सियासत का सच सतह पर नहीं होता। वह अंतः सलिला की तरह नदी के भीतर प्रवाहित होती है। इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि राजनीति के सच को जानने के लिए सरफेस रियालिटी को भेद कर ही जाना-समझा जा सकता है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने पटना जाकर वहां के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से डिनर टेबल पर क्या बात की, यह एक सस्पेंस बना हुआ है।

कहने को अमित शाह ने नीतीश कुमार से मिलने के बाद बड़ा ही खुशनुमा बयान दिया। कहा कि राजग अटूट है। इसमें किसी तरह का कोई मतभेद नहीं है। भाजपा-जद(यू) के बीच भी किसी किस्म का कोई मतभेद नहीं है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी सुर में सुर मिलाते हुए भाजपा के साथ किसी किस्म के मतभेद की बात को सिरे से नकार दिया। गठबंधन सरकार के सलामती की बात भी उन्होंने दोहरायी। नीतीश कुमार का स्वर तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के पटना पहुंचने के दो तीन दिन पहले से ही बदल गया था।
दोनों दिग्गजों की महामुलाकात का एजेंडा पहले यह बताया गया कि दोनों मिलकर बिहार में लोकसभा सीटों के बंटवारे के बाबत फाइनल बात करेंगे। नीतीश कुमार लगातार अपनी पार्टी के लिए ज्यादा सीटों की मांग कर रहे थे जो किसी भी सूरत में भाजपा देने वाली नहीं थी। वे 25 सीटों की मांग कर रहे थे जो किसी भी तरह व्यवहारिक भी नहीं था। 25 सीट जद(यू) और छह सीटे लोजपा, राष्ट्रीय समता पार्टी का भी दो तीन सीटें 32-34 फिर भाजपा के लिए बचता क्या है? नीतीश कुमार की मांग के बाबत भाजपा चुप थी। तय हुआ कि अमित शाह ही जाकर डील करेंगे।
अमित शाह पटना गए भी। दोनों के बीच महामुलाकात भी हो गयी। लेकिन सीटों के बंटवारे का द्वंद अब भी फंसा रह गया। अब नीतीश कुमार खुद कह रहे हैं कि सीटों का बंटवारा छह महीने बाद होंगे। असल में भाजपा का प्लान है कि इतनी देर कर दो कि जद(यू) के पास कहीं कोई विकल्प न बचे। कहा जा रहा है कि भाजपा ने नीतीश कुमार के सामने प्रस्ताव रखा है कि लोकसभा में भाजपा ज्यादा सीटें लेगा और विधानसभा चुनाव में जद(यू) को ज्यादा दी जाएगी।
लोग-बाग समझ नहीं पा रहे हैं कि जब दोनों की मुलाकात सीटों के बंटवारे को लेकर थी तो उस मुद्दों पर बात क्यों नहीं हो पाई। उस अगले छह महीने के लिए क्यों टाल दिया गया। क्यों अमित शाह की पटना पहुंचते ही नीतीश कुमार के सुर बदल गए।
अगर सूत्रों की बात मानं तो दोनों के बीच एक रहस्यमयी डिल हुई है। सूत्र बताते हैं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की कोई कमजोर नस भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के हाथ लग गयी है। इस कमजोर नस को दबाकर भाजपा ने उसे राजद से अलग करा दिया। अमित शाह पटना पहुंचते ही नीतीश की उस कमजोर नस पर धीरे से ऊंगली रख दी। नतीजतन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार फिर से पलटी खा गए। लेकिन इन बातों के बीच जनता के मन में यह सवाल नाग की फन की तरह काट रही है कि नीतीश की वह कमजोर नस है क्या? जाहिर की घोटाला, भ्रष्टाचार या कुछ और।

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