भारतीय राजनीति में दो तस्वीरें आमने-सामने खड़ी हैं। पहली तस्वीर लाल बहादुर शास्त्री की है। एक रेल दुर्घटना हुई। दुर्घटना उन्होंने नहीं कराई थी, पटरियां उन्होंने नहीं बिछाई थीं, इंजन उन्होंने नहीं चलाया था। फिर भी उन्होंने कहा कि मंत्री होने के नाते अंतिम जिम्मेदारी मेरी है। उन्होंने इस्तीफा दे दिया। वह इस्तीफा केवल एक पद का त्याग नहीं था बल्कि लोकतंत्र को दिया गया एक संदेश था कि सत्ता अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है। दूसरी तस्वीर आज के भारत की है। देश में रिकॉर्ड संख्या में एक्सप्रेस वे बन रहे हैं। सुरंगें बन रही हैं। पुल बन रहे हैं। हर मंच से दावा किया जाता है कि भारत विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचा खड़ा कर रहा है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी इस परिवर्तन का सबसे प्रमुख चेहरा हैं। उन्हें सरकार का सबसे प्रभावी मंत्री कहा जाता है लेकिन लोकतंत्र में केवल उपलब्धियां ही नहीं गिनी जातीं, असफलताओं का हिसाब भी लिया जाता है।
नैतिकता का आखिरी एक्सप्रेस वे सवालों के कटघरे में गडकरी
एक समय था जब लाल बहादुर शास्त्री ने एक रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया था। आज हजारों करोड़ रुपए की सड़क परियोजनाओं पर सवाल उठते हैं, निर्माण की गुणवत्ता पर बहस होती है, हितों के टकराव के आरोप लगते हैं लेकिन राजनीतिक जवाबदेही जैसे शब्द सार्वजनिक जीवन से गायब होते दिखाई देते हैं। सवाल किसी एक परियोजना का नहीं बल्कि उस नैतिक संस्कृति का है, जिस पर लोकतंत्र की विश्वसनीयता टिकी होती है
पिछले कुछ वर्षों में ऐसी कई परियोजनाएं विवादों में आई हैं जिन्होंने यह प्रश्न खड़ा किया कि क्या गुणवत्ता से अधिक गति को प्राथमिकता दी गई। उत्तराखण्ड की सिलक्यारा सुरंग दुर्घटना में 41 मजदूर कई दिनों तक भीतर फंसे रहे। दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के कुछ हिस्सों पर शुरुआती दौर में ही धंसाव और गड्ढों की शिकायतें सामने आईं। मुम्बई-पुणे मिसिंग लिंक परियोजना में भी शुरुआती संरचनात्मक क्षति और भूस्खलन ने सवाल खड़े किए। हर घटना के बाद कारण अलग-अलग बताए गए, अत्यधिक वर्षा, भूस्खलन, ड्रेनेज, ठेकेदार या तकनीकी समस्या लेकिन क्या कभी राजनीतिक जिम्मेदारी तय हुई?
यही वह प्रश्न है, जिससे लोकतंत्र असहज होता है। इन परियोजनाओं में कुछ निर्माण कंपनियों के नाम बार-बार सामने आते हैं। नवयुग इंजीनियरिंग जैसी कंपनियां आयकर छापों, चुनावी बाॅन्ड और विवादित परियोजनाओं के कारण चर्चा में रहीं। दूसरी ओर 2010 में हुई सतीश शेट्टी जैसे आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या ने देश को झकझोर दिया था। शेट्टी ने भूमि सौदों और सड़क परियोजनाओं से जुड़े कथित अनियमितताओं पर लगातार सवाल उठाए थे। जांच के दौरान आईआरबी इंफ्रास्ट्रक्चर का नाम सामने आया और केंद्रीय जांच एजेंसी ने कम्पनी से जुड़े कदम उठाए। यह भी सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा है कि अतीत में आईआरबी और नितिन गडकरी के पूर्ति समूह के बीच वित्तीय लेनदेन को लेकर विपक्ष ने हितों के टकराव के आरोप लगाए थे। गडकरी ने उन आरोपों और किसी भी प्रकार की अवैधता से इनकार किया। सतीश शेट्टी हत्या मामले में नितिन गडकरी को न तो आरोपी बनाया गया और न ही किसी जांच एजेंसी ने उनके खिलाफ आरोप लगाए। फिर भी यह पूरा घटनाक्रम एक बड़ा नैतिक प्रश्न छोड़ता है कि क्या सार्वजनिक जीवन में केवल कानूनी क्लीन चिट ही पर्याप्त है या जनता के हितों के टकराव के हर संदेह से परे पारदर्शिता का अधिकार भी है?
ऐसा ही प्रश्न एथेनाॅल नीति को लेकर भी उठता है। नितिन गडकरी वर्षों से एथेनाॅल मिश्रित ईंधन के सबसे बड़े समर्थक रहे हैं। उनका कहना है कि इससे किसानों को लाभ होगा, तेल आयात कम होगा और देश आत्मनिर्भर बनेगा लेकिन जब उनके परिवार से जुड़े कारोबार का सम्बंध भी एथेनाॅल क्षेत्र से सार्वजनिक रिकाॅर्ड में दिखाई देता है, तब विपक्ष हितों के टकराव का प्रश्न उठाता है। गडकरी इन आरोपों को खारिज करते हैं और कहते हैं कि उनके परिवार की हिस्सेदारी नगण्य है तथा नीति निर्माण से उसका कोई अनुचित सम्बन्ध नहीं है। यह उनका पक्ष है लेकिन लोकतंत्र में प्रश्न पूछना भी उतना ही आवश्यक है जितना उत्तर देना।
सवाल केवल सड़कों तक सीमित नहीं हैं। पिछले एक दशक में केंद्र सरकार ने बुनियादी ढांचे के विकास के साथ-साथ वैकल्पिक ईंधन को भी अपनी प्रमुख नीतियों में शामिल किया। एथेनाॅल मिश्रण कार्यक्रम को ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय बढ़ाने, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने और पर्यावरण संरक्षण से जोड़कर प्रस्तुत किया गया। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी इस नीति के सबसे मुखर समर्थकों में रहे हैं और अनेक सार्वजनिक मंचों से इसके पक्ष में लगातार तर्क देते रहे हैं। हालांकि इस नीति को लेकर बहस पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। एक ओर सरकार का दावा है कि एथेनाॅल मिश्रण से देश को दीर्घकालिक आर्थिक लाभ होगा, वहीं दूसरी तरफ उपभोक्ताओं के बीच माइलेज, ईंधन दक्षता और पुराने वाहनों पर इसके प्रभाव को लेकर सवाल उठते रहे हैं। सरकार और वाहन निर्माता कम्पनियां ई-20 अनुकूल वाहनों के लिए इसे सुरक्षित बताती हैं लेकिन इस विषय पर तकनीकी बहस जारी है।
एथेनाॅल नीति के साथ हितों के टकराव का प्रश्न भी समय-समय पर सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बना। सार्वजनिक रिकाॅर्ड बताते हैं कि गडकरी के परिवार से जुड़े कारोबारी हित एथेनाॅल क्षेत्र में भी हैं। विपक्ष ने इसे लेकर सवाल उठाए कि क्या ऐसी स्थिति में नीति निर्माण से जुड़े पद पर बैठे व्यक्ति को अतिरिक्त पारदर्शिता नहीं बरतनी चाहिए। गडकरी ने इन आरोपों को लगातार खारिज किया है। उनका कहना है कि उनके परिवार की हिस्सेदारी राष्ट्रीय इथेनॉल उत्पादन में नगण्य है और नीति निर्माण अथवा लाइसेंस आवंटन में उन्होंने किसी प्रकार का अनुचित हस्तक्षेप नहीं किया। यह उनका सार्वजनिक पक्ष है लेकिन लोकतंत्र में केवल कानूनी वैधता ही नहीं बल्कि हितों के टकराव की सम्भावनाओं से भी पूरी तरह मुक्त दिखाई देना सार्वजनिक जीवन की एक महत्वपूर्ण कसौटी मानी जाती है। ऐसा नहीं है कि सार्वजनिक जीवन में यह पहली बार हुआ हो। गडकरी के राजनीतिक जीवन में पूर्ति समूह को लेकर भी लम्बे समय तक विवाद चला। विपक्ष ने वित्तीय लेन-देन और कारोबारी संबंधों को लेकर आरोप लगाए, जिनका गडकरी ने लगातार खंडन किया। इन मामलों में राजनीतिक विवाद तो बना लेकिन किसी न्यायालय ने उन्हें दोषी नहीं ठहराया। फिर भी इन घटनाओं ने सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और नैतिक जवाबदेही की बहस को लगातार जीवित रखा।
13 जनवरी 2010 को महाराष्ट्र के तालेगांव दाभाडे में आरटीआई कार्यकर्ता सतीश शेट्टी की हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था। शेट्टी भूमि अधिग्रहण और सड़क परियोजनाओं से जुड़े कथित अनियमितताओं को उजागर कर रहे थे। बाद में मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई और जांच के दौरान आईआरबी इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े पहलुओं की भी पड़ताल हुई। अलग संदर्भ में आईआरबी और पूर्ति समूह के बीच वित्तीय लेन-देन को लेकर विपक्ष ने नितिन गडकरी पर हितों के टकराव के आरोप लगाए थे, जिन्हें उन्होंने पूरी तरह खारिज किया। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण तथ्य है कि सतीश शेट्टी हत्याकांड में नितिन गडकरी को न तो आरोपी बनाया गया और न ही किसी जांच एजेंसी ने उनके खिलाफ कोई आरोप तय किया लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने सार्वजनिक परियोजनाओं, निजी कम्पनियों, राजनीतिक वित्तपोषण और पारदर्शिता को लेकर व्यापक बहस को अवश्य जन्म दिया लेकिन यह भी सच है कि नितिन गडकरी भारतीय राजनीति के उन गिने-चुने नेताओं में हैं, जिनकी कार्यक्षमता की प्रशंसा उनके राजनीतिक विरोधी भी कई बार करते रहे हैं। राष्ट्रीय राजमार्गों का तेजी से विस्तार, ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे, लाॅजिस्टिक्स लागत कम करने की कोशिश और बुनियादी ढांचे में बड़े निवेश उनके कार्यकाल की महत्वपूर्ण उपलब्धियां मानी जाती हैं। सरकार के आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में राष्ट्रीय राजमार्गों की लम्बाई और सड़क निर्माण की गति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यही कारण है कि गडकरी को अक्सर सरकार का सबसे प्रभावी मंत्री कहा जाता है।
लोकतंत्र की असली परीक्षा उपलब्धियों से नहीं बल्कि जवाबदेही से होती है। किसी मंत्री का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जाता कि उसने कितनी सड़कें बनवाईं बल्कि इस आधार पर भी किया जाता है कि जिन परियोजनाओं पर हजारों करोड़ रुपए खर्च हुए उनकी गुणवत्ता कैसी रही? यदि शुरुआती वर्षों में ही किसी एक्सप्रेसवे पर धंसाव की खबर आती है, यदि सुरंगों की सुरक्षा पर प्रश्न उठते हैं, यदि निर्माण कंपनियां बार-बार विवादों में दिखाई देती हैं तो यह केवल तकनीकी समस्या नहीं रह जाती। यह सार्वजनिक नीति, निगरानी व्यवस्था और प्रशासनिक उत्तरदायित्व का विषय बन जाती है।
दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे, सिलक्यारा सुरंग और मुम्बई-पुणे मिसिंग लिंक जैसी परियोजनाओं ने यही बहस खड़ी की। हर मामले में सरकार या सम्बंधित एजेंसियों ने अलग-अलग कारण बताए, कहीं अत्यधिक वर्षा, कहीं भूगर्भीय परिस्थितियां, कहीं ड्रेनेज की समस्या और कहीं निर्माण सम्बंधी तकनीकी चुनौतियां। कई मामलों में अधिकारियों और ठेकेदारों के खिलाफ कार्रवाई भी की गई लेकिन इसके साथ एक प्रश्न लगातार बना रहा कि क्या केवल कार्रवाई की घोषणा पर्याप्त है या भविष्य में ऐसी परियोजनाओं के लिए स्वतंत्र गुणवत्ता आॅडिट और अधिक कठोर जवाबदेही व्यवस्था भी विकसित की जानी चाहिए?
यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक जवाबदेही की बहस शुरू होती है। लोकतंत्र में मंत्री हर निर्माण कार्य का इंजीनियर नहीं होता लेकिन वह उस पूरी व्यवस्था का राजनीतिक प्रमुख अवश्य होता है। इसलिए जब कोई परियोजना सफल होती है तो उसका श्रेय सरकार और मंत्री दोनों लेते हैं। उसी प्रकार जब गम्भीर खामियां सामने आती हैं, तब जनता यह जानना चाहती है कि जिम्मेदारी किस स्तर तक तय होगी। यही प्रश्न आज भारतीय लोकतंत्र के सामने भी खड़ा है।
यदि किसी परियोजना की सफलता का श्रेय मंत्री और सरकार को मिलता है तो स्वाभाविक रूप से उसकी विफलता की जिम्मेदारी को लेकर भी सवाल उठेंगे। बड़े सार्वजनिक निवेश वाली परियोजनाओं में निर्माण गुणवत्ता, सुरक्षा मानकों और निगरानी व्यवस्था पर प्रश्न खड़े होने के बाद यह बहस तेज हुई है कि क्या जवाबदेही केवल इंजीनियरों, अधिकारियों और ठेकेदारों तक सीमित रहनी चाहिए, या फिर राजनीतिक नेतृत्व को भी नैतिक स्तर पर अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए।
भारतीय लोकतंत्र में यह बहस नई नहीं है। लाल बहादुर शास्त्री द्वारा रेल दुर्घटना के बाद नैतिक आधार पर दिया गया इस्तीफा आज भी सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही का मानक माना जाता है। ऐसे में जब हजारों करोड़ रुपए की परियोजनाओं पर सवाल उठते हैं, नीतियों को लेकर हितों के टकराव के आरोप लगते हैं और सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता की मांग तेज होती है, तब स्वाभाविक रूप से यह अपेक्षा भी सामने आती है कि सरकार केवल उपलब्धियों का श्रेय ही न ले बल्कि विवादों और विफलताओं पर भी स्पष्ट जवाबदेही सुनिश्चित करे।
लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती केवल चैड़ी सड़कों, लम्बी सुरंगों और विशाल पुलों से नहीं मापी जाती, उसकी असली कसौटी यह होती है कि सत्ता जनता के प्रति कितनी जवाबदेह, कितनी पारदर्शी और कितनी नैतिक बनी रहती है। यही वह प्रश्न है, जिसका उत्तर आज भी भारतीय लोकतंत्र तलाश रहा है।