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बहुत जल्द अच्छी अंग्रेजी बोलने लगूंगा लिखकर छात्र ने लगाई फांसी

बहुत जल्द अच्छी अंग्रेजी बोलने लगूंगा लिखकर छात्र ने लगाई फांसी

आय दिन आत्महत्या करने की खबरें अखबारों के फ्रंट पेज पर देखने को मिलते रहते हैं। आत्महत्या करने वालों में सबसे अधिक कम उम्र के बच्चों में देखा गया है। कभी पढ़ाई के बोझ से तो कभी फैमिली प्रेसर से। एक ऐसी ही खबर कानपुर से 9वीं के छात्र आशुतोष की आई है। आशुतोष ने फांसी लगा ली। आशुतोष जुगल देवी सरस्वती विद्या मंदिर में पढ़ता था।

आशुतोष की फांसी लगा लेने की सूचना पुलिस को दी गई है। फोरेंसिक एक्सपर्ट की मदद से साक्ष्यों की जांच करवाई जा रही है। साथ ही बच्चों, स्कूल स्टाफ और घरवालों से भी पूछताछ की रही है। पुलिस को एक नोटबुक आशुतोष के कमरे से मिला है। नोटबुक के आखिरी में उसने एक छात्रा का नाम भी लिखा है।

आशुतोष ने नोटबुक के आखिरी पेज पर लिखा है, “हर इंसान अपने दोस्तों की तुलना में अपनी क्षमताओं को जानता है। मुझे अच्छे दोस्तों की संगत मिली जो काफी सहयोगी भावना के हैं। लेकिन कभी-कभी मुझे उनके सामने शर्मिंदा होना पड़ता है, जब वे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं। इसके पहले मेरी पढ़ाई तेलुगू मीडियम स्कूल में हुई। इस वजह से अंग्रेजी बोलने में बच्चों को हिचक महसूस होती थी। लेकिन वहां इसके अलावा कोई और स्कूल भी नहीं था। मैं तुमसे वादा करता हूं कि बहुत जल्द अच्छी अंग्रेजी बोलने लगूंगा।”

इसके बाद आशुतोष ने अपने नाम से जोड़कर छात्रा का नाम लिखा है और हस्ताक्षर भी किए। पुलिस का कहना है कि हो सकता है वो छात्रा से दोस्ती करना चाहता था, इस वजह से वह अंग्रेजी बोलना सीख रहा था। इसके अलावा बेड पर उसी छात्रा की डायरी भी मिली है। डायरी में एक संस्था की ओर से आयोजित टैलेंट डेवलेपमेंट परीक्षा का प्रवेश पत्र भी था। पुलिस पता लगा रही है कि आखिर छात्रा की डायरी आशुतोष के पास कैसे और क्यों आई। पुलिस छात्रा की डायरी और आशुतोष की नोटबुक को कब्जे में लेकर छानबीन कर रही है।

आशुतोष की मौत की की खबर से स्कूल के बच्चे सहम से गए हैं। उसके सहपाठी और हॉस्टल के बच्चे काफी देर तक रोते रहे। पुलिस हॉस्टल पहुंची और आशुतोष की अलमारी, बॉक्स खोलकर उसके कपड़ों और अन्य सामान की छानबीन भी की। पुलिस जो भी सामान अलमारी से निकालती आशुतोष के दोस्त उन सामानों को ऐसे स्पर्श करते जैसे वे अपने दोस्त को स्पर्श कर रहे हों। घटना के बाद स्कूल की छुट्टी कर दी गई।

स्कूल के प्रिंसिपल हरि प्रसाद शर्मा का कहना है, “आशुतोष क्लास का सबसे होनहार छात्र था। उसे कभी इतना दुखी नहीं देखा गया, जिससे अंदाजा नहीं लगाया जा सकता की वह ऐसा भी कदम उठा सकता है।” बचपन में ही मां का साया छिनने के बाद दादी-दादी ने आशुतोष और अभिलाष को पाला।

आशुतोष जब 5 साल का था, अभिलाष के जन्म के साथ ही मां का निधन हो गया। पिता कामता प्रसाद गोंडा जिले के एक प्राइमरी स्कूल में टीचर हैं। इतनी दूर पोस्टिंग की वजह से वह बच्चों को समय नहीं दे पाते थे। परिवार के दबाव के बाद भी कामता प्रसाद ने बच्चों की वजह से दूसरी शादी नहीं की। आशुतोष अपनी माँ को बहुत याद करता था। उसके दोस्तों ने भी बताया कि मां को याद कर वह अक्सर रोता था।

आज आशुतोष हमारे बीच नहीं है। पर सवाल उठता है कि बच्चों पर क्यों इतना पढ़ाई को लेकर दबाव है, क्यों बच्चों को अंग्रेजी ठीक से नहीं बोलने पर दोस्तों के बीच प्रतिस्पर्धा का भाव आ गया है। क्या शिक्षकों या अभिभावकों को इसकी जानकारी नहीं होती कि बच्चें किस मानसिक यातना से गुजर रहे हैं। ऐसा न हो कि खुद को भेड़ चाल में चलाते-चलाते बच्चों की बलि चढ़ाते जाएं।

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