राम मन्दिर भूमि पूजन के दौरान जिस प्रकार से कुछ मुस्लिम संगठनों ने आपत्ति दर्ज करायी है और जिस प्रकार से दोबारा मन्दिर के स्थान पर मस्जिद निर्माण की बात कही है उसे देखते हुए मुख्यमंत्री का पारा सातवें आसमान पर है। मुख्यमंत्री की नाराजगी का जीवंत उदाहरण है कि उन्होंने अभी से स्पष्ट कह दिया कि मस्जिद निर्माण के दौरान यदि उन्हें बुलाया गया तो वे नहीं जायेंगे, लिहाजा मुस्लिम संगठन ऐसा कोई प्रयास न करें।
मुख्यमंत्री के तीखे जवाबों की कल्पना किसी ने नहीं की होगी, शायद यही वजह है कि भाजपा के पक्ष में बनावटी बोल बोलने वाले मुस्लिम नेताओं के चेहरे भी मुर्झाए हुए हैं। यहां तक कि भाजपा के कुछ बडे़ मुस्लिम नेताओं की इस मुद्दे पर छायी चुप्पी उनकी नाराजगी बयां कर रही है। हालांकि कुछ नेताओं ने दबी जुबान से इतना जरूर कहा है कि ये मुख्यमंत्री का व्यक्तिगत मामला है। वे कहां जाना चाहते हैं और कहां नहीं, ये वही तय करेंगे। उन पर किसी प्रकार का दबाव नहीं डाला जा सकता।
कथित अनुशासन की सीमा में जकडे़ कुछ भाजपाई मुस्लिम नेता फिलवक्त तो चुप्पी साधकर बैठ गए हैं लेकिन कहा जा रहा है कि इन नेताओं का भाजपा से मोह भंग होता जा रहा है। जल्द ही कुछ नेता पार्टी छोड़कर किसी दूसरे दल की शरण में जा सकते हैं। कुछ ने तो अपनी मंशा स्पष्ट भी कर दी है। ऐसे नेताओं का कहना है कि जिस प्रकार से राम मन्दिर भूमि पूजन के दौरान मुस्लिम नेताओं को पूछा तक नहीं गया और उसके बाद मुख्यमंत्री का इस तरह से बयान देना, स्पष्ट करता है कि यूपी की मौजूदा सरकार पूरी तरह से मुस्लिम विरोधी है।
मुख्यमंत्री के इस बयान का आगामी विधानसभा चुनाव में कितना असर होगा? इसका फैसला तो सूबे की मुस्लिम आबादी करेगी लेकिन इतना जरूर तय है कि अब तक जो मुसलमान भाजपा के गुणगान करता चला आ रहा था उसका मोहभंग हो चुका है।