एक तरफ कोरोना का कहर है तो दूसरी तरफ बाढ़ की मार। लेकिन इन सबसे के बीच सबसे अधिक कवरेज सुशांत सिंह राजपूत को मिल रही है। जिस मुम्बई पुलिस को सबसे अच्छा माना जाता है, कहा जाता है कि देश के बाकी राज्यों के मुकाबले महाराष्ट्र पुलिस का ट्रेक रिकॉर्ड कहीं बेहतर है, जनता के बीच विश्वास अधिक है और दूसरे राज्यों के मुकाबले केस सॉल्व करने के मामले में रिकॉर्ड अच्छे हैं, उस पर संदेह किया जा रहा है। जिस बिहार पुलिस का रिकॉर्ड सबसे खराब है वह मुम्बई पहुंची हुई है और दावा किया जा रहा है कि वो वहां की पुलिस से बेहतर काम कर सकती है। महाराष्ट्र पुलिस पर आरोप है कि वो सही से काम नहीं कर रही है। और सुशांत के दोषियों को बचा रही है। देश की अधिकतर जनता इस तथ्य को मान भी रही है क्योंकि उसे भी लगता है कि सुशांत ने आत्महत्या नहीं बल्कि उसकी हत्या की गई है।
लेकिन सवाल उठता है कि जब किसी सेलेब्रिटी की प्राकृतिक मौत नहीं होती है तो आम आदमी को क्यों लगने लगता है कि उसकी हत्या हुई है। बड़े लोगों के मरने पर लोग शक क्यों करते हैं। दरअसल, इसका कारण मनोविज्ञानिक है। अमूमन लोगों को लगता है कि बड़े लोग इतनी आसानी से नहीं मर सकते हैं। उनकी दुर्घटना नहीं हो सकती है। वो बड़े सेफ्टी के साथ रहते हैं। उसके पास दुनिया की सारी खुशियां होती हैं। वे निराश नहीं होते, हमेशा खुश रहते हैं क्योंकि उनके पास सब कुछ है। फिर भला क्यों कोई आत्महत्या करेगा। उदाहरण के लिए कोरोना संक्रमित होने पर सेलेब्रिटी के खिदमत में सारा सिस्टम लग जाता है, वो अक्सर ठीक होकर लौट रहे हैं वहीं आम आदमी हृष्ट पुष्ट होने के बावजूद मर जाता है। यही वो मनोविज्ञान है कि जो बड़े लोगों के मौत पर शक करवाता है।
पटना के एसपी विनय तिवारी कल रविवार को मुंबई पहुंचे लेकिन उन्हें बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) ने पकड़कर क्वारेंटाइन कर दिया। उनके हाथ पर क्वारेंटाइन की मुहर लगाते हुए अगले आदेश तक एक घर में रहने को कहा गया। इस घटना के एक दिन पहले यानी 1 अगस्त को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने खुद मामले में हस्तक्षेप किया था। उनके बयानों पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। उद्धव ठाकरे ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि सुशांत सिंह राजपूत मामले पर राजनीति नहीं किया जाए। उन्होंने जोर देकर कहा कि मुंबई पुलिस अक्षम नहीं है। यदि किसी के पास कोई सबूत है तो वे इसे हमारे पास ला सकते हैं और हम दोषियों से पूछताछ कर उन्हें सजा देंगे। कृपया इस मामले को महाराष्ट्र और बिहार के बीच विवाद पैदा करने के बहाने के रूप में उपयोग न करें। असल में ठाकरे भी प्रतिद्वंदिता की ही राजनीति कर रहे हैं।
सवाल उठता है कि ये बात यहां तक पहुंची कैसे कि दो राज्यों की पुलिस एक-दूसरे से भीड़ जाए, शक्ति प्रदर्शन करे। इसका सही जवाब है कोरोना और बाढ़। कोरोना को लेकर पहले खबरें आती थी कि कितने संक्रमित हुए, कितने लोगों की मौत हुई। अब खबरें बन रही हैं कि कितने रिक्वर हुए। संक्रमितों की संख्या में हर दिन बेतहासा बढ़ोतरी हो रही है लेकिन मीडिया हमें बता रहा है कि भारत में अमेरिका के मुकाबले कम लोग मर रहे हैं। क्या कम लोगों का मरना मायने नहीं रखता? देश की राजधानी दिल्ली में बीते दिनों खबर आनी शुरू हुई, जब केजरीवाल सरकार पर इल्जाम लगे कि टेस्ट सही से नहीं हो रहा है। अब खबरें आ रही हैं कि दिल्ली में कोरोना संक्रमितों की संख्या आज कम आई। लेकिन कोई ये नहीं बता रहा कि कितने टेस्ट हुए। जाहिर-सी बात है जब टेस्ट कम होंगे तो रिजल्ट कम ही आएगें।
बिहार में कोरोना और बाढ़ से बुरा हाल है। नीतीश कुमार के विकास की इन दोनों मुसीबतों ने पोल-खोल कर रख दी है। बिहार में चुनाव है तो जाहिर है इसका प्रभाव वोट बैंक पर पड़ेगा। इसलिए पूरा सिस्टम कई दिनों से मीडिया का ध्यान बाढ़-कोरोना से हटाकर मुम्बई ले जाना चाहता है। ताकि विकास का चेहरा बेनकाब न हो। ऐसे में फिर से बिहार प्राइड का राग शुरू हो गया है। हालांकि, लॉकडाउन के दौरान बिहारी मजदूर सड़कों पर मर रहे थे तब ये बिहारी स्मिता गायब थी। राज्य के मुख्यमंत्री राज्य की जनता को राज्य में घुसने नहीं देना चाहते थे, तरह-तरह से धमका रहे थे। तब ये बिहार प्राइड कहां थी? किसी के पास कोई जवाब नहीं है। जनता की एक बड़ी समस्या ये है कि वो पिछले दिनों को बहुत जल्द भूल जाती है। जनता भी देखा जाए तो पूरी तरह से राजनीति में मोहरा बन रही है। उसे भी सिर्फ सुशांत की मौत पर बात करना अच्छा लग रहा है। कोई कोरोना से मरे या छत्त से अवसाद में आकर कुद जाए पर सुशांत की आत्महत्या में उसे साजिश दिखती बाकी सब समान्य घटनाएं हैं।
हर कोई सुशांत को न्याय दिलाना चाहता है पर आम आदमी को कितना न्याय सरकार दे रही है इससे किसी को कोई मतलब नहीं। ऐसा साफ मालूम पड़ता है कि जनता खुद ट्रैप होना चाहती है। इसके लिए आईटी सेल भी लगा हुआ है। वह आदित्य ठाकरे के साथ कार में बैठी दिशा पटानी को रिया चक्रवर्ती बना देता है। सुशांत और रिया की नाईट पार्टी में आदित्य को पहुंचा देता है ताकि जनता के शक को बल मिले। सोशल मीडिया पर खाली बैठे लोगों के पास शक को सच में बदलने के कई पुख्ता किस्से हैं। जैसे कि आदित्य ठाकरे, सूरज पंचोली और उसके साथियों ने सुशांत की पूर्व सेक्रेटरी का रेप करके खून किया था। और ये सभी बातें सुशांत को मालूम था जिसकी वजह से उनकी हत्या कर दी गई। सुशांत को मालूम था कि रिया चक्रवर्ती उसको लूट रही थी। कई तो इससे आगे बढ़ गए हैं कि रिया का सुशांत के दोस्त से कुछ चक्कर है और उन्हीं ने उसकी हत्या की है। जितनी मुंह उतनी बातें। एक तरह से पुलिस जांच से पहले ही फैसल हो गया है कि सुशांत ने आत्महत्या नहीं बल्कि उनकी हत्या हुई थी। इस बात को आगे बढ़ा रही है मीडिया। ऊपर से आदेश है ध्यान जनता का मूल मुद्दों से भटकाना है खास कर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इसे अंजाम दे रही है। ऊपर से यूट्यूब पर कई चैनल उग आए हैं जो हिट्स के लिए आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। जितना दिमाग उतना फतूरात।
बिहार में एक बांध टूटा तो राष्ट्रीय मीडिया में खबर बनी लेकिन उसके बाद कई बांध टूटे पर खबर गायब। संपादकों के तरफ से विशेष आदेश है कि बाढ़ की खबर पर ध्यान नहीं देना। अस्पतालों में नहीं जाना है। मरीजों को क्या सुविधाएं मिल रही हैं और क्या नहीं उस पर ध्यान नहीं देना है। तीन हफ्ते से देश में शोक का एक ही विषय है सुशांत सिंह राजपूत और शौर्य का एक ही विषय है राम मंदिर। बाकी सब मिथ्य है।
कई लोग सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं। लेकिन सवाल ये उठता है कि क्यों? क्या सीबीआई का ट्रेक रेकर्ड बिहार पुलिस और मुंबई पुलिस से बेहतर है? हां, तो फिर ललित बाबू हत्या कांड, नवरुणा हत्याकांड, सृजन या हाल ही में मुजफ्फरनजर बालिकागृह मामले में क्या हुआ? कुछ लोगों का आरोप है कि मुम्बई पुलिस रिया चक्रवर्ती को बचा रही है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या रिया टाटा-अंबानी के बेटी है, या किसी नेता की औलाद है, जिसके लिए महाराष्ट्र पुलिस अपने साख दाव पर लगा रही है।
आत्महत्या के मामले में पहले ‘एडीआर’ दर्ज की जाती है। उसके बाद इन्वेस्टिगेशन शुरू होता है। लेकिन ऐसे मामलों पर पहले से तय नहीं किया जाता है कि ये हुआ होगा तो ये हुआ होगा। इस मामले पर सोमवार को मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह मीडिया से मुखातिब हुए और बताया कि अब तक 56 लोगों के बयान दर्ज किया है। कई एक्सपर्ट, फॉरेंसिक एक्सपर्ट और डॉक्टरों की टीम से भी मशविरा लिया गया है। मामले में सुशांत की तीन बहनों, पिता, जीजा सिद्धार्थ तमर और ओपी सिंह का साइन स्टेटमेंट लिया गया है पर किसी ने अपने बयान में हत्या का शक नहीं जताया है। लेकिन जनता और मीडिया को शक है कि हत्या हुई है। इसलिए वो दूसरे कलाकारों पर आरोप लगा रहे हैं, ट्रोल कर रहे हैं। और आरोप लगा रहे हैं कि उन सब ने मिलकर सुशांत को सताया इसलिए उसने आत्महत्या की। लेकिन ठीक वही काम वे रिया चक्रवर्ती से साथ कर रहे हैं। उसे दोषी मानकर प्रताड़ित कर रहे हैं, ट्रोल कर रहे। मान भी लीजिए इस उत्पीड़न से तंग आकर उसने भी सुसाइड कर लिया तो उसका हिसाब कौन देगा। आगे चलकर वह निर्दोष साबित होती है तो उसके बर्बाद करियर को कौन लौटाएगा।
उधर बिहार के डीजीपी की लोग तारीफ कर रहे हैं, क्योंकि वो कहते हैं कि जिस रोज हम सुबूत जुटा लेंगे, रिया चक्रवर्ती को जमीन खोद कर निकाल लेंगे। मान लो कि वे रिया खिलाफ सुबूत नहीं मिला तो वे क्या करेंगे? क्या वो खुद को जमीनदोज कर लेंगे। जो लोग उनके बयानों पर लोट-पोट हो रहे हैं उन्हें डीजीपी से पूछना चाहिए कि आठ साल पहले हुए मुजफ्फरपुर की नवारुणा केस का क्या हुआ। क्यों नहीं इतनी समय बाद भी कातिल जमीन खोद नहीं निकाले जा सके। कायदे से कहा जाए तो नीतीश कुमार पर जब-जब सत्ता का खतरा मंडराता है बिहारी प्राइड याद जाता है। 2015 के विधानसभा चुनाव से समय इसका इस्तेमाल नरेंद्र मोदी के खिलाफ किया और बताया कि वो बिहारियों के डीएनए को खराब बता रहे हैं और उसके दो साल बाद ही वो कुद कर मोदी की गोद में जा बैठे। फिर से ये पाइड जाग गया है क्योंकि बिहारी जनता पूछेगी कि लॉकडाउन-कोरोना-बाढ़ के समय आप कहां थे। वह पूछेगी कि 15 साल देने के बावजूद अस्पतालों की हालत ऐसी क्यों है। ऐसे में भाजपा और जदयू के पास दो ही समाधान है सुशांत और राम मंदिर।