूल्य भी कम हो सकता है। उनका कहना है कि यदि नुकसान स्थायी है तो मुआवजा भी उसी अनुपात में होना चाहिए।
इसी कारण आंदोलनकारी किसान बाजार मूल्य का चार गुना मुआवजा मांग रहे हैं। उनकी दलील है कि जब देश के कई हिस्सों में भूमि अधिग्रहण कानून के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में चार गुना तक मुआवजे का प्रावधान किया गया है तो यहां भी उसी भावना का पालन होना चाहिए। दूसरी ओर राज्य सरकार का कहना है कि उसने पहले जंत्री दर के आधार पर दोगुना मुआवजा देने का प्रस्ताव रखा था लेकिन विरोध के बाद इसे संशोधित कर वास्तविक बाजार मूल्य का दोगुना करने का निर्णय लिया है। सरकार इसे किसानों के हित में बड़ा सुधार बता रही है।
हमेशा ही विवादित रहता है भूमि अधिग्रहण
भारत में भूमि से जुड़े विवादों का इतिहास काफी पुराना है। औद्योगिक परियोजनाओं, बांधों, खनन, राजमार्गों, रेलवे लाइनों और बिजली परियोजनाओं के दौरान समय-समय पर ऐसे संघर्ष सामने आते रहे हैं। कई बार सरकारों को अपनी नीतियां बदलनी पड़ीं, कई मामलों में अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ा और कई परियोजनाओं में मुआवजा बढ़ाना पड़ा। यही कारण है कि आज भूमि अधिग्रहण केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा भी बन चुका है।
वर्ष 2013 में बने भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम को इसी पृष्ठभूमि में लाया गया था। उस कानून का उद्देश्य केवल उचित मुआवजा देना नहीं बल्कि सामाजिक प्रभाव आकलन, प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और पारदर्शिता को भी कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा बनाना था। हालांकि ट्रांसमिशन लाइन जैसी परियोजनाओं में अलग कानूनी प्रावधान लागू होते हैं लेकिन किसान संगठनों का कहना है कि न्याय का सिद्धांत हर जगह समान होना चाहिए।
मोरबी आंदोलन में भी यही तर्क प्रमुखता से सामने आ रहा है। किसानों का कहना है कि उन्हें विकास से कोई आपत्ति नहीं है। वे बिजली परियोजनाओं या नवीकरणीय ऊर्जा के विरोधी नहीं हैं। उनका विरोध केवल इस बात को लेकर है कि विकास का पूरा आर्थिक बोझ कुछ किसानों पर क्यों डाला जाए। यदि परियोजना राष्ट्रीय हित में है तो उसके लाभ और लागत दोनों का न्यायसंगत वितरण होना चाहिए।
इस आंदोलन को विपक्षी दलों, किसान संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का भी समर्थन मिला है। कांग्रेस इसे किसानों के अधिकारों का प्रश्न बता रही है जबकि विभिन्न किसान संगठनों का आरोप है कि कई स्थानों पर किसानों पर पुलिस दबाव बनाकर काम आगे बढ़ाया गया। दूसरी ओर राज्य सरकार और कम्पनी दोनों इन आरोपों से इनकार करते हुए कहती हैं कि पूरी प्रक्रिया कानून के अनुसार संचालित की जा रही है और संवाद के लिए दरवाजे खुले हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में एक तथ्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि सरकार ने किसानों के लगातार आंदोलन के बाद अपनी नीति में संशोधन किया है। इससे यह संकेत अवश्य मिलता है कि जनदबाव का असर पड़ा लेकिन आंदोलनकारी किसान यह भी कह रहे हैं कि जब तक संशोधित नीति का औपचारिक लिखित आदेश जारी नहीं होगा और उसमें उनकी प्रमुख मांगों को स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया जाएगा, तब तक आंदोलन समाप्त नहीं होगा।
यह भी पहली बार नहीं है जब किसी बड़े काॅरपोरेट या सरकारी परियोजना के खिलाफ किसानों ने लम्बा संघर्ष किया हो। देश में पहले भी अनेक परियोजनाओं के दौरान मुआवजे, पुनर्वास और पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर आंदोलन हुए हैं। कई मामलों में बाद में सरकारों को मुआवजा बढ़ाना पड़ा, पुनर्वास नीति बदलनी पड़ी या परियोजनाओं में संशोधन करना पड़ा। इसलिए जेटपार का आंदोलन भी केवल स्थानीय विवाद नहीं बल्कि भारत में विकास और लोकतांत्रिक सहमति के सम्बंधों की एक नई परीक्षा माना जा रहा है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरे विवाद ने एक बार फिर उस प्रश्न को जीवित कर दिया है, जो पिछले कुछ वर्षों से बार-बार उठता रहा है कि क्या भारत में बड़े औद्योगिक और आधारभूत ढांचा परियोजनाओं के लिए ‘पूर्व सहमति, पर्याप्त मुआवजा और पारदर्शी संवाद’ को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए, ताकि विकास की प्रक्रिया संघर्ष के बजाय सहमति के आधार पर आगे बढ़ सके?
इसी प्रश्न का उत्तर शायद आने वाले दिनों में गुजरात सरकार, आंदोलनकारी किसान और अडानी समूह के बीच होने वाली बातचीत तय करेगी लेकिन यह भी स्पष्ट है कि मोरबी की यह लड़ाई अब राष्ट्रीय स्तर पर विकास माॅडल की बहस का हिस्सा बन चुकी है।
विवादों से पुराना नाता है अडानी समूह का
वर्ष 2014 में अडानी समूह की सूचीबद्ध कम्पनियों का संयुक्त बाजार पूंजीकरण (मार्केट कैप) लगभग 50-60 हजार करोड़ रुपए के आस-पास था। अगले एक दशक में समूह ने बंदरगाह, बिजली, ट्रांसमिशन, हवाई अड्डों, सीमेंट, हरित ऊर्जा, डेटा सेंटर, गैस वितरण और अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में तेजी से विस्तार किया। सितम्बर 2022 तक समूह का संयुक्त मार्केट कैप बढ़कर लगभग 18 लाख करोड़ रुपए के शिखर पर पहुंच गया। 2023 में हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद इसमें बड़ी गिरावट आई लेकिन समूह ने बाद के वर्षों में उल्लेखनीय रिकवरी दर्ज की। जुलाई 2026 तक अडानी समूह की सूचीबद्ध कम्पनियों का संयुक्त बाजार पूंजीकरण फिर बढ़कर करीब 20 लाख करोड़ रुपए के स्तर पर पहुंच गया। इस प्रकार 2014 से 2026 के बीच समूह की बाजार वैल्यू में लगभग 35 से 40 गुना की वृद्धि हुई, जो भारतीय काॅरपोरेट इतिहास की सबसे तेज विस्तार यात्राओं में गिनी जाती है। इसी तेज विस्तार के साथ समूह की कई बड़ी परियोजनाएं विकास, भूमि अधिग्रहण, पर्यावरण और पुनर्वास जैसे मुद्दों पर सार्वजनिक बहस का विषय भी बनीं।
कुल मिलाकर जेटपार का आंदोलन अंततः एक बड़े प्रश्न की ओर संकेत करता है कि क्या भारत ऐसा विकास माॅडल तैयार कर सकता है जिसमें विशाल आधारभूत संरचना परियोजनाएं भी समय पर पूरी हों और किसानों तथा स्थानीय समुदायों को यह महसूस हो कि उनके अधिकारों, आजीविका और सम्मान के साथ न्याय किया गया है? यही प्रश्न इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष है और आने वाले वर्षों में देश की विकास नीति के लिए भी एक बड़ी कसौटी साबित हो सकता है।