Uttarakhand

अस्मिता पर प्रहार ने बिगाड़ा ‘आप’ का खेल

कांग्रेस और भाजपा के बीच बारी-बारी सत्ता की गेंद उछालने वाली देवभूमि उत्तराखण्ड को विकल्प देने का दावा करते हुए आम आदमी पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव के लिए कमर कस चुकी है। उत्तराखण्ड की राजनीति का उबड़-खाबड़ पहाड़ आम आदमी पार्टी के लिए दिल्ली जितना सपाट न होने के चलते पार्टी पहाड़ पर चढ़ पाएगी या नहीं, इसमें संदेह बना हुआ है। हालांकि पहाड़ी एरिया की बनिस्पत उत्तराखण्ड का मैदानी इलाका आम आदमी पार्टी के लिए जमीनी राजनीति बनाने में संतुलन साध सकता है। लेकिन इस संतुलन को उसकी ही पार्टी के नेता बिगाड़ रहे हैं। 15 दिसंबर 2020 को दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया उत्तराखण्ड पहुंचे थे। जहां उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को चैलेंज करते हुए कहा कि वह कोई अपने कार्यकाल के 5 काम गिना दें जो उन्होंने उत्तराखण्ड के हित में किए हों। जनता ने मनीष सिसोदिया के इस बयान को हाथों-हाथ लिया था। सोशल मीडिया पर तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत की उत्तराखण्ड की जनता ने जमकर सुध ली थी। तब उत्तराखण्ड में मनीष सिसोदिया के 5 सवाल चर्चा का विषय बन गए थे।
इसी के साथ ही दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने यह कहकर भी खलबली मचा दी थी कि उनकी पार्टी सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। चुनाव में वह बिजली, पानी और स्वास्थ्य के साथ ही शिक्षा के मुद्दे को लेकर उत्तराखण्ड की जनता के बीच जाएगी। एक तरह से देखा जाए तो आम आदमी पार्टी उत्तराखण्ड में ‘दिल्ली मॉडल’ के सहारे सरकार बनाने का सपना सजोने लगी है।

पिछले दिनों दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल भी उत्तराखण्ड पहुंचे थे। जहां उन्होंने दिल्ली की तर्ज पर ही उत्तराखण्ड में फ्री बिजली देने की बात कहते हुए कहा कि अगर उनकी सरकार सत्ता में आई तो वह उत्तराखण्ड की जनता को 300 यूनिट बिजली फ्री देंगे। इसके बाद प्रदेश के ऊर्जा मंत्री हरक सिंह रावत फ्री बिजली के मामले में आम आदमी पार्टी के राजनीतिक दवाब में आ गए। जब उन्होंने कहा कि उनकी सरकार भी ऐसा प्रस्ताव बना रही है। हालांकि बाद में है हरक सिंह अपनी बात से मुकर गए।

आप नेताओं की सारी कवायद लेकिन पार्टी की एक प्रवक्ता उमा सिसोदिया के उलुल-जुलून बयान के चलते धराशायी होती नजर आने लगी है। इंटरनेट पर वायरल हो चले इस बयान में सिसोदिया आम उत्तराखण्डी की तुलना ‘खाने के लालच में’ होटलों के बाहर खड़े कुत्तों से करती सुनाई दे रही हैं। हालांकि बवाल मचने पर आप प्रवक्ता ने माफीनामा जारी किया जरूर, लेकिन तब तक पार्टी को खासा डैमेज हो चुका था। मुख्य
राजनीतिक दलों के साथ-साथ प्रदेश के क्षेत्रीय दलों ने भी इसे बड़ा मुद्दा बनाते हुए इसे उत्तराखण्डियत पर चोट पहुंचाने और आम उत्तराखण्डियों को अपमानित करने से जोड़ दिया है। आप का राष्ट्रीय नेतृत्व अब डैमेज कंट्रोल के लिए पर्यावरणविद् स्व सुंदरलाल बहुगुणा को भारत रत्न दिए जाने की मांग उठाने और दिल्ली विधानसभा में बहुगुणा की तस्वीर लगाने जैसे प्रयासों में जुट गया है। भाजपा और कांग्रेस इसे नौटंकी बताते हुए सवाल उठाने लगी है कि यदि केजरीवाल को पहाड़ियों से इतना ही प्रेम है तो दिल्ली में लाखों की तादात में बसे उत्तराखण्डियों में से किसी एक को भी प्रदेश विधानसभा चुनावों में पार्टी ने टिकट क्यों नहीं दिया?
अगर प्रदेश में आम आदमी पार्टी के संगठन और जनाधार की बात करें तो दोनों ही मामले में पार्टी कहीं नहीं ठहरती है। पार्टी का संगठन और जनाधार न होने का सवाल विरोधी दल और राजनीतिक विश्लेषक दोनों उठाते रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषक आम आदमी पार्टी के उत्तराखण्ड में चुनाव लड़ने पर कांग्रेस को कमजोर करने की बात करते रहे हैं। लेकिन देखा जाए तो उत्तराखण्ड में कांग्रेस की स्थिति इतनी कमजोर भी नहीं है। जिस तरह दिल्ली और दूसरी जगह पर कांग्रेस हताश दिखाई देती है उसका फायदा बेशक आम आदमी पार्टी दिल्ली में उठा पाई हो लेकिन उत्तराखण्ड में यह संभव नहीं लगता है। यहां कांग्रेस पार्टी के खाटी नेता हरीश रावत के नेतृत्व में आगामी विधानसभा चुनाव लड़ेगी। ऐसे में दिल्ली जैसी जीत उत्तराखण्ड में दोहराना आम आदमी पार्टी के लिए आसान नहीं होगा।

आदर्श हुए चकनाचूर, जाति और धर्म का रंग ‘आप’ पर भी चढ़ा

2017 के विधानसभा चुनाव में पंजाब में आम आदमी पार्टी को उसके मन मुताबिक सीट नहीं मिली। कारण था पार्टी का एक ऐसा गुप्त एजेंडा जो पंजाब के लोगों को नहीं भाया। वह था दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का पंजाब का मुख्यमंत्री बनने का सपना देखना। उस समय बड़े जोरों से चर्चा चली कि अरविंद केजरीवाल दिल्ली में मनीष सिसोदिया को मुख्यमंत्री बनाकर खुद पंजाब के सीएम बनने का ख्वाब संजोये हुए हैं।

इस चर्चा के चलते 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को मनमाफिक सफलता नहीं मिली। हालांकि वह पंजाब में 20 सीट जीत मुख्य विपक्षी दल बनने में सफल रही। 5 साल बाद पार्टी ने इस मामले में अपना एजेंडा क्लियर कर दिया। इस बार पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने स्पष्ट कर दिया है कि पंजाब में वह सिख बिरादरी के कैंडिडेट को सीएम बनाएगी। मतलब यह है कि एक आंदोलनकारी पार्टी अब जाति बिरादरी की ओर जाती हुई दिख रही है। पंजाब के साथ ही उत्तराखण्ड में भी पार्टी का रुख जाति बिरादरी की तरफ स्पष्ट हुआ है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में जिस उत्तराखण्ड के लोगों को एक भी टिकट पार्टी नहीं दे पाई वहां के पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा की तस्वीर विधानसभा में लगाकर वह उत्तराखण्ड में ब्राह्मण वोट बैंक को अपनी ओर आकर्षित करने में जुट गई है। दिल्ली विधानसभा में बहुगुणा की तस्वीर लगाने के साथ ही केजरीवाल ने उन्हें भारत रत्न देने की मांग भी कर डाली। वह इसलिए कि उत्तराखण्ड का ब्राह्मण मतदाता उनकी तरफ आकर्षित हों।

मतदाताओं को अपनी ओर किस तरह आकर्षित करना है इस मामले में केजरीवाल निपुण है। वोट पाने की खातिर वह एक चुनावी सभा में अपने आपको बनिया भी बता चुके हैं। दिल्ली में 2 साल पूर्व जब सीएए और एनआरसी आंदोलन हुआ तब भी आप धार्मिक संतुलन साधती नजर आई थी। रहस्यमय चुप्पी साध गए थे। केजरीवाल ने तब बहुसंख्यक वोटों को अपनी तरफ बनाए रखने के लिए सीएए और एनआरसी मामले में कुछ नहीं बोला। वह बखूबी जानते हैं कि दिल्ली में मुस्लिम मतदाता उनकी पार्टी के अलावा और कहीं नहीं जा सकते हैं। इसी के साथ केजरीवाल ने भाजपा के सामने दिल्ली में हनुमान को खड़ा कर दिया। चांदनी चौक हनुमान मंदिर पर जिस तरह राजनीति की गई वह बड़े-बड़े आदर्शों की बात करने वाली पार्टी अलग ही चेहरा सामने लाता है।

बात अपनी-अपनी

आम आदमी पार्टी का उत्तराखण्ड में न तो कोई स्ट्रक्चर है न कोई कैडर है। सच बात तो यह है कि आप का उत्तराखण्ड में कोई अस्तित्व ही नहीं है। यह भारतीय जनता पार्टी की बी टीम मात्र है। उत्तराखण्ड में असफल साबित हो रही भाजपा सरकार से असंतुष्ट जनता को गुमराह कर कांग्रेस के वोट काटे जा सके यह आम आदमी पार्टी के द्वारा संभव नहीं हो पाएगा।
प्रदीप ठम्टा, राज्यसभा सांसद

आम आदमी पार्टी दावे तो खूब कर रही है लेकिन इनको उत्तराखण्ड में 70 सीटों के लिए सभी जगह कैंडिडेट मिल भी पाएंगे इसमें भी संदेह है। आम आदमी पार्टी उत्तराखण्ड में अपने कैडर की बजाए दूसरी पार्टी के नेताओं की तरफ नजर गड़ाए हुए है। इन्हें उम्मीद है कि बड़े दलों के कुछ नेता टूट कर उनके पाले में आ जाएंगे जिन्हें टिकट देकर वह चुनाव जीत जाएगी, यह कभी भी संभव नहीं होगा।
डॉ. देवेंद्र भसीन, उत्तराखण्ड भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष और प्रवक्ता 

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