जंतर-मंतर पर काॅकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के आंदोलन के समर्थन में आमरण-अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक के अनशन को लगभग तीन हफ्ते हो चुके हैं और उनकी सेहत लगातार बिगड़ती जा रही है। इसके बावजूद केंद्र सरकार की ओर से अब तक न कोई औपचारिक वार्ता हुई है और न ही किसी वरिष्ठ प्रतिनिधि ने उनसे मुलाकात की है। एक ऐसे व्यक्ति की अनदेखी, जिसे देश शिक्षा, पर्यावरण और हिमालय की आवाज के रूप में पहचानता है। लोकतंत्र में संवाद और संवेदनशीलता को लेकर गम्भीर प्रश्न खड़े कर रही है
देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर इन दिनों जो दृश्य दिखाई दे रहा है, वह केवल एक धरना या एक आमरण-अनशन का दृश्य नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र की उस परीक्षा का दृश्य है जिसमें सरकार की संवेदनशीलता, संवाद की इच्छा और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता एक साथ कठघरे में खड़ी दिखाई दे रही है। प्रसिद्ध शिक्षा सुधारक, पर्यावरणविद् और लद्दाख के जनआंदोलनों के प्रमुख चेहरों में शामिल सोनम वांगचुक भारतीय काॅकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के आंदोलन के समर्थन में आमरण अनशन पर बैठे हैं। उनके अनशन को 16 दिन हो चुके हैं। चिकित्सकों के अनुसार लगातार उपवास के कारण उनकी शारीरिक स्थिति चिंताजनक होती जा रही है। शरीर का वजन तेजी से घटा है, कमजोरी बढ़ी है और स्वास्थ्य सम्बंधी अनेक जटिलताओं की आशंका व्यक्त की जा रही है। इसके बावजूद केंद्र सरकार की ओर से अब तक किसी औपचारिक संवाद की शुरुआत नहीं हुई है। यही वह तथ्य है जिसने इस पूरे घटनाक्रम को केवल एक आंदोलन नहीं बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श का विषय बना दिया है।
भारतीय लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन कोई नई बात नहीं है। आजादी के आंदोलन से लेकर आज तक अनगिनत बार नागरिकों ने अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से धरना दिया, रैलियां निकालीं और अनशन किए। अनेक बार सरकारों ने उनकी मांगें मानीं, अनेक बार असहमति जताई लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि संवाद का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ। जब भी किसी आंदोलन ने व्यापक सामाजिक महत्व प्राप्त किया, सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत की प्रक्रिया शुरू हुई। यही लोकतंत्र की पहचान मानी जाती है। इसलिए सोनम वांगचुक के मामले में सरकार की लगातार बनी हुई चुप्पी को लेकर राजनीतिक गलियारों से लेकर नागरिक समाज तक सवाल उठने लगे हैं।
सोनम वांगचुक की पहचान किसी राजनीतिक दल के नेता के रूप में नहीं रही है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने अपना अधिकांश जीवन लद्दाख में शिक्षा सुधार, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समाज के सशक्तिकरण के लिए समर्पित किया। अत्यंत कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले क्षेत्र में उन्होंने ऐसी शिक्षा पद्धति विकसित करने का प्रयास किया जिसकी चर्चा भारत ही नहीं, विदेशों में भी हुई। जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों के संरक्षण और हिमालयी पारिस्थितिकी पर उनके विचारों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी गम्भीरता से सुना गया। लोकप्रिय फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ के चर्चित किरदार ‘फुंसुख वांगडू’ की प्रेरणा भी उनके व्यक्तित्व से जुड़ी मानी जाती है। यही कारण है कि जब उन्होंने किसी राजनीतिक दल के मंच पर नहीं बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और जवाबदेही के प्रश्न पर आमरण अनशन का निर्णय लिया तो देशभर का ध्यान इस आंदोलन की ओर गया।
भारतीय काॅकरोच जनता पार्टी का यह आंदोलन शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, प्रशासनिक जवाबदेही और युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दों को लेकर शुरू हुआ। पार्टी का कहना है कि लगातार सामने आ रहे विवादों ने लाखों युवाओं का भरोसा व्यवस्था से उठाया है और सरकार को इन मुद्दों पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए। आंदोलनकारियों का दावा है कि उन्होंने शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से अपनी बात रखने का रास्ता चुना है। सोनम वांगचुक ने भी इसी आधार पर इस आंदोलन के साथ अपनी एकजुटता व्यक्त करते हुए आमरण अनशन शुरू किया।
अनशन शुरू होने के बाद से देश के विभिन्न हिस्सों से छात्र, शिक्षक, पर्यावरण कार्यकर्ता, सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि और आम नागरिक जंतर-मंतर पहुंच रहे हैं। कई लोग केवल कुछ घंटे धरनास्थल पर रुककर वापस लौट जाते हैं जबकि अनेक स्वयंसेवक लगातार वहीं डटे हुए हैं। धरनास्थल पर आने वालों का कहना है कि वे केवल किसी एक संगठन का समर्थन करने नहीं आए हैं बल्कि लोकतंत्र में नागरिकों की आवाज सुने जाने के अधिकार के समर्थन में खड़े हैं। उनका तर्क है कि यदि शांतिपूर्ण आंदोलन भी सरकार तक अपनी बात नहीं पहुंचा पाएंगे तो लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा।
धरनास्थल पर मौजूद चिकित्सकों के अनुसार लम्बे समय तक केवल सीमित मात्रा में तरल पदार्थों के सहारे चल रहा उपवास शरीर पर गम्भीर प्रभाव डालने लगा है। रक्तचाप, रक्त शर्करा और शरीर की ऊर्जा से जुड़े कई संकेतकों की नियमित निगरानी की जा रही है। चिकित्सकों ने स्वास्थ्य सम्बंधी जोखिमों को देखते हुए सावधानी बरतने की सलाह दी है। हालांकि सोनम वांगचुक अपने निर्णय पर अडिग हैं और उनका कहना है कि उनका उद्देश्य किसी टकराव को जन्म देना नहीं बल्कि सरकार का ध्यान उन मुद्दों की ओर आकर्षित करना है जिन्हें वे राष्ट्रीय महत्व का विषय मानते हैं।
सबसे अधिक चर्चा जिस बात की हो रही है, वह सरकार की ओर से अब तक किसी प्रत्यक्ष पहल का सामने न आना है। आंदोलनकारियों का कहना है कि उन्हें यह उम्मीद थी कि कम-से-कम सरकार का कोई प्रतिनिधि बातचीत के लिए आएगा, उनकी बात सुनेगा या भविष्य में वार्ता का कोई रास्ता निकालेगा लेकिन अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। सरकार की इस चुप्पी को लेकर विपक्षी दलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अनेक सार्वजनिक हस्तियों ने चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि लोकतंत्र में असहमति का उत्तर मौन नहीं बल्कि संवाद होना चाहिए। हालांकि सरकार की ओर से इस आंदोलन को लेकर विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवाद की प्रक्रिया बंद हो जाना सबसे चिंताजनक स्थिति होती है। सरकार चाहे किसी मांग को स्वीकार करें या अस्वीकार, यह उसका अधिकार है लेकिन किसी भी शांतिपूर्ण आंदोलन से बात न करना लोकतांत्रिक परम्पराओं के अनुरूप नहीं माना जाता। यही कारण है कि सोनम वांगचुक के आमरण-अनशन को लेकर उठ रहे प्रश्न अब केवल उनकी मांगों तक सीमित नहीं रह गए हैं। चर्चा इस बात की भी होने लगी है कि क्या भारत में लोकतांत्रिक असहमति के लिए उपलब्ध स्थान धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है।
याद रखने वाली बात यह भी है कि सोनम वांगचुक का सार्वजनिक जीवन किसी दलगत राजनीति का हिस्सा नहीं रहा है। उन्होंने समय-समय पर विभिन्न सरकारों के निर्णयों की सराहना भी की है और आलोचना भी। लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के निर्णय का उन्होंने स्वागत किया था लेकिन बाद में जब उन्हें लगा कि पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय लोगों के अधिकारों से जुड़े वादे पूरे नहीं हो रहे हैं तो उन्होंने उसी सरकार के सामने सवाल भी उठाए। इससे उनकी छवि किसी राजनीतिक विरोधी की नहीं बल्कि मुद्दों के आधार पर अपनी बात रखने वाले सामाजिक कार्यकर्ता की बनी। यही वजह है कि उनके आमरण अनशन को व्यापक नैतिक समर्थन भी मिल रहा है।
इसी कारण अब यह आंदोलन केवल एक संगठन या एक व्यक्ति का आंदोलन नहीं रह गया है। यह उस सवाल का प्रतीक बनता जा रहा है कि क्या लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराने वाले नागरिकों की आवाज सरकार तक पहुंच रही है या फिर असहमति को केवल अनदेखा कर देना ही नई राजनीतिक संस्कृति बनती जा रही है।
धरनास्थल पर लगातार देश के विभिन्न हिस्सों से लोग पहुंच रहे हैं। छात्रों, शोधार्थियों, शिक्षकों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों और अनेक सेवानिवृत्त अधिकारियों ने भी वहां पहुंचकर अपना समर्थन व्यक्त किया है। कई लोगों का कहना है कि वे किसी राजनीतिक विचारधारा के कारण नहीं बल्कि इसलिए वहां पहुंचे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि किसी शांतिपूर्ण आंदोलन की भी यदि उपेक्षा की जाएगी तो
लोकतांत्रिक अधिकारों का महत्व कम हो जाएगा। कई लोगों ने इसे संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार से भी जोड़ा है।
इस बीच चिकित्सकों की चिंता भी लगातार बढ़ रही है। लम्बे समय तक चलने वाले आमरण अनशन का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है, यह चिकित्सा विज्ञान अच्छी तरह जानता है। लगातार ऊर्जा की कमी, मांसपेशियों का क्षय, इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन, रक्तचाप और हृदय सम्बंधी जटिलताओं का खतरा बढ़ता जाता है। चिकित्सकों का कहना है कि जितना लम्बा अनशन चलता है, स्वास्थ्य सम्बंधी जोखिम उतने ही गम्भीर होते जाते हैं। इसी कारण अनेक सामाजिक संगठनों ने सरकार से आग्रह किया है कि किसी भी अप्रिय स्थिति से पहले संवाद का रास्ता निकाला जाए।
भारत का लोकतांत्रिक इतिहास इस बात का साक्षी है कि संवाद ने अनेक बड़े टकरावों को टाला है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी वार्ताओं के अनेक दौर हुए। आजादी के बाद विभिन्न राज्यों में हुए आंदोलनों, किसान संगठनों के आंदोलनों, छात्र आंदोलनों और सामाजिक अभियानों के दौरान भी सरकारें बातचीत की मेज तक पहुंचीं। हर बार समाधान नहीं निकला लेकिन बातचीत की प्रक्रिया ने लोकतंत्र में भरोसा बनाए रखा। इसलिए संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि संवाद केवल राजनीतिक प्रक्रिया नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति का आधार है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक और बहस को जन्म दिया है। क्या आज के भारत में असहमति व्यक्त करने वालों के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं तक पहुंच पहले की तुलना में कठिन होती जा रही है? क्या सरकारें केवल चुनावों के दौरान जनता से संवाद करती हैं और उसके बाद असहमति को महत्व नहीं देती? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर केवल इस आंदोलन से नहीं बल्कि शासन की कार्यशैली से भी जुड़ा हुआ है।
सरकार यदि आंदोलनकारियों की मांगों से सहमत नहीं है तो उसके पास पर्याप्त संवैधानिक और प्रशासनिक अधिकार हैं। वह तथ्यों के आधार पर अपना पक्ष रख सकती है, मांगों को अस्वीकार कर सकती है या
वैकल्पिक समाधान प्रस्तुत कर सकती है लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी शांतिपूर्ण आंदोलन को पूरी तरह अनसुना कर देना ऐसी स्थिति पैदा कर सकता है जहां नागरिकों का संस्थाओं पर विश्वास कमजोर पड़ने लगे। लोकतंत्र में असहमति को स्थान देना उसकी मजबूरी नहीं बल्कि उसकी सबसे बड़ी शक्ति होती है।
जंतर-मंतर पर बैठे लोगों की निगाहें अब भी सरकार की ओर लगी हैं। उन्हें उम्मीद है कि देर-सबेर कोई न कोई संवाद का रास्ता निकलेगा। दूसरी ओर, सरकार की ओर से अभी तक कोई ऐसी पहल सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है जिससे यह संकेत मिले कि बातचीत शीघ्र शुरू होगी। ऐसे में समय बीतने के साथ यह आंदोलन और अधिक संवेदनशील होता जा रहा है।
सोनम वांगचुक का आमरण अनशन अब केवल एक व्यक्ति की जिद या एक संगठन के विरोध का विषय नहीं रह गया है। यह उस बुनियादी प्रश्न का प्रतीक बन चुका है कि लोकतंत्र में सत्ता और समाज के बीच संवाद कितना जीवित है। किसी लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनाव जीतने से सिद्ध नहीं होती बल्कि इससे भी होती है कि वह अपने सबसे शांत, सबसे अहिंसक और सबसे असहमत नागरिक की आवाज को कितनी गम्भीरता से सुनता है।
यदि किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे नागरिकों को अपनी बात सुनाने के लिए लगातार आमरण अनशन करना पड़े, उनकी सेहत बिगड़ती रहे और इसके बावजूद सत्ता के गलियारों में सन्नाटा बना रहे तो यह केवल एक व्यक्ति या एक संगठन का संकट नहीं होता। यह उस लोकतांत्रिक संवेदनशीलता का भी संकट होता है, जिस पर भारत जैसे गणराज्य को गर्व रहा है। सरकार चाहे अंततः मांगें माने या न माने लेकिन संवाद की पहल करना उसकी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है क्योंकि इतिहास गवाह है कि लोकतंत्र में बातचीत कभी कमजोरी नहीं मानी गई बल्कि वही उसकी सबसे बड़ी ताकत रही है।