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सुरक्षित सीटों से सुनिश्चित होगी सत्ता

पांच राज्यों के विट्टाानसभा चुनावों में अब कुछ ही दिन बचे हैं। चुनावी सभाओं में सभी दल जीत का दावा कर रहे हैं। लेकिन 2018 में हुए चुनावों में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान में कांग्रेस ने दो तिहाई आरक्षित सीटों पर जीत का परचम लहराकर बीजेपी की उम्मीदों पर पानी फेर दिया था। इसी तरह तेलंगाना में केसीआर और मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट ने उलटफेर कर दिखाया था। राजनीतिक विश्लेषकों और आंकड़ों की मानें तो इन राज्यों में सत्ता की चाबी आरक्षित सीटों के मतदाताओं के हाथों में है। यही वजह है कि इस बार के चुनावी रण में भाजपा और कांग्रेस का फोकस एससी-एसटी सीटों पर है, क्योंकि सत्ता का सिंहासन इन्हीं सुरक्षित सीटों में छिपा है

इसी महीने होने वाले मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम के विधानसभा चुनाव का मतदान जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं वैसे-वैसे देश की राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ने लगी है। वहीं राजनीतिक विश्लेषकों और आंकड़ों की मानें तो पांचों राज्यों में सत्ता की चाबी अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के मतदाताओं के हाथों में है। 2018 में दलित-आदिवासी का विश्वास नहीं जीत पाने के चलते बीजेपी को तीन राज्यों में सत्ता गंवानी पड़ गई थी। इस बार के चुनावी रण में बीजेपी और कांग्रेस का फोकस एससी-एसटी सीटों पर है, क्योंकि इसे सत्ता के सिंहासन तक पहुंचने का रास्ता माना जाता है।

इन पांच राज्यों में कुल 669 विधानसभा सीटें हैं जिनमें से 250 सीटें एससी-एसटी के लिए सुरक्षित हैं जो 37.36 फीसदी सीटें होती हैं। कांग्रेस ने पिछले चुनाव यानी 2018 में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान में दो तिहाई एससी-एसटी आरक्षित सीटों पर जीत का परचम लहराकर बीजेपी के सत्ता में बने रहने की उम्मीदों पानी फेर दिया था। इसी तरह तेलंगाना में केसीआर और मिजोरम में एमएनएफ ने उलटफेर कर दिखाया था। यही वजह है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में सत्ता का सिंहासन इन्हीं सुरक्षित सीटों में छिपा है।
सबसे पहले बात करते हैं राजस्थान की जहां वर्तमान में कांग्रेस की सरकार है। यहां कुल 200 विधानसभा सीटों में से 30 फीसदी यानी 59 सीटें आरक्षित हैं। जिनमें से 34 सीटें एससी और 25 सीटें एसटी के लिए हैं। 2013 के चुनाव में बीजेपी ने 45 आरक्षित सीटें जीतकर राज्य की सत्ता को सुनिश्चित किया था लेकिन 2018 में घटकर 21 पर आ गई थी, वहीं 2013 में कांग्रेस सिर्फ सात आरक्षित सीटें ही जीती थी,जो 2018 में बढ़कर 34 सीटों पर पहुंच गई थी जिसमें 21 एसटी और 13 एससी सीटें थी और कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की थी। ऐसे में साफ तौर पर समझा जा सकता है कि कैसे राजस्थान में सत्ता का तिलिस्म एससी-एसटी आरक्षित सीटों में छिपा है। इसलिए इस बार भी बीजेपी और कांग्रेस पूरा दमखम इन्हीं सीटों पर लगा रही हैं।

एमपी की आरक्षित सीटों का समीकरण
मध्य प्रदेश में दलित और आदिवासी वोटर किसी भी राजनीतिक दल का खेल बनाने-बिगाड़ने की ताकत रखते हैं। एमपी में 16 फीसदी एससी और 21 फीसदी एसटी मतदाता हैं। राज्य की कुल 230 विधानसभा सीटों में से 82 सीटें इनके लिए आरक्षित हैं। जिनमें 47 सीट एसटी और 35 सीटें एससी के लिए हैं। 2013 के चुनाव में बीजेपी इन 82 सीटों में से 53 सीटें जीतने में सफल रही थी जबकि 2018 में घटकर 25 सीटों पर सिमट गई थी। कांग्रेस 2013 में सिर्फ 12 आरक्षित सीटें ही जीती थी, लेकिन 2018 के चुनाव में बढ़कर 40 सीटों पर पहुंच गई और सरकार बनाने में सफल रही थी। इसीलिए बीजेपी और कांग्रेस एससी और एसटी समुदाय के वोटों को हासिल करने के लिए जोर आजमाइश कर रही हैं।
छत्तीसगढ़ में एससी-एसटी का दांव

छत्तीसगढ़ की सियासत आदिवासी और दलित समुदाय के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है। राज्य में 34 फीसदी आदिवासी मतदाता हैं। उनके लिए 29 सीटें आरक्षित हैं। दलित 11 फीसदी के करीब हैं और उनके लिए 10 सीटें आरक्षित हैं। इस तरह से राज्य की कुल 90 विधानसभा सीटों में से 39 सीटें आरक्षित हैं जो करीब 40 फीसदी से ज्यादा होता है। पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी 39 आरक्षित सीटों में से महज 6 सीटें ही जीत सकी थी जबकि कांग्रेस ने 28 सीटें जीती थी। इसके दम पर कांग्रेस ने बहुमत हासिल कर सत्ता में वापसी की थी और बीजेपी को 15 साल के बाद विदा होना पड़ा था। ऐसे में इस बार भी दोनों पार्टियां पूरे दमखम के साथ सुरक्षित सीटों पर मशक्कत कर रही हैं।

तेलंगाना-मिजोरम एससी-एसटी सियासत

तेलंगाना में दलित और आदिवासी मतदाता को साधे बिना सत्ता पर काबिज होना लगभग नामुमकिन सा है। क्योंकि यहां 18 फीसदी एससी तो 12 फीसदी एसटी मतदाता हैं। राज्य में 30 फीसदी के करीब दोनों समुदाय के वोटर हैं जिसके चलते तेलंगाना की कुल 119 विधानसभा सीटों में से 31 सीटें आरक्षित हैं जिनमें से 12 सीटें एसटी और 19 सीटें एससी के लिए रिजर्व हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव में ज्यादातर रिजर्व सीटें केसीआर की पार्टी जीतने में सफल रही थी, लेकिन इस बार सियासी हालत बदले हुए नजर आ रहे हैं। कांग्रेस पूरे दमखम के साथ जुटी हुई है तो बीजेपी का भी फोकस इन्हीं सीटों पर है।

मिजोरम की बात करें तो यहां सियासत तो आदिवासी समुदाय के हाथों में है क्योंकि पूरा इलाका पहाड़ी है। राज्य की कुल 40 सीटों में से 39 सीटें एसटी समुदाय के लिए रिजर्व हैं और एक सीट सामान्य वर्ग के लिए है। मिजोरम में एससी समुदाय के लिए कोई सीट नहीं है। 2018 के चुनाव में मिजो नेशनल फ्रंट का प्रदर्शन बेहतर रहा था और पार्टी सत्ता के सिंहासन पर विराजमान हुई थी, लेकिन इस बार उसे चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है।

गौरतलब है कि देश में होने जा रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में सभी सियासी दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। वैसे तो यह ताकत सभी विधानसभा क्षेत्रों में लगाई जा रही है, लेकिन सभी सियासी दलों को अंदाजा है कि इन पांच राज्यों में अगर दलित और आदिवासियों को अपने पक्ष में कर लिया गया तो सत्ता उनके पास ही होगी। राजनीतिक दलों के पास ऐसा सोचने और इस समुदाय के लोगों को अपने पक्ष में करने के पीछे सबसे बड़ा कारण बीते चुनावों के नतीजे हैं। आंकड़े बताते हैं कि 2018 में जिस राज्य में दलित और आदिवासी का बंपर वोट जिस राजनीतिक दल को मिला सत्ता की चाबी उसको ही मिली।

 

2013 के नतीजे इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह ट्रेंड सत्ता पाने के लिए बना रहना बेहद जरूरी है। क्योंकि 2013 में सत्ता पाने वाली भाजपा ने 2018 के चुनाव में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे राज्यों में इस समुदाय पर अपना अधिकार खो दिया था। सियासी आंकड़े इस बात को स्पष्ट करते हैं कि इन चुनावों में अगर दलित और आदिवासी समुदाय को अपने पक्ष में कर लिया गया तो राज्य में सत्ता एक तरह से उसी की हो जाती है। आंकड़ों के मुताबिक पांच राज्यों में विधानसभा की 679 सीटें हैं। इन सभी सीटों में 240 सीटें ऐसी हैं, जो दलित और आदिवासियों के लिए सुरक्षित सीटें हैं। आंकड़ों के मुताबिक पांचों राज्यों की तकरीबन ऐसी 35 फीसदी सीटें आरक्षित कोटे में आती हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों कहना है कि 2018 के चुनाव में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में इन सभी सुरक्षित सीटों पर तकरीबन दो तिहाई कब्जा कर कांग्रेस ने सत्ता की चाबी पाई थी। यही वजह है कि 2023 के विधानसभा चुनाव में सभी राजनीतिक दलों का पूरा फोकस दलित और आदिवासियों पर ही केंद्रित है क्योंकि यही सुरक्षित सीटें इस बार के चुनाव की दशा और दिशा पूरी तरह से बदल देती हैं।

चुनाव आयोग के मुताबिक मिजोरम, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान की विधानसभा सीटों को मिलाया जाए तो कुल सीटें 679 हैं। मौजूदा समय में मिजोरम में 8.52 लाख, छत्तीसगढ़ में 2.03 करोड़, मध्य प्रदेश में 5.6 करोड़, राजस्थान में 5.2 करोड़ और तेलंगाना में 3.17 करोड़ मतदाता हैं। इन सभी को मिलाया जाए तो कुल 8.2 करोड़ पुरुष और 7.8 करोड़ महिला मतदाता हैं।

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