राज्य में वाहन पंजीकरण के नाम पर वाहन मालिकों से लूट मची हुई है। हैरानी की बात है कि परिवहन विभाग के उच्च अधिकारी इसके लिए विधानसभा से पारित अधिनियम को भी दरकिनार कर देते हैं। इसमें पूर्व सैनिकों के हितों पर भी चोट की जा रही है। विभाग की मनमानी से तंग आकर वाहन मालिक अब हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने को विवश हैं
प्रदेश के परिवहन विभाग की हठधर्मिता के चलते वाहन स्वामियों को वाहन पंजीकरण में दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। विभाग द्वारा उत्तराखण्ड मोटरयान कराधान सुधार अधिनियम के इतर उनसे जबरन अधिक कर वसूलने के मामले सामने आ रहे हैं। इससे वाहन स्वामियों को कई करों के बोझ तले दबना पड़ रहा है। विभाग उन्हें राहत के बजाये दण्ड देने में लगा हुआ है।
राज्य में वाहन पंजीकरण के निर्धारित नियमों के तहत 10 लाख तक के वाहन का पंजीकरण और अन्य शुल्क मूल्य का 6 प्रतिशत है। दस लाख से अधिक के वाहन के लिए यह राशि 8 प्रतिशत रखी गई है। इसके लिए उत्तराखण्ड परिवहन विभाग ने 2003 में ‘उत्तराखण्ड मोटरयान कराधान सुधार अधिनियम 2003’ असाधरण गजट जारी करके कानून बनाये हैं। जिसमें समय-समय पर कई सुधार किए गए हैं। इन सुधारों में मोटरयान पंजीकरण के शुल्क को बढ़ाया तो गया है, परंतु पंजीकरण शुल्क और करों के लिए एक्ट में कोई भी बदलाव नहीं किया गया है। बावजूद इसके स्वयं विभाग एक्ट के प्रवधानों के विपरीत प्रदेश में वाहन धारकों से पंजीकरण के नाम पर अधिक कर वसूल रहा है।
हैरानी की बात यह है कि 2003 से हो रही इस लूट पर न तो विभाग के अधिकारियों और न ही शासन में बैठे सचिव जैसै अधिकारियों ने ध्यान दिया। जबकि आम जनता में इसका विरोध होता रहा। नियमों के अनुसार प्रदेश में खरीदे गए वाहन के पंजीकरण की तय समय सीमा के बाद प्रतिदिन दंड लगाए जाने की प्रक्रिया के चलते अगर किसी वाहन स्वामी ने इसका विरोध करने का प्रयास भी किया तो उसकी पहले तो कहीं कोई सुनवाई नहीं हो पाई, उल्टा उसको अपने वाहन के पंजीकरण में देरी के कारण पंजीकरण का अतिरिक्त शुल्क भी देना पड़ा। इसके चलते विरोध के स्वर कभी भी मुखर नहीं हो पाए। नतीजा यह रहा कि विभाग जनता के धन पर टैक्स के नाम पर डाका डालकर अपना खजाना भरता चला गया। एक अनुमान के मुताबिक करोड़ां रुपये अब तक राज्य का परिवहन विभाग आम जनता से पंजीकरण के नाम पर ले चुका है।
उत्तराखण्ड परिवहन एक्ट 2003 में 3 दिसम्बर 2015 को संशोधन किया गया। इस संशोधन के बाद अधिसूचित एक्ट में रुपये दस लाख तक के वाहनों का पंजीकरण शुल्क 6 फीसदी और दस लाख से अधिक के वाहनें का 8 फीसदी लिए जाने का प्रावधान किया गया। 14 दिसम्बर 2018 को राज्य कैबिनेट ने परिवहन एक्ट में कुछ संशोधन किए, लेकिन पंजीकरण शुल्क में कोई बदलाव नहीं किया गया। अब पूरे मामले में आम जनता से जो लूट-खसोट होती रही है, उसकी बाननी दिलचस्प है। एक्ट में एक्स शोरूम मूल्य यानी वाहन की लागत के आधार पर ही पंजीकरण शुल्क, जीएसटी और सेस लिए जाने का प्रावधान रखा गया है। जबकि वाहन निर्माताओं द्वारा अपने-अपने वाहनों की बिक्री के लिए कई प्रकार की छूट वाहन खरीददारों को दी जाती है जिसके चलते एक्स शोरूम मूल्य घट जाता है। इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि माना किसी वाहन की कीमत 3 लाख 35 हजार है तो यह उस वाहन की एक्स शोरूम लागत मानी जाएगी। उस पर वाहन निर्माता से 25 हजार रुपए की छूट दी गई है तो उक्त वाहन का एक्स शोरूम मूल्य 3 लाख 10 हजार माना जाएगा जिसमें 18 फीसदी जीएसटी और सेस सभी शामिल है।
परिवहन विभाग ने अपने क्म्प्यूटर सॉफ्टवेयर में वाहन की एक्स शोरूम लागत के बजाय न्यूनतम खुदरा मूल्य यानी एमआरपी होम लोगेशन के नाम से फीड की हुई है, जबकि यह एक्स शोरूम लागत मानी जानी चाहिए और इस पर छूट के बाद ही नियमानुसार 6 फीसदी टैक्स लगाया जाना चाहिए। वाहन निर्माताओं द्वारा अपने वाहन खरीददार को 25 हजार की छूट दिए जाने के बावूजद परिवहन विभाग वाहन स्वामियों से इसी आधार पर कर वसूल रहा है।
गंभीर बात यह है कि उत्तराखण्ड सैनिक बाहुल्य प्रदेश होने के बावजूद परिवहन विभाग पूर्व सैनिकों तक से पंजीकरण टैक्स के नाम पर मनमानी कर रहा है। केंद्र सरकार से सैनिकों को जीएसटी में 50 प्रतिशत की छूट मिली हुई है। जबकि उत्तराखण्ड में पूर्व सैनिकों से पंजीकरण टैक्स में भी सामान्य नागरिकों की ही तरह से टैक्स लिया जा रहा है। इसको ऐसे समझा जा सकता है कि माना किसी वाहन की कीमत 1 लाख है और उस पर 50 फीसदी जीएसटी माफ की गई है तो उस वाहन की कीमत 91 हजार होगी और इस पर ही मोटर कराधान अधिनियम के तहत पंजीकरण शुल्क लिया जाएगा। लेकिन विभाग इसमें भी कोई छूट देने के बजाय 1 लाख पर ही पंजीकरण शुल्क ले रहा है। यह साफ तौर पर सैनिकां के हकां पर चोट है।
उत्तराखण्ड मोटरयान कराधान सुधार अधिनियम में कई संशोधन किए जाने के बावजूद पंजीकरण शुल्क के प्रावधानों में कोई भी संशोधन नहीं किया गया है। बावजूद इसके परिवहन विभाग सचिव स्तर के अधिकारियां द्वारा समय-समय पर दिए गए निर्देशों के अनुसार वाहन स्वामियों को लूटने का काम कर रहा है। 26 अप्रैल 2013 में तत्कालीन परिवहन सचिव उमाकांत पंवार ने परिवहन आयुक्त को पत्र जारी कर निर्देश दिए थे कि वाहन पर वाहन निर्माताओं द्वारा दी जा रही छूट के बावजूद वाहन का मूल्य एक्स शोरूम बगैर छूट के माना जाये। गौर करने वाली बात यह है कि कानून और एक्ट के मामले में सचिव का इस तरह से कोई पत्र जारी ही नहीं हो सकता है।
अधिनियम में अगर किसी तरह का कोई संशोधन किया जाता है तो इसका अधिकार राज्य केबिनेट या विधानसभा को ही है। लेकिन प्रदेश में तो एक परिवहन सचिव को ही यह अधिकार मिले हैं कि वह कानून में अपने हिसाब से कोई बदलाव करने को साधारण पत्र के जरिये आदेश जारी कर सकता है। यह बड़ा गंभीर मामला प्रतीत होता दिख रहा है। इसका मतलब साफ है कि राज्य में विधानसभा या राज्यपाल द्वारा स्वीकøत अधिनियम को एक सचिव स्तर का अधिकारी किस प्रकार से अपने आप ही संशोधन करके साधारण पत्र पर आदेश दे देता है।
यह प्रकरण शायद कभी सामने नहीं आता यदि पत्रकार सलीम सैफी ने इसके खिलाफ आवाज न उठाई होती। सलीम ने एक वाहन खरीदा जिसका पंजीकरण करवाने के लिए देहरादून आरटीओ कार्यालय में आवेदन किया। सैफी के वाहन की कीमत 10 लाख 30 हजार थी और इस पर हांडा कंपनी की ओर से 32 हजार की छूट ग्राहक को दी गई। इस हिसाब से सलीम सैफी की कार की एक्स शोरूम कीमत सभी कर लगाकर 9 लाख 98 हजार हुई। कार के बिल के अनुसार कार की कुल लागत मूल्य 7 लाख 60 हजार 101 रुपए होंडा कंपनी द्वारा तय की गई। जिसमें जीएसटी और सीजीएसटी 2 लाख 12 हजार 828 रुपए और 3 फीसदी सेस जोड़कर कार की कुल कीमत 9 लाख 94 हजार का बिल कम्पनी ने सलीम सैफी को दिया। इसके आधार पर सलीम सैफी ने देहरादून आरटीओ में अपने वाहन के पंजीकरण के लिए आवेदन दिया। इस पर एक्ट के अनुसार 6 प्रतिशत कर लेकर वाहन का पंजीकरण किया जाना था। लेकिन विभाग ने सलीम सैफी के वाहन का एमआरपी 10 लाख 30 हजार मानकर 8 फीसदी टैक्स वसूला।
सलीम सैफी ने परिवहन सचिव शैलेश बगोली और परिवहन आयुक्त को एक्ट के अनुसार ही टैक्स लेने के लिए पत्र लिखा। लेकिन उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई। यहां तक कि परिवहन आयुक्त सुनिता सिंह की ओर से सलीम सैफी को कहा गया कि विभाग उनके वाहन के एक्स शोरूम मूल्य 10 लाख 30 हजार पर 8 प्रतिशत टैक्स ही लेगा। अगर चाहें तो सलीम सैफी इसके लिए कोर्ट जा सकते हैं। मजबूरी में सलीम सैफी को अपने वाहन को अधिक कर देकर पंजीकरण करवाना पड़ा, क्योंकि समय पर पंजीकरण न करवाने पर प्रतिमाह 2 प्रतिशत लेट फीस देनी पड़ती है। सलीम सैफी से परिवहन विभाग को 59 हजार 646 रुपए कर के रूप में लेने चाहिए थे। लेकिन विभाग की हठधर्मिता के चलते उनसे 82 हजार 400 रुपए टैक्स के नाम पर वसूले गए। जो कि वास्तविक और परिवहन एक्ट के अनुसार 22 हजार 7 सौ 54 रुपए अधिक देने पड़े।
यह तो एक मामला है, जबकि राज्य में प्रतिवर्ष सैकड़ों वाहनों का पंजीकरण किया जाता है। एक अनुमान के मुताबिक राज्य बनने के बाद देहरादून में सभी प्रकार के वाहनों की संख्या वर्तमान में 5 लाख के करीब है। पूरे प्रदेश के आंकड़ा को देखा जाए तो संख्या कई लाख में पहुंच चुकी है। इस वर्ष दीपावली में ही
तकरीबन 3 सौ के करीब वाहन देहरादून में पंजीकøत हुए हैं और उनसे ज्यादा कर वसूला गया। राज्य बनने के बाद से लेकर अभी तक के करों के वसूलने का एक सामान्य आंकलन किया जाए तो यह संख्या कई सौ करोड़ तक पहुंच सकती है। यानी परिवहन विभाग ने वाहन स्वामियों से जबरन अधिक कर वसूला है जो कि उत्तराखण्ड मोटरयान कराधान सुधार अधिनियम 2003 के खिलाफ है।
नोट : परिवहन सचिव आईएएस शैलेश बगोली और परिवहन आयुक्त सुनिता सिंह से विभागीय पक्ष जानने के लिए टेलीफोन पर बात करने का कई बार प्रयास किया गया। मोबाइल और व्हाटसएप पर संदेश भी भेजा गया। लेकिन दोनों ही अधिकारियों का पक्ष नहीं मिल पाया।
बात अपनी-अपनी
एआरटीओ, परिवहन आयुक्त सुनिता सिंह सभी एक्ट की तोड़-मरोड़ कर व्याख्या करने में लगे हुये हैं। एक्ट में यह कहीं नहीं लिखा है कि एमआरपी पर टैक्स वूसला जाए। टैक्स एक्स शोरूम मूल्य पर लेने का उल्लेख है। अगर वाहन निर्माता अपने ग्राहक को कोई छूट देता है तो छूट को घटा कर एक्स शोरूम मूल्य माना जाना चाहिये। मैंने परिवहन आयुक्त सुनिता सिंह से इस मामले में बात की और बताया कि विभाग एक्ट के बजाये मनमर्जी से सचिव के साधारण पत्र के हिसाब से टैक्स ले रहा है, तो उनका कहना था कि हम तो ऐसे ही टैक्स लेंगे। अगर आपको कोई परेशानी है तो आप इसके लिए कोर्ट जा सकते हैं। मैं अब इस मामले में हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने वाला हूं। आज तक कई सौ करोड़ रुपये परिवहन विभाग की ओर से राज्य के वाहन स्वामियों से वूसले गये हैं जो कि एक्ट के प्रावधानों के खिलाफ हैं।
सलीम सैफी, पत्रकार
यह प्रकरण तो समाप्त हो गया। सलीम सैफी द्वारा सचिव साहब को शिकायत की गई थी और शासन ने हमसे जबाब मांगा था। हमने एक्ट और शासनादेश सभी तथ्य शासन को भेज दिये जिस पर सलीम सैफी ने टैक्स दिया। हमें इससे कोई मतलब नहीं है कि वाहन आपको किस कीमत पर मिला। जो उसकी एक्स शोरूम कीमत होगी उस पर ही हम टैक्स लेंगे। आप इसे जमीन की रजिस्ट्री के जैसे मान सकते हैं। जमीन चाहे फ्री में ली हो, लेकिन उसकी रजिस्ट्री तो सर्किल रेट पर ही होती है। उसी तरह से हम भी टैक्स लेते हैं। अगर किसी को कोई छूट मिली है तो यह उसका फायदा है। टैक्स में किसी प्रकार की कोई छूट नहीं दी जा सकती है।
अरविंद पांडे, एआरटीओ देहरादून

