भारत के संविधान की प्रस्तावना में न्याय, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक को सबसे पहले स्थान दिया गया है। यह कोई संयोग नहीं था। संविधान निर्माताओं को पता था कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, उसकी असली परीक्षा तब होती है जब सत्ता और नागरिक आमने-सामने खड़े हों। उस क्षण नागरिक के पास यदि कोई अंतिम दरवाजा बचता है तो वह सर्वोच्च न्यायालय होता है। इसलिए भारत का सुप्रीम कोर्ट केवल एक अदालत नहीं, बल्कि लोकतंत्र की वह संस्था है जिस पर करोड़ों लोग अपनी अंतिम उम्मीद टिकाते हैं। संसद कानून बना सकती है, सरकारें नीतियां बना सकती हैं, पुलिस बल प्रयोग कर सकती है लेकिन यदि इन सबके बीच किसी नागरिक के अधिकारों का हनन होता है तो उसे विश्वास रहता है कि सर्वोच्च न्यायालय उसकी बात सुनेगा, चाहे वह कितना ही कमजोर, अकेला या अलोकप्रिय क्यों न हो।
इसीलिए भारत में न्यायपालिका के प्रति सम्मान केवल उसके संवैधानिक दर्जे के कारण नहीं है बल्कि उस नैतिक पूंजी के कारण है जिसे उसने दशकों में अर्जित किया। यह वह संस्था रही जिसने कई बार सत्ता की आंखों में आंखें डालकर संविधान की रक्षा की, नागरिक स्वतंत्रताओं का विस्तार किया और लोकतंत्र को उसकी मूल भावना से भटकने नहीं दिया। इसी न्यायपालिका ने ऐसे निर्णय दिए जिनके कारण भारतीय लोकतंत्र दुनिया के सबसे जीवंत लोकतंत्रों में गिना गया लेकिन प्रश्न यह है कि क्या आज भी वही नैतिक ऊंचाई, वही संवेदनशीलता और वही लोकतांत्रिक आत्मा न्यायपालिका में दिखाई देती है?
यह प्रश्न किसी एक फैसले से पैदा नहीं हुआ। यह धीरे-धीरे जमा हुए अनुभवों, टिप्पणियों और न्यायिक व्यवहार से निकला है। पिछले कुछ वर्षों में बार-बार ऐसे अवसर आए जब लोगों ने महसूस किया कि सर्वोच्च न्यायालय की प्राथमिकताएं बदल रही हैं। अदालत की भाषा बदल रही है। नागरिकों की पीड़ा को देखने का उसका नजरिया बदल रहा है। न्याय केवल निर्णयों से नहीं मिलता, न्याय इस बात से भी महसूस होता है कि अदालत नागरिक के साथ किस भाषा में संवाद करती है, उसकी पीड़ा को कितनी गम्भीरता से सुनती है और उसके अधिकारों को कितना महत्व देती है। इसी संदर्भ में इस वर्ष दो घटनाओं ने व्यापक बहस को जन्म दिया। पहली घटना तब हुई जब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने एक सुनवाई के दौरान कुछ युवाओं और तथाकथित एक्टिविस्टों के संदर्भ में ‘काॅकरोच’ शब्द का प्रयोग किया। बाद में इस टिप्पणी पर विवाद हुआ और स्पष्टीकरण भी आया कि उनका आशय सभी युवाओं से नहीं था लेकिन न्यायपालिका में शब्द केवल शब्द नहीं होते। अदालत की हर टिप्पणी संस्थागत संदेश बन जाती है। जब देश का सर्वोच्च न्यायाधीश किसी वर्ग के लिए ऐसा रूपक इस्तेमाल करता है तो प्रश्न केवल उस टिप्पणी का नहीं रह जाता, प्रश्न यह बन जाता है कि क्या न्यायपालिका अब नागरिकों को अधिकारों वाले व्यक्ति के रूप में देखती है या व्यवस्था के लिए असुविधा पैदा करने वाले तत्व के रूप में?
दूसरी घटना कुछ ही दिनों बाद सामने आई। दिल्ली में छात्रों के विरोध-प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर तत्काल सुनवाई की मांग की गई। याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि पुलिस कार्रवाई के वीडियो उपलब्ध हैं। इस पर अदालत ने कहा कि उसके पास वीडियो देखने का समय नहीं है। अदालतें समय के दबाव में होती हैं, उनके सामने लाखों मामले लम्बित हैं, यह भी एक वास्तविकता है लेकिन लोकतंत्र में कुछ वाक्य केवल प्रशासनिक टिप्पणी नहीं रहते, वे प्रतीक बन जाते हैं। जब छात्रों के कथित उत्पीड़न का प्रश्न उठे और सर्वोच्च न्यायालय यह कहे कि उसके पास वीडियो देखने का समय नहीं है तो आम नागरिक के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि सर्वोच्च न्यायालय के पास समय नहीं है तो फिर नागरिक अपनी पीड़ा लेकर कहां जाए?
लोकतंत्र में अदालत की असली ताकत उसकी पुलिस नहीं होती, उसकी सेना नहीं होती, उसका बजट नहीं होता। उसकी सबसे बड़ी शक्ति जनता का विश्वास होता है। जिस दिन नागरिक यह मानना छोड़ देगा कि सर्वोच्च न्यायालय उसकी अंतिम शरण है, उसी दिन न्यायपालिका की सबसे बड़ी नैतिक शक्ति कमजोर पड़ने लगेगी। यही कारण है कि न्यायाधीशों के शब्द, उनका व्यवहार, उनकी प्राथमिकताएं और उनकी संवेदनशीलता केवल व्यक्तिगत गुण नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों का सार्वजनिक प्रदर्शन भी होते हैं।
भारतीय न्यायपालिका का इतिहास केवल कानून की किताबों में नहीं लिखा गया, वह उन क्षणों में लिखा गया जब किसी अकेले नागरिक ने सत्ता के विरुद्ध अदालत का दरवाजा खटखटाया और न्यायालय ने उससे यह नहीं पूछा कि वह कितना शक्तिशाली है बल्कि यह पूछा कि उसके अधिकारों का हनन हुआ है या नहीं। यही परम्परा सर्वोच्च न्यायालय को महान बनाती है लेकिन यदि कभी यह धारणा बनने लगे कि अदालत सत्ता की असुविधा से अधिक चिंतित है और नागरिक की पीड़ा से कम तो यह केवल न्यायपालिका का संकट नहीं होगा, यह भारतीय लोकतंत्र के आत्मविश्वास का संकट होगा। यदि भारतीय लोकतंत्र के इतिहास से सर्वोच्च न्यायालय के कुछ निर्णय निकाल दिए जाएं तो सम्भव है कि आज का भारत वैसा न होता जैसा हम जानते हैं। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है। संसदें बहुमत से चलती हैं, सरकारें राजनीतिक इच्छाशक्ति से चलती हैं लेकिन संविधान केवल तब जीवित रहता है जब कोई संस्था सत्ता को यह कहने का साहस रखती है कि ‘आप यहां तक आ सकते हैं, इसके आगे नहीं।’ यही भूमिका सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक बार निभाई है। इसलिए भारतीय न्यायपालिका का इतिहास केवल
मुकदमों का इतिहास नहीं है बल्कि लोकतंत्र को बचाने, संविधान को जीवित रखने और नागरिक की गरिमा की रक्षा करने का इतिहास भी है।
इस गौरवशाली यात्रा की शुरुआत सफलता से नहीं हुई। न्यायपालिका ने भी ऐसी भूलें की हैं, जिनके कारण इतिहास ने उसे कठोर प्रश्नों के कटघरे में खड़ा किया। सबसे बड़ा उदाहरण 1975 का आपातकाल है। जब देश में नागरिक स्वतंत्रताएं निलम्बित थीं, हजारों राजनीतिक कार्यकर्ता जेलों में बंद थे, प्रेस पर सेंसरशिप थी और सरकार की शक्ति लगभग निरंकुश हो चुकी थी, तब पूरा देश सर्वोच्च न्यायालय की ओर देख रहा था। प्रश्न केवल इतना था, क्या नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अदालत जाने का अधिकार है?
यह मामला ‘एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला’ के नाम से इतिहास में दर्ज है। सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय पीठ में चार न्यायाधीशों ने सरकार के पक्ष में निर्णय दिया। उन्होंने माना कि आपातकाल में यदि सरकार किसी व्यक्ति को हिरासत में ले ले तो वह अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए भी अदालत नहीं जा सकता। भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में यह निर्णय सबसे अधिक आलोचना का विषय बना। बाद के वर्षों में स्वयं सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि यह निर्णय संविधान की भावना के अनुरूप नहीं था लेकिन उसी फैसले में एक अकेली आवाज थी जिसने इतिहास की दिशा बदल दी। वह आवाज थी न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना की। उन्होंने असहमति व्यक्त करते हुए कहा कि जीवन और स्वतंत्रता केवल संविधान द्वारा दिए गए अधिकार नहीं हैं, वे मनुष्य होने के कारण प्राप्त प्राकृतिक अधिकार हैं। यदि संविधान मौन भी हो जाए, तब भी राज्य किसी नागरिक की स्वतंत्रता मनमाने ढंग से नहीं छीन सकता। उस समय उनका मत हार गया लेकिन इतिहास ने उन्हीं को विजेता घोषित किया। उनकी असहमति भारतीय लोकतंत्र की सबसे सम्मानित न्यायिक विरासतों में गिनी जाती है।
यही वह परम्परा थी जिसने बाद में सर्वोच्च न्यायालय को अपनी भूलों से सीखने का साहस दिया। 1973 का ‘केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य’ मामला भारतीय लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक निर्णय माना जाता है। उस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने ‘मूल संरचना सिद्धांत’ स्थापित किया। अदालत ने कहा कि संसद संविधान में संशोधन कर सकती है लेकिन वह संविधान की मूल संरचना जैसे लोकतंत्र, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संघवाद, धर्मनिरपेक्षता और कानून का शासन को नष्ट नहीं कर सकती। बाद में न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती ने जनहित याचिका (च्नइसपब प्दजमतमेज स्पजपहंजपवद) की अवधारणा को विकसित किया। आज चाहे पीआईएल के दुरुपयोग पर बहस होती हो लेकिन उस समय इसका उद्देश्य उन लोगों को न्याय दिलाना था जो स्वयं अदालत तक पहुंचने की स्थिति में नहीं थे। मजदूर, बंधुआ श्रमिक, जेलों में बंद कैदी, फुटपाथ पर रहने वाले लोग, इन सभी के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने अपने दरवाजे खोले। न्यायालय ने यह संदेश दिया कि न्याय केवल अमीर और प्रभावशाली लोगों का विशेषाधिकार नहीं है।
इसी क्रम में हुसैन आरा खातून मामले ने देश को झकझोर दिया। अदालत के सामने यह तथ्य आया कि हजारों विचाराधीन कैदी वर्षों से बिना मुकदमे के जेलों में बंद हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि शीघ्र सुनवाई का अधिकार भी अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार है। इस निर्णय ने हजारों गरीब कैदियों को न्याय दिलाया और भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली को अपनी कमियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया।
1994 में आया एस.आर. बोम्मई निर्णय भारतीय संघवाद की रक्षा का मजबूत स्तम्भ बना। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 356 का प्रयोग मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता। इस निर्णय ने केंद्र सरकार की उस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जिसके तहत राजनीतिक कारणों से राज्य सरकारों को बर्खास्त किया जाता था। यह फैसला केवल राज्यों की रक्षा नहीं था, यह लोकतांत्रिक संघीय ढांचे की रक्षा था।
1997 में विशाखा बनाम राजस्थान राज्य का निर्णय आया। उस समय संसद ने कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से सम्बंधित कोई कानून नहीं बनाया था। सर्वोच्च न्यायालय ने अंतरराष्ट्रीय मानकों और संविधान के आधार पर विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए। वर्षों तक वही दिशानिर्देश पूरे देश में कानून की तरह लागू रहे, जब तक संसद ने विधेयक पारित नहीं किया। यह निर्णय बताता है कि न्यायपालिका कभी- कभी समाज को उसके समय से आगे ले जाती है। हाल के वर्षों में पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ का फैसला भी उसी परंपरा का हिस्सा है। सर्वोच्च न्यायालय की नौ सदस्यीय पीठ ने सर्वसम्मति से कहा कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार है। डिजिटल युग में यह निर्णय नागरिक स्वतंत्रता का नया संविधान बन गया। इन सभी निर्णयों में एक समान तत्व था। अदालत का झुकाव सत्ता की सुविधा की ओर नहीं बल्कि नागरिक की गरिमा की ओर था। न्यायाधीश कानून की शुष्क व्याख्या भर नहीं कर रहे थे, वे संविधान की आत्मा को समझने का प्रयास कर रहे थे। उन्हें यह विश्वास था कि न्यायपालिका की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सरकार को प्रसन्न करना नहीं बल्कि नागरिक को यह भरोसा दिलाना है कि संविधान अभी भी जीवित है।
यही कारण है कि भारतीय जनता सर्वोच्च न्यायालय को केवल एक न्यायिक संस्था नहीं बल्कि लोकतंत्र के अंतिम प्रहरी के रूप में देखती रही लेकिन इतिहास का यह उजला अध्याय जितना प्रेरक है, उतना ही वह वर्तमान के लिए एक कठिन कसौटी भी बन जाता है। जब हम उन न्यायाधीशों के साहस, उनकी भाषा, उनकी
संवेदनशीलता और नागरिक अधिकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को याद करते हैं तो अनायास ही यह प्रश्न सामने आता है, क्या आज की न्यायपालिका भी उसी परम्परा को आगे बढ़ा रही है या उसका चरित्र धीरे-धीरे बदल रहा है?
लोकतंत्र केवल संविधान की धाराओं से संचालित नहीं होता बल्कि संस्थाओं के चरित्र से भी संचालित होता है। किसी भी संवैधानिक संस्था का वास्तविक मूल्य उसके अधिकारों से नहीं बल्कि उसके आचरण से तय होता है। यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय के हर शब्द का महत्व होता है। अदालत केवल फैसले नहीं सुनाती, वह लोकतंत्र की भाषा भी गढ़ती है। जब सर्वोच्च न्यायालय किसी नागरिक की बात सुनता है तो पूरा देश यह देखता है कि न्याय की भाषा कैसी है, सहानुभूति की, संवेदनशीलता की या फिर अधीरता और अस्वीकार की।
इसी संदर्भ में पिछले कुछ वर्षों की घटनाओं को यदि एक साथ रखकर देखा जाए तो एक असहज तस्वीर उभरती है। यह तस्वीर किसी एक फैसले या किसी एक मुख्य न्यायाधीश की नहीं बल्कि न्यायपालिका की बदलती कार्य-संस्कृति की है। सर्वोच्च न्यायालय आज पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली है लेकिन क्या वह पहले जितना ही सहज उपलब्ध भी है? क्या आम नागरिक अब भी उतनी ही सहजता से यह महसूस करता है कि उसकी बात सुनी जाएगी? या फिर अदालत धीरे-धीरे एक ऐसी संस्था बनती जा रही है जहां प्रक्रिया, संवेदना पर भारी पड़ रही है? इस प्रश्न का उत्तर केवल अदालत के आदेशों में नहीं बल्कि उसकी भाषा में भी छिपा है। किसी छात्र, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता या विरोध-प्रदर्शन कर रहे नागरिक के बारे में अदालत किस शब्दावली का प्रयोग करती है, यह महज भाषायी चयन नहीं होता, यह न्यायिक दृष्टिकोण का संकेत भी होता है। न्यायाधीश के शब्दों में संयम इसलिए अपेक्षित होता है क्योंकि वे केवल व्यक्तिगत राय नहीं होते, वे संस्था की आवाज बन जाते हैं।
यही कारण है कि जब ‘काॅकरोच’ जैसी टिप्पणी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनी तो विवाद केवल उस शब्द पर नहीं था। सवाल यह था कि क्या लोकतंत्र में असहमति रखने वाले, प्रश्न पूछने वाले या व्यवस्था से टकराने वाले नागरिकों को न्यायपालिका किस दृष्टि से देख रही है? इतिहास गवाह है कि हर दौर में सत्ता के लिए सबसे असुविधाजनक लोग छात्र, लेखक, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता ही रहे हैं। स्वतंत्रता आंदोलन भी ऐसे ही लोगों ने आगे बढ़ाया था। यदि न्यायपालिका भी उन्हें संदेह की दृष्टि से देखने लगे तो लोकतंत्र का संतुलन बदलने लगता है। इसी प्रकार जब अदालत यह कहती है कि उसके पास कथित पुलिस अत्याचार के वीडियो देखने का समय नहीं है तो यह प्रशासनिक व्यस्तता का बयान भर नहीं रह जाता। यह उस नागरिक के मन में प्रश्न पैदा करता है जो यह मानकर सर्वोच्च न्यायालय पहुंचता है कि उसकी बात कम-से-कम पूरी सुनी जाएगी। न्याय केवल किया जाना पर्याप्त नहीं है, न्याय होते हुए दिखाई भी देना चाहिए। न्याय तभी दिखाई देता है जब अदालत यह प्रदर्शित करे कि वह पीड़ित की बात सुनने के लिए तैयार है।
निसंदेह, सर्वोच्च न्यायालय पर अभूतपूर्व बोझ है। हजारों मामले लम्बित हैं। संवैधानिक पीठों की सुनवाई, नियमित अपीलें, आपराधिक और दीवानी मुकदमे, इन सबके बीच समय का संकट वास्तविक है लेकिन प्रश्न यह है कि समय का उपयोग किस प्राथमिकता के साथ किया जा रहा है? क्या नागरिक स्वतंत्रता से जुड़े मामलों को वही तात्कालिकता मिल रही है जो पहले मिला करती थी? क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, गिरफ्तारी, पुलिस कार्रवाई और मौलिक अधिकारों से जुड़े मामलों में सर्वोच्च न्यायालय उसी सक्रियता का परिचय दे रहा है जिसने उसे ‘संविधान का प्रहरी’ बनाया था?
यहां एक और परिवर्तन भी दिखाई देता है। कभी जनहित याचिका (पीआईएल) भारतीय न्यायपालिका की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक उपलब्धि मानी जाती थी। एक पोस्टकार्ड भी अदालत तक न्याय की गुहार पहुंचा देता था। जेल में बंद कैदी, बंधुआ मजदूर, फुटपाथ पर रहने वाले परिवार, पर्यावरण से जुड़े मुद्दे, इन सबको सर्वोच्च न्यायालय ने जनहित याचिका के माध्यम से आवाज दी लेकिन समय के साथ पीआईएल का दुरुपयोग भी हुआ।
राजनीतिक हितों, व्यक्तिगत प्रचार और निजी विवादों ने भी अदालत का दरवाजा खटखटाना शुरू किया। इसका परिणाम यह हुआ कि न्यायपालिका का दृष्टिकोण अधिक सतर्क और कई बार अधिक संदेहपूर्ण हो गया। सतर्कता आवश्यक है लेकिन यदि संदेह इतना बढ़ जाए कि वास्तविक पीड़ित भी उसी दायरे में आ जाए तो न्याय की आत्मा आहत होती है। न्यायपालिका का दायित्व केवल झूठी याचिकाओं को रोकना नहीं है, उसका दायित्व यह भी है कि किसी वास्तविक पीड़ित की आवाज प्रक्रिया के शोर में दब न जाए।
आज एक और चिंता बार-बार सामने आती है, महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों की सुनवाई में होने वाली देरी। नागरिकता, चुनाव, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संघवाद, राज्यपालों की भूमिका, मौलिक अधिकार, इनसे जुड़े अनेक मामलों पर अंतिम निर्णय आने में वर्षों लग जाते हैं। न्याय में देरी केवल प्रशासनिक समस्या नहीं होती, कई बार वही देरी न्याय के प्रभाव को समाप्त कर देती है। संविधान समय पर लागू होने वाला दस्तावेज है, यदि उसके संरक्षण में वर्षों लग जाएं तो उसका उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है।
इतिहास में सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार राजनीतिक बहुमत के विरुद्ध खड़े होकर संविधान की रक्षा की लेकिन आज नागरिकों के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या न्यायपालिका वही नैतिक आत्मविश्वास आज भी प्रदर्शित कर रही है? यह प्रश्न इसलिए नहीं उठ रहा कि अदालत ने कोई एक निर्णय दिया या नहीं दिया। यह प्रश्न इसलिए उठ रहा है क्योंकि संस्था की सार्वजनिक छवि बदल रही है। न्यायालय की भाषा, उसकी प्राथमिकताएं और उसकी प्रतिक्रिया, ये सब मिलकर उस विश्वास को आकार देते हैं, जिस पर पूरी न्याय व्यवस्था टिकी हुई है।
यह भी सच है कि न्यायपालिका पर बढ़ते राजनीतिक दबाव, मीडिया ट्रायल, सोशल मीडिया अभियानों और जनमत की तीखी प्रतिक्रियाओं का प्रभाव भी बढ़ा है। न्यायाधीश भी मनुष्य हैं। वे निर्वात में काम नहीं करते लेकिन संविधान ने उन्हें इसी कारण विशेष संरक्षण दिया है, ताकि वे लोकप्रियता या अलोकप्रियता से ऊपर उठकर निर्णय ले सकें। सर्वोच्च न्यायालय का दायित्व जनता की तालियां बटोरना नहीं बल्कि संविधान की रक्षा करना है, चाहे वह निर्णय लोकप्रिय हो या नहीं। यही कारण है कि आज आवश्यकता न्यायपालिका की आलोचना करने की नहीं बल्कि उसे उसकी अपनी गौरवशाली परम्परा का स्मरण कराने की है। इतिहास में सर्वोच्च न्यायालय तब सबसे महान दिखाई दिया जब उसने सत्ता से अधिक नागरिक की चिंता की, प्रक्रिया से अधिक न्याय की आत्मा को महत्व दिया और कानून की भाषा में भी मानवीय संवेदना को जीवित रखा।
लोकतंत्र में संस्थाएं अचानक कमजोर नहीं होतीं। वे धीरे-धीरे अपने नैतिक अधिकार खोती हैं। संसद तब कमजोर होती है जब बहस समाप्त हो जाती है। मीडिया तब कमजोर होता है जब प्रश्न पूछना छोड़ देता है। न्यायपालिका तब कमजोर होती है जब जनता यह महसूस करने लगे कि उसकी पीड़ा अदालत की प्राथमिकताओं में नहीं रही। यही इस समय का सबसे बड़ा प्रश्न है और इसका उत्तर किसी राजनीतिक दल, किसी सरकार या किसी एक न्यायाधीश के पास नहीं है। इसका उत्तर स्वयं न्यायपालिका को देना होगा, अपने फैसलों से, अपनी भाषा से, अपने आचरण से और सबसे बढ़कर उस संवेदनशीलता से जिसने उसे इस देश की सबसे विश्वसनीय संस्था बनाया था।
भारत का सर्वोच्च न्यायालय दुनिया की उन विरल संस्थाओं में है, जिसने समय-समय पर स्वयं को भी कठघरे में खड़ा करने का साहस दिखाया है। यही उसकी सबसे बड़ी विशेषता रही है। बहुत कम संस्थाएं होती हैं जो अपनी ऐतिहासिक भूलों को स्वीकार करती हैं लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसा किया। एडीएम जबलपुर के निर्णय को बाद की पीठों ने वस्तुतः अस्वीकार किया। न्यायपालिका ने माना कि आपातकाल के समय नागरिक स्वतंत्रता की जिस तरह व्याख्या की गई थी, वह संविधान की आत्मा के अनुरूप नहीं थी। किसी संस्था की महानता इस बात में नहीं होती कि उससे कभी गलती न हो, उसकी महानता इस बात में होती है कि वह अपनी भूल को स्वीकार करने का नैतिक साहस रखे।
आज फिर भारतीय न्यायपालिका ऐसे ही एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार संकट किसी एक फैसले का नहीं है बल्कि धारणा (च्मतबमचजपवद) का है। लोकतंत्र में धारणा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी वास्तविकता। यदि जनता यह महसूस करने लगे कि सर्वोच्च न्यायालय उसकी आवाज सुनने के बजाय उसे टाल रहा है, यदि उसे यह लगे कि संवैधानिक प्रश्नों की तुलना में प्रक्रियात्मक
औपचारिकताएं अधिक महत्वपूर्ण हो गई हैं, यदि अदालत की भाषा नागरिकों को सम्मान देने के बजाय उन्हें संदेह की दृष्टि से देखने लगे तो यह केवल छवि का संकट नहीं होता, यह लोकतंत्र के नैतिक आधार का संकट बन जाता है। न्यायपालिका के सामने आज चुनौतियां भी कम नहीं हैं। पांच करोड़ से अधिक लम्बित मामलों का बोझ, न्यायाधीशों की कमी, बढ़ती मुकदमेबाजी, डिजिटल युग की नई कानूनी जटिलताएं, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सोशल मीडिया का दबाव, इन सबके बीच न्याय देना पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन हो गया है। इन परिस्थितियों को नजरअंदाज करके न्यायपालिका का मूल्यांकन करना भी उचित नहीं होगा लेकिन इसी कारण सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि जब व्यवस्था पर दबाव बढ़ता है, तभी संविधान की रक्षा करने वाली संस्थाओं की असली परीक्षा होती है।
भारतीय न्यायपालिका की सबसे सुंदर परम्परा यही रही है कि उसने ‘लोकप्रिय न्याय’ नहीं बल्कि ‘संवैधानिक न्याय’ किया। कई निर्णय उस समय अलोकप्रिय थे लेकिन इतिहास ने उन्हें सही सिद्ध किया। यही कारण है कि न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना को लोग उनके एक असहमति वाले निर्णय के लिए याद करते हैं। यही कारण है कि वी.आर. कृष्ण अय्यर को गरीबों का न्यायाधीश कहा गया। यही कारण है कि जे.एस. वर्मा को महिलाओं की गरिमा से जुड़े न्यायिक दृष्टिकोण के लिए याद किया जाता है। इतिहास न्यायाधीशों को उनके पद से नहीं, उनके साहस से याद रखता है।
आज यदि सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है तो वह किसी सरकार से नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती है, जनविश्वास को अक्षुण्ण बनाए रखना। यह विश्वास किसी कानून से नहीं मिलता, यह हर दिन अर्जित करना पड़ता है। अदालत के हर आदेश से, हर टिप्पणी से, हर सुनवाई से और हर उस क्षण से जब कोई सामान्य नागरिक अदालत की चैखट पर खड़ा होता है।
इसीलिए ‘काॅकरोच’ जैसी टिप्पणी या ‘वीडियो देखने का समय नहीं’ जैसा वाक्य केवल समाचार नहीं रह जाते। वे इस बड़े प्रश्न का हिस्सा बन जाते हैं कि न्यायपालिका स्वयं को जनता के सामने किस रूप में प्रस्तुत कर रही है। न्यायाधीश का एक वाक्य कभी-कभी सैकड़ों पृष्ठों के निर्णय से अधिक प्रभाव छोड़ देता है। इसलिए न्यायिक संयम केवल निर्णयों में नहीं, भाषा में भी दिखाई देना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा उसके आदेशों जितनी ही उसके शब्दों से भी निर्मित होती है।
भारत के संविधान ने सर्वोच्च न्यायालय को केवल विवादों का निपटारा करने के लिए नहीं बनाया था। उसे संविधान का संरक्षक बनाया था। संरक्षक वह नहीं होता जो केवल कानून पढ़े, संरक्षक वह होता है जो कानून के पीछे छिपी मानवीय गरिमा को भी समझे। संविधान की प्रत्येक धारा के पीछे एक मनुष्य खड़ा है, कभी एक छात्र, कभी एक किसान, कभी एक पत्रकार, कभी एक आदिवासी, कभी एक महिला, कभी एक कैदी। यदि न्यायालय को केवल फाइल दिखाई देने लगे और उसके पीछे खड़ा मनुष्य दिखाई देना बंद हो जाए तो संविधान का नैतिक अर्थ भी धीरे-धीरे क्षीण होने लगता है।
भारत में वह संस्था आज भी सर्वोच्च न्यायालय है और हम सबकी प्रार्थना यही होनी चाहिए कि वह हमेशा ऐसी ही बनी रहे, सत्ता की नहीं, संविधान की अदालत, प्रक्रिया की नहीं, न्याय की अदालत और सबसे बढ़कर, कानून की नहीं, इंसान की अदालत।