उच्चतम न्यायालय ने अंततः केंद्र सरकार द्वारा 2019 में जम्मू-कश्मीर में लागू अनुच्छेद 370 को हटाने और जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने के फैसले पर अपनी मुहर लगाते हुए दफा 370 को हमेशा के लिए दफन कर दिया है। यह नरेंद्र मोदी सरकार के लिए एक बड़ी कानूनी जीत है। इस फैसले के दूरगामी परिणाम होने तय हैं क्योंकि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को समाप्त कर उसे दो केंद्र शासित राज्यों में बांटने की प्रक्रिया संवैधानिक दृष्टि से दोषपूर्ण थी। केंद्र सरकार के पास बजरिए संसद ऐसी शक्तियां निहित हैं जिनका पालन कर वह राष्ट्र की संप्रभुता और एकता को सुनिश्चित करने के लिए कोई भी कठोर से कठोर फैसला ले सकती है। इसके लिए लेकिन एक पूरी प्रक्रिया है जिसका पालन नहीं किया गया था। उच्चतम न्यायालय के इस फैसले ने उन आशंकाओं में इजाफा करने का काम किया है जिनके अनुसार वर्तमान सरकार के निर्णय और नीतियां संघवाद को कमजोर कर रही हैं। अनुच्छेद 370 को हटाने और जम्मू- कश्मीर को दो भागों में विभक्त कर केंद्र शासित प्रदेशों में बदलने तक सीमित उच्च्तम न्यायालय का यह फैसला मेरी समझ से कई गंभीर सवालों को दरकिनार कर लिया गया ऐसा फैसला है जिसके पीछे देश की सबसे बड़ी अदालत की मंशा जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय को लेकर उठने वाले तमाम संशयों को समाप्त कर राज्य में अमन-चैन का राज स्थापित करने की है। पर वाकई यह फैसला ऐसा कुछ कर पाने में सफल हो पाएगा? क्या कश्मीर में इस फैसले के बाद अलगाववाद की आग और नहीं भड़केगी? और क्या जिस तरीके से केंद्र सरकार ने एक राज्य को दो टुकड़ों में बांटा और उन्हें केंद्र शासित प्रदेशों में बदल डाला, उससे संघवाद कमजोर नहीं होगा? ऐसे कई प्रश्नों का उत्तर भविष्य के गर्भ में छिपा है। लेकिन अभी के लिए शायद उच्चतम न्यायालय का फैसला इससे इतर कुछ और हो नहीं सकता था। चलिए इस फैसले को थोड़ा समझने का प्रयास करते हैं। उच्चतम न्यायालय के समक्ष केंद्र सरकार के फैसले को चुनौती देते हुए जो याचिकाएं दर्ज की गईं थी उनमें मुख्यतः अनुच्छेद 370 को स्थाई प्रकृति का बताया गया था, जम्मू-कश्मीर के पास आंतरिक संप्रभुता होने की बात कही गई थी, 2019 में राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 370 की बाबत जारी आदेश को असंवैधानिक बताया गया था और केंद्र सरकार द्वारा किसी राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में बदलने के निर्णय को संघवाद के खिलाफ बताते हुए उच्चतम न्यायालय से अपील की गई थी कि वह इन मुद्दों पर सुनवाई कर अपना निर्णय सुनाए।
समय की मांग अनुसार फैसला

मेरी बात
याचिकाकर्ताओं के तर्कों को समझने के लिए इतिहास की यात्रा करनी पड़ेगी। 1947 में जब पाकिस्तानी सेना ने कबिलाईयों की ओट लेकर जम्मू-कश्मीर को अपने कब्जे में लेने का प्रयास शुरू किया तब अपनी रियासत को बचाने के लिए महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय को सशर्त मंजूरी देने संबंधी एक करार पर हस्ताक्षर किए थे जिसके बाद जम्मू-कश्मीर में भारतीय सेना को भेजा गया और पाकिस्तान के इरादों को पूरे होने से रोका गया था। इस विलय पत्र के अनुसार 17 अक्टूबर 1949 को भारतीय संविधान में अनुच्छेद 370 को शामिल किया गया। यह अनुच्छेद जम्मू-कश्मीर को कुछ विशेष रियायते देते हुए उसे भारत के संविधान के दायरे से बाहर रखता है। इसमें यह प्रावधान था कि जम्मू-कश्मीर राज्य अपना अलग संविधान रख सकता है और भारत सरकार को केवल विदेश, रक्षा तथा संचार मामलों में ही हस्तक्षेप करने और नियम इत्यादि बनाने का अधिकार रहेगा। इस अनुच्छेद में यह भी स्पष्ट रूप से कहा गया था कि विलय पत्र की शर्तों में भारत सरकार अथवा भारतीय संसद बदलाव नहीं कर सकती है और यदि बदलाव की कभी आवश्यकता पड़ी तो कश्मीर की संविधान सभा की सहमति लेनी होगी। इस अनुच्छेद के चलते राज्य में भारतीय संविधान की धारा 356 लागू नहीं हो सकती थी और राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को रद्द करने का भी अधिकार नहीं था। जम्मू- कश्मीर के लिए भारतीय संविधान में अनुच्छेद 35ए भी जोड़ा गया था जिसके तहत 14 मई 1954 से पहले कश्मीर में रह रहे लोगों को ही राज्य का स्थाई निवासी माना गया और उन्हें ही राज्य में जमीन खरीदने का विशेषाधिकार दिया गया। राज्य सरकार की नौकरियों में भी स्थाई निवासियों का ही हक रखा गया था। उच्चतम न्यायालय में दायर याचिकाओं में तर्क दिया गया था कि अनुच्छेद 370 को हटाया जाना गैरसंवैधानिक और राजा हरि सिंह के साथ किए गए विलय पत्र की शर्तों का उल्लंघन है। यहां यह समझा जाना जरूरी है कि कश्मीर की संविधान सभा राज्य का अलग संविधान लागू होने बाद 1956 में भंग कर दी गई थी। याचिकाकर्त्ताओं ने संविधान सभा के अस्तित्व में न रहने को आधार बनाते हुए तर्क दिया कि जब सभा अस्तित्व में है ही नहीं तो अनुच्छेद 370 में संशोधन कैसे किया जा सकता है? उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया है कि संविधान सभा के भंग होने बाद भारत के राष्ट्रपति के पास अनुच्छेद में संशोधन करने की एकतरफा शक्ति निहित है। याचिककर्ताओं का दूसरा तर्क जम्मू-कश्मीर की आंतरिक संप्रभुता की बाबत था। उनका कहना था कि विलय पत्र के अनुसार रक्षा, संचार तथा विदेशी मामलों को छोड़ कर भारतीय संविधान जम्मू- कश्मीर राज्य में लागू नहीं हो सकता था। उच्चतम न्यायालय ने इस दलील को भी नहीं माना और जम्मू- कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानते हुए उसके पास किसी भी प्रकार की संप्रभुता होने की बात को नकार दिया है। हालांकि पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ में शामिल एक न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने अपने निर्णय में माना कि राज्य के पास कुछ आंतरिक संप्रभुता है लेकिन उन्होंने इसे समाप्त किए जाने की शक्ति केंद्र सरकार के पास होने की बात भी अपने निर्णय में रहते हुए अनुच्छेद 370 को हटाए जाने को जायज करार दिया है।
याचिकाकर्ताओं ने 2019 में अनुच्छेद 370 को हटाने और राज्य को दो भागों में विभक्त कर उन्हें केंद्र शासित प्रदेशों में बदलने की बाबत राष्ट्रपति द्वारा जारी एक आदेश को गलत बताते हुए तर्क दिया था कि राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 367 में संशोधन करते हुए जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा का अर्थ विधान सभा माना जो कि असंवैधानिक है। न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकारते हुए अपने निर्णय में कहा कि राष्ट्रपति द्वारा दिया गया आदेश अमान्य है क्योंकि यह एक प्रकार का संविधान संशोधन है जिसका अधिकार राष्ट्रपति के पास निहित नहीं है। गौरतलब है कि संविधान में संशोधन केवल संसद के द्वारा ही किया जा सकता है इसलिए उच्चतम न्यायालय ने यह दलील स्वीकारी जरूर लेकिन इससे याचिकाकर्ताओं को कोई लाभ नहीं मिला क्योंकि न्यायालय ने राष्ट्रपति के पास अनुच्छेद 370 में संशोधन करने की एकतरफा शक्ति होने की बात भी अपने निर्णय में कह डाली। जिसका परिणाम रहा केंद्र द्वारा 2019 में अनुच्छेद 370 को रद्द करने के फैसले को उच्चतम न्यायालय की वैधता मिलना। यचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि केंद्र सरकार किसी राज्य को बगैर वैधानिक प्रक्रिया अपनाए राष्ट्रपति के आदेश जरिए केंद्र शासित प्रदेश में नहीं बदल सकती है और ऐसा करने से संघवाद के कमजोर पड़ने का खतरा है। उच्चतम न्यायालय ने इस मुद्दे पर यह कहते हुए विचार ही नहीं किया कि सरकार ने न्यायालय को आश्वासन दिया है कि वह जम्मू-कश्मीर को पुनः राज्य का दर्जा जल्द ही दे देगी और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाए रखा जाएगा। न्यायालय का इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर विचार तक नहीं करना चिंतनीय है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 अनुसार- ‘संसद, विधि द्वारा किसी राज्य में से उसका क्षेत्र अलग करके अथवा दो या अधिक राज्यों को या राज्यों के भागों को मिलाकर अथवा किसी राज्य क्षेत्र को किसी राज्य के भाग के साथ मिलाकर नए राज्य का निर्माण कर सकेगी।’ इस अनुच्छेद में लेकिन केंद्र सरकार अथवा राष्ट्रपति को यह अधिकार नहीं दिया गया है कि वह किसी राज्य का दर्जा कमतर करते हुए उसे केंद्र शासित प्रदेश में बदल सकती है। उच्चतम न्यायालय द्वारा अपने निर्णय में संघवाद को कमजोर किए जाने के तर्क पर विचार तक नहीं किया जाना आने वाले समय में केंद्र की शक्तियों को असीमित करने की प्रवृत्ति और परंपरा को जन्म दे सकता है। राजनीतिक विज्ञानी और अंग्रेजी दैनिक ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के नियमित स्तंभकार प्रताप भानू मेहता इस मुद्दे पर अपनी चिंता कुछ यूं जाहिर करते हैं- ‘इस निर्णय ने एक नए न्याय शास्त्र का अविष्कार कर दिखाया हैः आप कुछ भी असंवैधानिक कर सकते हैं, ऐसे कार्य के सभी लाभ भी ले सकते हैं और फिर जब कभी चाहें तब पुरानी स्थिति को बहाल कर सकते हैं। अनुच्छेद 370 को रद्द किए जाने की निश्चित ही सही ठहराया जा सकता है लेकिन अदालत द्वारा भारतीय संघवाद में की गई सबसे महत्वपूर्ण और नवीन प्रकार की गिरावट, जिसका उदाहरण जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन कानून, 2019 है, को पूरी तरह नजरअंदाज करना स्वयं अदालत की शक्तियों के हित में नहीं होगा। प्रदर्शनात्मक रूप से न्यायालय ने अंत में कहा है कि ‘‘भारत का पूरा संविधान जम्मू-कश्मीर पर लागू होता है लेकिन अभी नहीं।’’ यह वास्तव में एक शानदार प्रस्तुति है।’
कुल मिलाकर मेरी नजर में जहां तक अनुच्छेद 370 को रद्द करने का प्रश्न है तो उच्चतम न्यायालय का फैसला समय-काल और परिस्थिति अनुसार ठीक प्रतीत होता है भले ही इस फैसले में विलय पत्र को नजरअंदाज किया गया हो और केंद्र द्वारा सही प्रक्रिया को नहीं अपनाया गया हो। चिंताजनक लेकिन जम्मू-कश्मीर राज्य को केंद्र शासित दो राज्यों में बदले जाने से उत्पन्न आशंकाओं का निवारण उच्चतम न्यायालय द्वारा नहीं किया जाना है। इसलिए मैं इसे आधा-अधूरा सा फैसला कहने को बाध्य हूं।
