हिंदुस्तान की हिन्दुस्तानियत के लिए मुनव्वर सा’ब का जाना जैसे मछलियों के लिए एकाएक समुंदर से पानी का सूख जाना। यह नुकसान अदब और अवाम, दोनों के हिस्से का साझा नुकसान है। मुनव्वर राना शा’इर क्या थे, जैसे एक सदी थे। जिनकी आंखों ने इस जहां की अनगिनत त्रासदियों को देखा, जिसमें उनके अपने लोग भी बंटवारे के बाद एक-एक कर उस पार चले गए, कभी फिर वापस न आने के लिए। जिन्होंने उभरती और मरती कौमों की बादशाहियां देखीं। सियासत की आंख से आंख मिलाकर बात करने वाला वह शा’इर, अपने घर की औरतों की सोहबत में बना एक अदबी इंसान। उन्होंने लिखा भी है, ‘दिल ऐसा कि सीधे किए जूते भी बड़ों के जिद, इतनी कि खुद ताज उठा कर नहीं पहना।’ उनके इस शे’र से जो पहला वाक्या यहां दर्ज करने का मन हो रहा है वह यह कि वर्ष 2014 में उन्हें ‘शाहदाबा’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। इसी के अगले वर्ष यानी 2015 में उन्होंने दादरी में अखलाक, उससे पहले सीपीआई नेता गोविंद पनसारे और लेखक कलबुर्गी की हत्या के प्रतीकात्मक विरोध के तौर पर साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा दिया था। यह एक शा’इर की खुद्दारी ही थी वरना सियासत के दरबार में कई दिग्गज अपनी शख्सियत खो बैठते हैं।
अपना सम्मान चिÐ और एक लाख रुपए की राशि वापस करते हुए उन्होंने कहा था ‘मैं रायबरेली का रहने वाला हूं। सत्ता हमारी शहर की नालियों में बहकर दिल्ली पहुंचती थी। जब दादरी की घटना हुई, मैं दोहा में था। मैंने फेसबुक पर इसे आतंकी घटना कहा तो मुझ पर चारों ओर से हमले होने लगे। ….इस देश में बिजली के तार नहीं जोड़े जा पाते, लेकिन मुसलमानों के तार न जाने किससे-किससे जोड़ दिए जाते हैं।’ यह एक टीस थी उस गहरे खाई की जो सियासी लोगों की वजह से थी, जिसे उन्होंने अपने हिंदी-उर्दू शायरी अदब से भरसक पाटने की कोशिश की। लगातार लिखते रहे, बोलते रहे, अपने अंतिम दिनों तक मंचों से सरे-आम रोते रहे जैसे कोई बच्चा रोता है। उनकी उंगलियां हमेशा सच की ओर इशारा करती रहीं। उंगलियां ऐसा करती भी क्यों न, उन्होंने अपने बुजुर्गों की उल्टी जूतियां जो खूब सीधी की थीं। एक साक्षात्कार में वे बताते हैं कि जब उन्होंने साहित्य अकादमी लौटाया था, उसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोगों के हवाले से उनके पास कई मर्तबा मिलने का बुलावा आया। मगर हर बार उन्होंने मना किया। मगर शा’इर वो भी एहसासों को तरजीह देने वाला शख्स, एक बार पिघल गया।
हुआ यूं कि जब मुनव्वर राना सा’ब की मां का इंतकाल हुआ तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें एक पत्र लिखा और उनके मां के जाने पर दुःख व्यक्त किया। इस शा’इर पर इस बार असर होना ही था, उन्हें महसूस हुआ कि अब तो यह कर्ज उतारना पड़ेगा। इस तरह वे आखिर एक मर्तबा बुलावे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने गए। मां के जिक्र से उनके बचपन का एक वाक्या जो वे अक्सर याद कर रोने लगते थे, वह यह कि मुनव्वर अली (मुनव्वर राना) के पिता अनवर अली जब ट्रक चलाते थे और बहुत दिनों तक उन्हें बाहर रहना पड़ता था तो मुफलिसी के उन दिनों में जब कई-कई दिन घर पर चूल्हा नहीं जलता था तो इनकी मां इन्हें इनकी खाला के साथ उनके घर भेज देती थीं, ताकि बच्चों को वहां खाना तो मिल जाएगा, भूखे तो नहीं सोएंगे।
खाला के घर बच्चे जाते, जब तक घर के हालात ठीक नहीं होते तब तक रुकते और फिर वापस आ जाते। खाला के घर के ठीक सामने एक कुआं था और उन दिनों मुनव्वर को रात में चलने की बीमारी थी। इधर मां को इस बात का डर सताता कि अगर नींद में वह चलते-चलते किवाड़ खोलकर आगे चलता गया तो कुएं में गिर जाएगा, डूब गया तो! इसी डर से मुनव्वर की मां रातभर सोती नहीं, बेचैनी में घर के पास गांव में एक कुएं के पास जाकर बैठ जातीं और रोती रहतीं, मुनव्वर के सलामती की दुआएं करतीं। उन्हें लगता पानी का पानी से रिश्ता होता है, इस कुएं के पानी से इल्तिजा करतीं कि अगर मुनव्वर वहां उस कुएं में गिर गया तो उस पानी तक मेरी बात पहुंचा दो कि वो मेरे बेटे को डुबाए नहीं। ऐसी मां पर मुनव्वर ने अपनी कलम से जो लिखा, वह भी कम ही लगता है।
मां पर उनकी सबसे मशहूर नज़्म है,
किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई
मैं घर में सब से छोटा था मिरे हिस्से में मां आई
यहां से जाने वाला लौटकर कोई नहीं आया
मैं रोता रह गया लेकिन न वापस जा के मां आई
राना सा’ब कहते थे कि जब दूसरे शा’इर अपनी
प्रेमिकाओं को, खुदा को महबूब मानकर शायरी लिख सकते हैं तो मैं अपनी मां को महबूब मानकर शायरी क्यों नहीं कर सकता। इस बात से उनके स्कूली दिनों का एक वाक्या याद आता है, तब वे और उनका परिवार कलकत्ता में ही रहता था। लड़कपन के दिनों से ही मुनव्वर उर्दू गजलें लिखने लगे थे। तब उनके एक बंगाली दोस्त ने कहा था कि ‘जब तुम्हारी उर्दू कोठों की सीढ़ियों से नीचे उतर रही थी तब हमारी बांग्ला भाषा और उसका साहित्य अंग्रेजों से पंजे लड़ा रहा था।’ यही वो बात थी जो उनके सीने में घाव कर गई थी और फिर मुनव्वर राना ने इसमें नया करने का सोचा होगा, आगे हम वाकिफ हैं कि उर्दू शायरी को जाहिर तौर पर उन्होंने अपने प्रयोगों से ऊंचा मकाम दिया। जब और शा’इर अपनी कलम से माशूका के होंठों, आंखों, उसके दुपट्टे तक ही सीमित थे तब मुनव्वर सा’ब की नज़्मों में हिंदुस्तानी रूह की तासीर तारी होती है, बंटवारें के दर्द को अपनी स्याही में उतारा। एकता, अमन, गंगा-जमुनी तहजीब को जिंदा रखने के लिए अपनी कलम को मशाल बना दिया।
उन्होंने मां पर खूब लिखा। इसके साथ ही घर पर लिखा, पिता पर, बहन पर, दादी-नानी पर लिखा, भाइयों पर लिखा। मैंने ऊपर लिखा भी कि अपने घर की औरतों की सोहबत से बना एक मुकम्मल इंसान। मुकम्मल इंसान इसलिए क्योंकि उसे अपनी मां, बहनों और बेटियों का दर्द महसूस करना आता था, उसे रोना आता था। तथाकथित मर्दवादी अहम से कोसों दूर, अपने पिता की तरह। उन्होंने एक जगह जिक्र किया है कि सन् 57-58 की बात है, फूफियों के इश्क में उनकी दादी पाकिस्तान जाना चाहती थीं, बहुत जिद करने पर उनके पिता ने दादी को पाकिस्तान जाने वाली ट्रेन पर एक जानने वाले के साथ बैठा दिया। मगर जब तक ट्रेन ओझल नहीं हो गई, तब तक वह उसके पीछे भागते रहे, चिल्लाते रहे कि ‘कि अम्मा एक बार रुक जा, अबही न जा। उतर आवा अम्मा, उतर आवा . . .ना जा अम्मा . . .’ प्लेटफार्म पर पैर लड़खड़ाने से कई बार गिरते, फिर उठते। फिर वही पुकार . . .। छोटे से मुनव्वर ने यह सब देखा था। महसूसा था, अपने पिता के भीतर के बेटे को। उन्हें बाद में भी याद आता रहता था अपनी दादी का वह कहा जो उन्होंने उनकी मां से कहा था कि ‘मुन्ना को कभी मारना मत, इसे मारोगी तो समझ लेना तुम मुझे मारोगी!’ दादी के पाकिस्तान चले जाने के बाद जब भी इनकी मां इन्हें मारने दौड़ती तो उन्हें अपनी सास का कहा याद आता, इस तरह उन्होंने अपने अंतिम सांस लेने तक कभी भी अपने बेटे पर हाथ नहीं उठाया था।
खैर, जो लोग एक खास राजनीतिक विचारधारा के चलते मुनव्वर सा’ब को मजहबी खेमों में बांटते हैं उन्हें अंदाजा नहीं कि यह शख्स ताउम्र सांप्रदायिकता के खिलाफ खड़ा रहा। उनकी रचनाओं का अधिकांश हिस्सा सिर्फ एक आवाज उठाता है,
प्रतिरोध की आवाज। उन्हीं के शे’र का एक हिस्सा है कि ‘मैं दूर तक फैले अपने दायरे को खुद समेट भी सकता हूं।’ और आखिर, एक आजाद कलम के मालिक मुनव्वर राना सा’ब ने खुद को समेट लिया। मुझे इस शख्स के जिंदगी का कोई वरक, कोई हर्फ मैला नहीं दिखाई देता।
(लेखिका लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ से जुड़ी हैं एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

