राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर को तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने अपना सलाहकार बनाया तो पश्चिम बंगाल में भाजपा की बढ़त थामने के लिए था, पीके अपनी कार्यशैली चलते उल्टे भजपा की राह आसान करते नजर आ रहे हैं। ममता बनर्जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कम्यूनिस्ट पार्टी के खिलाफ लड़े नेताओं को ममता की प्रशांत किशोर पर बढ़ती निर्भरता खटकने लगी है। हालात इतने विकट हो चले हैं कि सुवेंदु अधिकारी की बगावत बाद अब कई बड़े तृणमूल नेता ऐन चुनावों के समय पाला बदलने की तैयारी करते नजर आ रहे हैं। प्रशांत किशोर ‘कारपोरेट’ अंदाज में राजनीतिक दलों को हांकने के अभ्यस्त हैं। उनका टैªक रिकाॅर्ड है कि वे केवल पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से संवाद करते हैं और बाकी नेताओं को नजरअंदाज कर अपने निर्णय थोपते है।
प्रशांत की कारपोरेट राजनीति
प्रशांत किशोर 2012 में हुए गुजरात विधानसभा चुनाव बाद देश भर में नोटिस लिए गए। इन चुनावों से एक बरस पहले वर्ष 2011 में गुजरात भाजपा ने उन्हें अपना रणनीतिकार नियुक्ति किया था। नरेंद्र मोदी ने उन्हें 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के लिए मुख्य रणनीतिकार बनाया था। पीके की ‘सिटिजन फार एकाउंटेबल गवर्नस’ चुनाव कम्पैन को जनता ने हाथों-हाथ लिया और मोदी को केंद्र की गद्दी मिल गई। तब भी गुजरात भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में पीके को लेकर नाराजगी की बात उठी थी। पीके केवल मोदी से संवाद करते थे और अन्य बड़े नेताओं को आदेश देने की शैली में बात करते थे।

पीके ने मोदी को करण थापर वाला इन्टरव्यू तीस बार दिखाया था।
कहा जाता है कि नरेंद्र मोदी को पत्रकारों के कठिन सवालों का सहजता से जवाब देने की ट्रैनिंग पीके ने उन्हें 2007 में प्रख्यात पत्रकार करण थापर द्वारा लिए गए उनके इन्टरव्यू को तीस बार दिखा कर उनकी गलतियों को चिन्हित किया था। इन इंटरव्यूह में मोदी थापर के गुजरात दंगों से जुड़े प्रश्नों से नाराज हो अधुरा छोड़ उठ गए थे। 2014 के चुनावों में एक अन्य मीडिया कम्पैन ‘चाय पर चर्चा’ भी प्रशांत किशोर के दिमाग की उपज थी। 2015 में लेकिन मोदी-पीके की जुगलबंदी टूट गई। पीके तब नीतीश के सलाहकार बन गए। 2015 के बिहार विधानसभा चुनावों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। इन चुनावों में जीत के बाद पीके से खासे प्रभावित हो नीतीश ने उन्हें जद(यू) का उपाध्यक्ष बना सबको चैंका दिया। बतौर जद(यू) उपाध्यक्ष उनका कार्यकाल विवादित और पार्टी के लिए घातक रहा। उनकी कार्यशैली के चलते पार्टी के पुराने और कद्दावर नेता खासे विचलित रहने लगे। अंततः यह साथ भी टूट गया और पीके की विजय रथ यात्रा जारी रही। उन्होंने 2016 के पंजाब चुनावों में कांग्रेस का रणनीतिकार बन पार्टी को जीत दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तो 2017 में आंध प्रदेश में जगन रेड्डी को जीत दिलाने, 2020 में आम आदमी पार्टी को प्रचंड बहुमत दिलाने में उनका योगदान बतौर रणनीतिकार रहा।
बुरी तरह असफल रहे यूपी, उत्तराखण्ड में
पीके लेकिन 2017 के दो महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों में भारी असफल रहे। कांग्रेस ने इन चुनावों में उन्हें दोनों राज्यों में रणनीतिकार बनाया था। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के हाथ मात्र सात सीटें तो उत्तराखण्ड में सरकार रहते मात्र ग्यारह सीटें हासिल हुई। इन दोनों राज्यों में कांग्रेस नेताओं की आलोचना और आक्रोश का केंद्र बिन्दु पीके की कार्यशैली रही।
बिहार से नदारत पीके
नीतीश की पार्टी से निकाले जाने के बाद पीके ने बिहार में राजनीतिक क्रांति लाने के बड़े-बड़े दावे किए। एक बारगी ऐसा माहौल उन्होंने रचा मानो वे नई पार्टी बनाने जा रहे हों। लेकिन सभी समय आने पर भ्रम साबित हुआ। बिहार के हालिया संपन्न चुनावों में पीके कहीं नजर नहीं आए। अपने गृह प्रदेश से कोसों दूर वे तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में सक्रिय रहे।

ममता के लिए सबसे बड़ा सिर दर्द बन रहे हैं पीके
प्रशांत किशोर को यूं तो 2021 में होने जा रहे तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के लिए प्रदेश के मुख्य विपक्षी दल डीएमके ने अपना रणनीतिकार बनाया है लेकिन उनका नाम ज्यादा चर्चा में बंगाल में होने जारहे 2021 के ही विधानसभा चुनावों को लेकर है। तृणमूल के कई बड़े नेता ममता के खिलाफ बगावत पर उतर आए हैं। इसकी शुरूआत का अपशय पीके को दिया जाने लगा है। टीएमसी के वरिष्ठ नेता मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी और उनके रणनीतिकार पीके से बेहद नाखुश हैं। नंदीग्राम सीट से विधायक और तृणमूल सरकार में मंत्री रहे ममता के विश्वास्त शुवेंदु अधिकारी ने पार्टी छोड़ ममता के खिलाफ बगावत का खुला एलान कर डाला है। अब बताया जा रहा है कि वे ममता से नाराज नेताओं को एकजुट करने में जुट गए हैं।

सुवेंदु के साथ भाजपा में जा सकते हैं कई दिग्गज
चर्चा गर्म है कि सुवेंदु अधिकारी दिसंबर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में भाजपा में शामिल होने जा रहे है। उनके साथ ही कई पार्टी विधायक और दो सांसद भी ममता का दामन छोड़ सकते हैं। खबर है कि सुवेंदु के साथ एक दर्जन एम एल ए एवं कई नगरपालिकाओं के प्रमुख तृणमूल छोड़ भाजपा में जाने की तैयारी कर रहे हैं। पश्चिम बर्धमान जिले के अध्यक्ष एवं विधायक जितेंद्र तिवारी ने पार्टी के सभी पद एवं विधायकी से इस्तीफा दे सुवेंदु अधिकारी के इस अभियान की शुरूआत कर डाली है।


